श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| सद्योजातं तथा रक्ते रक्तं वामं पितामहः।<br>पीते तत्पुरुषं पीतमघोरे कृष्णमीश्वरम्॥ ४५<br><br>ईशानं विश्वरूपाख्ये विश्वरूपं तदाह माम्। | नामवाले, रक्तकल्पमें रक्तवर्ण वामदेव नामवाले, पीत-कल्पमें पीतवर्ण तत्पुरुष नामवाले, कृष्णकल्पमें कृष्ण-वर्ण अघोर नामवाले तथा विश्वरूपकल्पमें विश्वरूप ईशान नामवाले मुझ ईश्वरको देखकर ब्रह्माजीने मुझसे कहा॥ ४४-४५ १/२॥ | | पितामह उवाच<br>वाम तत्पुरुषाघोर सद्योजात महेश्वर॥ ४६ | ब्रह्माजी बोले— हे वामदेव! हे तत्पुरुष! हे अघोर! हे सद्योजात! हे महेश्वर! हे देवदेव! महादेव! मैंने गायत्री-उपासनासे आपका दर्शन किया है॥ ४६ १/२॥ | | दृष्टो मया त्वं गायत्र्या देवदेव महेश्वर।<br>केन वश्यो महादेव ध्येयः कुत्र घृणानिधे॥ ४७<br><br>दृश्यः पूज्यस्तथा देव्या वक्तुमर्हसि शङ्कर। | हे महादेव! आप किस प्रकार वशमें होते हैं? हे दयानिधे! आपका ध्यान कहाँ करना चाहिये? आप देवी पार्वतीके द्वारा दृश्य तथा पूज्य हैं। हे शंकर! कृपा करके मुझे बताइये॥ ४७ १/२॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>अवोचं श्रद्धयैवेति वश्यो वारिजसम्भव॥ ४८ | भगवान् श्रीशंकर [ पार्वतीसे ] बोले— तब मैंने ब्रह्माजीसे कहा कि हे कमलोद्भव पितामह! मैं केवल श्रद्धासे वशमें किया जा सकता हूँ और आपने तथा विष्णुने समुद्रमें जिस लिङ्गका दर्शन किया था, उसीमें सबको मेरा ध्यान करना चाहिये॥ ४८ १/२॥ | | ध्येयो लिङ्गे त्वया दृष्टे विष्णुना पयसां निधौ।<br>पूज्यः पञ्चास्यरूपेण पवित्रैः पञ्चभिर्द्विजैः॥ ४९ | द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य)-को पवित्र सद्योजात आदि पाँच मन्त्रोंसे मेरे पंचमुखरूपकी पूजा करनी चाहिये। हे अण्डज! हे जगद्गुरो! आज आपने उसी भक्तिसे ही मेरा दर्शन प्राप्त किया है॥ ४९ १/२॥ | | भवभक्त्याद्य दृष्टोऽहं त्वयाण्डज जगद्गुरो।<br>सोऽपि मामाह भावार्थं दत्तं तस्मै मया पुरा॥ ५०<br><br>भावं भावेन देवेशि दृष्टवान् मां हृदीश्वरम्।<br>तस्मात्तु श्रद्धया वश्यो दृश्यः श्रेष्ठगिरेः सुते॥ ५१ | हे देवेशि! उन पितामहने भावपूर्वक मुझ ईश्वरको अपने हृदयमें देखा और जब उन्होंने मुझसे यह कहा कि आपमें मेरी अचल भक्ति हो, तब मैंने पूर्व-कालमें उन्हें वह भक्तिभाव प्रदान कर दिया। अतः हे श्रेष्ठ पर्वतकी पुत्री पार्वती! मात्र श्रद्धासे ही भक्त मुझे वशमें कर सकता है तथा मेरा दर्शन कर सकता है॥ ५०-५१॥ | | पूज्यो लिङ्गे न सन्देहः सर्वदा श्रद्धया द्विजैः।<br>श्रद्धा धर्मः परः सूक्ष्मः श्रद्धा ज्ञानं हुतं तपः॥ ५२<br><br>श्रद्धा स्वर्गश्च मोक्षश्च दृश्योऽहं श्रद्धया सदा॥ ५३ | द्विजोंको लिङ्गमें ही श्रद्धापूर्वक सदा मेरी पूजा करनी चाहिये और इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं होना चाहिये। श्रद्धा ही परम सूक्ष्म धर्म है। श्रद्धा ही ज्ञान, हवन, तप, स्वर्ग तथा मोक्ष आदिका फल प्रदान करती है और इसी श्रद्धासे भक्त सदा मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त कर सकते हैं॥ ५२-५३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भक्तिभावकथनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भक्तिभावकथन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥
११- श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा
अध्याय ११] श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा ६१
ग्यारहवाँ अध्याय
श्वेतलोहितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् सद्योजातका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| कथं वै दृष्टवान् ब्रह्मा सद्योजातं महेश्वरम्।<br>वामदेवं महात्मानं पुराणपुरुषोत्तमम्॥ १<br>अघोरं च तथेशानं यथावद्वक्तुमर्हसि। | [हे सूतजी!] ब्रह्माजीने सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर तथा ईशानसंज्ञक सनातन पुरुषोत्तम महेश्वर शिवको किस प्रकार देखा? आप हमें यथावत् रूपसे यह बतानेकी कृपा कीजिये॥ १ १/२॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| एकोनत्रिंशकः कल्पो विज्ञेयः श्वेतलोहितः॥ २<br>तस्मिंस्तत्परमं ध्यानं ध्यायतो ब्रह्मणस्तदा।<br>उत्पन्नस्तु शिखायुक्तः कुमारः श्वेतलोहितः॥ ३ | उनतीसवाँ कल्प श्वेतलोहित नामसे जाना जाता है। उस कल्पमें जब ब्रह्माजी समाधिस्थ होकर परमेश्वरका ध्यान कर रहे थे, उसी समय शिखाधारी श्वेतलोहित वर्णवाला एक कुमार प्रकट हुआ॥ २-३॥ |
| तं दृष्ट्वा पुरुषं श्रीमान् ब्रह्मा वै विश्वतोमुखः।<br>हृदि कृत्वा महात्मानं ब्रह्मरूपिणमीश्वरम्॥ ४<br>सद्योजातं ततो ब्रह्मा ध्यानयोगपरोऽभवत्।<br>ध्यानयोगात्परं ज्ञात्वा ववन्दे देवमीश्वरम्॥ ५ | उन सद्योजात कुमारको देखकर सर्वतोमुख श्रीमान् ब्रह्माजी उन्हीं ब्रह्मरूपी महात्मा परमेश्वरको हृदयमें धारण करके ध्यानयोगमें तत्पर हो गये। पुनः ध्यान-योगसे उन्हें साक्षात् परमेश्वर जानकर प्रणाम किया। ब्रह्माजीने उन सद्योजात कुमारको परात्पर ब्रह्म कल्पित कर लिया॥ ४-५ १/२॥ |
| सद्योजातं ततो ब्रह्मा ब्रह्म वै समचिन्तयत्।<br>ततोऽस्य पार्श्वतः श्वेताः प्रादुर्भूता महायशाः॥ ६<br>सुनन्दो नन्दनश्चैव विश्वनन्दोपनन्दनौ।<br>शिष्यास्ते वै महात्मानो यैस्तद् ब्रह्म सदावृतम्॥ ७ | तत्पश्चात् उन सद्योजात ब्रह्मके समीप ही सुनन्द, नन्दन, विश्वनन्द तथा उपनन्दन नामक श्वेतवर्णवाले चार महायशस्वी शिष्य प्रकट हुए। वे महात्मा शिष्य उन सद्योजात ब्रह्मकी सेवामें सर्वदा तत्पर रहते थे॥ ६-७॥ |
| तस्याग्रे श्वेतवर्णाभः श्वेतो नाम महामुनिः।<br>विजज्ञेऽथ महातेजास्तस्माजज्ञे हरस्त्वसौ॥ ८ | उनके आगे श्वेत वर्णकी आभावाले श्वेत नामक एक महातेजस्वी मुनि उत्पन्न हुए। उन सद्योजातसे उत्पन्न होनेके कारण उस मुनिका नाम हर भी है॥ ८॥ |
| तत्र ते मुनयः सर्वे सद्योजातं महेश्वरम्।<br>प्रपन्नाः परया भक्त्या गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम्॥ ९ | वहाँपर वे सभी मुनि परम भक्तिसे शाश्वत ब्रह्मरूप उन सद्योजात महेश्वरकी स्तुति करते हुए उनके शरणागत हुए॥ ९॥ |
| तस्माद्विश्वेश्वरं देवं ये प्रपद्यन्ति वै द्विजाः।<br>प्राणायामपरा भूत्वा ब्रह्मतत्परमानसाः॥ १०<br>ते सर्वे पापनिर्मुक्ता विमला ब्रह्मवर्चसः।<br>विष्णुलोकमतिक्रम्य रुद्रलोकं व्रजन्ति ते॥ ११ | अतएव हे द्विजो! जो प्राणी प्राणायामपरायण होकर ब्रह्मतत्परचित्तसे उन विश्वेश्वरदेवके शरणागत होते हैं; वे सभी पापोंसे मुक्त, विमल आत्मावाले तथा ब्रह्मज्ञानी हो जाते हैं और अन्तमें विष्णुलोकको भी पार करके रुद्रलोकको जाते हैं॥ १०-११॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सद्योजातमाहात्म्यं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सद्योजातमाहात्म्य' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥
१२- रक्तकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् वामदेवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा
श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग ६२
बारहवाँ अध्याय
रक्तकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् वामदेवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा
| सूत उवाच | |
|---|---|
| ततस्त्रिंशत्तमः कल्पो रक्तो नाम प्रकीर्तितः ।<br>ब्रह्मा यत्र महातेजा रक्तवर्णमधारयत् ॥ १ | **सूतजी बोले—**तीसवाँ कल्प रक्तकल्पके नामसे प्रसिद्ध है। महान् तेजस्वी ब्रह्माने उस कल्पमें रक्तवर्ण धारण किया था॥ १ ॥ |
| ध्यायतः पुत्रकामस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।<br>प्रादुर्भूतो महातेजाः कुमारो रक्तभूषणः ॥ २ | पुत्रकी कामनासे ध्यानरत परमेष्ठी ब्रह्माजीके समक्ष एक महातेजस्वी तथा प्रतापी कुमार प्रकट हुआ। वह रक्तवर्णके भूषण, रक्तवर्णकी माला तथा रक्तवर्णके वस्त्र धारण किये हुए था तथा उसके नेत्र भी रक्तवर्णके थे ॥ २\frac{१}{२} ॥ |
| रक्तमाल्याम्बरधरो रक्तनेत्रः प्रतापवान् ।<br>स तं दृष्ट्वा महात्मानं कुमारं रक्तवाससम् ॥ ३ | |
| परं ध्यानं समाश्रित्य बुबुधे देवमीश्वरम् ।<br>स तं प्रणम्य भगवान् ब्रह्मा परमयन्त्रितः ॥ ४ | लाल वस्त्र धारण किये उस महात्मा कुमारको देखकर ब्रह्माजीने परम ध्यानयोगसे यह जान लिया कि यह कुमार तो साक्षात् देवेश्वर है॥ ३\frac{१}{२} ॥ |
| वामदेवं ततो ब्रह्मा ब्रह्म वै समचिन्तयत् ।<br>तथा स्तुतो महादेवो ब्रह्मणा परमेश्वरः ॥ ५ | उन्हें प्रणाम करके आत्मजित् भगवान् ब्रह्माने वामदेवसंज्ञक उन परमेश्वरको साक्षात् ब्रह्मस्वरूप कल्पित किया॥ ४\frac{१}{२} ॥ |
