श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ५२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | नाम/पदच्छेद |
|---|---|
| भक्तिगम्य, परं-ब्रह्ममृगबाणार्पण, अनघ॥ ६१॥ | |
| अद्रिराजालयः कान्तः परमात्मा जगद्गुरुः।<br>सर्वकर्माचलस्त्वष्टा मङ्गल्यो मङ्गलावृतः॥ ६२ | अद्रिराजालय, कान्त, परमात्मा, जगद्गुरु, सर्वकर्माचल, त्वष्टा, मंगल्यमंगलावृत॥ ६२॥ |
| महातपा दीर्घतपाः स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः।<br>अहः संवत्सरो व्याप्तिः प्रमाणं परमं तपः॥ ६३ | महातपा, दीर्घतपा, स्थविष्ठ, स्थविर, ध्रुव, अहः, संवत्सर, व्याप्ति, प्रमाण, परम, तप॥ ६३॥ |
| संवत्सरकरो मन्त्रः प्रत्ययः सर्वदर्शनः।<br>अजः सर्वेश्वरः स्निग्धो महारेता महाबलः॥ ६४ | संवत्सरकर, मन्त्र-प्रत्यय, सर्वदर्शन, अज, सर्वेश्वर, स्निग्ध, महारेतामहाबलः॥ ६४॥ |
| योगी योग्यो महारेताः सिद्धः सर्वादििरग्निदः।<br>वसुर्वसुमनाः सत्यः सर्वपापहरो हरः॥ ६५ | योगी, योग्य, महारेता, सिद्ध, सर्वादि, अग्निदः, वसु, वसुमना, सत्यसर्वपापहर, हर॥ ६५॥ |
| अमृतः शाश्वतः शान्तो बाणहस्तः प्रतापवान्।<br>कमण्डलुधरो धन्वी वेदाङ्गो वेदविन्मुनिः॥ ६६ | अमृतशाश्वत, शान्त, बाणहस्तप्रतापवान्, कमण्डलुधर, धन्वी, वेदाङ्ग, वेदविद्, मुनि॥ ६६॥ |
| भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता लोकनेता दुराधरः।<br>अतीन्द्रियो महामायः सर्वावासश्चतुष्पथः॥ ६७ | भ्राजिष्णु, भोजनभोक्ता, लोकनेता, दुराधर, अतीन्द्रिय, महामाय, सर्वावास, चतुष्पथ॥ ६७॥ |
| कालयोगी महानादो महोत्साहो महाबलः।<br>महाबुद्धिर्महावीर्यो भूतचारी पुरन्दरः॥ ६८ | कालयोगी, महानाद, महोत्साह, महाबल, महाबुद्धि, महावीर्य, भूतचारी, पुरन्दर॥ ६८॥ |
| निशाचरः प्रेतचारिमहाशक्तिर्महाद्युतिः।<br>अनिर्देश्यवपुः श्रीमान् सर्वहार्यमितो गतिः॥ ६९ | निशाचर, प्रेतचारिमहाशक्ति, महाद्युति, अनिर्देश्यवपु, श्रीमान्, सर्वहार्यमित, गति॥ ६९॥ |
| बहुश्रुतो बहुमयो नियतात्मा भवोद्भवः।<br>ओजस्तेजोद्युतिकरो नर्तकः सर्वकामकः॥ ७० | बहुश्रुत, बहुमय, नियतात्मा, भवोद्भव, ओजस्तेजोद्युतिकर, नर्तक, सर्वकामक॥ ७०॥ |
| नृत्यप्रियो नृत्यनृत्यः प्रकाशात्मा प्रतापनः।<br>बुद्धस्पष्टाक्षरो मन्त्रः सन्मानः सारसम्प्लवः॥ ७१ | नृत्यप्रिय, नृत्यनृत्य, प्रकाशात्माप्रतापन, बुद्धस्पष्टाक्षर, मन्त्र, सन्मान, सारसंप्लव॥ ७१॥ |
| युगादिकृद्युगावर्तो गम्भीरो वृषवाहनः।<br>इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शरभः शरभो धनुः॥ ७२ | युगादिकृद्युगावर्त, गम्भीर, वृषवाहन, इष्ट, विशिष्ट-शिष्टेष्ट, शरभ, शरभधनुः॥ ७२॥ |
| अपां निधिरधिष्ठानं विजयो जयकालवित्।<br>प्रतिष्ठितः प्रमाणज्ञो हिरण्यकवचो हरिः॥ ७३ | अपांनिधि, अधिष्ठानविजय, जयकालवित्, प्रतिष्ठित, प्रमाणज्ञ, हिरण्यकवच, हरि॥ ७३॥ |
| विरोचनः सुरगणो विद्येशो विबुधाश्रयः।<br>बालरूपो बलोन्माथी विवर्तो गहनो गुरुः॥ ७४ | विरोचन, सुरगण, विद्येशविबुधाश्रय, बालरूप, बलोन्माथी, विवर्त, गहनगुरु॥ ७४॥ |
| करणं कारणं कर्ता सर्वबन्धविमोचनः।<br>विद्वत्तमो वीतभयो विश्वभर्ता निशाकरः॥ ७५ | करण, कारण, कर्ता, सर्वबन्धविमोचन, विद्वत्तमवीतभय, विश्वभर्ता, निशाकर॥ ७५॥ |
| व्यवसायो व्यवस्थानः स्थानदो जगदादिजः।<br>दुन्दुभो ललितो विश्वो भवात्मात्मनि संस्थितः॥ ७६ | व्यवसाय, व्यवस्थान, स्थानद, जगदादिज, दुन्दुभ, ललित, विश्व, भवात्मात्मनिसंस्थित॥ ७६॥ |
| वीरेश्वरो वीरभद्रो वीरहा वीरभृद्विराट्।<br>वीरचूडामणिर्वेत्ता तीव्रनादो नदीधरः॥ ७७ | वीरेश्वरवीरभद्र, वीरहा, वीरभृद्विराट्, वीरचूड़ामणि, वेत्ता, तीव्रनाद, नदीधर॥ ७७॥ |
| आज्ञाधारस्त्रिशूली च शिपिविष्टः शिवालयः।<br>वालखिल्यो महाचापस्तिग्मांशुर्निधिरव्ययः॥ ७८ | आज्ञाधार, त्रिशूली, शिपिविष्ट, शिवालय, वालखिल्य, महाचाप, तिग्मांशु, निधि-अव्यय॥ ७८॥ |
| अध्याय ९८ ] | भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना | ५२१ |
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| श्लोक | नाम-सूची |
|---|---|
| अभिरामः सुशरणः सुब्रह्मण्यः सुधापतिः।<br>मघवान् कौशिको गोमान् विश्रामः सर्वशासनः ॥ ७९ | अभिराम, सुशरण, सुब्रह्मण्य, सुधापति, मधवान्कौशिक, गोमान्, विश्राम, सर्वशासन ॥ ७९ ॥ |
| ललाटाक्षो विश्वदेहः सारः संसारचक्रभृत्।<br>अमोघदण्डी मध्यस्थो हिरण्यो ब्रह्मवर्चसी ॥ ८० | ललाटाक्ष, विश्वदेह, सार, संसारचक्रभृत्, अमोघदण्डी, मध्यस्थ, हिरण्य, ब्रह्मवर्चसी ॥ ८० ॥ |
| परमार्थः परमयः शम्बरो व्याघ्रकोऽनलः।<br>रुचिर्वररुचिर्वन्द्यो वाचस्पतिरहर्पतिः ॥ ८१ | परमार्थ, परमय, शम्बर, व्याघ्रक, अनल, रुचि, वररुचि, वन्द्य, वाचस्पति, अहर्पति ॥ ८१ ॥ |
| रविर्विरोचनः स्कन्धः शास्ता वैवस्वतोऽजनः।<br>युक्तिरुन्नतकीर्तिश्च शान्तरागः पराजयः ॥ ८२ | रविविरोचन, स्कन्ध, शास्तावैवस्वत, अजन, युक्ति, उन्नतकीर्ति, शान्तराग, पराजय ॥ ८२ ॥ |
| कैलासपतिकामारिः सविता रविलोचनः।<br>विद्वत्तमो वीतभयो विश्वहर्तानिवारितः ॥ ८३ | कैलासपतिकामारि, सविता, रविलोचन, विद्वत्तम, वीतभय, विश्वहर्तानिवारित ॥ ८३ ॥ |
| नित्यो नियतकल्याणः पुण्यश्रवणकीर्तनः।<br>दूरश्रवा विश्वसहो ध्येयो दुःस्वप्ननाशनः ॥ ८४ | नित्य, नियतकल्याण, पुण्यश्रवणकीर्तन, दूरश्रवा, विश्वसह, ध्येय, दुःस्वप्ननाशन ॥ ८४ ॥ |
| उत्तारको दुष्कृतिहा दुर्धर्षो दुःसहोऽभयः।<br>अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः किरीटीत्रिदशाधिपः ॥ ८५ | उत्तारक, दुष्कृतिहा, दुर्धर्ष, दुःसह, अभय, अनादि, भू, भुवो लक्ष्मी, किरीटीत्रिदशाधिप ॥ ८५ ॥ |
| विश्वगोप्ता विश्वभर्ता सुधीरो रुचिराङ्गदः।<br>जननो जनजन्मादिः प्रीतिमान्नीतिमान्नयः ॥ ८६ | विश्वगोप्ता, विश्वभर्ता, सुधीर, रुचिरांगद, जनन, जनजन्मादि, प्रीतिमान्, नीतिमान्, नय ॥ ८६ ॥ |
| विशिष्टः काश्यपो भानुर्भीमो भीमपराक्रमः।<br>प्रणवः सप्तधाचारो महाकायो महाधनुः ॥ ८७ | विशिष्ट, काश्यप, भानु, भीम, भीमपराक्रम, प्रणव, सप्तधाचार, महाकायमहाधनु ॥ ८७ ॥ |
| जन्माधिपो महादेवः सकलागमपारगः।<br>तत्त्वात्तत्त्वविवेकात्मा विभूष्णुर्भूतिभूषणः ॥ ८८ | जन्माधिप, महादेव, सकलागमपारग, तत्त्वात्तत्त्वविवेकात्मा, विभूष्णु, भूतिभूषण ॥ ८८ ॥ |
| ऋषिर्ब्राह्मणविज्जिष्णुर्जन्ममृत्युजरातिगः ।<br>यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञान्तोऽमोघविक्रमः ॥ ८९ | ऋषि, ब्राह्मणविज्जिष्णु, जन्ममृत्युजरातिग, यज्ञयज्ञपति, यज्वा, यज्ञान्त, अमोघविक्रम ॥ ८९ ॥ |
| महेन्द्रो दुर्भरः सेनी यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः।<br>पञ्चब्रह्मसमुत्पत्तिर्विश्वेशो विमलोदयः ॥ ९० | महेन्द्र, दुर्भर, सेनी, यज्ञांगयज्ञवाहन, पंचब्रह्मसमुत्पत्ति, विश्वेश, विमलोदय ॥ ९० ॥ |
| आत्मयोनिरनाद्यन्तो षड्विंशत्सप्तलोकधृक्।<br>गायत्रीवल्लभः प्रांशुर्विश्वावासः प्रभाकरः ॥ ९१ | आत्मयोनि, अनाद्यन्त, षड्विंशत्सप्तलोकधृक्, गायत्रीवल्लभ, प्रांशु, विश्वावास, प्रभाकर ॥ ९१ ॥ |
| शिशुर्गिरिरतः सम्राट् सुषेणः सुरशत्रुहा।<br>अमोघोऽरिष्टमथनो मुकुन्दो विगतज्वरः ॥ ९२ | शिशु, गिरिरत, सम्राट्सुषेण, सुरशत्रुहा, अमोघ, अरिष्टमथन, मुकुन्द, विगतज्वर ॥ ९२ ॥ |
| स्वयंज्योतिरनुज्योतिरारत्मज्योतिश्चञ्चलः ।<br>पिङ्गलः कपिलश्मश्रुः शास्त्रनेत्रस्त्रयीतनुः ॥ ९३ | स्वयंज्योति, अनुज्योति, आत्मज्योति, अचंचल, पिंगल, कपिलश्मश्रु, शास्त्रनेत्रत्रयीतनु ॥ ९३ ॥ |
| ज्ञानस्कन्धो महाज्ञानी निरुत्पत्तिरुपप्लवः।<br>भगो विवस्वानादित्यो योगाचार्यो बृहस्पतिः ॥ ९४ | ज्ञानस्कन्ध, महाज्ञानी, निरुत्पत्ति, उपप्लव, भग, विवस्वान्-आदित्य, योगाचार्य, बृहस्पति ॥ ९४ ॥ |
| उदारकीर्तिरुद्योगी सद्योगी सदसन्मयः।<br>नक्षत्रमाली राकेशः साधिष्ठानः षडाश्रयः ॥ ९५ | उदारकीर्ति, उद्योगी, सद्योगी, सदसन्मय, नक्षत्रमालीराकेश, साधिष्ठान, षडाश्रय ॥ ९५ ॥ |
| पवित्रपाणिः पापारिर्मणिपूरो मनोगतिः।<br>हृत्पुण्डरीकमासीनः शुक्लः शान्तो वृषाकपिः ॥ ९६ | पवित्रपाणि, पापारि, मणिपूर, मनोगति, |
| ५२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| हृत्पुण्डरीकमासीन, शुक्ल, शान्तवृषाकपि ॥ ९६ ॥ | |
|---|---|
| विष्णुर्गृहपतिः कृष्णः समर्थोऽनर्थनाशनः ।<br>अधर्मशत्रुरक्षय्यः पुरुहूतः पुरुष्टुतः ॥ ९७ | विष्णु, गृहपति, कृष्ण, समर्थ, अनर्थनाशन, अधर्मशत्रु, अक्षय्य, पुरुहूतपुरुष्टुत ॥ ९७ ॥ |
| ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः ।<br>जगद्धितैषिसुगतः कुमारः कुशलागमः ॥ ९८ | ब्रह्मगर्भ, बृहद्गर्भ, धर्मधेनु, धनागम, जगद्धितैषिसुगत, कुमार, कुशलागम ॥ ९८ ॥ |
