भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 834 में से

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पृष्ठ 56
५४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भी नहीं जानते हैं। असंख्य गुणोंवाले शुद्ध शिवात्मक तत्त्वको कौन जान सकता है अर्थात् कोई नहीं जान सकता॥ ५१॥
व्युत्थाने सिद्धयश्चैता ह्युपसर्गाश्च कीर्तिताः।<br>निरोद्धव्याः प्रयत्नेन वैराग्येण परेण तु॥ ५२।चौंसठ गुणात्मक ये ऐश्वर्य व्यवहारकालमें सिद्धि कहे जाते हैं, किंतु समाधिकालमें ये ही उपसर्ग अर्थात् विघ्न कहे गये हैं। इन्हें प्रयत्नपूर्वक परम वैराग्यसे रोकना चाहिये॥ ५२॥
नाशातिशयतां ज्ञात्वा विषयेषु भयेषु च।<br>अश्रद्धया त्यजेत्सर्वं विरक्त इति कीर्तितः॥ ५३भय उत्पन्न करनेवाले विषय-भोगोंकी अवश्यम्भावी नश्वरता जानकर सबका अश्रद्धासे त्याग कर देना चाहिये। ऐसा करनेवाला विरक्त कहा जाता है॥ ५३॥
वैतृष्ण्यं पुरुषे ख्यातं गुणवैतृष्ण्यमुच्यते।<br>वैराग्येणैव सन्त्याज्याः सिद्धयश्चौपसर्गिकाः॥ ५४पुरुषमें वितृष्णा नामसे प्रसिद्ध भावको ही गुणवैतृष्ण्य कहा जाता है। औपसर्गिक अर्थात् विघ्नरूप सिद्धियोंका वैराग्यके द्वारा परित्याग कर देना चाहिये॥ ५४॥
औपसर्गिकमाब्रह्मभुवनेषु परित्यजेत्।<br>निरुद्धयैव त्यजेत्सर्वं प्रसीदति महेश्वरः॥ ५५<br><br>प्रसन्ने विमला मुक्तिर्वैराग्येण परेण वै।<br>अथवानुग्रहार्थं च लीलार्थं वा तदा मुनिः॥ ५६चित्तको विषयभोगोंसे हटाकर भुवनोंमें समस्त विघ्नरूप ब्राह्म ऐश्वर्योंका परित्याग करनेसे महेश्वर प्रसन्न होते हैं और इस प्रकार साधकके परम वैराग्यसे शिवके प्रसन्न होनेपर उसे विमल मुक्ति प्राप्त होती है अथवा जो योगी सांसारिक प्राणियोंके कल्याणार्थ या लीलाके निमित्त इन सिद्धियोंका त्याग नहीं करता, वह भी सुखी ही रहता है॥ ५५-५६ १/२॥
अनिरुद्धय विचेष्टेतः सोऽप्येवं हि सुखी भवेत्।<br>क्वचिद्भूमिं परित्यज्य ह्याकाशे क्रीडते श्रिया॥ ५७कभी भूमि छोड़कर अपनी प्रबल शक्तिसे आकाशमें क्रीडा करता है और कभी सूक्ष्म अर्थात् सामान्य लोगोंके लिये अबोधगम्य वेदार्थोंको संक्षेपमें उच्चारित करता है॥ ५७ १/२॥
उद्गिरेच्च क्वचिद्वेदान् सूक्ष्मानर्थान् समासतः।<br>क्वचिच्छ्रुते तदर्थेन श्लोकबन्धं करोति सः॥ ५८वह कभी कोई प्रसंग सुनकर उसके अर्थसे श्लोक-रचना कर डालता है। कभी दण्डक छन्दमें और इसी प्रकार हजारों प्रकारके छन्दोंमें काव्यरचना करता है॥ ५८ १/२॥
क्वचिद्दण्डकबन्धं तु कुर्याद् बन्धं सहस्त्रशः।<br>मृगपक्षिसमूहस्य रुतज्ञानं च विन्दति॥ ५९उसे मृग तथा पक्षिवर्गकी ध्वनियोंका ज्ञान हो जाता है। यहाँतक कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समग्र संसार उस योगीके लिये हस्तामलकतुल्य हो जाता है॥ ५९ १/२॥
ब्रह्माद्यं स्थावरान्तं च हस्तामलकवद्भवेत्।<br>बहुनात्र किमुक्तेन विज्ञानानि सहस्रशः॥ ६०<br><br>उत्पद्यन्ते मुनिश्रेष्ठा मुनेस्तस्य महात्मनः।<br>अभ्यासेनैव विज्ञानं विशुद्धं च स्थिरं भवेत्॥ ६१हे श्रेष्ठ मुनियो! अधिक क्या कहा जाय; उस महात्मा योगीमें हजारों प्रकारके विज्ञान उत्पन्न हो जाते
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