| प्रतीतहृदयः सर्व इदमाह पितामहम् ।<br>ध्यायता पुत्रकामेन यस्मात्तेऽहं पितामह ॥ ६ | तत्पश्चात् ब्रह्माजीके द्वारा अनेकविध स्तुति किये जानेपर प्रसन्नहृदय परमेश्वर महादेवने उन पितामहसे यह कहा॥ ५\frac{१}{२} ॥ |
| दृष्टः परमया भक्त्या स्तुतश्च ब्रह्मपूर्वकम् ।<br>तस्माद् ध्यानबलं प्राप्य कल्पे कल्पे प्रयत्नतः ॥ ७ | हे पितामह! पुत्रकी कामनासे ध्यानपरायण आपने मेरा दर्शन प्राप्त किया और परम भक्तिसे ब्रह्म अर्थात् 'वामदेवाय' मन्त्र पूर्वमें लगाकर अनेक स्तुतियोंसे मेरा स्तवन किया। अतएव आप प्रयत्नपूर्वक ध्यानबलका आश्रय लेकर कल्प-कल्पमें मुझ सर्वश्रेष्ठ तथा लोकके आधारस्वरूप परमेश्वरको भलीभाँति जानेंगे॥ ६-७\frac{१}{२} ॥ |
| वेत्स्यसे मां प्रसंख्यातं लोकधातारमीश्वरम् ।<br>ततस्तस्य महात्मानश्चत्वारस्ते कुमारकाः ॥ ८ | |
| सम्बभूवुर्महात्मानो विशुद्धा ब्रह्मवर्चसः ।<br>विरजाश्च विबाहुश्च विशोको विश्वभावनः ॥ ९ | इसके अनन्तर ब्रह्माजीके विरजा, विबाहु, विशोक तथा विश्वभावन नामवाले चार और कुमार उत्पन्न हुए। वे सभी कुमार महान्, विशुद्ध आत्मावाले तथा ब्रह्मतेजसे सम्पन्न थे॥ ८-९॥ |
| ब्रह्मण्या ब्रह्मणस्तुल्या वीरा अध्यवसायिनः ।<br>रक्ताम्बरधराः सर्वे रक्तमाल्यानुलेपनाः ॥ १० | वे सभी कुमार ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मतुल्य, वीर तथा अध्यवसायी थे। वे रक्तवर्णके वस्त्र तथा रक्तवर्णकी मालासे विभूषित थे। उनके शरीरमें लाल कुमकुम तथा लाल भस्म लगा हुआ था॥ १०\frac{१}{२} ॥ |
| रक्तकुङ्कुमिलप्ताङ्गा रक्तभस्मानुलेपनाः ।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते ब्रह्मत्वेऽध्यवसायिनः ॥ ११ | तत्पश्चात् एक हजार वर्षके अनन्तर ब्रह्मभावमें |
१३- पीतवासाकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् तत्पुरुषका प्रादुर्भाव तथा उनका माहात्म्य
अध्याय १३] पीतवासाकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् तत्पुरुषका प्रादुर्भाव तथा उनका माहात्म्य ६३
| गृणन्तश्च महात्मानो ब्रह्म तद्धामदैविकम्।<br>अनुग्रहार्थं लोकानां शिष्याणां हितकाम्यया॥ १२<br><br>धर्मोपदेशमखिलं कृत्वा ते ब्रह्मणः प्रियाः।<br>पुनरेव महादेवं प्रविष्टा रुद्रमव्ययम्॥ १३<br><br>येऽपि चान्ये द्विजश्रेष्ठा युञ्जाना वाममीश्वरम्।<br>प्रपश्यन्ति महादेवं तद्भक्तास्तत्परायणाः॥ १४<br><br>ते सर्वे पापनिर्मुक्ता विमला ब्रह्मचारिणः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १५ | लीन वे सभी ब्रह्मप्रिय महात्मा कुमार उस वामदेवरूप ब्रह्मका चिन्तन करते हुए लोकके अनुग्रह तथा शिष्योंके कल्याणकी कामनासे सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश करके पुनः शाश्वत महादेव रुद्रमें समाविष्ट हो गये॥ ११—१३॥<br><br>हे श्रेष्ठ द्विजो! इसी प्रकार परमेश्वरपरायण अन्य जो भी भक्त समाधिसे ध्यान करके ब्रह्मरूप परमेश्वर वामदेवका दर्शन करेंगे; विमल आत्मावाले ब्रह्मनिष्ठ वे सभी भक्त पापसे छूटकर उस रुद्रलोकको प्राप्त होंगे, जहाँसे जीवका पुनः संसारमें आगमन नहीं होता॥ १४-१५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वामदेवमाहात्म्यं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वामदेवमाहात्म्य' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
पीतवासाकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् तत्पुरुषका प्रादुर्भाव तथा उनका माहात्म्य
| सूत उवाच<br>एकत्रिंशत्तमः कल्पः पीतवासा इति स्मृतः।<br>ब्रह्मा यत्र महाभागः पीतवासा बभूव ह॥ १ | **सूतजी बोले—**इकतीसवाँ कल्प 'पीतवासा' कल्प नामवाला कहा गया है, जिसमें महाभाग ब्रह्माने पीला वस्त्र धारण किया था॥ १॥ |
| ध्यायतः पुत्रकामस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>प्रादुर्भूतो महातेजाः कुमारः पीतवस्त्रधृक्॥ २<br><br>पीतगन्धानुलिप्ताङ्गः पीतमाल्याम्बरो युवा।<br>हेमयज्ञोपवीतश्च पीतोष्णीषो महाभुजः॥ ३ | पुत्रप्राप्तिकी कामनासे परमेश्वरके ध्यानमें रत परमेष्ठी ब्रह्माजीके समक्ष पीतवस्त्रधारी एक महातेजस्वी कुमार प्रकट हुआ। वह कुमार पीतवर्णकी माला तथा पीत परिधान धारण किये हुए था। उस महान् भुजाओंवाले कुमारके अंगोंमें पीत वर्णका गन्ध लिप्त था तथा वह पीले वर्णकी पगड़ी और हेमवर्णके यज्ञोपवीतसे सुशोभित था॥ २-३॥ |
| तं दृष्ट्वा ध्यानसंयुक्तो ब्रह्मा लोकमहेश्वरम्।<br>मनसा लोकधातारं प्रपेदे शरणं विभुम्॥ ४ | ध्यानयुक्त होकर ब्रह्माजीने जब यह जान लिया कि ये जगत्के परमेश्वर हैं, तब वे हृदयसे लोकके आधाररूप प्रभु महेश्वरके शरणागत हो गये॥ ४॥ |
| ततो ध्यानगतस्तत्र ब्रह्मा माहेश्वरीं वराम्।<br>गां विश्वरूपां ददृशे महेश्वरमुखाच्च्युताम्॥ ५<br><br>चतुष्पदां चतुर्वक्त्रां चतुर्हस्तां चतुःस्तनीम्।<br>चतुर्नेत्रां चतुःशृङ्गीं चतुर्दंष्ट्रां चतुर्मुखीम्॥ ६<br><br>द्वात्रिंशद्गुणसंयुक्तामीश्वरीं सर्वतोमुखाम्। | उसी समय ध्यानगत ब्रह्माजीने महेश्वरके मुखसे निकली हुई, चार पैरोंवाली, चार वक्त्रोंवाली, चार हाथोंवाली, चार स्तनोंवाली, चार नेत्रोंवाली, चार सींगोंवाली, चार दाढ़ोंवाली, चार मुखोंवाली, बत्तीस गुणोंसे युक्त, सभी दिशाओंमें मुखवाली, ईश्वररूपिणी विश्वरूपा श्रेष्ठ महेश्वरस्वरूपिणी गाय देखी॥ ५-६ १/२॥ |
| स तां दृष्ट्वा महातेजा महादेवीं महेश्वरीम्॥ ७ | तब उस महादेवी महेश्वरी गायको देखकर सभी |
| ६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| पुनराह महादेवः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>मतिः स्मृतिर्बुद्धिरिति गायमानः पुनः पुनः॥ ८<br><br>एहोहीति महादेवि सातिष्ठत्प्राञ्जलिर्विभुम्।<br>विश्वमावृत्य योगेन जगत्सर्वं वशीकुरु॥ ९ | देवताओंके वन्दनीय महातेजस्वी महादेवने 'तुम मति हो, बुद्धि हो तथा स्मृति हो'—इस रूपमें उस धेनुकी महिमाका बार-बार गान करते हुए कहा—हे महादेवि! आओ, आओ; और सम्पूर्ण जगत्को योगके द्वारा आवृत करके अपने वशमें करो। इस प्रकार कहनेपर वह धेनु हाथ जोड़कर सर्वसमर्थ महादेवके सम्मुख खड़ी हो गयी॥ ७-९॥ |
| अथ तामाह देवेशो रुद्राणी त्वं भविष्यसि।<br>ब्राह्मणानां हितार्थाय परमार्था भविष्यसि॥ १० | इसके अनन्तर देवेश्वर महादेवने उससे कहा—तुम रुद्राणी होओगी और ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये परमार्थसाधिका बनोगी॥ १०॥ |
| तथैनां पुत्रकामस्य ध्यायतः परमेष्ठिनः।<br>प्रददौ देवदेवेशः चतुष्पादां जगद्गुरुः॥ ११<br><br>ततस्तां ध्यानयोगेन विदित्वा परमेश्वरीम्।<br>ब्रह्मा लोकगुरोः सोऽथ प्रतिपेदे महेश्वरीम्॥ १२ | ऐसा कहकर देवाधिदेव जगद्गुरु महादेवने पुत्रकी कामनासे ध्यानरत ब्रह्माजीको वह चतुष्पाद गाय दे दी। तदनन्तर ध्यानयोगसे उस धेनुको परमेश्वरी जानकर ब्रह्माजीने जगद्गुरु महादेवसे वह माहेश्वर धेनु प्राप्त कर ली॥ ११-१२॥ |
| गायत्रीं तु ततो रौद्रीं ध्यात्वा ब्रह्मानुयन्त्रितः।<br>इत्येतां वैदिकीं विद्यां रौद्रीं गायत्रीमीरिताम्॥ १३<br><br>जपित्वा तु महादेवीं ब्रह्मा लोकनमस्कृताम्।<br>प्रपन्नस्तु महादेवं ध्यानयुक्तेन चेतसा॥ १४ | ब्रह्माजी एकाग्रचित्त होकर रौद्री गायत्रीका ध्यान करके और रौद्री गायत्रीके रूपमें कथित इस वेदप्रतिपादित, ज्ञानदायिनी, विद्यास्वरूपिणी तथा लोकवन्द्या महादेवी (धेनु)-का ध्यानयुक्त मनसे जप करके महादेवके शरणागत हुए॥ १३-१४॥ |
| ततस्तस्य महादेवो दिव्ययोगं बहुश्रुतम्।<br>ऐश्वर्यं ज्ञानसम्पत्तिं वैराग्यं च ददौ प्रभुः॥ १५ | तत्पश्चात् परमेश्वर महादेवने उन ब्रह्माजीको दिव्य योग, महान् कीर्ति, ऐश्वर्य, ज्ञानसम्पदा तथा वैराग्य प्रदान किया॥ १५॥ |
| ततोऽस्य पार्श्वतो दिव्याः प्रादुर्भूताः कुमारकाः।<br>पीतमाल्याम्बरधराः पीतस्रगनुलेपनाः॥ १६<br><br>पीताभोष्णीषशिरसः पीतास्याः पीतमूर्धजाः।<br>ततो वर्षसहस्रान्त उषित्वा विमलौजसः॥ १७ | इसके बाद तत्पुरुषसंज्ञक उन महादेवके समीप दिव्य कुमार प्रकट हुए, जो पीले रंगकी माला तथा वस्त्र धारण किये हुए थे और पीले रंगके गन्धका अनुलेपन किये हुए थे। उनके सिरपर पीले रंगकी पगड़ी थी। उनके मुख तथा बाल भी पीतवर्णके थे॥ १६ १/२॥ |
| योगात्मानस्तपोह्लादाः ब्राह्मणानां हितैषिणः।<br>धर्मयोगबलोपेता मुनीनां दीर्घसत्रिणाम्॥ १८<br><br>उपदिश्य महायोगं प्रविष्टास्ते महेश्वरम्।<br>एवमेतेन विधिना ये प्रपन्ना महेश्वरम्॥ १९ | तदनन्तर विमल ओजसे युक्त, योगात्मा, तपस्यामें ही आह्लादित रहनेवाले, ब्राह्मणोंके हितैषी तथा धर्म एवं योगबलसे सम्पन्न वे कुमार एक हजार वर्षतक उन तत्पुरुष महादेवके समीप निवास करके यज्ञ करनेवाले मुनियोंको महायोगका उपदेश प्रदानकर महेश्वरमें समाविष्ट हो गये॥ १७-१८ १/२॥<br>इसी विधिसे अन्य जो भी लोग नियतात्मा, |
