भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १०] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण····भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५९


श्लोकहिन्दी अर्थ
न दुर्लभा न सन्देहो भक्तानां किं पुनस्तथा।<br>ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणां तथान्येषामपि स्थितिः॥ ३६प्राणियोंको स्वर्ग आदि लोक सहज ही सुलभ हो जाते हैं तो फिर साक्षात् शिवभक्तोंके विषयमें क्या कहना! इस वास्तविकतामें कोई संदेह नहीं है॥ ३५¹/२॥
भक्त्या एव मुनीनां च बलसौभाग्यमेव च।<br>भवेन च तथा प्रोक्तं सम्प्रेक्ष्योमां पिनाकिना॥ ३७ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा अन्य देवता शिवभक्तिके द्वारा ही उत्तम पदको प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार मुनियोंका भी बल तथा सौभाग्य शिवभक्तिके ही कारण है॥ ३६¹/२॥
देव्यै देवेन मधुरं वाराणस्यां पुरा द्विजाः।<br>अविमुक्ते समासीना रुद्रेण परमात्मना॥ ३८हे ऋषियो! प्राचीन कालमें देवाधिदेव पिनाकी शंकरने उमाको लक्ष्य करके वाराणसीमें उनसे जिस मधुर प्रसंगका वर्णन किया था, वही मैं भी आप लोगोंसे कह रहा हूँ॥ ३७¹/२॥
रुद्राणी रुद्रमाहेदं लब्ध्वा वाराणसीं पुरीम्।अविमुक्त क्षेत्र वाराणसीपुरीमें आकर भगवान् शिवके साथ विराजमान भगवती रुद्राणीने उन भगवान् रुद्रसे यह पूछा॥ ३८¹/२॥
श्रीदेव्युवाच<br>केन वश्यो महादेव पूज्यो दृश्यस्त्वमीश्वरः॥ ३९<br><br>तपसा विद्यया वापि योगेनेह वद प्रभो।देवी श्रीपार्वतीने कहा— हे महादेव! तप, विद्या, योग आदि किस साधनसे आप वशमें होते हैं, पूजित होते हैं तथा दर्शन देते हैं? हे प्रभो! मुझे बताइये॥ ३९¹/२॥
सूत उवाच<br>निशम्य वचनं तस्यास्तथा ह्यालोक्य पार्वतीम्॥ ४०सूतजी बोले— उन पार्वतीका वचन सुनकर बालचन्द्रमाको तिलकरूपमें धारण करनेवाले शिवने पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मुखवाली पार्वतीकी ओर देखकर हँसते हुए उनसे कहा—॥ ४०¹/२॥
आह बालेन्दुतिलकः पूर्णेन्दुवदनां हसन्।<br>स्मृत्वाथ मेनया पत्या गिरेर्गां कथितां पुरा॥ ४१<br><br>चिरकालस्थितिं प्रेक्ष्य गिरौ देव्या महात्मनः।<br>देवि लब्धा पुरी रम्या त्वया यत्प्रष्टुमर्हसि॥ ४२पूर्वमें चिरकालतक कैलासपर पार्वतीसहित मुझे रहते हुए देखकर हिमालयकी पत्नी मेनाद्वारा [अपना स्थान होना चाहिये—इस प्रकार] कही गयी वाणीको स्मरणकर सदाशिव बोले—हे देवि! हे विलासिनि! क्या तुम स्थानहेतु अपनी माताके द्वारा कहे गये वचनोंको भूल गयी हो? अब तुमने परम रम्य काशीपुरीको पा लिया है, अतः निश्चिन्त होकर अब तुम प्रश्न करनेयोग्य हो॥ ४१-४२¹/२॥
स्थानार्थं कथितं मात्रा विस्मृतेह विलासिनि।<br>पुरा पितामहेनापि पृष्टः प्रश्नवतां वरे॥ ४३प्रश्न करनेवालोंमें श्रेष्ठ हे पार्वति! जिस प्रकार ब्रह्मात्मक तत्त्व जाननेके लिये इस समय तुमने मुझसे प्रश्न किया है, उसी प्रकार प्राचीन कालमें पितामह ब्रह्माने भी मुझसे पूछा था॥ ४३¹/२॥
यथा त्वयाद्य वै पृष्टो द्रष्टुं ब्रह्मात्मकं त्वहम्।<br>श्वेते श्वेतेन वर्णेन दृष्ट्वा कल्पे तु मां शुभे॥ ४४हे कल्याणि! श्वेतकल्पमें श्वेतवर्ण सद्योजात