श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ५८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | अर्थ |
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| प्रीतितापविषादेभ्यो विनिवृत्तिर्विरक्तता।<br>संन्यासः कर्मणां न्यासः कृतानामकृतैः सह॥ २७ | नहीं होता तथा अनुकूल विषयोंकी प्राप्तिपर हर्षित नहीं होता; वह प्रीति, संताप तथा विषादसे रहित हो जाता है। उसकी यह विनिवृत्ति ही विरक्तता (विराग) कही जाती है॥ २६१/२॥ |
| कुशलाकुशलानां तु प्रहाणं न्यास उच्यते।<br>अव्यक्ताद्यविशेषान्ते विकारेऽस्मिन्नचेतने॥ २८ | निषिद्ध कर्मोंसहित विहित कर्मोंमें दोष-गुण बुद्धिका न्यास (त्याग) ही संन्यास है और इष्ट और अनिष्ट कर्मोंका भलीभाँति छोड़ना ही न्यास है॥ २७१/२॥ |
| चेतनाचेतनान्यत्वविज्ञानं ज्ञानमुच्यते।<br>एवं तु ज्ञानयुक्तस्य श्रद्धायुक्तस्य शङ्करः॥ २९ | अव्यक्त अर्थात् प्रकृतिसे लेकर परमाणुपर्यन्त इस जड जगत्के सभी पदार्थोंसे ईश्वरको पृथक् जानना ही वास्तविक ज्ञान है॥ २८१/२॥ |
| प्रसीदति न सन्देहो धर्मश्चायं द्विजोत्तमाः।<br>किं तु गुह्यतमं वक्ष्ये सर्वत्र परमेश्वरे॥ ३० | हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकारके ज्ञान तथा भक्ति (श्रद्धा)-से सम्पन्न पुरुषके ऊपर भगवान् शंकर अवश्य प्रसन्न होते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है और वास्तवमें यही धर्म है॥ २९१/२॥ |
| भवे भक्तिर्न सन्देहस्तया युक्तो विमुच्यते।<br>अयोग्यस्यापि भगवान् भक्तस्य परमेश्वरः॥ ३१ | 'परम गुह्य रहस्य क्या है' अब मैं आप लोगोंको वह बताता हूँ। सर्वव्यापी परमेश्वर शिवमें भक्ति रखनी चाहिये। उस भक्तिसे युक्त प्राणी निःसंदेह मुक्ति प्राप्त कर लेता है॥ ३०१/२॥ |
| प्रसीदति न सन्देहो निगृह्य विविधं तमः।<br>ज्ञानमध्यापनं होमो ध्यानं यज्ञस्तपः श्रुतम्॥ ३२ | पात्रता न होनेपर भी उनकी परम भक्तिसे युक्त प्राणीके विविध अज्ञानरूप अन्धकारोंको दूर करके महेश्वर शिव उसपर प्रसन्न हो जाते हैं; इसमें संदेह नहीं है॥ ३११/२॥ |
| दानमध्ययनं सर्वं भवभक्त्यै न संशयः।<br>चान्द्रायणसहस्रैश्च प्राजापत्यशतैस्तथा॥ ३३ | ज्ञान, अध्यापन, होम, ध्यान, यज्ञ, तप, वेद, दान, अध्ययन—ये सभी शिवकी भक्ति प्राप्त करनेके साधन हैं; इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है॥ ३२१/२॥ |
| मासोपवासैश्चान्यैर्वा भक्तिर्मुनिवरोत्तमाः।<br>अभक्ता भगवत्यस्मिँल्लोके गिरिगुहाशये॥ ३४ | हे मुनीश्वरो! हजारों चान्द्रायण तथा सैकड़ों प्राजापत्यव्रतों, मासपर्यन्त किये गये उपवासों तथा अन्य अनुष्ठान आदिकी अपेक्षा शिवभक्ति ही श्रेष्ठ है॥ ३३१/२॥ |
| पतन्ति चात्मभोगार्थं भक्तो भावेन मुच्यते।<br>भक्तानां दर्शनादेव नृणां स्वर्गादयो द्विजाः॥ ३५ | भगवान् शिवकी भक्तिसे हीन प्राणी स्वर्गादिकी प्राप्तिके लिये अनेकविध कर्मजालमें फँसकर गहन गिरि-गुहारूपी इस मृत्युलोकमें बार-बार गिरते रहते हैं, किंतु भक्तिभावसे युक्त प्राणी मुक्त हो जाता है॥ ३४१/२॥<br>हे द्विजो! भगवान् शिवके भक्तोंके दर्शनमात्रसे |