१४- असितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् अघोरका प्राकट्य और उनका माहात्म्य
अध्याय १४ ] असितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् अघोरका प्राकट्य और उनका माहात्म्य ६५
| अन्येऽपि नियतात्मानो ध्यानयुक्ता जितेन्द्रियाः।<br>ते सर्वे पापमुत्सृज्य विमला ब्रह्मवर्चसः॥ २०<br><br>प्रविशन्ति महादेवं रुद्रं ते त्वपुनर्भवाः॥ २१ | ध्यानपरायण तथा जितेन्द्रिय होकर महेश्वरके शरणागत होते हैं, वे समस्त पापोंसे मुक्त होकर शुद्धात्मा तथा ब्रह्मतेजसम्पन्न हो जाते हैं और अन्तमें महादेवमें प्रविष्ट हो जाते हैं तथा पुनर्भवके बन्धनसे छूट जाते हैं॥ १९—२१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे तत्पुरुषमाहात्म्यं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'तत्पुरुषमाहात्म्य' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३॥
चौदहवाँ अध्याय
असितकल्पमें शिवस्वरूप भगवान् अघोरका प्राकट्य और उनका माहात्म्य
| सूत उवाच | |
|---|---|
| ततस्तस्मिन् गते कल्पे पीतवर्णे स्वयम्भुवः।<br>पुनरन्यः प्रवृत्तस्तु कल्पो नाम्नासितस्तु सः॥ १ | सूतजी बोले— इसके बाद उस पीतकल्पके बीत जानेपर ब्रह्माका दूसरा कल्प प्रवृत्त हुआ। वह असित कल्प नामवाला था॥ १॥ |
| एकार्णवे तदा वृत्ते दिव्ये वर्षसहस्रके।<br>स्रष्टुकामः प्रजा ब्रह्मा चिन्तयामास दुःखितः॥ २ | एक हजार दिव्य वर्षोंतक जब सर्वत्र जल-ही-जल व्याप्त रहा, तब ब्रह्माजी अत्यन्त दुःखित होकर प्रजासृष्टिकी इच्छासे विचारमग्न हो गये॥ २॥ |
| तस्य चिन्तयमानस्य पुत्रकामस्य वै प्रभोः।<br>कृष्णः समभवद्वर्णो ध्यायतः परमेष्ठिनः॥ ३ | इस प्रकार चिन्तनमग्न होकर पुत्रकी कामनासे ध्यान कर रहे प्रभु ब्रह्माका वर्ण काला हो गया॥ ३॥ |
| अथापश्यन्महातेजाः प्रादुर्भूतं कुमारकम्।<br>कृष्णवर्णं महावीर्यं दीप्यमानं स्वतेजसा॥ ४<br><br>कृष्णाम्बरधरोष्णीषं कृष्णयज्ञोपवीतिनम्।<br>कृष्णेन मौलिना युक्तं कृष्णास्रगनुलेपनम्॥ ५ | इसी बीच महातेजस्वी ब्रह्माने कृष्णवर्णवाले, महान् वीर्यसम्पन्न, अपने तेजसे देदीप्यमान, कृष्णवर्णका वस्त्र-पगड़ी तथा यज्ञोपवीत धारण किये हुए, कृष्णमुकुटसे सुशोभित, कृष्णमाला धारण किये हुए तथा कृष्ण अंगरागसे अनुलिप्त अंगोंवाले एक कुमारको वहाँ प्रकट हुआ देखा॥ ४-५॥ |
| स तं दृष्ट्वा महात्मानमघोरं घोरविक्रमम्।<br>ववन्दे देवदेवेशमद्भुतं कृष्णपिङ्गलम्॥ ६ | उन घोर पराक्रमवाले महात्माको अघोरसंज्ञक महादेव जानकर ब्रह्माजीने अद्भुत कृष्ण-पिंगल वर्णकी आभासे युक्त उन देवदेवेशको प्रणाम किया॥ ६॥ |
| प्राणायामपरः श्रीमान् हृदि कृत्वा महेश्वरम्।<br>मनसा ध्यानयुक्तेन प्रपन्नस्तु तमीश्वरम्॥ ७<br><br>अघोरं तु ततो ब्रह्मा ब्रह्मरूपं व्यचिन्तयत्।<br>तथा वै ध्यायमानस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ८<br><br>प्रददौ दर्शनं देवो ह्यघोरो घोरविक्रमः। | तत्पश्चात् ध्यानयुक्त मनसे प्राणायामपरायण होकर तथा महेश्वरको हृदयमें धारणकर श्रीमान् ब्रह्माजी उन अघोररूप परमेश्वरके शरणागत हो गये और उन अघोरको ब्रह्मस्वरूप मानकर उनका ध्यान करने लगे। तदनन्तर घोर पराक्रमवाले अघोर महादेवने उन ध्यानपरायण परमेष्ठी ब्रह्माको साक्षात् दर्शन दिया॥ ७-८ १/२॥ |
| अथास्य पार्श्वतः कृष्णाः कृष्णास्रगनुलेपनाः॥ ९ | तदनन्तर उन अघोरके समीप कृष्ण, कृष्णशिख, |
१५- अघोरेशमाहात्म्य तथा अघोरमन्त्रके जपसे विविध पातकोंका विनाश
| श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | |
|---|---|---|
| ६६ |
| चत्वारस्तु महात्मानः सम्बभूवुः कुमारकाः।<br>कृष्णः कृष्णशिखश्चैव कृष्णास्यः कृष्णवस्त्रधृक्॥ १० | कृष्णास्य तथा कृष्णवस्त्रधृक् नामवाले चार महात्मा कुमार प्रादुर्भूत हुए, जो कृष्णवर्णके थे, कृष्णमालासे विभूषित थे और कृष्ण अंगरागसे अनुलिप्त थे॥ ९-१०॥ |
| ततो वर्षसहस्रं तु योगतः परमेश्वरम्।<br>उपासित्वा महायोगं शिष्येभ्यः प्रददुः पुनः॥ ११ | एक हजार वर्षोंतक योगपरायण होकर उन अघोर परमेश्वरकी उपासना करके उन कुमारोंने पुनः अपने शिष्योंको महायोगका उपदेश प्रदान किया॥ ११॥ |
| योगेन योगसम्पन्नाः प्रविश्य मनसा शिवम्।<br>अमलं निर्गुणं स्थानं प्रविष्टा विश्वमीश्वरम्॥ १२ | योगसम्पन्न वे सभी महात्मा मनसे शिवका ध्यानयोग करके महेश्वरके निर्विकार, निर्गुण, विश्वरूप तथा ऐश्वर्यमय स्थानमें प्रविष्ट हुए॥ १२॥ |
| एवमेतेन योगेन येऽपि चान्ये मनीषिणः।<br>चिन्तयन्ति महादेवं गन्तारो रुद्रमव्ययम्॥ १३ | इसी प्रकार और भी अन्य जो मनीषी इस योगके द्वारा महादेवका ध्यान करते हैं, वे अविनाशी भगवान् रुद्रके दिव्य लोकको प्राप्त होते हैं॥ १३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अघोरोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अघोरोत्पत्तिवर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥
पन्द्रहवाँ अध्याय
अघोरेशमाहात्म्य तथा अघोरमन्त्रके जपसे विविध पातकोंका विनाश
| सूत उवाच<br>ततस्तस्मिन् गते कल्पे कृष्णवर्णे भयानके।<br>तुष्टाव देवदेवेशं ब्रह्मा तं ब्रह्मरूपिणम्॥ १ | सूतजी बोले— [हे मुनियो!] उस भयावह कृष्ण कल्पके बीत जानेपर ब्रह्माजी उन ब्रह्मस्वरूप देवदेवेश अघोरकी स्तुति करने लगे॥ १॥ |
| अनुगृह्य ततस्तुष्टो ब्रह्माणमवदद्धरः।<br>अनेनैव तु रूपेण संहरामि न संशयः॥ २<br><br>ब्रह्महत्यादिकान् घोरांस्तथान्यानपि पातकान्।<br>हीनांश्चैव महाभाग तथैव विविधान्यपि॥ ३ | उस स्तुतिसे प्रसन्न होकर महादेवने अनुग्रह करके ब्रह्मासे कहा—हे महाभाग! ब्रह्महत्या आदि महापातकों, अन्य पातकों तथा अनेकविध पापोंको मैं अपने इसी अघोर रूपसे दूर करता हूँ; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ २-३॥ |
| उपपातकम्प्येवं तथा पापानि सुव्रत।<br>मानसानि सुतीक्ष्णानि वाचिकानि पितामह॥ ४<br><br>कायिकानि सुमिश्राणि तथा प्रासङ्गिकानि च।<br>बुद्धिपूर्वं कृतान्येव सहजागन्तुकानि च॥ ५<br><br>मातृदेहोत्थितान्येवं पितृदेहे च पातकम्।<br>संहरामि न सन्देहः सर्वं पातकजं विभो॥ ६ | हे सुव्रत! हे पितामह! इसी प्रकार सभी उपपातकों, मानसिक पापों, सुतीक्ष्ण वाचिक पापों, कायिक पापों, मिश्रित पापों, प्रासंगिक पापों, जानबूझकर किये गये पापों, सहज रूपमें आगन्तुक पापों तथा पितृ-मातृदेहजन्य पापोंको दूर कर देता हूँ और हे विभो! समस्त प्रकारके पातकजनित दुःखोंका नाश कर देता हूँ; इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है॥ ४-६॥ |
| लक्षं जप्त्वा ह्यघोरेभ्यो ब्रह्महा मुच्यते प्रभो।<br>तदर्थं वाचिके वत्स तदर्थं मानसे पुनः॥ ७ | हे प्रभो! एक लाख बार अघोर मन्त्र (अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यः०) जपकर ब्रह्महत्यारा भी मुक्त हो जाता है। |
| अध्याय १५ ] | अघोरेशमाहात्म्य तथा अघोरमन्त्रके जपसे विविध पातकोंका विनाश | ६७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चतुर्गुणं बुद्धिपूर्वे क्रोधादष्टगुणं स्मृतम्।<br>वीरहा लक्षमात्रेण भ्रूणहा कोटिमभ्यसेत्॥ ८ | हे वत्स! उससे आधा जप करनेसे वाचिक पाप तथा उससे भी आधे जपसे मानसिक पाप, चार गुना जप करनेसे बुद्धिपूर्वक अर्थात् जानबूझकर किये गये पाप तथा आठ गुना जप करनेसे क्रोधपूर्वक किये गये पाप दूर होते हैं॥ ७ १/२॥ |
| मातृहा नियुतं जप्त्वा शुद्ध्यते नात्र संशयः।<br>गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च स्त्रीघ्नः पापयुतो नरः॥ ९ | वीरोंकी हत्या करनेवालेको एक लाख जप तथा भ्रूण-हत्या करनेवालेको एक करोड़ जप करना चाहिये। माताका हत्यारा दस लाख जप करनेसे शुद्ध होता है; इसमें संशय नहीं है॥ ८ १/२॥ |
| अयुताघोरमभ्यस्य मुच्यते नात्र संशयः।<br>सुरापो लक्षमात्रेण बुद्ध्याबुद्ध्यापि वै प्रभो॥ १० | गायकी हत्या करनेवाला, कृतघ्न तथा स्त्रीका हत्यारा—ऐसा पापी मनुष्य दस हजार बार अघोरमन्त्र जपकर पापमुक्त हो जाता है; इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है॥ ९ १/२॥ |
| मुच्यते नात्र सन्देहस्तदर्धेन च वारुणीम्।<br>अस्नाताशी सहस्रेण अजपी च तथा द्विजः॥ ११ | हे प्रभो! जानकर अथवा बिना जाने सुरापान करनेवाला एक लाख जपसे तथा वारुणी (मद्य) पीनेवाला उसके आधे अर्थात् पचास हजार जपसे पापमुक्त हो जाता है; इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं है॥ १० १/२॥ |
| अहुताशी सहस्रेण अदाता च विशुद्ध्यति।<br>ब्राह्मणस्वापहर्ता च स्वर्णस्तेयी नराधमः॥ १२ | बिना स्नान किये भोजन करनेवाला, गायत्री-जप तथा अग्निहोत्र किये बिना और देवताओं एवं अतिथियों आदिको भोजन कराये बिना भोजन करनेवाला द्विज एक हजार जप करनेसे शुद्ध होता है॥ ११ १/२॥ |