| हिरण्यवर्णो ज्योतिष्मान्नानाभूतधरो ध्वनिः ।<br>अरोगो नियमध्यक्षो विश्वामित्रो द्विजोत्तमः ॥ ९९ | हिरण्यवर्ण, ज्योतिष्मान्, नानाभूतधर, ध्वनि, अरोग, नियमाध्यक्ष, विश्वामित्रद्विजोत्तम ॥ ९९ ॥ |
| बृहज्ज्योतिः सुधामा च महाज्योतिरनुत्तमः ।<br>मातामहो मातरिश्वा नभस्वान्नागहारधृक् ॥ १०० | बृहज्ज्योति, सुधामा, महाज्योति, अनुत्तम, मातामह, मातरिश्वा, नभस्वान्, नागहारधृक् ॥ १०० ॥ |
| पुलस्त्यः पुलहोऽगस्त्यो जातूकर्ण्यः पराशरः ।<br>निरावरणधर्मज्ञो विरिञ्चो विष्टरश्रवाः ॥ १०१ | पुलस्त्य, पुलह, अगस्त्य, जातूकर्ण्य, पराशर, निरावरणधर्मज्ञ, विरिंच, विष्टरश्रवा ॥ १०१ ॥ |
| आत्मभूरनिरुद्धोऽत्रिज्ज्ञानमूर्तिर्महायशाः ।<br>लोकचूडामणिर्वीरः चण्डसत्यपराक्रमः ॥ १०२ | आत्मभू, अनिरुद्ध, अत्रिज्ञानमूर्ति, महायशा, लोकचूडामणि, वीर, चण्डसत्यपराक्रम ॥ १०२ ॥ |
| व्यालकल्पो महाकल्पो महावृक्षः कलाधरः ।<br>अलङ्करिष्णुस्त्वचलो रोचिष्णुर्विक्रमोत्तमः ॥ १०३ | व्यालकल्प, महाकल्प, महावृक्ष, कलाधर, अलंकरिष्णु, अचल, रोचिष्णु, विक्रमोत्तम ॥ १०३ ॥ |
| आशुशब्दपतिर्वेगी प्लवनः शिखिसारथिः ।<br>असंस्पृष्टोऽतिथिः शक्रः प्रमाथी पापनाशनः ॥ १०४ | आशुशब्दपति, वेगी, प्लवन, शिखिसारथि, असंस्पृष्ट, अतिथि, शक्रप्रमाथी, पापनाशन ॥ १०४ ॥ |
| वसुश्रवाः कव्यवाहः प्रतप्तो विश्वभोजनः ।<br>जर्यो जराधिशमनो लोहितश्च तनूनपात् ॥ १०५ | वसुश्रवा, कव्यवाह, प्रतप्त, विश्वभोजन, जर्य, जराधिशमन, लोहित, तनूनपात् ॥ १०५ ॥ |
| पृषदश्वो नभो योनिः सुप्रतीकस्तमिस्रहा ।<br>निदाघस्तपनो मेघः पक्षः परपुरञ्जयः ॥ १०६ | पृषदश्व, नभ, योनि, सुप्रतीक, तमिस्रहा, निदाघतपन, मेघपक्ष, परपुरंजय ॥ १०६ ॥ |
| मुखानिलः सुनिष्पन्नः सुरभिः शिशिरात्मकः ।<br>वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बीजवाहनः ॥ १०७ | मुखानिल, सुनिष्पन्न, सुरभि, शिशिरात्मक, वसन्तमाधव, ग्रीष्म, नभस्य, बीजवाहन ॥ १०७ ॥ |
| अङ्गिरा मुनिरात्रेयो विमलो विश्ववाहनः ।<br>पावनः पुरुजिच्छक्रस्त्रिविद्यो नरवाहनः ॥ १०८ | अंगिरा, मुनिआत्रेय, विमल, विश्ववाहन, पावन, पुरुजित्, शक्र, त्रिविद्य, नरवाहन ॥ १०८ ॥ |
| मनोबुद्धिरहङ्कारः क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालकः ।<br>तेजोनिधिर्ज्ञाननिधिर्विपाको विघ्नकारकः ॥ १०९ | मनोबुद्धि, अहंकार, क्षेत्रज्ञ, क्षेत्रपालक, तेजोनिधि, ज्ञाननिधि, विपाक, विघ्नकारक ॥ १०९ ॥ |
| अधरोऽनुत्तरो ज्ञेयो ज्येष्ठो निःश्रेयसालयः ।<br>शैलो नगस्तनुर्दोहो दानवारिररिन्दमः ॥ ११० | अधर, अनुत्तर, ज्ञेय, ज्येष्ठ, निःश्रेयसालय, शैल, नग, तनु, दोह, दानवारि, अरिन्दम ॥ ११० ॥ |
| चारुधीर्जनकश्चारुविशल्यो लोकशल्यकृत् ।<br>चतुर्वेदश्चतुर्भावश्चतुरश्चतुरप्रियः ॥ १११ | चारुधीर्जनक, चारुविशल्य, लोकशल्यकृत्, चतुर्वेद, चतुर्भाव, चतुरचतुरप्रिय ॥ १११ ॥ |
| आम्नायोऽथ समाम्नायस्तीर्थदेवशिवालयः ।<br>बहुरूपो महारूपः सर्वरूपश्चराचरः ॥ ११२ | आम्नाय, समाम्नाय, तीर्थदेवशिवालय, बहुरूप, महारूप, सर्वरूप, चराचर ॥ ११२ ॥ |
| न्यायनिर्वाहको न्यायो न्यायगम्यो निरञ्जनः ।<br>सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वशस्त्रप्रभञ्जनः ॥ ११३ | न्यायनिर्वाहक, न्याय, न्यायगम्य, निरंजन, सहस्रमूर्धा, देवेन्द्र, सर्वशस्त्रप्रभंजन ॥ ११३ ॥ |
अध्याय ९८] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५२३
| श्लोक | नाम-सूची |
|---|---|
| मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी दान्तो गुणोत्तमः।<br>पिङ्गलाक्षोऽथ हर्यक्षो नीलग्रीवो निरामयः॥ ११४॥ | मुण्ड, विरूप, विकृत, दण्डी, दान्त, गुणोत्तम, पिङ्गलाक्ष, हर्यक्ष, नीलग्रीव, निरामय॥ ११४॥ |
| सहस्रबाहुः सर्वेशः शरण्यः सर्वलोकभृत्।<br>पद्मासनः परंज्योतिः परावरपरंफलः॥ ११५॥ | सहस्रबाहुसर्वेश, शरण्य, सर्वलोकभृत्, पद्मासन, परंज्योति, परावरपरंफल॥ ११५॥ |
| पद्मगर्भो महागर्भो विश्वगर्भो विचक्षणः।<br>परावरज्ञो बीजेशः सुमुखः सुमहास्वनः॥ ११६॥ | पद्मगर्भ, महागर्भ, विश्वगर्भ, विचक्षण, परावरज्ञ, बीजेश, सुमुखसुमहास्वन॥ ११६॥ |
| देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः।<br>देवासुरमहामात्रो देवासुरमहाश्रयः॥ ११७॥ | देवासुरगुरुदेव, देवासुरनमस्कृत, देवासुरमहामात्र, देवासुरमहाश्रय॥ ११७॥ |
| देवादिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः।<br>देवासुरेश्वरो दिव्यो देवासुरमहेश्वरः॥ ११८॥ | देवादिदेव, देवर्षिदेवासुरवरप्रद, देवासुरेश्वर, दिव्य, देवासुरमहेश्वर॥ ११८॥ |
| सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवतात्मात्मसम्भवः।<br>ईड्योऽनीशः सुरव्याघ्रो देवसिंहो दिवाकरः॥ ११९॥ | सर्वदेवमय, अचिन्त्य, देवतात्मा, आत्मसम्भव, ईड्य, अनीश, सुरव्याघ्र, देवसिंह, दिवाकर॥ ११९॥ |
| विबुधाग्रवरश्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः।<br>शिवज्ञानरतः श्रीमान् शिखिश्रीपर्वतप्रियः॥ १२०॥ | विबुधाग्रवरश्रेष्ठ, सर्वदेवोत्तमोत्तम, शिवज्ञानरत, श्रीमान्, शिखिश्रीपर्वतप्रिय॥ १२०॥ |
| जयस्तम्भो विशिष्टम्भो नरसिंहनिपातनः।<br>ब्रह्मचारी लोकचारी धर्मचारी धनाधिपः॥ १२१॥ | जयस्तम्भ, विशिष्टम्भ, नरसिंहनिपातन, ब्रह्मचारी, लोकचारी, धर्मचारी, धनाधिप॥ १२१॥ |
| नन्दी नन्दीश्वरो नग्नो नग्नव्रतधरः शुचिः।<br>लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो युगाध्यक्षो युगावहः॥ १२२॥ | नन्दी, नन्दीश्वर, नग्न, नग्नव्रतधर, शुचि, लिङ्गाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, युगाध्यक्ष, युगावह॥ १२२॥ |
| स्ववशः सवशः स्वर्गस्वरः स्वरमयस्वनः।<br>बीजाध्यक्षो बीजकर्ता धनकृद्धर्मवर्धनः॥ १२३॥ | स्ववश, सवश, स्वर्गस्वर, स्वरमयस्वन, बीजाध्यक्ष, बीजकर्ता, धनकृद्धर्मवर्धन॥ १२३॥ |
| दम्भोऽदम्भो महादम्भः सर्वभूतमहेश्वरः।<br>श्मशाननिलयस्तिष्यः सेतुरप्रतिमाकृतिः॥ १२४॥ | दम्भ, अदम्भ, महादम्भ, सर्वभूतमहेश्वर, श्मशाननिलय, तिष्य, सेतु, अप्रतिमाकृति॥ १२४॥ |
| लोकोत्तरस्फुटालोकस्त्र्यम्बको नागभूषणः।<br>अन्धकारिर्मखद्वेषी विष्णुकन्धरपातनः॥ १२५॥ | लोकोत्तरस्फुटालोक, त्र्यम्बक, नागभूषण, अन्धकारि, मखद्वेषी, विष्णुकन्धरपातन॥ १२५॥ |
| वीतदोषोऽक्षयगुणो दक्षारिः पूषदन्तहृत्।<br>धूर्जटिः खण्डपरशुः सकलो निष्कलोऽनघः॥ १२६॥ | वीतदोष, अक्षयगुण, दक्षारि, पूषदन्तहृत्, धूर्जटि, खण्डपरशु, सकल, निष्कल, अनघ॥ १२६॥ |
| आधारः सकलाधारः पाण्डुराभो मृडो नटः।<br>पूर्णः पूरयिता पुण्यः सुकुमारः सुलोचनः॥ १२७॥ | आधार, सकलाधार, पाण्डुराभ, मृड, नट, पूर्ण, पूरयिता, पुण्य, सुकुमार, सुलोचन॥ १२७॥ |
| सामगेयः प्रियकरः पुण्यकीर्तिर्निरामयः।<br>मनोजवस्तीर्थकरो जटिलो जीवितेश्वरः॥ १२८॥ | सामगेय, प्रियकर, पुण्यकीर्ति, अनामय, मनोजव, तीर्थकर, जटिल, जीवितेश्वर॥ १२८॥ |
| जीवितान्तकरो नित्यो वसुचेता वसुप्रियः।<br>सद्गतिः सत्कृतिः सक्तः कालकण्ठः कलाधरः॥ १२९॥ | जीवितान्तकर, नित्य, वसुचेता, वसुप्रिय, सद्गति, सत्कृति, सक्त, कालकण्ठ, कलाधर॥ १२९॥ |
| मानी मान्यो महाकालः सद्भूतिः सत्परायणः।<br>चन्द्रसञ्जीवनः शास्ता लोकगूढोऽमराधिपः॥ १३०॥ | मानी, मान्य, महाकाल, सद्भूति, सत्परायण, चन्द्रसंजीवन, शास्तालोकगूढ़, अमराधिप॥ १३०॥ |
| लोकबन्धुर्लोकनाथः कृतज्ञः कृतिभूषणः।<br>अनपाय्यक्षरः कान्तः सर्वशास्त्रभृतां वरः॥ १३१॥ | लोकबन्धु, लोकनाथ, कृतज्ञ-कृतिभूषण, |
| ५२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| अनपाय्यक्षर, कान्त, सर्वशास्त्रभृतांवर ॥ १३१ ॥ | |
|---|---|
| तेजोमयो द्युतिधरो लोकमायोऽग्रणीरणुः ।<br>शुचिस्मितः प्रसन्नात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ॥ १३२ | तेजोमयद्युतिधर, लोकमाय, अग्रणी, अणु, शुचिस्मित, प्रसन्नात्मा, दुर्जय, दुरतिक्रम ॥ १३२ ॥ |
| ज्योतिर्मयो निराकारो जगन्नाथो जलेश्वरः ।<br>तुम्बवीणी महाकायो विशोकः शोकनाशनः ॥ १३३ | ज्योतिर्मय, निराकार, जगन्नाथ, जलेश्वर, तुम्बवीणी, महाकाय, विशोक, शोकनाशन ॥ १३३ ॥ |
| त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः शुद्धः शुद्धी रथाक्षजः ।<br>अव्यक्तलक्षणोऽव्यक्तो व्यक्ताव्यक्तो विशाम्पतिः ॥ १३४ | त्रिलोकात्मा, त्रिलोकेश, शुद्ध, शुद्धि, रथाक्षज, अव्यक्तलक्षण, अव्यक्त, व्यक्ताव्यक्तविशाम्पति ॥ १३४ ॥ |
| वरशीलो वर्तलो मानो मानधनो मयः ।<br>ब्रह्मा विष्णुः प्रजापालो हंसो हंसगतिर्यमः ॥ १३५ | वरशील, वर्तुल, मान, मानधनमय, ब्रह्मा, विष्णुप्रजापाल, हंस, हंसगति, यम ॥ १३५ ॥ |
| वेधा धाता विधाता च अत्ताहर्ता चतुर्मुखः ।<br>कैलासशिखरावासी सर्वावासी सतां गतिः ॥ १३६ | वेधा, धाता, विधाता, अत्ताहर्ता, चतुर्मुख, कैलासशिखरावासी, सर्वावासी, सतांगति ॥ १३६ ॥ |
| हिरण्यगर्भो हरिणः पुरुषः पूर्वजः पिता ।<br>भूतालयो भूतपतिर्भूतिदो भुवनेश्वरः ॥ १३७ | हिरण्यगर्भ, हरिण, पुरुष, पूर्वजपिता, भूतालय, भूतपति, भूतिद, भुवनेश्वर ॥ १३७ ॥ |
