श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९८] भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना ५२३
| श्लोक | नाम-सूची |
|---|---|
| मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी दान्तो गुणोत्तमः।<br>पिङ्गलाक्षोऽथ हर्यक्षो नीलग्रीवो निरामयः॥ ११४॥ | मुण्ड, विरूप, विकृत, दण्डी, दान्त, गुणोत्तम, पिङ्गलाक्ष, हर्यक्ष, नीलग्रीव, निरामय॥ ११४॥ |
| सहस्रबाहुः सर्वेशः शरण्यः सर्वलोकभृत्।<br>पद्मासनः परंज्योतिः परावरपरंफलः॥ ११५॥ | सहस्रबाहुसर्वेश, शरण्य, सर्वलोकभृत्, पद्मासन, परंज्योति, परावरपरंफल॥ ११५॥ |
| पद्मगर्भो महागर्भो विश्वगर्भो विचक्षणः।<br>परावरज्ञो बीजेशः सुमुखः सुमहास्वनः॥ ११६॥ | पद्मगर्भ, महागर्भ, विश्वगर्भ, विचक्षण, परावरज्ञ, बीजेश, सुमुखसुमहास्वन॥ ११६॥ |
| देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः।<br>देवासुरमहामात्रो देवासुरमहाश्रयः॥ ११७॥ | देवासुरगुरुदेव, देवासुरनमस्कृत, देवासुरमहामात्र, देवासुरमहाश्रय॥ ११७॥ |
| देवादिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः।<br>देवासुरेश्वरो दिव्यो देवासुरमहेश्वरः॥ ११८॥ | देवादिदेव, देवर्षिदेवासुरवरप्रद, देवासुरेश्वर, दिव्य, देवासुरमहेश्वर॥ ११८॥ |
| सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवतात्मात्मसम्भवः।<br>ईड्योऽनीशः सुरव्याघ्रो देवसिंहो दिवाकरः॥ ११९॥ | सर्वदेवमय, अचिन्त्य, देवतात्मा, आत्मसम्भव, ईड्य, अनीश, सुरव्याघ्र, देवसिंह, दिवाकर॥ ११९॥ |
| विबुधाग्रवरश्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः।<br>शिवज्ञानरतः श्रीमान् शिखिश्रीपर्वतप्रियः॥ १२०॥ | विबुधाग्रवरश्रेष्ठ, सर्वदेवोत्तमोत्तम, शिवज्ञानरत, श्रीमान्, शिखिश्रीपर्वतप्रिय॥ १२०॥ |
| जयस्तम्भो विशिष्टम्भो नरसिंहनिपातनः।<br>ब्रह्मचारी लोकचारी धर्मचारी धनाधिपः॥ १२१॥ | जयस्तम्भ, विशिष्टम्भ, नरसिंहनिपातन, ब्रह्मचारी, लोकचारी, धर्मचारी, धनाधिप॥ १२१॥ |
| नन्दी नन्दीश्वरो नग्नो नग्नव्रतधरः शुचिः।<br>लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो युगाध्यक्षो युगावहः॥ १२२॥ | नन्दी, नन्दीश्वर, नग्न, नग्नव्रतधर, शुचि, लिङ्गाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, युगाध्यक्ष, युगावह॥ १२२॥ |
| स्ववशः सवशः स्वर्गस्वरः स्वरमयस्वनः।<br>बीजाध्यक्षो बीजकर्ता धनकृद्धर्मवर्धनः॥ १२३॥ | स्ववश, सवश, स्वर्गस्वर, स्वरमयस्वन, बीजाध्यक्ष, बीजकर्ता, धनकृद्धर्मवर्धन॥ १२३॥ |
| दम्भोऽदम्भो महादम्भः सर्वभूतमहेश्वरः।<br>श्मशाननिलयस्तिष्यः सेतुरप्रतिमाकृतिः॥ १२४॥ | दम्भ, अदम्भ, महादम्भ, सर्वभूतमहेश्वर, श्मशाननिलय, तिष्य, सेतु, अप्रतिमाकृति॥ १२४॥ |
| लोकोत्तरस्फुटालोकस्त्र्यम्बको नागभूषणः।<br>अन्धकारिर्मखद्वेषी विष्णुकन्धरपातनः॥ १२५॥ | लोकोत्तरस्फुटालोक, त्र्यम्बक, नागभूषण, अन्धकारि, मखद्वेषी, विष्णुकन्धरपातन॥ १२५॥ |
| वीतदोषोऽक्षयगुणो दक्षारिः पूषदन्तहृत्।<br>धूर्जटिः खण्डपरशुः सकलो निष्कलोऽनघः॥ १२६॥ | वीतदोष, अक्षयगुण, दक्षारि, पूषदन्तहृत्, धूर्जटि, खण्डपरशु, सकल, निष्कल, अनघ॥ १२६॥ |
| आधारः सकलाधारः पाण्डुराभो मृडो नटः।<br>पूर्णः पूरयिता पुण्यः सुकुमारः सुलोचनः॥ १२७॥ | आधार, सकलाधार, पाण्डुराभ, मृड, नट, पूर्ण, पूरयिता, पुण्य, सुकुमार, सुलोचन॥ १२७॥ |
| सामगेयः प्रियकरः पुण्यकीर्तिर्निरामयः।<br>मनोजवस्तीर्थकरो जटिलो जीवितेश्वरः॥ १२८॥ | सामगेय, प्रियकर, पुण्यकीर्ति, अनामय, मनोजव, तीर्थकर, जटिल, जीवितेश्वर॥ १२८॥ |
| जीवितान्तकरो नित्यो वसुचेता वसुप्रियः।<br>सद्गतिः सत्कृतिः सक्तः कालकण्ठः कलाधरः॥ १२९॥ | जीवितान्तकर, नित्य, वसुचेता, वसुप्रिय, सद्गति, सत्कृति, सक्त, कालकण्ठ, कलाधर॥ १२९॥ |
| मानी मान्यो महाकालः सद्भूतिः सत्परायणः।<br>चन्द्रसञ्जीवनः शास्ता लोकगूढोऽमराधिपः॥ १३०॥ | मानी, मान्य, महाकाल, सद्भूति, सत्परायण, चन्द्रसंजीवन, शास्तालोकगूढ़, अमराधिप॥ १३०॥ |
| लोकबन्धुर्लोकनाथः कृतज्ञः कृतिभूषणः।<br>अनपाय्यक्षरः कान्तः सर्वशास्त्रभृतां वरः॥ १३१॥ | लोकबन्धु, लोकनाथ, कृतज्ञ-कृतिभूषण, |