| नियुतं मानसं जप्त्वा मुच्यते नात्र संशयः।<br>गुरुतल्परो वापि मातृघ्नो वा नराधमः॥ १३ | ब्राह्मणका धन हरण करनेवाला तथा स्वर्णकी चोरी करनेवाला अधम व्यक्ति दस लाख अघोर मन्त्र जपकर पापसे मुक्त होता है, इसमें संदेह नहीं है। इसी प्रकार |
| ब्रह्मघ्नश्च जपेदेवं मानसं वै पितामह।<br>सम्पर्कात्पापिनां पापं तत्समं परिभाषितम्॥ १४ | हे पितामह! गुरुपत्नीमें आसक्ति रखनेवाले, माताका वध करनेवाले तथा ब्रह्महत्यारे नराधमको भी [पापमुक्तिहेतु] दस लाख मानस जप करना चाहिये॥ १२-१३ १/२॥ |
| तथाप्ययुतमात्रेण पातकाद्वै प्रमुच्यते<br>संसर्गात्पातकी लक्षं जपेद्वै मानसं धिया॥ १५ | पापियोंके सम्पर्कमात्रसे लगनेवाला पाप उन पापियोंके पापके ही समान कहा गया है, फिर भी मात्र दस हजार जपसे ही सम्पर्कमें रहनेवाला प्राणी उस पापसे मुक्त हो जाता है॥ १४ १/२॥ |
| उपांशु यच्चतुर्धा वै वाचिकं चाष्टधा जपेत्।<br>पातकादर्धमेव स्यादुपपातकिनां स्मृतम्॥ १६ | संसर्गसे होनेवाले पाप-शमनके लिये पातकीको एक लाख मानस जप अथवा उसका चार गुना उपांशु जप अथवा आठ गुना वाचिक जप बुद्धिपूर्वक करना |
६८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| तदधं केवले पापे नात्र कार्या विचारणा।<br>ब्रह्महत्या सुरापानं सुवर्णस्तेयमेव च ॥ १७ | चाहिये। उपपातकीजनोंके लिये पापीजनोंके लिये निर्धारित जपका आधा जप करना बताया गया है तथा सामान्य पापोंसे मुक्तिहेतु उससे भी आधे जपका विधान है; इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिये॥ १५-१६१/२॥ |
| कृत्वा च गुरुतल्पं च पापकृद् ब्राह्मणो यदि।<br>रुद्रगायत्रिया ग्राह्यं गोमूत्रं कापिलं द्विजाः ॥ १८<br><br>गन्धद्वारेति तस्य वै गोमयं स्वस्थमाहरेत्।<br>तेजोऽसिशुक्रमित्याज्यं कापिलं संहरेद् बुधः ॥ १९<br><br>आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णोति चाहरेत् ।<br>गव्यं दधि नवं साक्षात्कापिलं वै पितामह ॥ २०<br><br>देवस्य त्वेति मन्त्रेण सङ्ग्रहेद्वै कुशोदकम्।<br>एकस्थं हेमपात्रे वा कृत्वाघोरेण राजते ॥ २१<br><br>ताम्रे वा पद्मपत्रे वा पालाशे वा दले शुभे ।<br>सकूर्चं सर्वरत्नाढ्यं क्षिप्त्वा तत्रैव काञ्चनम् ॥ २२ | हे द्विजो! ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्णकी चोरी, गुरुपत्नीगमन आदि महापातक करनेवाले ब्राह्मणको चाहिये कि वह रुद्रगायत्री¹ मन्त्रके द्वारा कपिला (किंचित् पीतवर्ण) गायका मूत्र, ‘गन्धद्वारा०’² इस मन्त्रसे उसी गायका पृथ्वीके सम्पर्कसे रहित गोबर, ‘तेजोऽसि शुक्रं’³ इस मन्त्रसे कपिला गायका घी, ‘आप्यायस्व’⁴ इस मन्त्रसे दूध, ‘दधिक्राव्ण’⁵ इस मन्त्रसे साक्षात् कपिला गायका ताजा दही और हे पितामह! ‘देवस्य त्वा’⁶ इस मन्त्रसे कुशाका जल इकट्ठा करे। तत्पश्चात् इन सबको स्वर्ण, चाँदी या ताँबेके पात्रमें अथवा कमल या पलाशपत्रमें एकत्र करके अघोरमन्त्र⁷से अभिमन्त्रित करना चाहिये। पुनः उसमें ब्रह्मकूर्च तथा सभी रत्नोंसहित सोना डाल देना चाहिये॥ १७-२२॥ |
| जपेल्लक्षमघोराख्यं हुत्वा चैव घृतादिभिः।<br>घृतेन चरुणा चैव समिद्भिश्च तिलैस्तथा ॥ २३<br><br>यवैश्च व्रीहिभिश्चैव जुहुयाद्वै पृथक्पृथक् ।<br>प्रत्येकं सप्तवारं तु द्रव्यालाभे घृतेन तु ॥ २४<br><br>हुत्वाघोरेण देवेशं स्नात्वाघोरेण वै द्विजाः ।<br>अष्टद्रोणघृतेनैव स्नाप्य पश्चाद्विशोध्य च ॥ २५ | तत्पश्चात् अघोर मन्त्रका जप करके घी आदिसे हवन करना चाहिये। घी, चरु, समिध, तिल, यव, धान्यसे अलग-अलग आहुति देनी चाहिये। प्रत्येककी सात-सात बार आहुति देनेका विधान है। इन द्रव्योंके अभावमें अघोरमन्त्रसे केवल घीसे ही हवन किया जा सकता है। हे द्विजो! इसके बाद अघोर मन्त्रका जप करते हुए आठ द्रोण घीसे देवेश शिवको स्नान कराकर बादमें शुद्धोदक स्नान कराना चाहिये॥ २३-२५॥ |
| अहोरात्रोषितः स्नातः पिबेत्कूर्चं शिवाग्रतः।<br>ब्राह्मं ब्रह्मजपं कुर्यादाचम्य च यथाविधि ॥ २६ | पुनः दिन-रात उपवास करके दूसरे दिन प्रातः-काल स्नानकर ब्रह्मकूर्चविधिसे बनाये गये पंचगव्यका पान करना चाहिये। तत्पश्चात् आचमन करके शिवके |
१. ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
२. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥
३. तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि धाम नामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि ॥ (शु०यजु० १।३१)
४. आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्। भवा वाजस्य सङ्गथे॥ (शु०यजु० १२।११२)
५. दधिक्राव्णोऽअकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयूंषि तारिषत्॥ (शु०यजु० २३।३२)
६. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्।
७. अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥
१६- विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव, ब्रह्माजीद्वारा ईशानकी स्तुति
अध्याय १६ ] विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव [ ६१
| एवं कृत्वा कृतघ्नोऽपि ब्रह्महा भ्रूणहा तथा।<br>वीरहा गुरुघाती च मित्रविश्वासघातकः ॥ २७<br><br>स्तेयी सुवर्णस्तेयी च गुरुतल्पेरतः सदा।<br>मद्यपो वृषलीसक्तः परदारविधर्षकः ॥ २८<br><br>ब्रह्मस्वहा तथा गोघ्नो मातृहा पितृहा तथा।<br>देवप्रच्यावकश्चैव लिङ्गप्रध्वंसकस्तथा ॥ २९<br><br>तथ अन्यानि च पापानि मानसानि द्विजो यदि।<br>वाचिकानि तथान्यानि कायिकानि सहस्रशः ॥ ३०<br><br>कृत्वा विमुच्यते सद्यो जन्मान्तरशतैरपि।<br>एतद्रहस्यं कथितमघोरेशप्रसङ्गतः ॥ ३१<br><br>तस्माज्जपेद् द्विजो नित्यं सर्वपापविशुद्धये ॥ ३२ | आगे विधिपूर्वक ब्रह्मसम्बन्धी गायत्री मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ २६ ॥<br><br>ऐसा करके कृतघ्न, ब्रह्महत्यारा, भ्रूणहत्या करनेवाला, वीरघाती, गुरुकी हत्या करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, चौर-वृत्तिवाला, स्वर्णचोर, गुरुकी पत्नीमें सदा आसक्ति रखनेवाला, मद्यपान करनेवाला, शूद्र-स्त्रीमें आसक्त, परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवाला, ब्राह्मणका धन हरण करनेवाला, गोहत्यारा, माता-पिताकी हत्या करनेवाला, देवताओंकी मूर्ति खण्डित करनेवाला, शिवलिङ्ग ध्वस्त करनेवाला तथा हजारों प्रकारके अन्य मानसिक-वाचिक-शारीरिक पाप करनेवाला द्विज शीघ्र ही पापमुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, इस विधिके करनेसे सैकड़ों जन्म-जन्मान्तरके पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। मैंने अघोरेश्वर भगवान् शिवके प्रसंगसे इस रहस्यका वर्णन किया है। अतएव द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यको सभी पापोंसे मुक्तिहेतु इस अघोर मन्त्रका जप नित्य करना चाहिये ॥ २७—३२ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽघोरेशमाहात्म्यं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अघोरेशमाहात्म्य' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय
विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव, ब्रह्माजीद्वारा ईशानकी स्तुति
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| अथान्यो ब्रह्मणः कल्पो वर्तते मुनिपुङ्गवाः।<br>विश्वरूप इति ख्यातो नामतः परमाद्भुतः ॥ १ | हे मुनिश्रेष्ठो! असित कल्पके अनन्तर 'विश्वरूप' नामसे विख्यात ब्रह्माजीका दूसरा अत्यन्त अद्भुत कल्प आरम्भ हुआ ॥ १ ॥ |
| विनिवृत्ते तु संहारे पुनः सृष्टे चराचरे।<br>ब्रह्मणः पुत्रकामस्य ध्यायतः परमेष्ठिनः ॥ २<br><br>प्रादुर्भूता महानादा विश्वरूपा सरस्वती।<br>विश्वमाल्याम्बरधरा विश्वयज्ञोपवीतिनी ॥ ३<br><br>विश्वोष्णीषा विश्वगन्धा विश्वमाता महोष्ठिका।<br>तथाविधं स भगवानीशानं परमेश्वरम् ॥ ४ | समस्त जगत्के संहारके अनन्तर चराचर संसारकी पुनः सृष्टिके निमित्त पुत्र-कामनासे ध्यानरत परमेष्ठी ब्रह्माजीके समक्ष महान् नाद करती हुई विश्वरूपा सरस्वती गौ प्रकट हुई। वह विश्वरूप माला, वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा शिरोभूषण (पगड़ी) धारण की हुई थी। उन महोष्ठिका विश्वमाताके सभी अंग विश्वगन्धसे अनुलिप्त थे ॥ २-३ १/२ ॥ |
| शुद्धस्फटिकसङ्काशं सर्वाभरणभूषितम्।<br>अथ तं मनसा ध्यात्वा युक्तात्मा वै पितामहः ॥ ५ | तदनन्तर वे युक्तात्मा भगवान् ब्रह्मा उसी प्रकारके विश्वरूपवाले, शुद्ध स्फटिकमणिके तुल्य आभायुक्त |