| संयोगी योगविद्ब्रह्मा ब्रह्मण्यो ब्राह्मणप्रियः ।<br>देवप्रियो देवनाथो देवज्ञो देवचिन्तकः ॥ १३८ | संयोगी, योगविद्ब्रह्मा, ब्रह्मण्य, ब्राह्मणप्रिय, देवप्रिय, देवनाथ, देवज्ञ, देवचिन्तक ॥ १३८ ॥ |
| विषमाक्षः कलाध्यक्षो वृषाङ्को वृषवर्धनः ।<br>निर्मदो निरहङ्कारो निर्मोहो निरुपद्रवः ॥ १३९ | विषमाक्ष, कलाध्यक्ष, वृषांक, वृषवर्धन, निर्मद-निरहंकार, निर्मोह, निरुपद्रव ॥ १३९ ॥ |
| दर्पहा दर्पितो दृप्तः सर्वर्तुपरिवर्तकः ।<br>सप्तजिह्वः सहस्रार्चिः स्निग्धः प्रकृतिदक्षिणः ॥ १४० | दर्पहा, दर्पित, दृप्त, सर्वऋतुपरिवर्तक, सप्तजिह्व, सहस्रार्चि, स्निग्ध, प्रकृतिदक्षिण ॥ १४० ॥ |
| भूतभव्यभवन्नाथः प्रभवो भ्रान्तिनाशनः ।<br>अर्थोऽनर्थो महाकोशः परकार्यैकपण्डितः ॥ १४१ | भूतभव्यभवन्नाथ, प्रभव, भ्रान्तिनाशन, अर्थ, अनर्थ, महाकोश, परकार्यैकपण्डित ॥ १४१ ॥ |
| निष्कण्टकः कृतानन्दो निर्व्याजो व्याजमर्दनः ।<br>सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यकीर्तिस्तम्भकृतागमः ॥ १४२ | निष्कण्टक, कृतानन्द, निर्व्याज, व्याजमर्दन, सत्त्ववान्, सात्त्विक, सत्यकीर्तिस्तम्भकृतागम ॥ १४२ ॥ |
| अकम्पितो गुणग्राही नैकात्मा नैककर्मकृत् ।<br>सुप्रीतः सुमुखः सूक्ष्मः सुकरो दक्षिणोऽनलः ॥ १४३ | अकम्पित, गुणग्राही, नैकात्मा-नैककर्मकृत्, सुप्रीत, सुमुख, सूक्ष्म, सुकर, दक्षिण, अनल ॥ १४३ ॥ |
| स्कन्धः स्कन्धधरो धुर्यः प्रकटः प्रीतिवर्धनः ।<br>अपराजितः सर्वसहो विदग्धः सर्ववाहनः ॥ १४४ | स्कन्ध, स्कन्धधर, धुर्य, प्रकट, प्रीतिवर्धन, अपराजित, सर्वसह, विदग्ध, सर्ववाहन ॥ १४४ ॥ |
| अधृतः स्वधृतः साध्यः पूर्तमूर्तिर्यशोधरः ।<br>वराहशृङ्गधृग्वायुर्बलवानेकनायकः ॥ १४५ | अधृत, स्वधृत, साध्य, पूर्तमूर्ति, यशोधर, वराहशृङ्गधृक्, वायु, बलवान्, एकनायक ॥ १४५ ॥ |
| श्रुतिप्रकाशः श्रुतिमानेकबन्धुरनेकधृक् ।<br>श्रीवल्लभशिवारम्भः शान्तभद्रः समञ्जसः ॥ १४६ | श्रुतिप्रकाश, श्रुतिमान्, एकबन्धु, अनेकधृक्, श्रीवल्लभशिवारम्भ, शान्तभद्र, समंजस ॥ १४६ ॥ |
| भूशयो भूतिकृद्भूतिर्भूषणो भूतवाहनः ।<br>अकायो भक्तकायस्थः कालज्ञानी कलावपुः ॥ १४७ | भूशय, भूतिकृद्भूति, भूषण, भूतवाहन, अकाय, भक्तकायस्थ, कालज्ञानी, कलावपु ॥ १४७ ॥ |
| सत्यव्रतमहात्यागी निष्ठाशान्तिपरायणः ।<br>परार्थवृत्तिर्वरदो विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ १४८ | सत्यव्रतमहात्यागी, निष्ठाशान्तिपरायण, परार्थवृत्ति, वरद, विविक्त, श्रुतिसागर ॥ १४८ ॥ |
अध्याय ९८ ] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५२५
| अनिर्वण्णो गुणग्राही कलङ्काङ्कः कलङ्कहा।<br>स्वभावरुद्रो मध्यस्थः शत्रुघ्नो मध्यनाशकः॥ १४९ | अनिर्वण्ण, गुणग्राही, कलंकांक, कलंकहा, स्वभावरुद्र, मध्यस्थ, शत्रुघ्न, मध्यनाशक॥ १४९॥ |
|---|---|
| शिखण्डी कवची शूली चण्डी मुण्डी च कुण्डली।<br>मेखली कवची खड्गी मायी संसारसारथिः॥ १५० | शिखण्डी, कवची, शूली, चण्डी, मुण्डी, कुण्डली, मेखली, कवची, खड्गी, मायीसंसारसारथि॥ १५०॥ |
| मृत्युः सर्वदृक् सिंहस्तेजोराशिर्महामणिः।<br>असंख्येयोऽप्रमेयात्मा वीर्यवान् कार्यकोविदः॥ १५१ | मृत्युसर्वदृक्, सिंह, तेजोराशि-महामणि, असंख्येय, अप्रमेयात्मा, वीर्यवान्, कार्यकोविद॥ १५१॥ |
| वेद्यो वेदार्थविद्गोप्ता सर्वाचारो मुनीश्वरः।<br>अनुत्तमो दुराधर्षो मधुरः प्रियदर्शनः॥ १५२ | वेद्य, वेदार्थविद्गोप्ता, सर्वाचार, मुनीश्वर, अनुत्तम, दुराधर्ष, मधुर, प्रियदर्शन॥ १५२॥ |
| सुरेशः शरणं सर्वः शब्दब्रह्मसताङ्गतिः।<br>कालभक्षः कलङ्कारिः कङ्कणीकृतवासुकिः॥ १५३ | सुरेश, शरण, सर्व, शब्दब्रह्मसतांगति, कालभक्ष, कलंकारि, कंकणीकृतवासुकि॥ १५३॥ |
| महेष्वासो महीभर्ता निष्कलङ्को विश्रृङ्खलः।<br>द्युमणिस्तरणिर्धन्यः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥ १५४ | महेष्वास, महीभर्ता, निष्कलंक, विश्रृंखल, द्युमणितरणि, धन्य, सिद्धिद, सिद्धिसाधन॥ १५४॥ |
| निवृत्तः संवृतः शिल्पो व्यूढोरस्को महाभुजः।<br>एकज्योतिर्निरातङ्को नरो नारायणप्रियः॥ १५५ | निवृत्त, संवृत, शिल्प, व्यूढोरस्क, महाभुज, एकज्योति, निरातंक, नरनारायणप्रिय॥ १५५॥ |
| निर्लेपो निष्प्रपञ्चात्मा निर्व्यग्रो व्यग्रनाशनः।<br>स्तव्यस्तवप्रियः स्तोता व्यासमूर्तिरनाकुलः॥ १५६ | निर्लेप, निष्प्रपंचात्मा, निर्व्यग्र, व्यग्रनाशन, स्तव्यस्तवप्रिय, स्तोताव्यासमूर्ति, अनाकुल॥ १५६॥ |
| निरवद्यपदोपायो विद्याराशिरविक्रमः।<br>प्रशान्तबुद्धिरक्षुद्रः क्षुद्रहा नित्यसुन्दरः॥ १५७ | निरवद्यपदोपाय, विद्याराशि, अविक्रम, प्रशान्तबुद्धिअक्षुद्र, क्षुद्रहा, नित्यसुन्दर॥ १५७॥ |
| धैर्याग्र्यधुर्यो धात्रीशः शाकल्यः शर्वरीपतिः।<br>परमार्थगुरुर्दृष्टिर्गुरुराश्रितवत्सलः॥ १५८<br>रसो रसज्ञः सर्वज्ञः सर्वसत्त्वावलम्बनः। | धैर्याग्र्यधुर्य, धात्रीश, शाकल्य, शर्वरीपति, परमार्थगुरुदृष्टि, गुरु, आश्रितवत्सल, रस, रसज्ञ, सर्वज्ञ, सर्वसत्त्वावलम्बन॥ १५८१/२॥ |
| सूत उवाच<br>एवं नाम्नां सहस्रेण तुष्टाव वृषभध्वजम्॥ १५९<br>स्नापयामास च विभुः पूजयामास पङ्कजैः।<br>परीक्षार्थं हरेः पूजाकमलेषु महेश्वरः॥ १६० | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] इस प्रकार विष्णुने एक हजार नामोंसे वृषभध्वजकी स्तुति की; पुनः उन्हें स्नान कराया और कमलोंसे उनका पूजन किया। उस समय विष्णुकी परीक्षा लेनेके लिये जगत्के स्वामी महेश्वरने पूजाके कमलोंमेंसे एक कमलको छिपा लिया॥ १५९-१६०१/२॥ |
| गोपायमास कमलं तदैकं भुवनेश्वरः।<br>हतपुष्पो हरिस्तत्र किमिदं त्वभ्यचिन्तयन्॥ १६१<br>ज्ञात्वा स्वनेत्रमुद्धृत्य सर्वसत्त्वावलम्बनम्।<br>पूजयामास भावेन नाम्ना तेन जगद्गुरुम्॥ १६२ | तब हतपुष्पवाले विष्णुने 'यह क्या'—ऐसा सोचते हुए बादमें वास्तविकता समझकर अपने नेत्रको निकाल करके सर्वसत्त्वावलम्बन (सभी प्राणियोंको अवलम्ब देनेवाले) जगद्गुरु [शिव]–की पूजा प्रेमपूर्वक उस [अन्तिम सर्वसत्त्वावलम्बन] नामसे की॥ १६१-१६२॥ |
| ततस्तत्र विभुर्दृष्ट्वा तथाभूतं हरो हरिम्।<br>तस्मादवतताराशु मण्डलात्पावकस्य च॥ १६३<br>कोटिभास्करसङ्काशं जटामुकुटमण्डितम्।<br>ज्वालामालावृतं दिव्यं तीक्ष्णदंष्ट्रं भयङ्करम्॥ १६४ | तत्पश्चात् समर्पित नेत्रवाले विष्णुको देखकर भगवान् शिव उस लिङ्गसे तथा अग्नि-मण्डलसे शीघ्र उतरे। तब करोड़ों सूर्योंके समान तेजसम्पन्न, |
५२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शूलटङ्कगदाचक्रकुन्तपाशधरं हरम्।<br>वरदाभयहस्तं च द्वीपिचर्मोत्तरीयकम्॥ १६५<br><br>इत्थंभूतं तदा दृष्ट्वा भवं भस्मविभूषितम्।<br>हृष्टो नमश्चकाराशु देवदेवं जनार्दनः॥ १६६ | जटारूपी मुकुटसे मण्डित, ज्वालासमूहसे घिरे हुए, दिव्य, तीक्ष्ण दाँतोंवाले, भयंकर, शूल-टंक-गदा-चक्र-भाला-पाश धारण किये हुए, वर तथा अभय मुद्रायुक्त हाथवाले, बाघके चर्मको उत्तरीयके रूपमें धारण किये हुए तथा भस्मसे विभूषित—इस प्रकारके रूपवाले हर भवको देखकर प्रसन्न हुए जनार्दनने उन देवदेव [शिव]-को शीघ्र प्रणाम किया॥ १६५-१६६॥ |
| दुद्रुवुस्तं परिक्रम्य सेन्द्रा देवास्त्रिलोचनम्।<br>चचाल ब्रह्मभुवनं चकम्पे च वसुन्धरा॥ १६७<br><br>ददाह तेजस्तच्छम्भोः प्रान्तं वै शतयोजनम्।<br>अधस्ताच्चोर्ध्वतश्चैव हाहेत्यकृत भूतले॥ १६८ | इन्द्रसहित देवतागण त्रिलोचनकी परिक्रमा करके भागने लगे, ब्रह्मलोक हिल उठा और पृथ्वी काँपने लगी। शिवका वह तेज नीचेसे तथा ऊपरसे सौ योजन स्थानको जलाने लगा; इससे पृथ्वीतलपर हाहाकार मच गया॥ १६७-१६८॥ |
| तदा प्राह महादेवः प्रहसन्निव शङ्करः।<br>सम्प्रेक्ष्य प्रणयाद्विष्णुं कृताञ्जलिपुटं स्थितम्॥ १६९ | तदनन्तर महादेव शंकरने हाथ जोड़कर [सामने] खड़े विष्णुकी ओर प्रेमपूर्वक देखकर हँसते हुए कहा— |
| ज्ञातं मयेदमधुना देवकार्यं जनार्दन।<br>सुदर्शनाख्यं चक्रं च ददामि तव शोभनम्॥ १७० | हे जनार्दन! अब मैं देवताओंके इस कार्यको जान गया और आपको सुदर्शन नामक उत्तम चक्र प्रदान करता हूँ॥ १६९-१७०॥ |
| यद्रूपं भवता दृष्टं सर्वलोकभयङ्करम्।<br>हिताय तव यत्नेन तव भावाय सुव्रत॥ १७१ | हे सुव्रत! आपने सभी लोकोंके लिये भयंकर मेरे जिस रूपको देखा है, वह पूर्णरूपसे आपके हित तथा भक्तिभावके लिये है। |
| शान्तं रणाजिरे विष्णो देवानां दुःखसाधनम्।<br>शान्तस्य चास्त्रं शान्तः स्याच्छान्तेनास्त्रेण किं फलम्॥ १७२ | हे विष्णो! युद्धभूमिमें सौम्यरूप धारण करना देवताओंके लिये दुःखदायक है। शान्त व्यक्तिका अस्त्र यदि शान्त हो, तो उस शान्त अस्त्रसे कोई फल नहीं होता है। |
