भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १०] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण····भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आचिनोति च शास्त्रार्थनाचार्यस्तेन चोच्यते।<br>विज्ञेयं श्रवणाच्छ्रौतं स्मरणात्स्मार्तमुच्यते॥ १६नियोजित करता है एवं शास्त्रोंके अर्थोंका परिशीलन करता है; वह आचार्य कहा जाता है॥ १५ १/२॥<br>वेदोंका श्रवण करनेसे श्रौत तथा शास्त्रोंके अर्थोंका स्मरण करनेसे स्मार्त कहा जाता है। वेदविहित यज्ञ आदि करनेवाला श्रौत तथा वर्णाश्रमसम्बन्धी नियमोंका पालन करनेवाला स्मार्त कहा जाता है॥ १६ १/२॥
इज्या वेदात्मकं श्रौतं स्मार्तं वर्णाश्रमात्मकम्।<br>दृष्ट्वानुरूपमर्थं यः पृष्टो नैवापि गूहति॥ १७किसीके द्वारा पूछनेपर देखे गये अनुरूप (कथनयोग्य) तथा अननुरूप (कथनके अयोग्य) विषयको बिना छिपाये अभिव्यक्त करनेको लिङ्गपुराणके अनुसार सत्य कहा गया है॥ १७ १/२॥
यथादृष्टप्रवादस्तु सत्यं लैङ्गेऽत्र पठ्यते।<br>ब्रह्मचर्यं तथा मौनं निराहारत्वमेव च॥ १८ब्रह्मचर्य, मौन, निराहार, अहिंसा तथा सर्वविध शान्तिको तप कहा गया है॥ १८ १/२॥
अहिंसा सर्वतः शान्तिस्तप इत्यभिधीयते।<br>आत्मवत्सर्वभूतेषु यो हितायाहिताय च॥ १९जो पुरुष सदा अपने ही हित तथा अहितकी भाँति सभी प्राणियोंके हिताहितका ध्यान रखता है; उसकी यह निरन्तर बनी रहनेवाली वृत्ति पूर्णतः दया कही गयी है॥ १९ १/२॥
वर्तते त्वसकृद्वृत्तिः कृत्स्ना ह्येषा दया स्मृता।<br>यद्यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनैवागतं क्रमात्॥ २०<br><br>तत्तद्गुणवते देयं दातुस्तद्दानलक्षणम्।<br>दानं त्रिविधमित्येतत्कनिष्ठज्येष्ठमध्यमम्॥ २१<br><br>कारुण्यात्सर्वभूतेभ्यः संविभागस्तु मध्यमः।क्रमसे न्यायपूर्वक अर्जित अभीष्टतम द्रव्य गुणीको ही दिया जाना चाहिये। दाताके द्वारा प्रदत्त दानका यही लक्षण है। वह दान भी कनिष्ठ, मध्यम तथा श्रेष्ठ—तीन प्रकारका होता है। करुणापूर्वक सभी प्राणियोंके निमित्त धनका विभाग करना मध्यम दान है॥ २०-२१ १/२॥
श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मो वर्णाश्रमात्मकः॥ २२श्रुतियों तथा स्मृतियोंसे विहित वर्णाश्रमसम्बन्धी तथा शिष्टाचारके अनुकूल जो धर्म है, वह साधुधर्म कहा जाता है॥ २२ १/२॥
शिष्टाचाराविरुद्धश्च स धर्मः साधुरुच्यते।<br>मायाकर्मफलत्यागी शिवात्मा परिकीर्तितः॥ २३मायायुक्त कर्मफलका त्याग करनेवाला शिवात्मा कहा जाता है तथा सभी आसक्तियोंसे निवृत्त प्राणी युक्त-योगी कहा जाता है॥ २३ १/२॥
निवृत्तः सर्वसङ्गेभ्यो युक्तो योगी प्रकीर्तितः।<br>असक्तो भयतो यस्तु विषयेषु विचार्य च॥ २४अनासक्त तथा पुनः-पुनः जन्म-मृत्युके भयसे भीत होकर विषयभोगोंकी नश्वरतापर विचार करके सभी ओरसे प्रलोभन दिये जानेपर भी जो अलुब्ध बना रहता है, वह संयमी कहा जाता है॥ २४ १/२॥
अलुब्धः संयमी प्रोक्तः प्रार्थितोऽपि समन्ततः।<br>आत्मार्थं वा परार्थं वा इन्द्रियाणीह यस्य वै॥ २५अपने लिये अथवा दूसरेके लिये जिस व्यक्तिकी इन्द्रियाँ मिथ्या प्रवृत्त नहीं होतीं, वह शमके लक्षणोंवाला कहा जाता है॥ २५ १/२॥
न मिथ्या सम्प्रवर्तन्ते शमस्यैव तु लक्षणम्।<br>अनुद्विग्नो ह्यनिष्टेषु तथेष्टान्नाभिनन्दति॥ २६जो अनिष्ट अर्थात् प्रतिकूल विषयोंपर उद्विग्न
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