श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | नाम/पदच्छेद |
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| भक्तिगम्य, परं-ब्रह्ममृगबाणार्पण, अनघ॥ ६१॥ | |
| अद्रिराजालयः कान्तः परमात्मा जगद्गुरुः।<br>सर्वकर्माचलस्त्वष्टा मङ्गल्यो मङ्गलावृतः॥ ६२ | अद्रिराजालय, कान्त, परमात्मा, जगद्गुरु, सर्वकर्माचल, त्वष्टा, मंगल्यमंगलावृत॥ ६२॥ |
| महातपा दीर्घतपाः स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः।<br>अहः संवत्सरो व्याप्तिः प्रमाणं परमं तपः॥ ६३ | महातपा, दीर्घतपा, स्थविष्ठ, स्थविर, ध्रुव, अहः, संवत्सर, व्याप्ति, प्रमाण, परम, तप॥ ६३॥ |
| संवत्सरकरो मन्त्रः प्रत्ययः सर्वदर्शनः।<br>अजः सर्वेश्वरः स्निग्धो महारेता महाबलः॥ ६४ | संवत्सरकर, मन्त्र-प्रत्यय, सर्वदर्शन, अज, सर्वेश्वर, स्निग्ध, महारेतामहाबलः॥ ६४॥ |
| योगी योग्यो महारेताः सिद्धः सर्वादििरग्निदः।<br>वसुर्वसुमनाः सत्यः सर्वपापहरो हरः॥ ६५ | योगी, योग्य, महारेता, सिद्ध, सर्वादि, अग्निदः, वसु, वसुमना, सत्यसर्वपापहर, हर॥ ६५॥ |
| अमृतः शाश्वतः शान्तो बाणहस्तः प्रतापवान्।<br>कमण्डलुधरो धन्वी वेदाङ्गो वेदविन्मुनिः॥ ६६ | अमृतशाश्वत, शान्त, बाणहस्तप्रतापवान्, कमण्डलुधर, धन्वी, वेदाङ्ग, वेदविद्, मुनि॥ ६६॥ |
| भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता लोकनेता दुराधरः।<br>अतीन्द्रियो महामायः सर्वावासश्चतुष्पथः॥ ६७ | भ्राजिष्णु, भोजनभोक्ता, लोकनेता, दुराधर, अतीन्द्रिय, महामाय, सर्वावास, चतुष्पथ॥ ६७॥ |
| कालयोगी महानादो महोत्साहो महाबलः।<br>महाबुद्धिर्महावीर्यो भूतचारी पुरन्दरः॥ ६८ | कालयोगी, महानाद, महोत्साह, महाबल, महाबुद्धि, महावीर्य, भूतचारी, पुरन्दर॥ ६८॥ |
| निशाचरः प्रेतचारिमहाशक्तिर्महाद्युतिः।<br>अनिर्देश्यवपुः श्रीमान् सर्वहार्यमितो गतिः॥ ६९ | निशाचर, प्रेतचारिमहाशक्ति, महाद्युति, अनिर्देश्यवपु, श्रीमान्, सर्वहार्यमित, गति॥ ६९॥ |
| बहुश्रुतो बहुमयो नियतात्मा भवोद्भवः।<br>ओजस्तेजोद्युतिकरो नर्तकः सर्वकामकः॥ ७० | बहुश्रुत, बहुमय, नियतात्मा, भवोद्भव, ओजस्तेजोद्युतिकर, नर्तक, सर्वकामक॥ ७०॥ |
| नृत्यप्रियो नृत्यनृत्यः प्रकाशात्मा प्रतापनः।<br>बुद्धस्पष्टाक्षरो मन्त्रः सन्मानः सारसम्प्लवः॥ ७१ | नृत्यप्रिय, नृत्यनृत्य, प्रकाशात्माप्रतापन, बुद्धस्पष्टाक्षर, मन्त्र, सन्मान, सारसंप्लव॥ ७१॥ |
| युगादिकृद्युगावर्तो गम्भीरो वृषवाहनः।<br>इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शरभः शरभो धनुः॥ ७२ | युगादिकृद्युगावर्त, गम्भीर, वृषवाहन, इष्ट, विशिष्ट-शिष्टेष्ट, शरभ, शरभधनुः॥ ७२॥ |
| अपां निधिरधिष्ठानं विजयो जयकालवित्।<br>प्रतिष्ठितः प्रमाणज्ञो हिरण्यकवचो हरिः॥ ७३ | अपांनिधि, अधिष्ठानविजय, जयकालवित्, प्रतिष्ठित, प्रमाणज्ञ, हिरण्यकवच, हरि॥ ७३॥ |
| विरोचनः सुरगणो विद्येशो विबुधाश्रयः।<br>बालरूपो बलोन्माथी विवर्तो गहनो गुरुः॥ ७४ | विरोचन, सुरगण, विद्येशविबुधाश्रय, बालरूप, बलोन्माथी, विवर्त, गहनगुरु॥ ७४॥ |
| करणं कारणं कर्ता सर्वबन्धविमोचनः।<br>विद्वत्तमो वीतभयो विश्वभर्ता निशाकरः॥ ७५ | करण, कारण, कर्ता, सर्वबन्धविमोचन, विद्वत्तमवीतभय, विश्वभर्ता, निशाकर॥ ७५॥ |
| व्यवसायो व्यवस्थानः स्थानदो जगदादिजः।<br>दुन्दुभो ललितो विश्वो भवात्मात्मनि संस्थितः॥ ७६ | व्यवसाय, व्यवस्थान, स्थानद, जगदादिज, दुन्दुभ, ललित, विश्व, भवात्मात्मनिसंस्थित॥ ७६॥ |
| वीरेश्वरो वीरभद्रो वीरहा वीरभृद्विराट्।<br>वीरचूडामणिर्वेत्ता तीव्रनादो नदीधरः॥ ७७ | वीरेश्वरवीरभद्र, वीरहा, वीरभृद्विराट्, वीरचूड़ामणि, वेत्ता, तीव्रनाद, नदीधर॥ ७७॥ |
| आज्ञाधारस्त्रिशूली च शिपिविष्टः शिवालयः।<br>वालखिल्यो महाचापस्तिग्मांशुर्निधिरव्ययः॥ ७८ | आज्ञाधार, त्रिशूली, शिपिविष्ट, शिवालय, वालखिल्य, महाचाप, तिग्मांशु, निधि-अव्यय॥ ७८॥ |