| शान्तस्य समरे चास्त्रं शान्तिरेव तपस्विनाम्।<br>योद्धुः शान्त्या बलच्छेदः परस्य बलवृद्धिदः॥ १७३ | [केवल] तपस्वीके प्रति युद्धमें शान्त व्यक्तिका अस्त्र शान्त होता है। योद्धाकी शान्तिसे उसकी बलहीनता शत्रुके बलको बढ़ानेवाली होती है। |
| देवैरशान्तैर्यद्रूपं मदीयं भावयाव्ययम्।<br>किमायुधेन कार्यं वै योद्धुं देवारिसूदन॥ १७४ | हे देवशत्रुनाशक! अशान्त देवताओंके साथ आप मेरे अव्यय स्वरूपका ध्यान कीजिये; युद्ध करनेके लिये अस्त्रसे क्या प्रयोजन? |
| क्षमा युधि न कार्या वै योद्धुं देवारिसूदन।<br>अनागते व्यतीते च दौर्बल्ये स्वजनोत्करे॥ १७५<br><br>अकालिके त्वधर्मे च अनर्थे वारिसूदन।<br>एवमुक्त्वा ददौ चक्रं सूर्यायुतसमप्रभम्॥ १७६ | हे देवारिसूदन! युद्धमें क्षमा नहीं करनी चाहिये। युद्धके लिये अनुपस्थित शत्रु तथा बलशाली स्वजनोंके प्रति और अधर्म-अनर्थकी स्थितिमें अनुपयुक्त समयमें भी क्षमाका आश्रय नहीं लेना चाहिये॥ १७१-१७५ १/२॥ |
| नेत्रं च नेता जगतां प्रभुर्वै पद्मसन्निभम्।<br>तदाप्रभृति तं प्राहुः पद्माक्षमिति सुव्रतम्॥ १७७ | ऐसा कहकर लोकनायक प्रभु [शिव]-ने उन्हें दस हजार सूर्योंके समान तेजस्वी [सुदर्शन] चक्र तथा कमलसदृश एक नेत्र भी प्रदान किया; उसी समयसे |
अध्याय ९८ ] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५२७
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उन सुव्रत [विष्णु]-को पद्माक्ष (कमलनयन) कहा जाता है॥ १७६-१७७॥ | |
| दत्तवैवं नयनं चक्रं विष्णवे नीललोहितः।<br>पस्पर्श च कराभ्यां वै सुशुभाभ्यामुवाच ह॥ १७८<br><br>वरदोऽहं वरश्रेष्ठ वरान् वरय चेप्सितान्।<br>भक्त्या वशीकृतो नूनं त्वयाहं पुरुषोत्तम॥ १७९ | विष्णुको चक्र तथा नेत्र प्रदान करके नीललोहित [शिव]-ने अपने परम पवित्र हाथोंसे उनका स्पर्श किया और कहा—'हे वरश्रेष्ठ! मैं वरदाता हूँ, आप अभीष्ट वरोंको माँगिये। हे पुरुषोत्तम! आपने निश्चित रूपसे अपनी भक्तिसे मुझे वशमें कर लिया है'॥ १७८-१७९॥ |
| इत्युक्तो देवदेवेन देवदेवं प्रणम्य तम्।<br>त्वयि भक्तिर्महादेव प्रसीद वरमुत्तमम्॥ १८०<br><br>नान्यमिच्छामि भक्तानामार्तयो नास्ति यत्प्रभो।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दयावान् सुतरां भवः॥ १८१ | देवाधिदेवके इस प्रकार कहनेपर विष्णुने उन देवदेवेश्वरको प्रणाम करके कहा—'हे महादेव! आपमें मेरी [पूर्ण] भक्ति हो, आप मुझपर प्रसन्न होइये। हे प्रभो! मैं अन्य उत्तम वर नहीं चाहता; क्योंकि भक्तोंकी अन्य कामनाएँ नहीं होती हैं'॥ १८० १/२॥ |
| पस्पर्श च ददौ तस्मै श्रद्धां शीतांशुभूषणः।<br>प्राह चैवं महादेवः परमात्मानमच्युतम्॥ १८२<br><br>मयि भक्तश्च वन्द्यश्च पूज्यश्चैव सुरासुरैः।<br>भविष्यसि न सन्देहो मत्प्रसादात्सुरोत्तम॥ १८३<br><br>यदा सती दक्षपुत्री विनिन्द्यैव सुलोचना।<br>मातरं पितरं दक्षं भविष्यति सुरेश्वरी॥ १८४<br><br>दिव्या हैमवती विष्णो तदा त्वमपि सुव्रत।<br>भगिनीं तव कल्याणीं देवीं हैमवतीमुमाम्॥ १८५<br><br>नियोगाद् ब्रह्मणः साध्वीं प्रदास्यसि ममैव ताम्।<br>मत्सम्बन्धी च लोकानां मध्ये पूज्यो भविष्यसि॥ १८६<br><br>मां दिव्येन च भावेन तदाप्रभृति शङ्करम्।<br>द्रक्ष्यसे च प्रसन्नेन मित्रभूतमिवात्मना॥ १८७ | उनका वचन सुनकर परम दयालु शिवने उनका स्पर्श किया और उन्हें [अपनी] भक्ति प्रदान की। तत्पश्चात् चन्द्रमाको भूषणके रूपमें धारण करनेवाले महादेवने परमात्मा अच्युत (विष्णु)-से कहा—'हे सुरोत्तम! मेरी कृपासे आप मुझमें भक्ति रखनेवाले और देवताओं तथा असुरोंके वन्दनीय तथा पूजनीय होंगे; इसमें सन्देह नहीं है। हे विष्णो! हे सुव्रत! जब सुन्दर नेत्रोंवाली दक्षपुत्री सती अपनी माता तथा पिता दक्षकी निन्दा करके सुरेश्वरीके रूपमें हिमवान्की दिव्य कन्या होकर उत्पन्न होंगी; उस समय आप ब्रह्माके आदेशसे अपनी भगिनीरूपा उन हिमवान्की पुत्री कल्याणी साध्वी देवी उमाको मुझे प्रदान करेंगे। तब लोकोंके बीच मेरे सम्बन्धीके रूपमें आप पूज्य होंगे। उस समयसे आप दिव्य भावसे तथा प्रसन्न मनसे मुझ शंकरको मित्रकी भाँति देखेंगे'—ऐसा कहकर नीललोहित भगवान् रुद्र अन्तर्धान हो गये॥ १८१-१८७ १/२॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे रुद्रो भगवान्नीललोहितः।<br>जनार्दनोऽपि भगवान् देवानामपि सन्निधौ॥ १८८<br><br>अयाचत महादेवं ब्रह्माणं मुनिभिः समम्।<br>मया प्रोक्तं स्तवं दिव्यं पद्मयोने सुशोभनम्॥ १८९<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्।<br>प्रतिनाम्नि हिरण्यस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात्॥ १९० | भगवान् जनार्दनने भी देवताओंकी उपस्थितिमें मुनियोंके साथ महान् देवता ब्रह्मासे प्रार्थना की—हे पद्मयोने! जो मेरे द्वारा कहे गये दिव्य तथा परम सुन्दर स्तव (सहस्रनाम स्तोत्र)-को पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है; वह प्रत्येक नामके उच्चारणपर सुवर्णके दानका फल प्राप्त करता है और उसे हजार अश्वमेध यज्ञ करनेसे होनेवाला फल मिलता है। जो घृत |
९९- भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव तथा शिवाका दक्षपुत्री सतीके रूपमें पुनः मेनाकी कन्या पार्वतीके रूपमें प्राकट्य
५२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग ---|---
| अश्वमेधसहस्रेण फलं भवति तस्य वै।<br>घृताद्यैः स्नापयेद् रुद्रं स्थाल्या वै कलशैः शुभैः ॥ १९१<br>नाम्नां सहस्रेणानेन श्रद्धया शिवमिश्वरम्।<br>सोऽपि यज्ञसहस्रस्य फलं लब्ध्वा सुरेश्वरैः ॥ १९२<br>पूज्यो भवति रुद्रस्य प्रीतिर्भवति तस्य वै।<br>तथास्त्विति तथा प्राह पद्मयोनिर्जनार्दनम् ॥ १९३<br>जग्मतुः प्रणिपत्यैनं देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>तस्मान्नाम्नां सहस्रेण पूजयेदनघो द्विजाः ॥ १९४<br>जपेन्नाम्नां सहस्रं च स याति परमां गतिम् ॥ १९५ | आदिसे परिपूर्ण स्थाली अथवा शुभ कलशोंसे इस सहस्रनामके द्वारा भगवान् रुद्र शिवको श्रद्धापूर्वक स्नान कराता है, वह भी हजार यज्ञोंका फल प्राप्त करके सुरेश्वरोंके द्वारा पूजित होता है और उसके प्रति रुद्रकी प्रीति होती है॥ १८८-१९२१/२॥<br>तब ब्रह्माने विष्णुसे कहा—'ऐसा ही हो।' इसके बाद इन जगद्गुरु देवदेव [शिव]-को प्रणाम करके वे दोनों (ब्रह्मा-विष्णु) चले गये। अतः हे द्विजो! जो निष्पाप व्यक्ति [इस] हजार नामोंसे शिवकी पूजा करता है और हजार नामोंका जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥ १९३-१९५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सहस्रनामभिः पूजनाद्विष्णुचक्रलाभो नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सहस्रनामोंद्वारा पूजनसे विष्णुको चक्रलाभ' नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९८ ॥
निन्यानबेवाँ अध्याय
भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव तथा शिवाका दक्षपुत्री सतीके रूपमें पुनः मेनाकी कन्या पार्वतीके रूपमें प्राकट्य
| ऋषय ऊचुः<br>सम्भवः सूचितो देव्यास्त्वया सूत महामते।<br>सविस्तरं वदस्वाद्य सतीत्वे च यथातथम् ॥ १<br>मेनाजत्वं महादेव्या दक्षयज्ञविमर्दनम्।<br>विष्णुना च कथं दत्ता देवदेवाय शम्भवे ॥ २<br>कल्याणं वा कथं तस्य वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्।<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः ॥ ३<br>सम्भवं च महादेव्याः प्राह तेषां महात्मनाम्। | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! हे महामते! आपने देवीकी उत्पत्तिके विषयमें बताया; अब उनके सतीत्वके विषयमें ठीक-ठीक विस्तारपूर्वक बताइये और महादेविका मेनासे उत्पन्न होने तथा दक्षके यज्ञविध्वंसका भी वर्णन कीजिये; विष्णुने देवदेव शम्भुको उन्हें कैसे प्रदान किया और उन विष्णुका कल्याण किस प्रकार हुआ—यह सब इस समय बतानेकी कृपा कीजिये॥ १-२१/२॥<br>उनका यह वचन सुनकर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजी उन महात्माओंसे महादेविके जन्मके विषयमें बताने लगे॥ ३१/२॥ |
| सूत उवाच<br>ब्रह्मणा कथितं पूर्वं दण्डिने तत्सुविस्तरम् ॥ ४<br>युष्माभिर्वै कुमाराय तेन व्यासाय धीमते।<br>तस्मादहमुपश्रुत्य प्रवदामि सुविस्तरम् ॥ ५<br>वचनाद्भो महाभागाः प्रणम्योमां तथा भवम्।<br>सा भगाख्या जगद्धात्री लिङ्गमूर्तेस्त्रिवेदिका ॥ ६ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] आपलोगोंने जो पूछा है, उस विषयमें सर्वप्रथम ब्रह्माने दण्डी सनत्कुमारको विस्तारसे बताया था, पुनः उन सनत्कुमारने बुद्धिमान् व्यासजीको बताया और हे महाभागो! उन [व्यासजी]-से सुन करके मैं आपलोगोंके कहनेपर उमा तथा शिवको प्रणाम करके विस्तारपूर्वक आप लोगोंको बता रहा हूँ॥ ४-५१/२॥<br>वे जगन्माता भग नामवाली और लिङ्गरूप शिवकी |
