श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९८ ] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५१९
| महर्षिः कपिलाचार्यो विश्वदीप्तिस्त्रिलोचनः।<br>पिनाकपाणिर्भूदेवः स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्सदा॥ ४४॥ | महर्षि कपिलाचार्य, विश्वदीप्ति, त्रिलोचन, पिनाकपाणिभूदेव, स्वस्तिद, सदास्वस्तिकृत् ॥ ४४॥ |
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| त्रिधामा सौभगः शर्वः सर्वज्ञः सर्वगोचरः।<br>ब्रह्मधृग्विborder ब्रह्मधृग्विश्वसृक्स्वर्गः कर्णिकारः प्रियः कविः॥ ४५॥ | त्रिधामा, सौभग, शर्व-सर्वज्ञ, सर्वगोचर,<br>ब्रह्मधृग्विश्वसृक्स्वर्ग, कर्णिकार, प्रिय, कवि ॥ ४५ ॥ |
| शाखो विशाखो गोशाखः शिवो नैकः क्रतुः समः।<br>गङ्गाप्लवोदको भावः सकलः स्थपतिःस्थिरः॥ ४६॥ | शाख-विशाख, गोशाख, शिव, नैक, क्रतु, सम,<br>गंगाप्लवोदक, भाव, सकल, स्थपतिस्थिर ॥ ४६ ॥ |
| विजितात्मा विधेयात्मा भूतवाहनसारथिः।<br>सगणो गणकार्यश्च सुकीर्तिश्छिन्नसंशयः॥ ४७॥ | विजितात्मा, विधेयात्मा, भूतवाहनसारथि, सगण,<br>गणकार्य, सुकीर्ति, छिन्नसंशय ॥ ४७ ॥ |
| कामदेवः कामपालो भस्मोद्धूलितविग्रहः।<br>भस्मप्रियो भस्मशायी कामी कान्तः कृतागमः॥ ४८॥ | कामदेव, कामपाल, भस्मोद्धूलितविग्रह, भस्मप्रिय,<br>भस्मशायी, कामी-कान्त, कृतागम ॥ ४८ ॥ |
| समायुक्तो निवृत्तात्मा धर्मयुक्तः सदाशिवः।<br>चतुर्मुखश्चतुर्बाहुर्दुरावासो दुरासदः॥ ४९॥ | समायुक्त, निवृत्तात्मा, धर्मयुक्त, सदाशिव,<br>चतुर्मुखचतुर्बाहु, दुरावास, दुरासद ॥ ४९ ॥ |
| दुर्गमो दुर्लभो दुर्गः सर्वायुधविशारदः।<br>अध्यात्मयोगनिलयः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः॥ ५०॥ | दुर्गमदुर्लभ, दुर्ग, सर्वायुधविशारद, अध्यात्म-<br>योगनिलय, सुतन्तु, तन्तुवर्धन ॥ ५० ॥ |
| शुभाङ्गो लोकसारङ्गो जगदीशोडमृताशनः।<br>भस्मशुद्धिकरो मेरुरोजस्वी शुद्धविग्रहः॥ ५१॥ | शुभाङ्ग, लोकसारंग, जगदीश, अमृताशन,<br>भस्मशुद्धिकर, मेरु, ओजस्वी, शुद्धविग्रह ॥ ५१ ॥ |
| हिरण्यरेतास्तरणिर्मरीचिर्महिमालयः।<br>महाह्रदो महागर्भः सिद्धवृन्दारवन्दितः॥ ५२॥ | हिरण्यरेता, तरणि-मरीचि, महिमालय, महाह्रद,<br>महागर्भ, सिद्धवृन्दारवन्दित ॥ ५२ ॥ |
| व्याघ्रचर्मधरो व्याली महाभूतो महानिधिः।<br>अमृताङ्गोऽमृतवपुः पञ्चयज्ञः प्रभञ्जनः॥ ५३॥ | व्याघ्रचर्मधर, व्याली, महाभूत, महानिधि, अमृतांग,<br>अमृतवपु, पंचयज्ञ, प्रभंजन ॥ ५३ ॥ |
| पञ्चविंशतितत्त्वज्ञः पारिजातः परावरः।<br>सुलभः सुव्रतः शूरो वाङ्मयैकनिधिर्निधिः॥ ५४॥ | पंचविंशतितत्त्वज्ञ, पारिजात, परावर, सुलभ,<br>सुव्रतशूर, वाङ्मयैकनिधि, निधि ॥ ५४ ॥ |
| वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः।<br>आश्रमः क्षपणः क्षामो ज्ञानवानचलाचलः॥ ५५॥ | वर्णाश्रमगुरु, वर्णी, शत्रुजिच्छत्रुतापन, आश्रम, क्षपण,<br>क्षाम, ज्ञानवान्, अचलाचल ॥ ५५ ॥ |
| प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः सुपर्णो वायुवाहनः।<br>धनुर्धरो धनुर्वेदो गुणराशिर्गुणाकरः॥ ५६॥ | प्रमाणभूत, दुर्ज्ञेय, सुपर्ण, वायुवाहन, धनुर्धरधनुर्वेद,<br>गुणराशि, गुणाकर ॥ ५६ ॥ |
| अनन्तदृष्टिरानन्दो दण्डो दमयिता दमः।<br>अभिवाद्यो महाचार्यो विश्वकर्मा विशारदः॥ ५७॥ | अनन्तदृष्टि, आनन्द, दण्डदमयिता, दम, अभिवाद्य,<br>महाचार्य, विश्वकर्मा, विशारद ॥ ५७ ॥ |
| वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भूतभावनः।<br>उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नो जितकामोऽजितप्रियः॥ ५८॥ | वीतराग, विनीतात्मा, तपस्वी, भूतभावन,<br>उन्मत्तवेषप्रच्छन्न, जितकाम, अजितप्रिय ॥ ५८ ॥ |
| कल्याणप्रकृतिः कल्पः सर्वलोकप्रजापतिः।<br>तपस्वी तारको धीमान् प्रधानप्रभुरव्ययः॥ ५९॥ | कल्याणप्रकृति, कल्प, सर्वलोकप्रजापति,<br>तपस्वीतारक, धीमान्, प्रधानप्रभु, अव्यय ॥ ५९ ॥ |
| लोकपालोऽन्तर्हितात्मा कल्पादिः कमलेक्षणः।<br>वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो नियमो नियमाश्रयः॥ ६०॥ | लोकपाल, अन्तर्हितात्मा, कल्पादि, कमलेक्षण,<br>वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ, नियम, नियमाश्रय ॥ ६० ॥ |
| चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्विरामो विद्रुमच्छविः।<br>भक्तिगम्यः परं ब्रह्म मृगबाणार्पणोऽनघः॥ ६१॥ | चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, विराम, विद्रुमच्छवि, |