भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १०] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण... भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५५


हैं। सतत अभ्यासके द्वारा ही यह विशुद्ध विज्ञान सदा स्थिर रहता है॥ ६०-६१॥
तेजोरूपाणि सर्वाणि सर्वं पश्यति योगवित्।<br>देवबिम्बान्यनेकानि विमानानि सहस्रशः॥ ६२योगी सभी तेजसम्पन्न देवताओंके बिम्ब तथा हजारों प्रकारके विमानोंको देखनेकी सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है॥ ६२॥
पश्यति ब्रह्मविष्ण्वीन्द्रयमाग्निवरुणादिकान्।<br>ग्रहनक्षत्रताराश्च भुवनानि सहस्रशः॥ ६३वह ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम, अग्नि, वरुण आदि देवताओं, ग्रहों, नक्षत्रों, तारों तथा हजारों भुवनोंको देख लेता है॥ ६३॥
पातालतलसंस्थांश्च समाधिस्थः स पश्यति।<br>आत्मविद्याप्रदीपेन स्वस्थेनाचलनेन तु॥ ६४वह पातालके तलमें स्थित पदार्थोंको भी आत्मविद्यारूप स्वस्थ तथा अचल दीपकसे समाधिस्थ होकर देखता है॥ ६४॥
प्रसादामृतपूर्णेन सत्त्वपात्रस्थितेन तु।<br>तमो निहत्य पुरुषः पश्यति ह्यात्मनीश्वरम्॥ ६५वह साधक प्रसादरूप अमृतसे पूर्ण सत्त्वपात्रमें स्थित उस आत्मविद्यारूप प्रदीपसे अज्ञानान्धकारको नष्ट करके अपने भीतर साक्षात् ईश्वरका दर्शन करता है॥ ६५॥
तस्य प्रसादाद्धर्मश्च ऐश्वर्यं ज्ञानमेव च।<br>वैराग्यमपवर्गश्च नात्र कार्या विचारणा॥ ६६उसी परमेश्वरकी कृपासे धर्म, ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य तथा मोक्ष सुलभ हो जाते हैं; इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं करना चाहिये॥ ६६॥
न शक्यो विस्तरो वक्तुं वर्षाणामयुतैरपि।<br>योगे पाशुपते निष्ठा स्थातव्यं च मुनीश्वराः॥ ६७हे मुनीश्वरो! शिवकी महिमाका विस्तृत वर्णन हजारों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है। अतएव पाशुपतयोगमें निष्ठापूर्वक रहना चाहिये तथा उसीमें सदा मनको स्थिर रखना चाहिये॥ ६७॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे योगान्तरायकथनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'योगान्तरायकथन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥


दसवाँ अध्याय

योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण, साधुधर्मका स्वरूप, भगवान् शिवके साक्षात्कारके उपायोंका वर्णन तथा भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता

सूत उवाचसूतजी बोले—हे उत्तम ब्राह्मणो! संत, जितेन्द्रिय, साक्षात् द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य), धर्मज्ञ, साधु, आचार्य, शिवात्मा, दयावान्, तपस्वी, संन्यासी, वैराग्य-परायण, ज्ञानी, मनपर नियन्त्रण रखनेवाले, दानी, उदार, मनसा-वाचा-कर्मणा सत्यवादी, अलुब्ध,
सतां जितात्मनां साक्षाद् द्विजातीनां द्विजोत्तमाः।<br>धर्मज्ञानां च साधूनामाचार्याणां शिवात्मनाम्॥ १
दयावतां द्विजश्रेष्ठास्तथा चैव तपस्विनाम्।<br>संन्यासिनां विरक्तानां ज्ञानिनां वशगात्मनाम्॥ २