| अध्याय ९९ ] | भगवान् शिवके वामभागसे शिवाका प्रादुर्भाव | ५२९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लिङ्गस्तु भगवान् द्वाभ्यां जगत्सृष्टिर्द्विजोत्तमाः।<br>लिङ्गमूर्तिः शिवो ज्योतिस्तमसश्चोपरि स्थितः॥ ७<br>लिङ्गवेदिसमायोगादर्धनारीश्वरोऽभवत् ।<br>ब्रह्माणं विदधे देवमग्रे पुत्रं चतुर्मुखम्॥ ८ | त्रिगुणवेदिका प्रकृतिरूपा हैं। लिङ्गरूप शिव सदा भगयुक्त रहते हैं। हे उत्तम द्विजो! इन्हीं दोनों [लिङ्ग तथा भग]-से ही जगत्की सृष्टि होती है। लिङ्गस्वरूप शिव प्रकाशरूप हैं और सदा मायारूपी तम (अन्धकार)-के ऊपर विराजमान हैं। लिङ्ग तथा वेदीके समायोगसे शिव अर्धनारीश्वर हो गये। उन्होंने पहले चतुर्मुख देव ब्रह्माको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ६–८॥ |
| प्राहिणोति स्म तस्यैव ज्ञानं ज्ञानमयो हरः।<br>विश्वाधिकोऽसौ भगवानर्धनारीश्वरो विभुः॥ ९<br>हिरण्यगर्भं तं देवो जायमानमपश्यत।<br>सोऽपि रुद्रं महादेवं ब्रह्मापश्यत शङ्करम्॥ १०<br>तं दृष्ट्वा संस्थितं देवमर्धनारीश्वरं प्रभुम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्वरदं वारिजोद्भवः॥ ११<br>विभजस्वेति विश्वेशं विश्वात्मानमजो विभुः।<br>ससर्ज देवीं वामाङ्गात्पत्नीं चैवात्मनः समाम्॥ १२ | ज्ञानमय तथा विश्वमें सबसे बढ़कर विभु अर्धनारीश्वर भगवान् हरने उन [ब्रह्मा]-को ज्ञान प्रदान किया। शिवजीने उत्पन्न हुए ब्रह्माको देखा और उन ब्रह्माने भी रुद्र शंकर महादेवको देखा। वहाँ स्थित अर्धनारीश्वर प्रभु शिवको देखकर ब्रह्माने अभीष्ट वचनोंसे उन वरदाता [शिव]-की स्तुति की। इसके बाद प्रभु अजने विश्वेश्वर विश्वात्मा [शिव]-से प्रार्थना की—'अपनेको विभक्त कीजिये।' तब उन्होंने अपने बायें अंगसे पत्नीके रूपमें अपने ही समान देवीका सृजन किया॥ ९–१२॥ |
| श्रद्धा ह्यस्य शुभा पत्नी ततः पुंसः पुरातनी।<br>सैवाज्ञया विभोर्देवी दक्षपुत्री बभूव ह॥ १३<br>सतीसंज्ञा तदा सा वै रुद्रमेवाश्रिता पतिम्।<br>दक्षं विनिन्द्य कालेन देवी मैना ह्यभूत्पुनः॥ १४ | इन [आत्मरूप] पुरुषकी पुरातन शुभा पत्नी श्रद्धा हैं; शिवकी आज्ञासे वे देवी दक्षपुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुईं। उस समय उनका नाम सती पड़ा और उन्होंने रुद्रको पतिके रूपमें स्वीकार किया। कुछ समयके बाद दक्षकी निन्दा करके वे देवी पुनः मेनाकी पुत्री हुईं॥ १३-१४॥ |
| नारदस्यैव दक्षोऽपि शापाद्देवं विनिन्द्य च।<br>अवज्ञादुर्मदो दक्षो देवदेवमुमापतिम्॥ १५<br>अनादृत्य कृतिं ज्ञात्वा सती दक्षेण तत्क्षणात्।<br>भस्मीकृत्यात्मनो देहं योगमार्गेण सा पुनः॥ १६<br>बभूव पार्वती देवी तपसा च गिरेः प्रभोः।<br>ज्ञात्वैतद्भगवान् भर्गो ददाह रुषितः प्रभुः॥ १७<br>दक्षस्य विपुलं यज्ञं च्यावनेर्वचनादपि।<br>च्यवनस्य सुतो धीमान् दधीच इति विश्रुतः॥ १८<br>विजित्य विष्णुं समरे प्रसादात् त्र्यम्बकस्य च।<br>विष्णुना लोकपालांश्च शशाप च मुनीश्वरः॥ १९<br>रुद्रस्य क्रोधजेनैव वह्निना हविषा सुराः।<br>विनाशो वै क्षणादेव मायया शङ्करस्य वै॥ २० | नारदके शापके कारण अवज्ञासे दुर्मद दक्षने भी देवदेव उमापतिकी निन्दा करके यज्ञ किया। तब शिवके प्रति अनादरपूर्ण दक्षकृत्यको जानकर सतीने उसी क्षण अपनी देहको योगमार्गसे भस्म करके पुनः पर्वतराज हिमाचलकी तपस्यासे [उनकी पुत्री होकर] देवी पार्वतीके रूपमें जन्म लिया। यह जानकर च्यवनके पुत्रके कहनेसे भगवान् प्रभु भर्गने कुपित होकर दक्षके विस्तृत यज्ञको जला दिया। च्यवनके बुद्धिमान् पुत्र दधीच नामसे प्रसिद्ध थे। शिवकी कृपासे युद्धमें विष्णुको जीतकर उन मुनीश्वरने विष्णुसहित लोकपालोंको यह शाप दे दिया—'हे देवताओ! शंकरकी मायाके कारण रुद्रके क्रोधसे उत्पन्न हविष्याग्निके द्वारा क्षणभरमें [आपलोगोंका] विनाश हो जायगा'॥ १५–२०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवीसम्भवो नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवीकी उत्पत्ति' नामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९९॥
१००- वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह
| ५३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
सौवाँ अध्याय
वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह
| ऋषय ऊचुः<br>विजित्य विष्णुना सार्धं भगवान् परमेश्वरः।<br>सर्वान् दधीचवचनात्कथं भेजे महेश्वरः॥ १ | ऋषिगण बोले— [ हे सूतजी!] परमेश्वर भगवान् महेश्वरने दधीचके कहनेसे विष्णुसहित सबको जीतकर पुनः यज्ञका सेवन कैसे किया ? ॥ १ ॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>दक्षयज्ञे सुविपुले देवान् विष्णुपुरोगमान्।<br>ददाह भगवान् रुद्रः सर्वान् मुनिगणानपि॥ २<br><br>भद्रो नाम गणस्तेन प्रेषितः परमेष्ठिना।<br>विप्रयोगेन देव्या वै दुःसहेनैव सुव्रताः॥ ३<br><br>सोऽसृजद्वीरभद्रश्च गणेशान् रोमजाञ्छुभान्।<br>गणेश्वरैः समारुह्य रथं भद्रः प्रतापवान्॥ ४<br><br>गन्तुं चक्रे मतिं यस्य सारथिर्भगवानजः।<br>गणेश्वराश्च ते सर्वे विविधायुधपाणयः॥ ५<br><br>विमानैर्विश्वतो भद्रैस्तमन्वयुरथो सुराः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये हेमशृङ्गे सुशोभने॥ ६<br><br>यज्ञवाटस्तथा तस्य गङ्गाद्वारसमीपतः।<br>तद्देशे चैव विख्यातं शुभं कनखलं द्विजाः॥ ७ | सूतजी बोले— [ हे ऋषियो!] भगवान् रुद्रने दक्षके अति महान् यज्ञमें विष्णु आदि प्रमुख देवताओं तथा सभी मुनियोंको जला दिया। हे सुव्रतो! देवीके असहनीय वियोगके कारण उन शिवजीने [अपने] भद्र नामक गणको भेजा। उस वीरभद्रने अपने रोमोंसे उत्तम गणेश्वरोंको उत्पन्न किया। तब गणेश्वरोंके साथ रथपर सवार होकर प्रतापशाली वीरभद्रने प्रस्थान करनेका निश्चय किया; जिनके सारथि भगवान् ब्रह्मा थे। हाथोंमें विविध आयुध लिये हुए वे सभी गणेश्वर तथा देवता शुभ विमानोंपर आरूढ़ होकर सभी ओरसे उन वीरभद्रके पीछे-पीछे चले। हे द्विजो! हिमवान्के रमणीय तथा परम सुन्दर सुवर्णमय शिखरपर गंगाद्वारके समीप कनखल नामक शुभ तथा विख्यात स्थान है; उसी स्थानमें उन दक्षकी यज्ञशाला थी ॥ २–७ ॥<br><br>जब शिवजीने भगवान् वीरभद्रको [यज्ञको] दग्ध<br><br>(चित्र)<br><br>करनेके लिये भेजा, उस समय लोकोंको भयभीत |
| दग्धुं वै प्रेषितश्चासौ भगवान् परमेष्ठिना।<br>तदोत्पातो बभूवाथ लोकानां भयशंसनः॥ ८ |
अध्याय १००] वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह ५३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पर्वताश्च व्यशीर्यन्त प्रचकम्पे वसुन्धरा।<br>मरुतश्चाप्यघूर्णन्त चुक्षुभे मकरालयः॥ ९<br>अग्नयो नैव दीप्यन्ति न च दीप्यति भास्करः।<br>ग्रहाश्च न प्रकाशन्ते न देवा न च दानवाः॥ १० | करनेवाला उत्पात होने लगा। पर्वत फटने लगे, पृथ्वी काँप उठी, वायु घूर्णित हो गये, समुद्र क्षुब्ध हो गया, अग्निने जलना बन्द कर दिया, सूर्य दीप्तिरहित हो गया, ग्रह प्रकाशहीन हो गये और देवता तथा दानव कोई भी प्रसन्न नहीं थे॥ ८—१०॥ |
| ततः क्षणात् प्रविश्यैव यज्ञवाटं महात्मनः।<br>रोमजैः सहितो भद्रः कालाग्निरिव चापरः॥ ११<br>उवाच भद्रो भगवान् दक्षं चामिततेजसम्।<br>सम्पर्कादेव दक्षाद्य मुनीन् देवान् पिनाकिना॥ १२<br>दग्धुं सम्प्रेषितश्चाहं भवन्तं समुनीश्वरैः।<br>इत्युक्त्वा यज्ञशालां तां ददाह गणपुङ्गवः॥ १३ | उसी क्षण दूसरी कालाग्निके समान भगवान् वीरभद्रने अपने रोमोंसे उत्पन्न किये गये गणेश्वरोंके साथ महात्मा [दक्ष]-के यज्ञस्थलमें प्रवेश करके अमित तेजवाले दक्षसे कहा—‘हे दक्ष! आज पिनाकधारी शिवने मुनियों, देवताओं तथा मुनीश्वरोंसहित आपको केवल स्पर्शमात्रसे दग्ध करनेके लिये मुझको भेजा है।’—ऐसा कहकर उस श्रेष्ठ गणने उस यज्ञशालाको जला डाला॥ ११-१३॥ |
| गणेश्वराश्च सङ्क्रुद्धा यूपानुत्पाट्य चिक्षिपुः।<br>प्रस्तोत्रा सह होत्रा च दग्धं चैव गणेश्वरैः॥ १४<br>गृहीत्वा गणपाः सर्वान् गङ्गास्रोतसि चिक्षिपुः।<br>वीरभद्रो महातेजाः शक्रस्योद्यच्छतः करम्॥ १५<br>व्यष्टम्भयददीनात्मा तथान्येषां दिवौकसाम्।<br>भगस्य नेत्रे चोत्पाट्य करजाग्रेण लीलया॥ १६<br>निहत्य मुष्टिना दन्तान् पूष्णाश्चैवं न्यपातयत्।<br>तथा चन्द्रमसं देवं पादाङ्गुष्ठेन लीलया॥ १७ | अत्यन्त क्रुद्ध गणेश्वरोंने [यज्ञके] यूपों (स्तम्भों)-को उखाड़कर फेंक दिया। गणेश्वरोंने प्रस्तोता तथा होतासहित सबको जला दिया। उन गणेश्वरोंने सभीको पकड़कर गंगाकी धारामें फेंक दिया। महातेजस्वी तथा अदीन आत्मावाले वीरभद्रने उठे हुए इन्द्रके वज्र-युक्त हाथको स्तम्भित कर दिया और अन्य देवताओंके हाथोंको भी स्तम्भित कर दिया। उन्होंने लीलापूर्वक अपने नाखूनोंके अग्रभागसे भगके नेत्रोंको निकालकर पुनः मुष्टिकासे प्रहार करके पूषाके दाँतोंको तोड़कर गिरा दिया॥ १४-१६ १/२॥ |