| ७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| ववन्दे देवमीशानं सर्वेशं सर्वगं प्रभुम्।<br>ओमीशान नमस्तेऽस्तु महादेव नमोऽस्तु ते॥ ६ | तथा सभी आभूषणोंसे शोभायमान, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, सर्वसमर्थ परमात्मा ईशानदेवका मनसे ध्यान करके उनकी वन्दना करने लगे॥ ४-५ १/२ ॥ | | नमोऽस्तु सर्वविद्यानामीशान परमेश्वर।<br>नमोऽस्तु सर्वभूतानामीशान वृषवाहन॥ ७<br><br>ब्रह्मणोऽधिपते तुभ्यं ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे।<br>नमो ब्रह्माधिपतये शिवं मेऽस्तु सदाशिव॥ ८ | हे ओम्स्वरूप ईशान! आपको नमस्कार है। हे महादेव! आपको नमस्कार है। हे समस्त विद्याओंके ईशान (स्वामी) परमेश्वर! आपको नमस्कार है। हे सभी प्राणियोंके अधिपति वृषवाहन! आपको नमस्कार है। हे ब्रह्माधिपते! आप ब्रह्मरूप तथा साक्षात् ब्रह्मको नमस्कार है। आप ब्रह्माधिपतिको नमस्कार है। हे सदाशिव! मेरा कल्याण हो॥ ६-८॥ | | ओङ्कारमूर्ते देवेश सद्योजात नमो नमः।<br>प्रपद्ये त्वां प्रपन्नोऽस्मि सद्योजाताय वै नमः॥ ९ | हे ओंकारमूर्ते! हे देवेश! हे सद्योजात! आपको बार-बार नमस्कार है। मैं कष्टसे पीड़ित होकर आपके शरणागत हूँ। सद्योजातको नमस्कार है। | | अभवे च भवे तुभ्यं तथा नातिभवे नमः।<br>भवोद्भव भवेशान मां भजस्व महाद्युते॥ १० | अजन्मा होनेपर भी आप लोकाभ्युदयार्थ ही जन्मादिको स्वीकार करनेवाले हैं, हे शिव! आपको नमस्कार है। हे विश्वोत्पादक! हे विश्वके ईशान (विश्वेश)! हे महाद्युते! मेरी रक्षा करो॥ ९-१०॥ | | वामदेव नमस्तुभ्यं ज्येष्ठाय वरदाय च।<br>नमो रुद्राय कालाय कलनाय नमो नमः॥ ११<br><br>नमो विकरणायैव कालवर्णाय वर्णिने।<br>बलाय बलिनां नित्यं सदा विकरणाय ते॥ १२ | हे वामदेव! आपको नमस्कार है। ज्येष्ठको नमस्कार है। वरदको नमस्कार है। रुद्रको, कालको तथा कलन (संख्यारूप)-को बार-बार नमस्कार है। वर्णी, कालवर्ण, विकरणको नित्य नमस्कार है। बलियोंके बली, विकरण (मनोरूप) आपको सर्वदा नमस्कार है॥ ११-१२॥ | | बलप्रमथनायैव बलिने ब्रह्मरूपिणे।<br>सर्वभूतेश्वरेशाय भूतानां दमनाय च॥ १३<br><br>मनोन्मनाय देवाय नमस्तुभ्यं महाद्युते।<br>वामदेवाय वामाय नमस्तुभ्यं महात्मने॥ १४<br><br>ज्येष्ठाय चैव श्रेष्ठाय रुद्राय वरदाय च।<br>कालहन्त्रे नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं महात्मने॥ १५ | बलशाली तथा ब्रह्मरूप बलप्रमथनको नमस्कार है। सभी प्राणियोंका दमन करनेवाले सर्वभूतेश्वरेशको नमस्कार है। मनोन्मनको नमस्कार है। देवको नमस्कार है। हे महाद्युते! आपको नमस्कार है। वामदेवको नमस्कार है, वामको नमस्कार है, आप महात्माको नमस्कार है। ज्येष्ठको नमस्कार है, श्रेष्ठको नमस्कार है, रुद्रको नमस्कार है, वरदको नमस्कार है, महात्मा कालहन्ताको नमस्कार है। आपको नमस्कार है। आपको नमस्कार है॥ १३-१५॥ | | इति स्तवेन देवेशं ननाम वृषभध्वजम्।<br>यः पठेत्सकृद्देवेह ब्रह्मलोकं गमिष्यति॥ १६ | इस स्तवनसे ब्रह्माजीने वृषभध्वज ईशानको नमस्कार किया। जो पुरुष एक बार श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त करता |
अध्याय १६ ] विश्वरूप नामक कल्पमें शिवस्वरूप भगवान् ईशानका प्रादुर्भाव ७१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रावयेद्वा द्विजान् श्राद्धे स याति परमां गतिम्।<br>एवं ध्यानगतं तत्र प्रणमन्तं पितामहम्॥ १७ | है अथवा जो श्राद्धमें ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है॥ १६ १/२॥<br><br>इस प्रकार ध्यानमग्न होकर वन्दना करते हुए पितामह ब्रह्मासे भगवान् ईशान बोले—मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम क्या चाहते हो?॥ १७ १/२॥ |
| उवाच भगवानीशः प्रीतोऽहं ते किमिच्छसि।<br>ततस्तु प्रणतो भूत्वा वाग्विशुद्धं महेश्वरम्॥ १८<br>उवाच भगवान् रुद्रं प्रीतं प्रीतेन चेतसा।<br>यदिदं विश्वरूपं ते विश्वगौः श्रेयसीश्वरी ॥ १९<br>एतद्वेदितुमिच्छामि यथेयं परमेश्वर। | तत्पश्चात् ब्रह्माजीने अत्यन्त निवेदनपूर्वक विशुद्ध वाणीवाले तथा प्रसन्नताको प्राप्त महेश्वरसे प्रसन्न मनसे कहा—हे परमेश्वर! यह आपका जो विश्वरूप है तथा परम कल्याणी यह जो विश्वरूपा गौ है—इसके विषयमें मैं जानना चाहता हूँ॥ १८-१९ १/२॥ |
| कैषा भगवती देवी चतुष्पादा चतुर्मुखी ॥ २०<br>चतुःशृङ्गी चतुर्वक्त्रा चतुर्दंष्ट्रा चतुःस्तनी।<br>चतुर्हस्ता चतुर्नेत्रा विश्वरूपा कथं स्मृता ॥ २१<br>किं नामगोत्रा कस्येयं किं वीर्या चापि कर्मतः। | चार पैरोंवाली, चार मुखवाली, चार सींगोंवाली, चार वक्त्रवाली, चार दाढ़ोंवाली, चार स्तनोंवाली, चार हाथों तथा चार नेत्रोंवाली ये भगवती कौन हैं तथा इन देवीको विश्वरूपा क्यों कहा गया है? इनका नाम तथा गोत्र क्या है? ये किसकी भार्या हैं तथा इनके कर्मका प्रभाव एवं सामर्थ्य क्या है?॥ २०-२१ १/२॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवो वृषध्वजः ॥ २२<br>प्राह देववृषं ब्रह्मा ब्रह्माणं चात्मसम्भवम्। | उन ब्रह्माका वह वचन सुनकर ब्रह्मरूप देवदेव वृषध्वज शिवने देवताओंमें श्रेष्ठ अपने पुत्र ब्रह्मासे कहा—॥ २२ १/२॥ |
| रहस्यं सर्वमन्त्राणां पावनं पुष्टिवर्धनम् ॥ २३<br>शृणुष्वैतत्परं गुह्यमादिसर्गे यथा तथा।<br>एवं यो वर्तते कल्पो विश्वरूपस्त्वसौ मतः ॥ २४<br>ब्रह्मस्थानमिदं चापि यत्र प्राप्तं त्वया प्रभो।<br>त्वत्तः परतरं देव विष्णुना तत्पदं शुभम् ॥ २५<br>वैकुण्ठेन विशुद्धेन मम वामाङ्गेन वै। | अब आदिसर्गमें जैसा था, वही पुष्टिकी वृद्धि करनेवाला, पवित्र तथा सभी मन्त्रोंका परम गुह्य रहस्य सुनो। हे प्रभो! यह जो वर्तमान कल्प है, वह विश्वरूप कल्प नामवाला कहा गया है। जिसमें आपने यह ब्रह्मपद प्राप्त किया है और मेरे वाम अंगसे उत्पन्न विष्णुके द्वारा विशुद्ध वैकुण्ठलोक प्राप्त किया गया। हे देव! विष्णुद्वारा प्राप्त वह शुभ पद तुम्हारे ब्रह्मपदसे भी श्रेष्ठ है॥ २३—२५ १/२॥ |
| तदा प्रभृति कल्पश्च त्रयस्त्रिंशत्तमो ह्ययम् ॥ २६<br>शतं शतसहस्राणामतीता ये स्वयम्भुवः।<br>पुरस्तात्तव देवेश तच्छृणुष्व महामते ॥ २७ | हे देवेश! हे महामते! उस समयसे अब यह तैंतीसवाँ कल्प है और इससे पूर्व लाखों कल्प बीत चुके हैं तथा आपसे पहले लाखों ब्रह्मा भी हो चुके हैं, उनके विषयमें सुनो॥ २६-२७॥ |
| आनन्दस्तु स विज्ञेय आनन्दत्वे व्यवस्थितः।<br>माण्डव्यगोत्रस्तपसा मम पुत्रत्वमागतः॥ २८ | आपका माण्डव्य गोत्र है और तपस्यासे मुझे पुत्र-रूपमें प्राप्त हुए हैं, अतएव आपको आनन्दरूप तत्त्वमें व्यवस्थित वह ब्रह्मरूप आनन्द जानना चाहिये॥ २८॥ |
| ७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| त्वयि योगं च सांख्यं च तपो विद्याविधिक्रियाः।<br>ऋतं सत्यं दया ब्रह्म अहिंसा सन्मतिः क्षमा॥ २९<br><br>ध्यानं ध्येयं दमः शान्तिर्विद्याविद्या मतिर्धृतिः।<br>कान्तिर्नीतिः प्रथा मेधा लज्जा दृष्टिः सरस्वती॥ ३०<br><br>तुष्टिः पुष्टिः क्रिया चैव प्रसादश्च प्रतिष्ठिताः।<br>द्वात्रिंशत्सुगुणा ह्येषा द्वात्रिंशाक्षरसंज्ञया॥ ३१<br><br>प्रकृतिर्विहिता ब्रह्मंस्त्वत्प्रसूतिर्महेश्वरी।<br>विष्णोर्भगवतश्चापि तथान्येषामपि प्रभो॥ ३२<br><br>सैषा भगवती देवी मत्प्रसूतिः प्रतिष्ठिता।<br>चतुर्मुखी जगद्योनिः प्रकृतिर्गौः प्रतिष्ठिता॥ ३३<br><br>गौरी माया च विद्या च कृष्णा हैमवतीति च।<br>प्रधानं प्रकृतिश्चैव यामाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ३४ | आपमें योग, सांख्य (तत्त्वज्ञान), तप, विद्या, विधि, क्रिया, ऋत (प्रियभाषण), सत्य, दया, वेद, अहिंसा, सन्मति, क्षमा, ध्यान, ध्येय (ईश्वर-सन्निधान), इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, ज्ञान, अविद्या (माया), बुद्धि, धृति, कान्ति, नीति, प्रथा (ख्याति), मेधा (धारणवती बुद्धि), लज्जा, दृष्टि (दिव्य ज्ञान), सरस्वती (सर्वलक्षणयुक्त वाणी), तुष्टि, पुष्टि, क्रिया (वेदविहित कर्म) तथा प्रसाद—ये बत्तीस गुण प्रतिष्ठित हैं। ककार आदि बत्तीस अक्षरस्वरूपा तथा बत्तीस गुणोंसे युक्त यह विश्वरूपा गाय तुम्हें उत्पन्न करनेवाली है; इसीलिये तुम उन बत्तीस गुणोंसे सम्पन्न हो। हे ब्रह्मन्! प्रकृतिक रचना मैंने की है और हे प्रभो! आप, भगवान् विष्णु तथा इन्द्र आदि देवता इस महेश्वरीसे प्रसूत हैं। जगत्को उत्पन्न करनेवाली साक्षात् देवी भगवतीस्वरूपा यह चतुर्मुखी प्रकृति गौ मुझसे उत्पन्न होकर प्रतिष्ठाको प्राप्त हुई है, जिसे तत्त्वचिन्तक गौरी, माया, विद्या, कृष्णा, हैमवती, प्रधान तथा प्रकृति—ऐसा कहते हैं॥ २९-३४॥ |
| अजामेकां लोहितां शुक्लकृष्णां<br>विश्वप्रजां सृजमानां सरूपाम्।<br>अजोऽहं मां विद्धि तां विश्वरूपं<br>गायत्रीं गां विश्वरूपां हि बुद्ध्या॥ ३५ | विश्वकी प्रजाओंकी सृष्टि करनेवाली, रक्त-श्वेत-कृष्ण-वर्णवाली, रूपसम्पन्न, अजन्मा तथा अद्वितीय इस विश्वरूपा गायको अपने बुद्धि-विचारसे साक्षात् गायत्री जानो और मैं भी अजन्मा हूँ, मुझे भी विश्वरूप जानो॥ ३५॥ |
