श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ९ ] | योगसाधनाके अन्तराय (विघ्न) ... पाशुपतयोगकी प्राप्ति | ५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पर्वतादिमहाभारस्कन्धेनोद्वहनं पुनः।<br>लघुत्वं च गुरुत्वं च पाणिभ्यां वायुधारणम्॥ ४०<br><br>अङ्गुल्यग्रनिघातेन भूमेः सर्वत्र कम्पनम्।<br>एकेन देहनिष्पत्तिर्वातैश्वर्यं स्मृतं बुधैः॥ ४१ | मनकी गति प्राप्त कर लेना अर्थात् जहाँ मनकी इच्छा हो वहाँ चले जाना, अन्य प्राणियोंके अन्तर्मनमें निवास करना, पर्वत आदि महाभार कंधेपर धारण करके चलना, हलका तथा भारी होनेकी सामर्थ्य रखना, हाथोंसे वायु पकड़ लेना, अंगुलिके अग्रभागसे आघात करके पृथ्वीमें सर्वत्र कम्पन उत्पन्न कर देना, केवल आकाश तत्त्वसे देह धारण करना—ये वातसम्बन्धी ऐश्वर्य विद्वानोंके द्वारा कहे गये हैं॥ ३९—४१॥ |
| छायाविहीननिष्पत्तिरिन्द्रियाणां च दर्शनम्।<br>आकाशगमनं नित्यमिन्द्रियार्थैः समन्वितम्॥ ४२<br><br>दूरे च शब्दग्रहणं सर्वशब्दावगाहनम्।<br>तन्मात्रलिङ्गग्रहणं सर्वप्राणिनिदर्शनम्॥ ४३ | शरीरकी छाया न होना, इन्द्रियोंका प्रत्यक्ष दर्शन होना, आकाशमें गमन करना, इन्द्रियोंके अर्थका ज्ञान, दूरसे ही शब्दोंको सुननेकी क्षमता रखना, सभी शब्दोंके ज्ञानमें पारंगत होना, तन्मात्राओंके स्वरूपका ज्ञान तथा सभी प्राणियोंको साक्षात् देखनेमें समर्थ होना—ये ऐन्द्र ऐश्वर्य अर्थात् आकाशसम्बन्धी ऐश्वर्य हैं। इन समस्त पाँच प्रकारके ऐश्वर्योंसे युक्त साधक कायव्यूहसामर्थ्यवान् कहा जाता है॥ ४२-४३ १/२॥ |
| ऐन्द्रमैश्वर्यमित्युक्तमेतैरुक्तः पुरातनः।<br>यथाकामोपलब्धिश्च यथाकामविनिर्गमः॥ ४४<br><br>सर्वत्राभिभवश्चैव सर्वगुह्यनिदर्शनम्।<br>कामानुरूपनिर्माणं वशित्वं प्रियदर्शनम्॥ ४५ | किसी भी अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति, जहाँ भी जानेकी इच्छा हो, वहाँ पहुँच जाना, सभी जगह अपना शक्तिप्राबल्य प्रदर्शित करना अर्थात् अपने प्रभावसे सभीको पराभूत कर देना, सभी गुप्त पदार्थोंको देख लेना, अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करना, सभीको अपने वशमें कर लेना, सभीको प्रिय लगना, सम्पूर्ण जगत्को देखनेकी सामर्थ्य रखना—ये सब मानस गुणोंके लक्षण हैं॥ ४४-४५ १/२॥ |
| संसारदर्शनं चैव मानसं गुणलक्षणम्।<br>छेदनं ताडनं बन्धं संसारपरिवर्तनम्॥ ४६<br><br>सर्वभूतप्रसादश्च मृत्युकालजयस्तथा।<br>प्राजापत्यमिदं प्रोक्तमाहङ्कारिकमुत्तमम्॥ ४७ | छेदन, ताड़न, बन्ध, संसारपरिवर्तन, सर्वभूतप्रसाद, मृत्यु तथा कालका जय—ये प्रजापतिसम्बन्धी श्रेष्ठ आहंकारिक ऐश्वर्य कहे गये हैं॥ ४६-४७॥ |
| अकारणजगत्सृष्टिस्थानुग्रह एव च।<br>प्रलयश्चाधिकारश्च लोकवृत्तप्रवर्तनम्॥ ४८<br><br>असादृश्यमिदं व्यक्तं निर्माणं च पृथक् पृथक्।<br>संसारस्य च कर्तृत्वं ब्राह्ममेतदनुत्तमम्॥ ४९ | बिना कारण जगत्की सृष्टि, अनुग्रह, प्रलय, अधिकार, लोकवृत्तका प्रवर्तन, असादृश्य, पृथक्-पृथक् व्यक्त निर्माण तथा संसारका कर्तृत्व—यह उत्तम ब्राह्म ऐश्वर्य है॥ ४८-४९॥ |
| एतावत्तत्त्वमित्युक्तं प्राधान्यं वैष्णवं पदम्।<br>ब्रह्मणा तद्गुणं शक्यं वेत्तुमन्यैर्न शक्यते॥ ५० | ये ब्राह्म ऐश्वर्यके तत्त्व कहे गये हैं और ये ही प्रधानसम्बन्धी वैष्णव पद हैं। ब्रह्माके बिना उस गुणको अन्य कोई नहीं जान सकता है॥ ५०॥ |
| विद्यते तत्परं शैवं विष्णुना नावगम्यते।<br>असंख्येयगुणं शुद्धं को जानीयाच्छिवात्मकम्॥ ५१ | उस वैष्णवपदसे भी परे शैवपद है, जिसे विष्णु |