| घर्षयामास भगवान् वीरभद्रः प्रतापवान्।<br>चिच्छेद च शिरस्तस्य शक्रस्य भगवान् प्रभोः॥ १८<br>वह्नेर्हस्तद्वयं छित्त्वा जिह्वामुत्पाट्य लीलया।<br>जघान मूर्ध्नि पादेन वीरभद्रो महाबलः॥ १९ | इसके बाद प्रतापी भगवान् वीरभद्रने [अपने] पैरके अँगूठेसे बिना प्रयासके चन्द्रदेवको घर्षित कर दिया और उन प्रभु इन्द्रके सिरको काट दिया। महाबली वीरभद्रने लीलापूर्वक अग्निदेवके दोनों हाथोंको काटकर तथा जीभ उखाड़कर पैरसे उनके सिरपर प्रहार किया॥ १७-१९॥ |
| यमस्य दण्डं भगवान् प्रचिच्छेद स्वयं प्रभुः।<br>जघान देवमीशानं त्रिशूलेन महाबलम्॥ २०<br>त्रयस्त्रिंशत्सुरानेवं विनिहत्याप्रयत्नतः।<br>त्रयश्च त्रिशतं तेषां त्रिसाहस्रं च लीलया॥ २१<br>त्रयं चैव सुरेन्द्राणां जघान च मुनीश्वरान्।<br>अन्यांश्च देवान् देवोऽसौ सर्वान् युद्धाय संस्थितान्॥ २२<br>जघान भगवान् रुद्रः खड्गमुष्ट्यादिसायकैः।<br>अथ विष्णुर्महातेजाश्चक्रमुद्यम्य मूर्च्छितः॥ २३ | तत्पश्चात् प्रभु भगवान् वीरभद्रने स्वयं यमके दण्डको काट दिया और महाबली ईशानदेवको त्रिशूलसे मारा। उन्होंने [वसु, रुद्रादित्यरूप] तैंतीस देवताओं तथा इन्हीं तीनोंके तीन सौ तथा तीन हजार भेदोंको लीलापूर्वक अनायास ही मार करके [इन्द्र, अग्नि, सोमरूप] तीन प्रधान देवों, मुनीश्वरों तथा युद्धके लिये सन्नद्ध अन्य सभी देवताओंको भी मार डाला॥ २०-२२ १/२॥ |
| ५३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| युयोध भगवांस्तेन रुद्रेण सह माधवः ।<br>तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् ॥ २४<br><br>विष्णोर्योगबलात्तस्य दिव्यदेहाः सुदारुणाः ॥ २५ | इसके बाद महातेजस्वी लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु [अपना] चक्र उठाकर आवेशयुक्त होकर उन रुद्रके साथ युद्ध करने लगे; उन दोनोंके बीच अतिभयंकर तथा रोमांचकारी युद्ध हुआ। उन विष्णुके योगबलसे हाथोंमें शंख-चक्र-गदा धारण किये हुए, दिव्य देहवाले तथा परम दारुण असंख्य योद्धा उत्पन्न हो गये॥ २३—२५ १/२ ॥ |
| शङ्खचक्रगदाहस्ता असंख्याताश्च जज्ञिरे ।<br>तान् सर्वानपि देवोऽसौ नारायणसमप्रभान् ॥ २६<br><br>निहत्य गदया विष्णुं ताडयामास मूर्धनि ।<br>ततश्चोरसि तं देवं लीलयैव रणाजिरे ॥ २७<br><br>पपात च तदा भूमौ विसंज्ञः पुरुषोत्तमः ।<br>पुनरुत्थाय तं हन्तुं चक्रमुद्यम्य स प्रभुः ॥ २८ | तब उन वीरभद्रदेवने नारायणके समान प्रभाववाले उन सबको भी मार करके रणभूमिमें ही गदासे लीलापूर्वक विष्णुदेवके सिरपर प्रहार किया; इसके बाद उनके वक्षःस्थलपर प्रहार किया, तब वे पुरुषोत्तम (विष्णु) अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इसके बाद उठ करके उन [वीरभद्र]-को मारनेके लिये चक्र उठाकर वे श्रीमान् पुरुषश्रेष्ठ प्रभु क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले होकर खड़े हो गये॥ २६—२८ १/२ ॥ |
| क्रोधरक्तेक्षणः श्रीमानतिष्ठत्पुरुषर्षभः ।<br>तस्य चक्रं च यद्रौद्रं कालादित्यसमप्रभम् ॥ २९<br><br>व्यष्टम्भयददीनात्मा करस्थं न चचाल सः ।<br>अतिष्ठत्स्तम्भितस्तेन शृङ्गवानिव निश्चलः ॥ ३० | उन [विष्णु]-का भयानक तथा कालादित्यके समान तेजवाला जो चक्र था, उसको अदीन आत्मावाले वीरभद्रने स्तम्भित कर दिया; वह हाथमें पड़ा ही रह गया और हिलातक नहीं और वीरभद्रके द्वारा स्तम्भित कर दिये गये वे विष्णु भी पर्वतकी भाँति स्थिर होकर खड़े रहे॥ २९-३०॥ |
| त्रिभिश्च धर्षितं शार्ङ्गं त्रिधाभूतं प्रभोस्तदा ।<br>शार्ङ्गकोटिप्रसङ्गाद्वै चिच्छेद च शिरः प्रभोः ॥ ३१<br><br>छिन्नं च निपपातासु शिरस्तस्य रसातले ।<br>वायुना प्रेरितं चैव प्राणजेन पिनाकिना ॥ ३२<br><br>प्रविवेश तदा चैव तदीयाहवनीयकम् ।<br>तत्प्रविध्वस्तकलशं भग्नयूपं सतोरणम् ॥ ३३<br><br>प्रदीपितमहाशालं दृष्ट्वा यज्ञोऽपि दुद्रुवे ।<br>तं तदा मृगरूपेण धावन्तं गगनं प्रति ॥ ३४<br><br>वीरभद्रः समाधाय विशिरस्कमथाकरोत् ।<br>ततः प्रजापतिं धर्मं कश्यपं च जगद्गुरुम् ॥ ३५<br><br>अरिष्टनेमिनं वीरो बहुपुत्रं मुनीश्वरम् ।<br>मुनिमङ्गिरसं चैव कृशाश्वं च महाबलः ॥ ३६<br><br>जघान मूर्ध्नि पादेन दक्षं चैव यशस्विनम् ।<br>चिच्छेद च शिरस्तस्य ददाहाग्नौ द्विजोत्तमाः ॥ ३७ | इसके बाद वीरभद्रने तीन बाणोंसे विष्णुके शार्ङ्ग [नामक] धनुषको काट दिया और वह तीन टुकड़ोंमें हो गया एवं शार्ङ्ग धनुषके सिरेसे लग जानेके कारण विष्णुका सिर कट गया। उनका कटा हुआ सिर शीघ्र ही [भगवान्] शंकरकी निःश्वास वायुसे प्रेरित होकर रसातलमें चला गया। तत्पश्चात् वहाँ उनकी आहवनीय अग्निने प्रवेश किया। ध्वस्त कलशवाले तथा तोरणों-सहित टूटे हुए यूपवाले उस जलते हुए यज्ञवाटको देखकर यज्ञदेव भी भाग गये। तब मृगके रूपसे आकाशकी ओर भागते हुए उस यज्ञदेवको पकड़कर वीरभद्रने उसे सिरविहीन कर दिया। तत्पश्चात् महाबली वीरभद्रने प्रजापति, धर्म, जगद्गुरु कश्यप, अरिष्टनेमि, मुनीश्वर बहुपुत्र, मुनि अंगिरा और कृशाश्वके सिरपर पैरसे प्रहार किया; हे श्रेष्ठ द्विजो! उसने यशस्वी दक्षके सिरपर भी पैरसे प्रहार किया और उनके सिरको काट लिया तथा उसे अग्निमें जला दिया। |
अध्याय १०० ] वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह ५३३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| सरस्वत्याश्च नासाग्रं देवमातुस्तथैव च।<br>निकृत्य करजाग्रेण वीरभद्रः प्रतापवान्॥ ३८<br><br>तस्थौ श्रिया वृतो मध्ये प्रेतस्थाने यथा भवः। | तदनन्तर प्रतापी वीरभद्र अपने नाखूनके अग्रभागसे देवमाता सरस्वतीकी नासिकाका अग्रभाग काटकर ऐश्वर्ययुक्त होकर सबके बीच उसी तरह स्थित हुए जैसे श्मशानमें [भगवान्] भव॥ ३१—३८ १/२॥ |
| एतस्मिन्नेव काले तु भगवान् पद्मसंभवः॥ ३९<br><br>भद्रमाह महातेजाः प्रार्थयन् प्रणतः प्रभुः।<br>अलं क्रोधेन वै भद्र नष्टाश्चैव दिवौकसः॥ ४०<br><br>प्रसीद क्षम्यतां सर्वं रोमजैः सह सुव्रत। | इसी समय महातेजस्वी प्रभु ब्रह्माजी प्रार्थना करते हुए प्रणत होकर वीरभद्रसे बोले—'हे भद्र! क्रोध मत कीजिये, देवतागण नष्ट हो गये हैं, हे सुव्रत! प्रसन्न होइये और अपने रोमोंसे उत्पन्न गणेश्वरोंसहित सबको क्षमा कीजिये'॥ ३९-४० १/२॥ |
| सोऽपि भद्रः प्रभावेण ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ४१<br><br>शमं जगाम शनकैः शान्तस्तस्थौ तदाज्ञया।<br>देवोऽपि तत्र भगवानन्तरिक्षे वृषध्वजः॥ ४२<br><br>सगणः सर्वदः शर्वः सर्वलोकमहेश्वरः।<br>प्रार्थितश्चैव देवेन ब्रह्मणा भगवान् भवः॥ ४३<br><br>हतानां च तदा तेषां प्रददौ पूर्ववत्तनुम्।<br>इन्द्रस्य च शिरस्तस्य विष्णोश्चैव महात्मनः॥ ४४<br><br>दक्षस्य च मुनीन्द्रस्य तथान्येषां महेश्वरः।<br>वागीश्याश्चैव नासाग्रं देवमातुस्तथैव च॥ ४५<br><br>नष्टानां जीवितं चैव वराणि विविधानि च।<br>दक्षस्य ध्वस्तवक्त्रस्य शिरसा भगवान् प्रभुः॥ ४६<br><br>कल्पयामास वै वक्त्रं लीलया च महान् भवः। | तब वे वीरभद्र भी परमेष्ठी ब्रह्माके प्रभावसे धीरे-धीरे शान्तिको प्राप्त हुए; उनकी आज्ञासे शान्त होकर वे खड़े हो गये। उस समय भगवान् महादेव वृषभध्वज अन्तरिक्षमें स्थित थे; देव ब्रह्माने गणोंसहित उन सर्वदाता, शर्व, सभी लोकोंके स्वामी भगवान् भवसे प्रार्थना की। तब उन्होंने मारे गये उन सभीको पूर्वकी भाँति शरीर प्रदान कर दिया। महेश्वरने इन्द्र, महात्मा विष्णु, दक्ष, मुनीन्द्र तथा अन्य लोगोंको सिर प्रदान कर दिया, देवमाता सरस्वतीको नासिका प्रदान कर दी, नष्ट हुए लोगोंको जीवन प्रदान कर दिया; साथ ही उन्होंने विविध वर भी प्रदान किये। भगवान् महाप्रभु भवने लीलापूर्वक ध्वस्तमुखवाले दक्षका सिरसहित मुख बना दिया॥ ४१—४६ १/२॥ |
| दक्षोऽपि लब्धसंज्ञश्च समुत्थाय कृताञ्जलिः॥ ४७ | तब चेतनाप्राप्त दक्षने भी उठकर हाथ जोड़ करके |
१०१- सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य, शिवकी प्राप्तिके लिये उनका कठोर तप, तारकासुरद्वारा देवताओंको पराजित करना, शिवद्वारा कामदेवका दहन तथा पुनः जीवित करना
| ५३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| तुष्टाव देवदेवेशं शङ्करं वृषभध्वजम्।<br>स्तुतस्तेन महातेजाः प्रदाय विविधान् वरान्॥ ४८<br>गाणपत्यं ददौ तस्मै दक्षायक्लिष्टकर्मणे।<br>देवाश्च सर्वे देवेशं तुष्टुवुः परमेश्वरम्॥ ४९<br>नारायणश्च भगवान् तुष्टाव च कृताञ्जलिः।<br>ब्रह्मा च मुनयः सर्वे पृथक्पृथग्जोद्भवम्॥ ५०<br>तुष्टुवुर्देवदेवेशं नीलकण्ठं वृषध्वजम्।<br>तान् देवाननुगृह्यैव भवोऽप्यन्तरधीयत॥ ५१ | देवदेवेश वृषभध्वज शंकरकी स्तुति की। उनके द्वारा स्तुत होकर महातेजस्वी शिवने उत्तम कर्मवाले उन दक्षको विविध वर प्रदान करके उन्हें गाणपत्य [पद] प्रदान किया॥ ४७-४८१/२॥<br>तब सभी देवताओंने देवेश परमेश्वरकी स्तुति की। भगवान् नारायणने भी हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। ब्रह्मा तथा सभी मुनियोंने भी ब्रह्माकी सृष्टि करनेवाले देवदेवेश नीलकण्ठ वृषभध्वजकी पृथक्-पृथक् स्तुति की। इसके बाद उन देवताओंपर अनुग्रह करके शिवजी भी अन्तर्धान हो गये॥ ४९-५१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवकृकदक्षयज्ञविध्वंसनो नाम शततमोऽध्यायः॥ १००॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवकृत दक्षयज्ञविध्वंसन' नामक सौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १००॥
