भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ११] श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा ६१


ग्यारहवाँ अध्याय

श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले—
कथं वै दृष्टवान् ब्रह्मा सद्योजातं महेश्वरम्।<br>वामदेवं महात्मानं पुराणपुरुषोत्तमम्॥ १<br>अघोरं च तथेशानं यथावद्वक्तुमर्हसि।[हे सूतजी!] ब्रह्माजीने सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर तथा ईशानसंज्ञक सनातन पुरुषोत्तम महेश्वर शिवको किस प्रकार देखा? आप हमें यथावत् रूपसे यह बतानेकी कृपा कीजिये॥ १ १/२॥
सूत उवाचसूतजी बोले—
एकोनत्रिंशकः कल्पो विज्ञेयः श्वेतलोहितः॥ २<br>तस्मिंस्तत्परमं ध्यानं ध्यायतो ब्रह्मणस्तदा।<br>उत्पन्नस्तु शिखायुक्तः कुमारः श्वेतलोहितः॥ ३उनतीसवाँ कल्प श्वेतलोहित नामसे जाना जाता है। उस कल्पमें जब ब्रह्माजी समाधिस्थ होकर परमेश्वरका ध्यान कर रहे थे, उसी समय शिखाधारी श्वेतलोहित वर्णवाला एक कुमार प्रकट हुआ॥ २-३॥
तं दृष्ट्वा पुरुषं श्रीमान् ब्रह्मा वै विश्वतोमुखः।<br>हृदि कृत्वा महात्मानं ब्रह्मरूपिणमीश्वरम्॥ ४<br>सद्योजातं ततो ब्रह्मा ध्यानयोगपरोऽभवत्।<br>ध्यानयोगात्परं ज्ञात्वा ववन्दे देवमीश्वरम्॥ ५उन सद्योजात कुमारको देखकर सर्वतोमुख श्रीमान् ब्रह्माजी उन्हीं ब्रह्मरूपी महात्मा परमेश्वरको हृदयमें धारण करके ध्यानयोगमें तत्पर हो गये। पुनः ध्यान-योगसे उन्हें साक्षात् परमेश्वर जानकर प्रणाम किया। ब्रह्माजीने उन सद्योजात कुमारको परात्पर ब्रह्म कल्पित कर लिया॥ ४-५ १/२॥
सद्योजातं ततो ब्रह्मा ब्रह्म वै समचिन्तयत्।<br>ततोऽस्य पार्श्वतः श्वेताः प्रादुर्भूता महायशाः॥ ६<br>सुनन्दो नन्दनश्चैव विश्वनन्दोपनन्दनौ।<br>शिष्यास्ते वै महात्मानो यैस्तद् ब्रह्म सदावृतम्॥ ७तत्पश्चात् उन सद्योजात ब्रह्मके समीप ही सुनन्द, नन्दन, विश्वनन्द तथा उपनन्दन नामक श्वेतवर्णवाले चार महायशस्वी शिष्य प्रकट हुए। वे महात्मा शिष्य उन सद्योजात ब्रह्मकी सेवामें सर्वदा तत्पर रहते थे॥ ६-७॥
तस्याग्रे श्वेतवर्णाभः श्वेतो नाम महामुनिः।<br>विजज्ञेऽथ महातेजास्तस्माजज्ञे हरस्त्वसौ॥ ८उनके आगे श्वेत वर्णकी आभावाले श्वेत नामक एक महातेजस्वी मुनि उत्पन्न हुए। उन सद्योजातसे उत्पन्न होनेके कारण उस मुनिका नाम हर भी है॥ ८॥
तत्र ते मुनयः सर्वे सद्योजातं महेश्वरम्।<br>प्रपन्नाः परया भक्त्या गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम्॥ ९वहाँपर वे सभी मुनि परम भक्तिसे शाश्वत ब्रह्मरूप उन सद्योजात महेश्वरकी स्तुति करते हुए उनके शरणागत हुए॥ ९॥
तस्माद्विश्वेश्वरं देवं ये प्रपद्यन्ति वै द्विजाः।<br>प्राणायामपरा भूत्वा ब्रह्मतत्परमानसाः॥ १०<br>ते सर्वे पापनिर्मुक्ता विमला ब्रह्मवर्चसः।<br>विष्णुलोकमतिक्रम्य रुद्रलोकं व्रजन्ति ते॥ ११अतएव हे द्विजो! जो प्राणी प्राणायामपरायण होकर ब्रह्मतत्परचित्तसे उन विश्वेश्वरदेवके शरणागत होते हैं; वे सभी पापोंसे मुक्त, विमल आत्मावाले तथा ब्रह्मज्ञानी हो जाते हैं और अन्तमें विष्णुलोकको भी पार करके रुद्रलोकको जाते हैं॥ १०-११॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सद्योजातमाहात्म्यं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सद्योजातमाहात्म्य' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