| एवमुक्त्वा महादेवः ससर्ज परमेश्वरः।<br>ततश्च पार्श्वगा देव्याः सर्वरूपकुमारकाः॥ ३६<br><br>जटी मुण्डी शिखण्डी च अर्धमुण्डश्च जज्ञिरे।<br>ततस्तेन यथोक्तेन योगेन सुमहौजसः॥ ३७<br><br>दिव्यवर्षसहस्रान्ते उपासित्वा महेश्वरम्।<br>धर्मोपदेशमखिलं कृत्वा योगमयं दृढम्॥ ३८<br><br>शिष्टाश्च नियतात्मानः प्रविष्टा रुद्रमीश्वरम्॥ ३९ | तदनन्तर ब्रह्माजीसे ऐसा कहकर परमेश्वर महादेवने कई कुमार सृजित किये और इस प्रकार देवीके समीपसे अनेक रूपोंवाले कुमार प्रकट हुए, जिनमें कोई जटाधारी था, कोई मुण्डितसिर था, कोई सिरपर शिखा धारण किये था तथा कोई अर्धमुण्डित सिरवाला था। तदनन्तर सदाचारी, नियत आत्मावाले तथा महान् ओजसे सम्पन्न वे कुमार यथोक्त योगाभ्यास करते हुए देवताओंके एक हजार वर्षतक महेश्वरकी आराधना करके दृढ़ योगयुक्त सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश अपने शिष्यों-प्रशिष्योंको देकर अन्तमें परमेश्वर रुद्रमें प्रवेश कर गये॥ ३६-३९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ईशानमाहात्म्यकथनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ईशानमाहात्म्यकथन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥
१७- ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य, ब्रह्मा और विष्णुद्वारा हंस एवं वाराहरूप धारणकर लिङ्गके मूलस्थानका अन्वेषण, लिङ्गमध्यसे शब्दमय उमामहेश्वरका प्रादुर्भाव और ईशानादि पाँच शिवरूपोंकी उत्पत्ति
अध्याय १७ ] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य... शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७३
सत्रहवाँ अध्याय
ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य, ब्रह्मा और विष्णुद्वारा हंस एवं वाराहरूप धारणकर लिङ्गके मूलस्थानका अन्वेषण, लिङ्गमध्यसे शब्दमय उमा-महेश्वरका प्रादुर्भाव और ईशानादि पाँच शिवरूपोंकी उत्पत्ति
| सूत उवाच<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तः सद्यादीनां समुद्भवः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ १<br>स याति ब्रह्मसायुज्यं प्रसादात्परमेष्ठिनः। | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! इस प्रकार मैंने शिवजीके सद्योजात आदि अवतारोंका वर्णन संक्षेपमें कर दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)-को सुनाता है, वह शिवजीके अनुग्रहसे ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होता है॥ १ १/२॥ | | ऋषय ऊचुः<br>कथं लिङ्गमभूल्लिङ्गे समभ्यर्च्यः स शङ्करः॥ २<br>किं लिङ्गं कस्तथा लिङ्गी सूत वक्तुमिहार्हसि। | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! लिङ्गकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई तथा उस लिङ्गमें शंकरजीकी उपासना कैसे की जानी चाहिये? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है? यह आप हमें बताइये॥ २ १/२॥ | | रोमहर्षण उवाच<br>एवं देवाश्च ऋषयः प्रणिपत्य पितामहम्॥ ३<br>अपृच्छन् भगवँल्लिङ्गं कथमासीदिति स्वयं।<br>लिङ्गे महेश्वरो रुद्रः समभ्यर्च्यः कथं त्विति॥ ४<br>किं लिङ्गं कस्तथा लिङ्गी सोऽप्याह च पितामहः। | **रोमहर्षण [ सूतजी ] बोले—**हे ऋषियो! इसी प्रकार अत्यन्त निवेदनपूर्वक देवताओंने भी पितामह ब्रह्मासे पूछा था कि हे भगवन्! यह लिङ्ग कैसे उत्पन्न हुआ तथा लिङ्गमें महेश्वर रुद्रका किस प्रकार पूजन होना चाहिये? लिङ्ग क्या है तथा लिङ्गी कौन है? इसपर वे ब्रह्मा बोले॥ ३-४ १/२॥ | | पितामह उवाच<br>प्रधानं लिङ्गमाख्यातं लिङ्गी च परमेश्वरः॥ ५<br>रक्षार्थमम्बुधौ महां विष्णोस्तवासीत्सुरोत्तमाः। | **पितामह [ ब्रह्माजी ]-ने कहा—**प्रधानको लिङ्ग तथा परमेश्वरको लिङ्गी कहा गया है। हे उत्तम देवताओ! यह मेरी तथा विष्णुकी रक्षाके लिये समुद्रमें प्रकट हुआ था॥ ५ १/२॥ | | वैमानिके गते सर्गे जनलोकं सहर्षिभिः॥ ६<br>स्थितिकाले तदा पूर्णे ततः प्रत्याहृते तथा।<br>चतुर्युगसहस्रान्ते सत्यलोकं गते सुराः॥ ७ | जब देवताओंकी सृष्टि समाप्त हो गयी, तब वे देवता ऋषियोंके साथ जनलोक चले गये और पुनः स्थिति-कालके पूर्ण होनेपर और इसके बाद हजार चतुर्युगीके अन्तमें पुनः प्रलयके उपस्थित होनेपर वे सत्यलोक चले गये॥ ६-७॥ | | विनाधिपत्यं समतां गतेऽन्ते ब्रह्मणो मम।<br>शुष्के च स्थावरे सर्वे त्वनावृष्ट्या च सर्वशः॥ ८<br>पशवो मानुषा वृक्षाः पिशाचाः पिशिताशनाः।<br>गन्धर्वाद्याः क्रमेणैव निर्दग्धा भानुभानुभिः॥ ९ | उस समय मैं ब्रह्मा बिना किसी आधिपत्यके साम्य-अवस्थाको प्राप्त था। इस प्रकार अन्तमें अनावृष्टिके कारण सभी स्थावर पदार्थोंके सूख जानेपर सभी ओर समस्त पशु, मनुष्य, वृक्ष, पिशाच, राक्षस, गन्धर्व आदि क्रमसे सूर्यकी किरणोंसे दग्ध हो गये॥ ८-९॥ | | एकार्णवे महाघोरे तमोभूते समन्ततः।<br>सुष्वापाम्भसि योगात्मा निर्मलो निरुपप्लवः॥ १० | तत्पश्चात् चारों ओर समुद्र-ही-समुद्रके व्याप्त हो |
| ७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सहस्रशीर्षा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>सहस्रबाहुः सर्वज्ञः सर्वदेवभवोद्भवः॥ ११<br><br>हिरण्यगर्भो रजसा तमसा शङ्करः स्वयम्।<br>सत्त्वेन सर्वगो विष्णुः सर्वात्मत्वे महेश्वरः॥ १२<br><br>कालात्मा कालनाभास्तु शुक्लः कृष्णस्तु निर्गुणः।<br>नारायणो महाबाहुः सर्वात्मा सदसन्मयः॥ १३ | जाने तथा घोर अन्धकार छा जानेपर योगात्मा, निर्मल, उपद्रवरहित, हजार सिरोंवाले, हजार नेत्रोंवाले, हजार पैरोंवाले, हजार भुजाओंवाले, विश्वात्मा, सब कुछ जाननेवाले, सभी देवताओं तथा संसारकी उत्पत्ति करनेवाले, रजोगुणसे युक्त होनेके कारण ब्रह्मा, तमोगुणसे युक्त होनेके कारण स्वयं शंकर, सत्त्वगुणसे युक्त होनेके कारण सर्वव्यापी विष्णु, सबकी आत्मा होनेके कारण महेश्वर, कालात्मा, कालरूप नाभिवाले, शुक्ल, कृष्ण, गुणोंसे रहित, नारायण, महान् बाहुवाले तथा सत्-असत्से युक्त सर्वात्मा जलके मध्यमें शयन करने लगे॥ १०-१३॥ |
| तथाभूतमहं दृष्ट्वा शयानं पङ्कजेक्षणम्।<br>मायया मोहितस्तस्य तमवोचममर्षितः॥ १४ | उन्हें इस प्रकार जल-स्थित कमलपर सोते हुए देखकर मैं उस क्षण उनकी मायासे मोहित हो गया और उन सनातनको हाथसे पकड़कर उठाते हुए क्रोधपूर्वक मैंने उनसे कहा—तुम कौन हो, यह मुझे बताओ? ॥ १४ १/२ ॥ |
| कस्त्वं वदेति हस्तेन समुत्थाप्य सनातनम्।<br>तदा हस्तप्रहारेण तीव्रेण स दृढेन तु॥ १५ | तत्पश्चात् मेरे तेज तथा दृढ़ हस्त-प्रहारसे शेषनाग-रूपी शय्यासे उठकर इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले वे प्रभु उस क्षण बैठ गये॥ १५ १/२ ॥ |
| प्रबुद्धोऽहीशयनात्समासीनः क्षणं वशी।<br>ददर्श निद्राविक्किन्ननीरजामललोचनः॥ १६<br><br>मामग्रे संस्थितं भासाध्यासितो भगवान् हरिः।<br>आह चोत्थाय भगवान् हसन्मां मधुरं सकृत्॥ १७ | इसके बाद निद्रासे विक्किन्न स्वच्छ कमलसदृश नेत्रोंवाले प्रभावयुक्त भगवान् हरिने अपने सम्मुख विराजमान मुझ ब्रह्माको देखा और उन भगवान्ने शय्यासे उठकर थोड़ा हँसते हुए मुझसे मधुर-मधुर वाणीमें कहा—हे महाद्युते! हे वत्स! हे पितामह! तुम्हारा स्वागत है, स्वागत है॥ १६-१७ १/२ ॥ |
| स्वागतं स्वागतं वत्स पितामह महाद्युते।<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स्मितपूर्वं सुरर्षभाः॥ १८ | हे श्रेष्ठ देवताओ! उनका वह वचन सुनकर रजोगुणसे युक्त होनेके कारण शत्रुतापूर्ण भावसे मैंने मुसकराकर उन जनार्दनसे कहा—॥ १८ १/२ ॥ |
| रजसा बद्धवैरश्च तमवोचं जनार्दनम्।<br>भाषसे वत्स वत्सेति सर्गसंहारकारणम्॥ १९ | हे अनघ! सृजन तथा संहार करनेवाले मुझ ब्रह्माको तुम 'वत्स! वत्स!' इस प्रकार सम्बोधित करते हुए जैसे गुरु शिष्यसे कहता है, उस प्रकारसे मुसकराकर क्यों बोल रहे हो? ॥ १९ १/२ ॥ |
| मामिहान्तः स्मितं कृत्वा गुरुः शिष्यमिवानघ।<br>कर्तारं जगतां साक्षात्प्रकृतेश्च प्रवर्तकम्॥ २०<br><br>सनातनमजं विष्णुं विरिञ्चिं विश्वसम्भवम्।<br>विश्वात्मानं विधातारं धातारं पङ्कजेक्षणम्॥ २१<br><br>किमर्थं भाषसे मोहाद्वक्तुमर्हसि सत्वरम्।<br>सोऽपि मामाह जगतां कर्ताहमिति लोकप॥ २२ | जगत्के साक्षात् रचयिता, प्रकृतिके प्रवर्तक, सनातन, अजन्मा, पालनकर्ता, विश्वके उत्पत्तिकारक ब्रह्मा, विश्वात्मा, विधाता तथा धारणकर्ता मुझ कमलनयन पितामहसे मोहयुक्त होकर इस प्रकार क्यों बोल रहे हो? इसका |
अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कारण शीघ्र बताओ॥ २०-२१<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ | |
| भर्ता हर्ता भवानङ्गादवतीर्णो ममाव्ययात्।<br>विस्मृतोऽसि जगन्नाथं नारायणमनामयम्॥ २३<br><br>पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्।<br>विष्णुमच्युतमीशानं विश्वस्य प्रभवोद्भवम्॥ २४ | इसपर उन्होंने भी मुझसे कहा—सम्पूर्ण जगत्का सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता तथा संहारकर्ता मैं (विष्णु) ही हूँ, ऐसा जानो और तुमने भी मुझ शाश्वत परमेश्वरके अंगसे ही अवतार ग्रहण किया है। फिर भी तुम मुझ जगत्पति, नारायण, रोग-विकाररहित, परम पुरुष, परमात्मा, सभीसे आवाहित होनेवाले, पुरुष्टुत, अच्युत, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा विश्वकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप मुझ विष्णुको भूल गये हो, किंतु इसमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। यह सब तो मेरी मायाद्वारा रचा गया है॥ २२—२४<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तवापराधो नास्त्यत्र मम मायाकृतं त्विदम्।<br>शृणु सत्यं चतुर्वक्त्र सर्वदेवेश्वरो ह्यहम्॥ २५ | हे चार मुखवाले ब्रह्मन्! तुम यह सत्य जानो कि सृष्टिका कर्ता, पालक, संहारक तथा सभी देवताओंका स्वामी मैं ही हूँ। मेरे सदृश ऐश्वर्यवाला और कोई नहीं है॥ २५<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| कर्ता नेता च हर्ता च न मयास्ति समो विभुः।<br>अहमेव परं ब्रह्म परं तत्त्वं पितामह॥ २६ | हे पितामह! मैं ही परम ब्रह्म हूँ, मैं ही परम तत्त्व हूँ, मैं ही परम ज्योति हूँ तथा मैं ही परम समर्थ परमात्मा हूँ॥ २६<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| अहमेव परं ज्योतिः परमात्मा त्वहं विभुः।<br>यद्यद्दृष्टं श्रुतं सर्वं जगत्यस्मिंश्चराचरम्॥ २७ | हे चतुर्मुख! इस जगत्में जो भी समस्त स्थावर-जंगम वस्तुएँ दिखायी पड़ रही हैं अथवा जिनके बारेमें सुना जाता है; उन सबको मुझसे व्याप्त किया हुआ जानो॥ २७<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| तत्तद्विद्धि चतुर्वक्त्र सर्वं मन्मयमृत्यथ।<br>मया सृष्टं पुरा व्यक्तं चतुर्विंशतिकं स्वयम्॥ २८<br><br>नित्यान्ता ह्यणवो बद्धाः सृष्टाः क्रोधोद्भवादयः।<br>प्रसादाद्धि भवानण्डान्यनेकानीह लीलया॥ २९ | प्राचीन कालमें मैंने ही स्वयं चौबीस तत्त्वमय व्यक्त सृष्टि रची है। नित्य अन्तको प्राप्त होनेवाले सूक्ष्मातिसूक्ष्म बद्धजीव, क्रोधसे उत्पन्न अन्यान्य तामसी सृष्टि तथा आप (ब्रह्मा)-सहित अनेक ब्रह्माण्ड मेरी मायाके प्रभावसे ही विरचित हैं॥ २८-२९॥ |
| सृष्टा बुद्धिमया तस्यामहङ्कारस्त्रिधा ततः।<br>तन्मात्रापञ्चकं तस्मान्मनः षष्ठेन्द्रियाणि च॥ ३०<br><br>आकाशादीनि भूतानि भौतिकानि च लीलया।<br>इत्युक्तवति तस्मिंश्च मयि चापि वचस्तथा॥ ३१ | मैंने बुद्धिकी रचना की है तथा उसमें तीन प्रकारके अहंकारों (सात्त्विक, राजस, तामस)-का निर्माण किया है। इसी प्रकार अपनी मायासे पाँच तन्मात्राएँ एवं मन, इन्द्रियाँ, आकाश आदि पाँच महाभूतोंकी सृष्टि मैंने ही की है॥ ३०<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| आवयोश्चाभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।<br>प्रलयार्णवमध्ये तु रजसा बद्धवैरयोः॥ ३२ | यह वचन कहनेके अनन्तर रजोगुणकी वृद्धिसे परस्पर शत्रुता-भावको प्राप्त हम दोनोंमें उस प्रलय-सागरके मध्य भीषण रोमांचकारी संग्राम होने लगा॥ ३१-३२॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे लिङ्गमभवच्चावयोः पुरः।<br>विवादशमनार्थं हि प्रबोधार्थं च भास्वरम्॥ ३३ | इसी बीच हम दोनोंके कलहको दूर करने तथा |
| ७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोपमम्।<br>क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥ ३४<br><br>(चित्र)<br><br>अनौपम्यमनिर्देश्यमव्यक्तं विश्वसम्भवम्। | ज्ञान प्रदान करनेके निमित्त एक दीप्तिमान् लिङ्ग हमलोगोंके समक्ष प्रकट हुआ। वह लिङ्ग हजारों अग्नि-ज्वालाओंसे व्याप्त, सैकड़ों कालानिके सदृश, क्षय तथा वृद्धिसे रहित, आदि-मध्य-अन्तसे हीन, अतुलनीय, अवर्णनीय, अव्यक्त तथा विश्वका उत्पत्तिकर्तरूप था॥ ३३-३४१/२॥ |
| तस्य ज्वालासहस्रेण मोहितो भगवान् हरिः ॥ ३५<br>मोहितं प्राह मामत्र परीक्षावोऽग्निसम्भवम्।<br>अधोगमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च॥ ३६<br>भवानूर्ध्वं प्रयत्नेन गन्तुमर्हसि सत्वरम्। | उस लिङ्गकी हजारों ज्वालाओंसे भगवान् विष्णु तथा मैं—दोनों लोग मोहित हो गये। फिर विष्णुने मुझसे कहा कि हमें अग्नि-उद्भूत इस लिङ्गका पता लगाना चाहिये। एतदर्थ मैं इस अनुपम अग्नि-स्तम्भके नीचे जाता हूँ और आप प्रयत्नपूर्वक शीघ्र इसके ऊपर जाइये॥ ३५-३६ १/२॥ |
| एवं व्याहृत्य विश्वात्मा स्वरूपमकरोत्तदा॥ ३७<br>वाराहमहमप्याशु हंसत्वं प्राप्तवान् सुराः।<br>तदा प्रभृति मामाहुर्हसं हंसो विराडिति॥ ३८<br>हंस हंसेति यो ब्रूयान्मां हंसः स भविष्यति। | हे देवताओ! ऐसा कहकर विश्वात्मा भगवान् विष्णुने वराहका रूप धारण कर लिया और मैं भी शीघ्र हंसके रूपको प्राप्त हो गया। उसी समयसे मुझ ब्रह्माको विराट् रूपवाले भगवान् विष्णु 'हंस' कहने लगे। जो प्राणी 'हंस-हंस' नामसे मेरा कीर्तन करता है, वह हंसत्वको प्राप्त हो जाता है॥ ३७-३८ १/२॥ |
| सुश्वेतो ह्यनलाक्षश्च विश्वतः पक्षसंयुतः॥ ३९<br>मनोऽनिलजवो भूत्वा गतोऽहं चोर्ध्वतः सुराः। | हे देवताओ! उस समय मैं अत्यन्त श्वेत वर्णका था, मेरे नेत्र अग्निके समान थे और मैं सभी ओरसे पंखोंसे युक्त था—इस प्रकार हंसरूपमें मैं मनरूपी वायुके वेगसे उड़कर ऊपरकी ओर गया॥ ३९ १/२॥ |
| नारायणोऽपि विश्वात्मा नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ४०<br>दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम्।<br>मेरुपर्वतवर्ष्माणं गौरतीक्ष्णाग्रदंष्ट्रिणम्॥ ४१<br>कालादित्यसभाभासं दीर्घघोणं महास्वनम्।<br>ह्रस्वपादं विचित्राङ्गं जैत्रं दृढमनौपमम्॥ ४२<br>वाराहमसितं रूपमास्थाय गतवानधः। | उधर विश्वात्मा नारायण विष्णु भी दस योजन चौड़े तथा शत योजन लम्बे और नीले अंजनके समूहसदृश, मेरुपर्वत-तुल्य शरीरवाले, श्वेत तथा तीक्ष्ण दंष्ट्रांकुर एवं विशाल थूथनवाले, छोटे-छोटे पैरोंवाले, विचित्र अंगोंवाले, प्रलयकालीन सूर्यके समान प्रकाशमान, दृढ़, अनुपमेय, भीषण शब्दवाले तथा सर्वथा अपराजेय कृष्णवाराहका रूप धारण करके उस अग्नि-स्तम्भ (लिङ्ग)-के नीचेकी ओर गये॥ ४०-४२ १/२॥ |
| एवं वर्षसहस्रं तु त्वरन् विष्णुरधोगतः॥ ४३<br>नापश्यदल्पमप्यस्य मूलं लिङ्गस्य सूकरः। | इस प्रकार विष्णुभगवान् एक हजार वर्षतक वेगपूर्वक नीचेकी ओर जाते रहे, किंतु वाराहरूप विष्णु इस लिङ्गके मूलका अल्पांश भी नहीं देख सके॥ ४३ १/२॥ |
| तावत्कालं गतो ह्यूर्ध्वमहमप्यरिसूदनः॥ ४४<br>सत्वरं सर्वयत्नेन तस्यान्तं ज्ञातुमिच्छया।<br>श्रान्तो ह्यदृष्ट्वा तस्यान्तमहङ्कारादधोगतः॥ ४५ | शत्रुओंका दमन करनेवाला मैं ब्रह्मा भी उस लिङ्गका अन्त जाननेकी इच्छासे पूरे प्रयासके साथ शीघ्रतापूर्वक ऊपरकी ओर जाता रहा॥ ४४ १/२॥ |
अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथैव भगवान् विष्णुः श्रान्तः सन्त्रस्तलोचनः।<br>सर्वदेवभवस्तूर्णमुत्थितः स महावपुः॥ ४६ | तत्पश्चात् अहंकारपूर्वक ऊपर गया हुआ मैं उस लिङ्गका अन्त न देखकर अत्यन्त थका हुआ नीचे लौट आया और उसी प्रकार सभी देवताओंके उद्भवकर्ता तथा महान् शरीरवाले वे भगवान् विष्णु भी थकान एवं सन्त्रासभरे नेत्रोंके साथ लिङ्गका मूल न पाकर नीचेसे ऊपर आ गये॥ ४५-४६॥ |
| समागतो मया सार्धं प्रणिपत्य महामनाः।<br>मायया मोहितः शम्भोस्तस्थौ संविग्नमानसः॥ ४७ | शंकरकी मायासे मोहको प्राप्त वे महामना विष्णु मेरे साथ आकर परमेश्वरको प्रणाम करके व्याकुल मनसे खड़े हो गये। |
| पृष्ठतः पार्श्वतश्चैव चाग्रतः परमेश्वरम्।<br>प्रणिपत्य मया सार्धं सस्मार किमिदं त्विति॥ ४८ | इसके बाद मेरे साथ पुनः परमेश्वरको पीछेसे, बगलसे तथा आगेसे प्रणाम करके वे विचार करने लगे कि [आदि-अन्तहीन] यह क्या है?॥ ४७-४८॥ |
| तदा समभवत्तत्र नादो वै शब्दलक्षणः।<br>ओमोमिति सुरश्रेष्ठाः सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः॥ ४९ | हे श्रेष्ठ देवताओ! उसी समय वहाँ प्लुत स्वरसे युक्त ‘ओम्-ओम्’ ऐसा अत्यन्त स्पष्ट शब्दरूप नाद सुनायी पड़ा॥ ४९॥ |
| किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य मया तिष्ठन् महास्वनम्।<br>लिङ्गस्य दक्षिणे भागे तदापश्यत्सनातनम्॥ ५० | यह तीव्र शब्द क्या है— ऐसा मेरे साथ विचार करते हुए वे विष्णु खड़े रहे। तभी उन्होंने उस ‘ओम्’ नादके अन्तमें लिङ्गके दक्षिण भागमें सनातन आदि वर्ण |
