श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| अनपाय्यक्षर, कान्त, सर्वशास्त्रभृतांवर ॥ १३१ ॥ | |
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| तेजोमयो द्युतिधरो लोकमायोऽग्रणीरणुः ।<br>शुचिस्मितः प्रसन्नात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ॥ १३२ | तेजोमयद्युतिधर, लोकमाय, अग्रणी, अणु, शुचिस्मित, प्रसन्नात्मा, दुर्जय, दुरतिक्रम ॥ १३२ ॥ |
| ज्योतिर्मयो निराकारो जगन्नाथो जलेश्वरः ।<br>तुम्बवीणी महाकायो विशोकः शोकनाशनः ॥ १३३ | ज्योतिर्मय, निराकार, जगन्नाथ, जलेश्वर, तुम्बवीणी, महाकाय, विशोक, शोकनाशन ॥ १३३ ॥ |
| त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः शुद्धः शुद्धी रथाक्षजः ।<br>अव्यक्तलक्षणोऽव्यक्तो व्यक्ताव्यक्तो विशाम्पतिः ॥ १३४ | त्रिलोकात्मा, त्रिलोकेश, शुद्ध, शुद्धि, रथाक्षज, अव्यक्तलक्षण, अव्यक्त, व्यक्ताव्यक्तविशाम्पति ॥ १३४ ॥ |
| वरशीलो वर्तलो मानो मानधनो मयः ।<br>ब्रह्मा विष्णुः प्रजापालो हंसो हंसगतिर्यमः ॥ १३५ | वरशील, वर्तुल, मान, मानधनमय, ब्रह्मा, विष्णुप्रजापाल, हंस, हंसगति, यम ॥ १३५ ॥ |
| वेधा धाता विधाता च अत्ताहर्ता चतुर्मुखः ।<br>कैलासशिखरावासी सर्वावासी सतां गतिः ॥ १३६ | वेधा, धाता, विधाता, अत्ताहर्ता, चतुर्मुख, कैलासशिखरावासी, सर्वावासी, सतांगति ॥ १३६ ॥ |
| हिरण्यगर्भो हरिणः पुरुषः पूर्वजः पिता ।<br>भूतालयो भूतपतिर्भूतिदो भुवनेश्वरः ॥ १३७ | हिरण्यगर्भ, हरिण, पुरुष, पूर्वजपिता, भूतालय, भूतपति, भूतिद, भुवनेश्वर ॥ १३७ ॥ |
| संयोगी योगविद्ब्रह्मा ब्रह्मण्यो ब्राह्मणप्रियः ।<br>देवप्रियो देवनाथो देवज्ञो देवचिन्तकः ॥ १३८ | संयोगी, योगविद्ब्रह्मा, ब्रह्मण्य, ब्राह्मणप्रिय, देवप्रिय, देवनाथ, देवज्ञ, देवचिन्तक ॥ १३८ ॥ |
| विषमाक्षः कलाध्यक्षो वृषाङ्को वृषवर्धनः ।<br>निर्मदो निरहङ्कारो निर्मोहो निरुपद्रवः ॥ १३९ | विषमाक्ष, कलाध्यक्ष, वृषांक, वृषवर्धन, निर्मद-निरहंकार, निर्मोह, निरुपद्रव ॥ १३९ ॥ |
| दर्पहा दर्पितो दृप्तः सर्वर्तुपरिवर्तकः ।<br>सप्तजिह्वः सहस्रार्चिः स्निग्धः प्रकृतिदक्षिणः ॥ १४० | दर्पहा, दर्पित, दृप्त, सर्वऋतुपरिवर्तक, सप्तजिह्व, सहस्रार्चि, स्निग्ध, प्रकृतिदक्षिण ॥ १४० ॥ |
| भूतभव्यभवन्नाथः प्रभवो भ्रान्तिनाशनः ।<br>अर्थोऽनर्थो महाकोशः परकार्यैकपण्डितः ॥ १४१ | भूतभव्यभवन्नाथ, प्रभव, भ्रान्तिनाशन, अर्थ, अनर्थ, महाकोश, परकार्यैकपण्डित ॥ १४१ ॥ |
| निष्कण्टकः कृतानन्दो निर्व्याजो व्याजमर्दनः ।<br>सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यकीर्तिस्तम्भकृतागमः ॥ १४२ | निष्कण्टक, कृतानन्द, निर्व्याज, व्याजमर्दन, सत्त्ववान्, सात्त्विक, सत्यकीर्तिस्तम्भकृतागम ॥ १४२ ॥ |
| अकम्पितो गुणग्राही नैकात्मा नैककर्मकृत् ।<br>सुप्रीतः सुमुखः सूक्ष्मः सुकरो दक्षिणोऽनलः ॥ १४३ | अकम्पित, गुणग्राही, नैकात्मा-नैककर्मकृत्, सुप्रीत, सुमुख, सूक्ष्म, सुकर, दक्षिण, अनल ॥ १४३ ॥ |
| स्कन्धः स्कन्धधरो धुर्यः प्रकटः प्रीतिवर्धनः ।<br>अपराजितः सर्वसहो विदग्धः सर्ववाहनः ॥ १४४ | स्कन्ध, स्कन्धधर, धुर्य, प्रकट, प्रीतिवर्धन, अपराजित, सर्वसह, विदग्ध, सर्ववाहन ॥ १४४ ॥ |
| अधृतः स्वधृतः साध्यः पूर्तमूर्तिर्यशोधरः ।<br>वराहशृङ्गधृग्वायुर्बलवानेकनायकः ॥ १४५ | अधृत, स्वधृत, साध्य, पूर्तमूर्ति, यशोधर, वराहशृङ्गधृक्, वायु, बलवान्, एकनायक ॥ १४५ ॥ |
| श्रुतिप्रकाशः श्रुतिमानेकबन्धुरनेकधृक् ।<br>श्रीवल्लभशिवारम्भः शान्तभद्रः समञ्जसः ॥ १४६ | श्रुतिप्रकाश, श्रुतिमान्, एकबन्धु, अनेकधृक्, श्रीवल्लभशिवारम्भ, शान्तभद्र, समंजस ॥ १४६ ॥ |
| भूशयो भूतिकृद्भूतिर्भूषणो भूतवाहनः ।<br>अकायो भक्तकायस्थः कालज्ञानी कलावपुः ॥ १४७ | भूशय, भूतिकृद्भूति, भूषण, भूतवाहन, अकाय, भक्तकायस्थ, कालज्ञानी, कलावपु ॥ १४७ ॥ |
| सत्यव्रतमहात्यागी निष्ठाशान्तिपरायणः ।<br>परार्थवृत्तिर्वरदो विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ १४८ | सत्यव्रतमहात्यागी, निष्ठाशान्तिपरायण, परार्थवृत्ति, वरद, विविक्त, श्रुतिसागर ॥ १४८ ॥ |