एक सौ एकवाँ अध्याय
सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य, शिवकी प्राप्तिके लिये उनका कठोर तप, तारकासुरद्वारा देवताओंको पराजित करना, शिवद्वारा कामदेवका दहन तथा पुनः जीवित करना
| ऋषय ऊचुः<br>कथं हिमवतः पुत्री बभूवाम्बा सती शुभा।<br>कथं वा देवदेवेशमवाप पतीमीश्वरम्॥ १ | ऋषिगण बोले—कल्याणमयी अम्बा सती हिमवान्की पुत्री कैसे हुईं और उन्होंने देवदेवेश महेश्वरको पतिके रूपमें कैसे प्राप्त किया?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>सा मेनातनुमाश्रित्य स्वेच्छयैव वराङ्गना।<br>तदा हैमवती जज्ञे तपसा च द्विजोत्तमाः॥ २<br>जातकर्मादिकाः सर्वाश्चकार च गिरीश्वरः।<br>द्वादशे च तदा वर्षे पूर्णे हैमवती शुभा॥ ३<br>तपस्तेपे तया सार्धमनुजा च शुभानना।<br>अन्या च देवी ह्यनुजा सर्वलोकनमस्कृता॥ ४ | सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ द्विजो! उस श्रेष्ठ अंगनाने तपस्याके द्वारा अपनी इच्छासे मेनाके शरीरका आश्रय लेकर हिमालयकी पुत्रीके रूपमें जन्म लिया। पर्वतराजने उसके जातकर्म आदि समस्त संस्कार सम्पन्न किये। तब बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर हिमवान्की वह सुन्दर पुत्री तपस्या करने लगी; उसके साथ सुन्दर मुखवाली उसकी छोटी बहन और सर्वलोकनमस्कृत एक दूसरी छोटी बहन भी थी॥ २-४॥ |
| ऋषयश्च तदा सर्वे सर्वलोकमहेश्वरीम्।<br>तुष्टुवुस्तपसा देवीं समावृत्य समन्ततः॥ ५ | तब सभी ऋषि सभी लोकोंकी महेश्वरी उस देवीको चारों ओरसे घेरकर तपके लिये उसकी स्तुति करने लगे॥ ५॥ |
| ज्येष्ठा ह्यपर्णा ह्यनुजा चैकपर्णा शुभानना।<br>तृतीया च वरारोहा तथा चैवैकपाटला॥ ६ | उनमें सबसे बड़ी अपर्णा थी, उससे छोटी सुन्दर मुखवाली एकपर्णा थी और तीसरी परम सुन्दरी एकपाटला [नामवाली] थी। महादेवी पार्वतीकी तपस्यासे |
| तपसा च महादेव्याः पार्वत्याः परमेश्वरः।<br>वशीकृतो महादेवः सर्वभूतपतिर्भवः॥ ७ |
अध्याय १०१] सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य ५३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सभी प्राणियोंके स्वामी परमेश्वर महादेव शिव [उनके] वशमें हो गये॥ ६-७॥ | |
| एतस्मिन्नेव काले तु तारको नाम दानवः।<br>तारात्मजो महातेजा बभूव दितिनन्दनः॥ ८<br><br>तस्य पुत्रास्त्रयश्चापि तारकाक्षो महासुरः।<br>विद्युन्माली च भगवान् कमलाक्षश्च वीर्यवान्॥ ९<br><br>पितामहस्तथा चैषां तारो नाम महाबलः।<br>तपसा लब्धवीर्यश्च प्रसादाद् ब्रह्मणः प्रभोः॥ १०<br><br>सोऽपि तारो महातेजास्त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>विजित्य समरे पूर्वं विष्णुं च जितवानसौ॥ ११ | इसी समय तारक नामवाला एक दानव हुआ; दितिको आनन्दित करनेवाला वह तारपुत्र (तारक) महातेजस्वी था। उसके तीन पुत्र थे—महान् असुर तारकाक्ष, भाग्यशाली विद्युन्माली और पराक्रमी कमलाक्ष। तार नामक इनके महाबली पितामहने प्रभु ब्रह्माकी कृपासे [अपनी] तपस्याके द्वारा [अतुलनीय] पराक्रम प्राप्त कर लिया था। उस महातेजस्वी तारने चराचरसहित तीनों लोकोंको जीतकर संग्राममें विष्णुको भी जीत लिया था॥ ८–११॥ |
| तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु दिवारात्रमविश्रमम्॥ १२<br><br>सरथं विष्णुमादाय चिक्षेप शतयोजनम्।<br>तारेण विजितः संख्ये दुद्राव गरुडध्वजः॥ १३<br><br>तारो वराञ्छतगुणं लब्ध्वा शतगुणं बलम्।<br>पितामहाज्जगत्सर्वमवाप दितिनन्दनः॥ १४<br><br>देवेन्द्रप्रमुखाञ्जित्वा देवान् देवेश्वरेश्वरः।<br>वारयामास तैर्देवान् सर्वलोकेषु मायया॥ १५ | उन दोनोंमें दिन-रात बिना विश्रामके (निरन्तर) एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त भयानक तथा रोमांचकारी युद्ध हुआ। उसने रथसहित विष्णुको पकड़कर सौ योजन दूर फेंक दिया। तारके द्वारा युद्धमें पराजित होकर विष्णु भाग गये। ब्रह्मासे एक सौ वर तथा सैकड़ों गुना बल प्राप्त करके दितिनन्दन तारने सम्पूर्ण जगत्पर अधिकार कर लिया। देवेन्द्र आदि देवताओंको जीतकर देवेश्वरेश्वरके रूपमें होकर उसने अपनी मायासे देवताओंको सभी लोकोंमें उनके कार्योंसे वंचित कर दिया॥ १२–१५॥ |
| देवताश्च सहेन्द्रेण तारकाद्यपीडिताः।<br>न शान्तिं लेभिरे शूराः शरणं वा भयार्दिताः॥ १६<br><br>तदामरपतिः श्रीमान् सन्निपत्यामरप्रभुः।<br>उवाचाङ्गिरसं देवो देवानार्माप सन्निधौ॥ १७ | इन्द्रसहित देवतागण तारकासुरके भयसे पीड़ित हो गये; वीर होते हुए भी वे भयग्रस्त होनेके कारण [कहीं भी] शान्ति अथवा शरण प्राप्त नहीं कर सके। तब देवताओंके स्वामी श्रीमान् प्रभु इन्द्र बृहस्पतिकी शरणमें जाकर देवताओंकी उपस्थितिमें उनसे कहने लगे॥ १६-१७॥ |
| भगवंस्तारको नाम तारजो दानवोत्तमः।<br>तेन सन्निहता युद्धे वत्सा गोपत्तिना यथा॥ १८<br><br>भयात्तस्मान्महाभाग बृहद्युद्धे बृहस्पते।<br>अनिकेता भ्रमन्त्येते शकुन्ता इव पञ्जरे॥ १९ | हे भगवन्! तारसे उत्पन्न तारक नामक एक महादानव है; उसने युद्धमें हमलोगोंको उसी तरह आहत किया है, जैसे बैल बछड़ोंको आहत कर देता है। अतः हे महाभाग! हे बृहस्पते! भयके कारण इस विशाल युद्धमें देवतालोग आश्रयविहीन होकर उसी प्रकार भ्रमण कर रहे हैं, जैसे पिँजरेमें पक्षी। हे अंगिरोवर! हमलोगोंके जो अस्त्र पहले |
५३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अस्माकं यान्यमोघानि आयुधान्यङ्गिरोवर।<br>तानि मोघानि जायन्ते प्रभावादमरद्विषः॥ २०<br><br>दशवर्षसहस्राणि द्विगुणानि बृहस्पते।<br>विष्णुना योधितो युद्धे तेनापि न च सूदितः॥ २१<br><br>यस्तेनानिर्जितो युद्धे विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>कथमस्मद्विधस्तस्य स्थास्यते समरेऽग्रतः॥ २२ | अमोघ थे, वे उस देवशत्रुके प्रभावके कारण निष्फल हो गये हैं। हे बृहस्पते ! विष्णुने बीस हजार वर्षोंतक उसके साथ युद्ध किया; किंतु वह उनके भी द्वारा युद्धमें नहीं मारा गया। महाशक्तिसम्पन्न विष्णुके द्वारा भी युद्धमें जो जीता नहीं जा सका, तब हम-जैसे लोग युद्धमें उसके समक्ष कैसे टिक सकते हैं ?॥ १८-२२॥ |
| एवमुक्तस्तु शक्रेण जीवः सार्धं सुराधिपैः।<br>सहस्राक्षेण च विभुं सम्प्राप्याह कुशध्वजम्॥ २३ | इन्द्रके ऐसा कहनेपर श्रेष्ठ देवताओं तथा इन्द्रको साथ लेकर बृहस्पतिने विभु ब्रह्माके पास पहुँचकर [सब कुछ] बताया॥ २३॥ |
| सोऽपि तस्य मुखाच्छ्रुत्वा प्रणयात्प्रणतार्तिहा।<br>देवैरशेषैः सेन्द्रैस्तु जीवमाह पितामहः॥ २४ | उनके मुखसे [सारा वृत्तान्त] सुनकर शरणागतोंका कष्ट दूर करनेवाले उन पितामहने इन्द्रसहित सभी देवताओंके साथ आये हुए बृहस्पतिसे प्रेमपूर्वक कहा— |
| जाने वोऽर्तिं सुरेन्द्राणां तथापि शृणु साम्प्रतम्।<br>विनिन्द्य दक्षं या देवी सती रुद्राङ्गसम्भवा॥ २५ | मैं आप सब देवताओंकी विपत्तिको जानता हूँ; फिर भी इस समय सुनिये। रुद्रके अंगसे उत्पन्न जो देवी सती हैं, वे दक्षकी निन्दा करके |
| उमा हैमवती जज्ञे सर्वलोकनमस्कृता।<br>तस्याश्चैवेह रूपेण यूयं देवाः सुरोत्तमाः॥ २६ | समस्त लोकोंद्वारा नमस्कृत उमाके रूपमें हिमवान्की पुत्री होकर उत्पन्न हुई हैं। हे उत्तम देवताओं! आप देवतागण उन्हींके रूपके द्वारा |
| विभोर्यतध्वमाक्रष्टुं रुद्रस्यास्य मनो महत्।<br>तयोर्योगेन सम्भूतः स्कन्दः शक्तिधरः प्रभुः॥ २७ | इन विभु रुद्रके महान् मनको आकृष्ट करानेका प्रयत्न कीजिये। उन दोनोंके संयोगसे शक्तिधर प्रभु स्कन्द उत्पन्न होंगे; वे षडास्य (छः मुखवाले), |
| अध्याय १०१ ] | सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य | ५३७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| षडास्यो द्वादशभुजः सेनानीः पावकिः प्रभुः।<br>स्वाहेयः कार्तिकेयश्च गाङ्गेयः शरधामजः॥ २८<br><br>देवः शाखो विशाखश्च नैगमेशश्च वीर्यवान्।<br>सेनापतिः कुमाराख्यः सर्वलोकनमस्कृतः॥ २९<br><br>लीलयैव महासेनः प्रबलं तारकासुरम्।<br>बालोऽपि विनिहत्यैको देवान् सन्तारयिष्यति॥ ३० | द्वादशभुज (बारह भुजाओंवाले), सेनानी, पावकि, प्रभु, स्वाहेय, कार्तिकेय, गांगेय, शरधामज, देव, शाख, विशाख, नैगमेश, वीर्यवान्, सेनापति और कुमार नामवाले होकर सभी लोकोंसे नमस्कृत होंगे। वे महासेन बालक होते हुए भी बिना प्रयासके अकेले ही [उस] महाबली तारकासुरका वध करके देवताओंका उद्धार करेंगे॥ २४—३०॥ |