| आद्यवर्णमकारं तु उकारं चोत्तरे ततः।<br>मकारं मध्यतश्चैव नादान्तं तस्य चोमिति॥ ५१ | अकार, उसके उत्तर भागमें उकार तथा उसके मध्यमें मकार देखा॥ ५०-५१॥ |
| सूर्यमण्डलवद् दृष्ट्वा वर्णमाद्यं तु दक्षिणे।<br>उत्तरे पावकप्रख्यमुकारं पुरुषर्षभः॥ ५२ | इस प्रकार सूर्यमण्डलके समान आदि वर्ण अकारको लिङ्गके दक्षिणमें, अग्निके सदृश प्रतीत होनेवाले उकारको उत्तरमें |
| शीतांशुमण्डलप्रख्यं मकारं मध्यमं तथा।<br>तस्योपरि तदापश्यच्छुद्धस्फटिकवत्प्रभुम्॥ ५३ | तथा चन्द्रमण्डलके तुल्य मकारको मध्यमें देखनेके बाद उन पुरुषश्रेष्ठ विष्णुने उसके ऊपर |
| तुरीयातीतममृतं निष्कलं निरुपप्लवम्।<br>निर्द्वन्द्वं केवलं शून्यं बाह्याभ्यन्तरवर्जितम्॥ ५४ | तुरीयातीत, अमृतरूप, कलारहित, विकारशून्य, निर्द्वन्द्व, अद्वितीय, शून्यस्वरूप, बाह्य तथा आभ्यन्तरसे रहित, |
| सबाह्याभ्यन्तरं चैव सबाह्याभ्यन्तरस्थितम्।<br>आदिमध्यान्तरहितमानन्दस्यापि कारणम्॥ ५५ | बाह्य तथा आभ्यन्तरसे युक्त, बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों रूपोंमें स्थित, आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा आनन्दके भी कारणस्वरूप शुद्ध स्फटिकके सदृश प्रकाशमान प्रभुको देखा॥ ५२—५५॥ |
| मात्रास्तिस्रस्त्वर्धमात्रं नादाख्यं ब्रह्मसंज्ञितम्।<br>ऋग्यजुःसामवेदा वै मात्रारूपेण माधवः॥ ५६ | अकार, उकार और मकाररूप तीन मात्राएँ तथा बिन्दुरूप अर्धमात्रास्वरूपवाला प्रणव ही नाद कहलाता है और वही ब्रह्मसंज्ञावाला है। ऋक्-यजुः तथा सामवेद उन तीनों मात्राओंके रूपमें विष्णु ही हैं॥ ५६॥ |
| वेदशब्दैभ्य एवेशं विश्वात्मानमचिन्तयत्।<br>तदाभवदृषिर्वेद ऋषेः सारतमं शुभम्॥ ५७ | उसी वेदरूप शब्दके द्वारा विष्णुने विश्वात्मा |
| [ पूर्वभाग | श्रीलिङ्गमहापुराण | ७८ ] | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तेनैव ऋषिणा विष्णुर्ज्ञातवान् परमेश्वरम्। | ईश्वर शिवका चिन्तन किया। उसी समयसे अतीन्द्रिय-दर्शक, परम-तत्त्वरूप कल्याणकारी वेद हुआ और उसी ऋषि (वेद)-से विष्णुने परमेश्वर शिवको जाना॥ ५७^{१/२} ॥ |
| देव उवाच<br>चिन्तया रहितो रुद्रो वाचो यन्मनसा सह ॥ ५८<br>अप्राप्य तं निवर्तन्ते वाच्यस्त्वेकाक्षरेण सः।<br>एकाक्षरेण तद्वाच्यमृतं परमकारणम्॥ ५९<br>सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्म परात्परम्।<br>एकाक्षरादकाराख्यो भगवान् कनकाण्डजः॥ ६० | देव (ब्रह्मा) बोले—वाणी भी मनके साथ जिन्हें प्राप्त न करके लौट आती है, उन चिन्तारहित भगवान् रुद्रका वाचक एकाक्षर प्रणव ही है और यही एकाक्षर प्रणव उस सृष्टिके परम कारणरूप, सत्य-आनन्द तथा अमृतरूप परात्पर परम ब्रह्मका भी वाचक है*॥ ५८-५९^{१/२}॥ |
| एकाक्षरादुकाराख्यो हरिः परमकारणम्।<br>एकाक्षरान्मकाराख्यो भगवान्नीललोहितः॥ ६१ | उसी एकाक्षर प्रणवसे अकारसंज्ञक भगवान् ब्रह्मा, उकारसंज्ञक परमकारणस्वरूप विष्णु तथा मकारसंज्ञक परमेश्वर नीललोहितका प्रादुर्भाव हुआ है॥ ६०-६१॥ |
| सर्गकर्ता त्वकाराख्यो ह्युकाराख्यस्तु मोहकः।<br>मकाराख्यस्तयोर्नित्यमनुग्रहकरोऽभवत् ॥ ६२ | अकारसंज्ञक ब्रह्मा सृष्टिके निर्माता, उकारसंज्ञक विष्णु मोह करनेवाले तथा मकारसंज्ञक शिव उन दोनों ब्रह्मा तथा विष्णुपर सदा अनुग्रह करनेवाले हैं॥ ६२॥ |
| मकाराख्यो विभुर्बीजी ह्यकारो बीजमुच्यते।<br>उकाराख्यो हरियोंनिः प्रधानपुरुषेश्वरः॥ ६३ | मकाररूप भगवान् शिव बीजवान्, अकाररूप ब्रह्मा बीज तथा उकाररूप प्रधानपुरुषेश्वर विष्णु योनि कहे जाते हैं॥ ६३॥ |
| बीजी च बीजं तद्योनिर्नादाख्यश्च महेश्वरः।<br>बीजी विभज्य चात्मानं स्वेच्छया तु व्यवस्थितः॥ ६४ | नादरूप महेश्वर शिव ही स्वयं बीजी, बीज तथा योनि—तीनों हैं। वे बीजीरूप महेश्वर स्वेच्छासे अपनेको विभाजित करके प्रतिष्ठित हैं॥ ६४॥ |
| अस्य लिङ्गादभूद्बीजमकारो बीजिनः प्रभोः।<br>उकारयोनौ निक्षिप्तमवर्धत समन्ततः॥ ६५<br>सौवर्णमभवच्चाण्डमावेष्ट्याद्यं तदक्षरम्।<br>अनेकाब्दं तथा चाप्सु दिव्यमण्डं व्यवस्थितम्॥ ६६ | इन बीजीरूप परमेश्वर शिवके लिङ्गसे अकाररूप बीज (ब्रह्मा), उकाररूप योनि (विष्णु)-में गिरकर चारों ओर वृद्धिको प्राप्त होने लगा और वह फिर स्वर्णका अण्ड हो गया। इसके बाद एकाक्षर प्रणवको आदि-अन्तसे आवेष्टित करके वह दिव्य अण्ड बहुत वर्षोंतक जलमें स्थित रहा॥ ६५-६६॥ |
| ततो वर्षसहस्रान्ते द्विधा कृतमजोद्भवम्।<br>अण्डमप्सु स्थितं साक्षादाद्याख्येनेश्वरेण तु॥ ६७ | तदनन्तर हजार वर्षोंके बाद साक्षात् आदिरूप परमेश्वरने जलमें स्थित उस अजोद्भूत अण्डको दो भागोंमें कर दिया॥ ६७॥ |
| तस्याण्डस्य शुभं हैमं कपालं चोर्ध्वसंस्थितम्।<br>जज्ञे यद् द्यौस्तदपरं पृथिवी पञ्चलक्षणा॥ ६८ | उस अण्डके ऊर्ध्वस्थित हेममय पवित्र कपालसे आकाश तथा नीचेके भागसे पाँच लक्षणोंसे सम्पन्न पृथ्विकी उत्पत्ति हुई॥ ६८॥ |
* यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। (तैत्ति० २।४।१)
अध्याय १७] ब्रह्मा तथा विष्णुके समक्ष ज्योतिर्मय महालिङ्गका प्राकट्य···शिवरूपोंकी उत्पत्ति ७९
| श्लोक | अर्थ |
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| तस्मादण्डोद्भवो जज्ञे त्वकाराख्यश्चतुर्मुखः।<br>स स्रष्टा सर्वलोकानां स एव त्रिविधः प्रभुः॥ ६९॥ | उसी अण्डसे अकारसंज्ञक चतुर्मुख ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। अतएव वही लिङ्गरूप प्रणव सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाला है तथा वही प्रणव अकार-उकार-मकाररूप तीन प्रकारका ईश्वर है॥ ६९॥ |
| एवमोमोमिति प्रोक्तमित्याहुर्यजुषां वराः।<br>यजुषां वचनं श्रुत्वा ऋचः सामानि सादरम्॥ ७०<br><br>एवमेव हरे ब्रह्मन्नित्याहुः श्रुतयस्तदा।<br>ततो विज्ञाय देवेशं यथावच्छ्रुतिसम्भवैः॥ ७१ | इस प्रकार वह प्रणव ओम्-ओमरूप ब्रह्म कहा गया है—ऐसा यजुर्वेदके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ मनीषियोंने कहा है और उन यजुर्वेद-ज्ञाताओंके वचन सुनकर उसे ऋग्वेदकी ऋचाओं तथा साममन्त्रोंने भी आदरपूर्वक स्वीकार किया है और इसी तरह सभी श्रुतियोंने उसी 'ओम्' को सदा हे हरे! हे ब्रह्मन्! के रूपमें सम्बोधित किया है॥ ७०½॥<br><br>इस वेद-वाक्य आदिसे शिवको यथावत् जानकर हम दोनों वैदिक मन्त्रोंसे महोदय देवेश्वर महादेवकी स्तुति करने लगे॥ ७१½॥ |
| मन्त्रैर्महेश्वरं देवं तुष्टाव सुमहोदयम्।<br>आवयोः स्तुतिसन्तुष्टो लिङ्गे तस्मिनिरञ्जनः॥ ७२ | हम दोनोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर मायाके आवरणसे रहित महेश्वर दिव्य शब्दमय रूप धारणकर हँसते हुए उस लिङ्गमें प्रकट हुए॥ ७२½॥ |
| दिव्यं शब्दमयं रूपमास्थाय प्रहसन् स्थितः।<br>अकारस्तस्य मूर्द्धा तु ललाटं दीर्घमुच्यते॥ ७३<br><br>इकारो दक्षिणं नेत्रमीकारो वामलोचनम्।<br>उकारो दक्षिणं श्रोत्रमूकारो वाममुच्यते॥ ७४<br><br>ऋकारो दक्षिणं तस्य कपोलं परमेष्ठिनः।<br>वामं कपोलमॄकारो लॢलॄ नासापुटे उभे॥ ७५<br><br>एकारमोष्ठमूर्ध्वञ्च ऐकारस्त्वधरो विभोः।<br>ओकारश्च तथौकारो दन्तपङ्क्तिद्वयं क्रमात्॥ ७६<br><br>अमस्तु तालुनी तस्य देवदेवस्य धीमतः।<br>कादिपञ्चाक्षराण्यस्य पञ्च हस्तानि दक्षिणे॥ ७७<br><br>चादिपञ्चाक्षराण्येवं पञ्च हस्तानि वामतः।<br>टादिपञ्चाक्षरं पादस्तादिपञ्चाक्षरं तथा॥ ७८<br><br>पकारमुदरं तस्य फकारः पार्श्वमुच्यते।<br>बकारो वामपार्श्वं वै भकारं स्कन्धमस्य तत्॥ ७९<br><br>मकारं हृदयं शम्भोर्महादेवस्य योगिनः।<br>यकारादिसकारान्ता विभोर्वै सप्तधातवः॥ ८०<br><br>हकार आत्मरूपं वै क्षकारः क्रोध उच्यते।<br>तं दृष्ट्वा उमया सार्द्धं भगवन्तं महेश्वरम्॥ ८१ | अकार उनका मस्तक तथा दीर्घ (आकार) उनका ललाट कहा जाता है। इकार दाहिना नेत्र, ईकार बायाँ नेत्र, उकार दाहिना कान, ऊकार बायाँ कान, ऋकार उन परमेष्ठी महेश्वरका दायाँ कपोल, ॠकार उनका बायाँ कपोल, लृ तथा लॄ क्रमशः उनके दाहिने तथा बायें—दोनों नासापुट, एकार ऊपरी ओष्ठ, ऐकार उन प्रभुका नीचेका ओष्ठ, ओकार तथा औकार क्रमशः ऊपर तथा नीचेकी दन्त-पंक्तियाँ, अं तथा अः उन धीमान् देवदेवके क्रमशः ऊपर तथा नीचेके तालु, ककार आदि पाँच अक्षर (क, ख, ग, घ, ङ) उनके दाहिनी ओरके पाँच हाथ, इसी प्रकार चकार आदि पाँच अक्षर बायीं ओरके पाँच हाथ, टकार आदि पाँच अक्षर दायाँ पैर, तकार आदि पाँच अक्षर बायाँ पैर, पकार उन परमेश्वरका उदर, फकार दाहिना पार्श्व, बकार बायाँ पार्श्व, भकार उनका स्कन्ध, मकार परम योगी महादेव शंकरका हृदय, यकारसे लेकर सकारपर्यन्त सात वर्ण (य, र, ल, व, श, ष, स) उन प्रभुके सातों धातु*, हकार उनकी आत्मा तथा क्षकार उनका क्रोध कहा गया है॥ ७३–८०½॥ |
* रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र—ये सात शरीरस्थ धातुएँ हैं।