| एवमुक्तस्तदा तेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना।<br>बृहस्पतिस्तथा सेन्द्रैर्देवैर्देवं प्रणम्य तम्॥ ३१<br><br>मेरोः शिखरमासाद्य स्मरं सस्मार सुव्रतः।<br>स्मरणाद्देवदेवस्य स्मरोऽपि सह भार्यया॥ ३२<br><br>रत्या समं समागम्य नमस्कृत्य कृताञ्जलिः।<br>सशक्रमह तं जीवं जगज्जीवो द्विजोत्तमाः॥ ३३<br><br>स्मृतो यद्भवता जीव सम्प्राप्तोऽहं तवान्तिकम्।<br>ब्रूहि यन्मे विधातव्यं तमाह सुरपूजितः॥ ३४<br><br>तमाह भगवान् शक्रः सम्भाव्य मकरध्वजम्।<br>शङ्करेणाम्बिकामद्य संयोजय यथासुखम्॥ ३५<br><br>तया स रमते येन भगवान् वृषभध्वजः।<br>तेन मार्गेण मार्गस्व पत्न्या रत्यानया सह॥ ३६<br><br>सोऽपि तुष्टो महादेवः प्रदास्यति शुभां गतिम्।<br>विप्रयुक्तस्तया पूर्वं लब्ध्वा तां गिरिजामुमाम्॥ ३७ | तब उन परमेष्ठी ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर इन्द्रसहित सभी देवताओंके साथ सुव्रत बृहस्पतिने देवदेव उन ब्रह्माको प्रणाम करके मेरुके शिखरपर पहुँचकर कामदेवका स्मरण किया। हे श्रेष्ठ द्विजो! देवगुरु ब्रह्माके स्मरण करनेसे जगत्का जीवस्वरूप कामदेव भी [अपनी] भार्या रतिके साथ वहाँ आकर हाथ जोड़कर नमस्कार करके इन्द्रसहित उन बृहस्पतिसे बोला—‘हे बृहस्पते! आपने मेरा स्मरण किया है, अतः मैं आपके पास आया हूँ; मुझे जो करना हो, उसे बताइये।’ तब देवपूजित बृहस्पति उससे कुछ बोलने ही वाले थे कि उत्सुकतावश भगवान् इन्द्रने कामदेवकी प्रशंसा करके उससे कहा—‘अब आप सुखपूर्वक शंकरके साथ अम्बिकाका संयोग कराइये। वे भगवान् वृषभध्वज जिस भी उपायसे उनके साथ रमण करें; अपनी पत्नी रतिके साथ आप उस उपायको खोजिये। पहलेसे ही उन [अम्बिका]-से वियुक्त हुए वे महादेव भी उन पार्वती उमाको [पुनः] प्राप्त करके प्रसन्न होकर आपको शुभ गति प्रदान करेंगे’॥ ३१—३७॥ |
| एवमुक्तो नमस्कृत्य देवदेवं शचीपतिम्।<br>देवदेवाश्रमं गन्तुं मतिं चक्रे तया सह॥ ३८<br><br>गत्वा तदाश्रमे शम्भोः सह रत्या महाबलः।<br>वसन्तेन सहायेन देवं योक्तुमनाभवत्॥ ३९ | उनके ऐसा कहनेपर देवदेव इन्द्रको नमस्कार करके कामदेवने उस [रति]-के साथ शंकरजीके आश्रममें जानेका निश्चय किया। तब रति तथा अपने सहायक वसन्तके साथ शिवजीके आश्रममें जाकर महाबली कामदेवने पार्वतीके साथ महादेवका संयोग करानेका मन बनाया॥ ३८-३९॥ |
| ततः सम्प्रेक्ष्य मदनं हसन् देवस्त्रियम्बकः।<br>नयनेन तृतीयेन सावज्ञं तमवैक्षत॥ ४०<br><br>ततोऽस्य नेत्रजो वह्निर्मदनं पार्श्वतः स्थितम्।<br>अदहत्तत्क्षणादेव ललाप करुणं रतिः॥ ४१ | तत्पश्चात् कामदेवको देखकर हँसते हुए त्रिनेत्र शिवने अवज्ञापूर्वक उसे [अपने] तीसरे नेत्रसे देखा। इसके बाद उनके नेत्रसे उत्पन्न अग्निने पासमें ही खड़े कामदेवको उसी क्षण जला दिया। तब रति करुण |
१०२- पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका ब्राह्मणवेषमें आकर उन्हें वरदान देना, हिमालयद्वारा पार्वतीस्वयंवरकी घोषणा, स्वयंवरमें भगवान् शिवका बालरूपमें उपस्थित होकर सभीको मोहित करना, पुनः ब्रह्माकी स्तुतिसे प्रसन्न हो महेश्वरका मनोहर वररूप धारणकर सबको आनन्दित करना
| ५३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| रत्याः प्रलापमाकर्ण्य देवदेवो वृषध्वजः।<br>कृपया परया प्राह कामपत्नीं निरीक्ष्य च॥ ४२<br><br>अमूर्तोऽपि ध्रुवं भद्रे कार्यं सर्वं पतिस्तव।<br>रतिकाले ध्रुवं भद्रे करिष्यति न संशयः॥ ४३<br><br>यदा विष्णुश्च भविता वासुदेवो महायशाः।<br>शापाद् भृगोर्महातेजाः सर्वलोकहिताय वै॥ ४४<br><br>तदा तस्य सुतो यश्च स पतिस्ते भविष्यति।<br>सा प्रणम्य तदा रुद्रं कामपत्नी शुचिस्मिता॥ ४५<br><br>जगाम मदनं लब्ध्वा वसन्तेन समन्विता॥ ४६ | विलाप करने लगी। रतिके विलापको सुनकर देवदेव वृषध्वजने परम कृपासे कामदेवकी पत्नीकी ओर देखकर उससे कहा—'हे भद्रे! तुम्हारा पति देहरहित होते हुए भी रतिकालमें निश्चित रूपसे सम्पूर्ण कार्य करेगा; हे भद्रे! इसमें सन्देह नहीं है। जब [भगवान्] विष्णु भृगुके शापसे सभी लोकोंके हितके लिये महायशस्वी तथा महातेजस्वी वासुदेव (वसुदेवपुत्र)-के रूपमें अवतीर्ण होंगे, तब उनका [प्रद्युम्न नामक] जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तुम्हारा पति होगा'॥ ४०—४४¹/₂॥<br><br>इसके बाद रुद्रको प्रणाम करके पवित्र मुसकानवाली वह कामपत्नी अनंगको प्राप्त करके वसन्तके साथ चली गयी॥ ४५-४६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मदनदाहो नामैकाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मदनदाह' नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०१॥
एक सौ दोवाँ अध्याय
पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका ब्राह्मणवेषमें आकर उन्हें वरदान देना, हिमालयद्वारा पार्वतीस्वयंवरकी घोषणा, स्वयंवरमें भगवान् शिवका बालरूपमें उपस्थित होकर सभीको मोहित करना, पुनः ब्रह्माकी स्तुतिसे प्रसन्न हो महेश्वरका मनोहर वररूप धारणकर सबको आनन्दित करना
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| तपसा च महादेव्याः पार्वत्या वृषभध्वजः।<br>प्रीतश्च भगवान् शर्वो वचनाद् ब्रह्मणस्तदा॥ १<br><br>हिताय चाश्रमाणां च क्रीडार्थं भगवान् भवः।<br>तदा हैमवतीं देवीमुपयेमे यथाविधि॥ २<br><br>जगाम स स्वयं ब्रह्मा मरीच्याद्यैर्महर्षिभिः।<br>तपोवनं महादेव्याः पार्वत्याः पद्मसम्भवः॥ ३<br><br>प्रदक्षिणीकृत्य च तां देवीं स जगतोऽरणीम्।<br>किमर्थं तपसा लोकान् सन्तापयसि शैलजे॥ ४<br><br>त्वया सृष्टं जगत्सर्वं मातस्त्वं मा विनाशय।<br>त्वं हि सन्धारये लोकानिमान् सर्वान् स्वतेजसा॥ ५<br><br>सर्वदेवेश्वरः श्रीमान् सर्वलोकपतिर्भवः।<br>यस्य वै देवदेवस्य वयं किङ्करवादिनः॥ ६ | [हे ऋषियो!] भगवान् वृषभध्वज शर्व पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो गये। इसके बाद ब्रह्माजीके कहनेसे भगवान् भवने सभी आश्रमोंके हितके लिये और क्रीड़ा करनेके लिये विधिपूर्वक पार्वतीके साथ विवाह किया॥ १-२॥<br><br>उस समय कमलसे उत्पन्न ब्रह्माजी स्वयं मरीचि आदि महर्षियोंके साथ महादेवी पार्वतीके तपोवनमें गये थे। उन्होंने जगत्की निमित्तकारणस्वरूपा उन देवीकी प्रदक्षिणा करके कहा—'हे शैलजे! आप तपस्यासे लोकोंको किसलिये संतप्त कर रही हैं? हे मातः! आपने ही सम्पूर्ण जगत्का सृजन किया है, अतः आप इसका विनाश मत कीजिये; आप अपने तेजसे इन समस्त लोकोंको धारण कीजिये। श्रीमान् शिवजी सभी देवताओंके ईश्वर तथा सभी लोकोंके स्वामी हैं। |
| अध्याय १०२] | पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना | ५३१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स एवं परमेशानः स्वयं च वरयिष्यति।<br>वरदे येन सृष्टासि न विना यस्त्वयाम्बिके॥ ७<br><br>वर्तते नात्र सन्देहस्तव भर्ता भविष्यति। | हमलोग जिन देवाधिदेवके सेवक कहे जाते हैं, वे परमेश्वर ही स्वयं आपका वरण करेंगे। हे वरदे! जिन्होंने आपका सृजन किया है और हे अम्बिके! जो आपके बिना रह नहीं सकते; वे [शिवजी] आपके पति होंगे; इसमें सन्देह नहीं है'॥ ३—७½॥ |
| इत्युक्त्वा तां नमस्कृत्य मुहुः सम्प्रेक्ष्य पार्वतीम्॥ ८<br><br>गते पितामहे देवो भगवान् परमेश्वरः।<br>जगामानुग्रहं कर्तुं द्विजरूपेण चाश्रमम्॥ ९ | ऐसा कहकर उन पार्वतीको नमस्कार करके बार-बार उनकी ओर देखकर पितामह (ब्रह्मा)-के चले जानेपर भगवान् परमेश्वर [शिव] अनुग्रह करनेके लिये ब्राह्मणके रूपमें उस आश्रममें गये॥ ८-९॥ |
| सा च दृष्ट्वा महादेवं द्विजरूपेण संस्थितम्।<br>प्रतिभाद्यैः प्रभुं ज्ञात्वा ननाम वृषभध्वजम्॥ १०<br><br>सम्पूज्य वरदं देवं ब्राह्मणं छद्मनागतम्।<br>तुष्टाव परमेशानं पार्वती परमेश्वरम्॥ ११ | द्विजरूपसे उपस्थित महादेवको देखकर उन पार्वतीने उनकी दीप्ति आदिके द्वारा उन्हें भगवान् वृषभध्वज जानकर प्रणाम किया। ब्राह्मणके छद्मरूपमें आये हुए वरदाता महादेवकी पूजा करके पार्वतीने उन परमेशान परमेश्वरकी स्तुति की॥ १०-११॥ |
| अनुगृह्य तदा देवीमुवाच प्रहसन्निव।<br>कुलधर्माश्रयं रक्षन् भूधरस्य महात्मनः॥ १२<br><br>क्रीडार्थं च सतां मध्ये सर्वदेवपतिर्भवः।<br>स्वयंवरे महादेवि तव दिव्यसुशोभने॥ १३<br><br>आस्थाय रूपं यत्सौम्यं समेष्येऽहं सह त्वया। | तदनन्तर देवीपर अनुग्रह करके शिवजी हँसते हुए बोले—'हे महादेवि! सभी देवताओंका स्वामी मैं शिव महात्मा हिमालयके कुलधर्मकी परम्पराकी रक्षा करता हुआ क्रीड़ा करनेके लिये सज्जनोंके मध्य तुम्हारे दिव्य तथा अतिसुन्दर स्वयंवरमें सौम्य रूप धारण करके तुमसे मिलूँगा'॥ १२-१३½॥ |
| इत्युक्त्वा तां समालोक्य देवो दिव्येन चक्षुषा॥ १४<br><br>जगामेष्टं तदा दिव्यं स्वपुरं प्रययौ च सा।<br>दृष्ट्वा हृष्टस्तदा देवीं मेनया तुहिनाचलः॥ १५ | ऐसा कह करके उन्हें दिव्य दृष्टिसे देखकर शिवजी अपने अभीष्ट (प्रिय) दिव्य लोकको चले गये |