श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 523, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 523
| अध्याय ९८ ] | भगवान् विष्णुद्वारा एक सहस्र नामोंसे भगवान् शिवकी स्तुति करना | ५२१ |
|---|
| श्लोक | नाम-सूची |
|---|---|
| अभिरामः सुशरणः सुब्रह्मण्यः सुधापतिः।<br>मघवान् कौशिको गोमान् विश्रामः सर्वशासनः ॥ ७९ | अभिराम, सुशरण, सुब्रह्मण्य, सुधापति, मधवान्कौशिक, गोमान्, विश्राम, सर्वशासन ॥ ७९ ॥ |
| ललाटाक्षो विश्वदेहः सारः संसारचक्रभृत्।<br>अमोघदण्डी मध्यस्थो हिरण्यो ब्रह्मवर्चसी ॥ ८० | ललाटाक्ष, विश्वदेह, सार, संसारचक्रभृत्, अमोघदण्डी, मध्यस्थ, हिरण्य, ब्रह्मवर्चसी ॥ ८० ॥ |
| परमार्थः परमयः शम्बरो व्याघ्रकोऽनलः।<br>रुचिर्वररुचिर्वन्द्यो वाचस्पतिरहर्पतिः ॥ ८१ | परमार्थ, परमय, शम्बर, व्याघ्रक, अनल, रुचि, वररुचि, वन्द्य, वाचस्पति, अहर्पति ॥ ८१ ॥ |
| रविर्विरोचनः स्कन्धः शास्ता वैवस्वतोऽजनः।<br>युक्तिरुन्नतकीर्तिश्च शान्तरागः पराजयः ॥ ८२ | रविविरोचन, स्कन्ध, शास्तावैवस्वत, अजन, युक्ति, उन्नतकीर्ति, शान्तराग, पराजय ॥ ८२ ॥ |
| कैलासपतिकामारिः सविता रविलोचनः।<br>विद्वत्तमो वीतभयो विश्वहर्तानिवारितः ॥ ८३ | कैलासपतिकामारि, सविता, रविलोचन, विद्वत्तम, वीतभय, विश्वहर्तानिवारित ॥ ८३ ॥ |
| नित्यो नियतकल्याणः पुण्यश्रवणकीर्तनः।<br>दूरश्रवा विश्वसहो ध्येयो दुःस्वप्ननाशनः ॥ ८४ | नित्य, नियतकल्याण, पुण्यश्रवणकीर्तन, दूरश्रवा, विश्वसह, ध्येय, दुःस्वप्ननाशन ॥ ८४ ॥ |
| उत्तारको दुष्कृतिहा दुर्धर्षो दुःसहोऽभयः।<br>अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः किरीटीत्रिदशाधिपः ॥ ८५ | उत्तारक, दुष्कृतिहा, दुर्धर्ष, दुःसह, अभय, अनादि, भू, भुवो लक्ष्मी, किरीटीत्रिदशाधिप ॥ ८५ ॥ |
| विश्वगोप्ता विश्वभर्ता सुधीरो रुचिराङ्गदः।<br>जननो जनजन्मादिः प्रीतिमान्नीतिमान्नयः ॥ ८६ | विश्वगोप्ता, विश्वभर्ता, सुधीर, रुचिरांगद, जनन, जनजन्मादि, प्रीतिमान्, नीतिमान्, नय ॥ ८६ ॥ |
| विशिष्टः काश्यपो भानुर्भीमो भीमपराक्रमः।<br>प्रणवः सप्तधाचारो महाकायो महाधनुः ॥ ८७ | विशिष्ट, काश्यप, भानु, भीम, भीमपराक्रम, प्रणव, सप्तधाचार, महाकायमहाधनु ॥ ८७ ॥ |
| जन्माधिपो महादेवः सकलागमपारगः।<br>तत्त्वात्तत्त्वविवेकात्मा विभूष्णुर्भूतिभूषणः ॥ ८८ | जन्माधिप, महादेव, सकलागमपारग, तत्त्वात्तत्त्वविवेकात्मा, विभूष्णु, भूतिभूषण ॥ ८८ ॥ |
| ऋषिर्ब्राह्मणविज्जिष्णुर्जन्ममृत्युजरातिगः ।<br>यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञान्तोऽमोघविक्रमः ॥ ८९ | ऋषि, ब्राह्मणविज्जिष्णु, जन्ममृत्युजरातिग, यज्ञयज्ञपति, यज्वा, यज्ञान्त, अमोघविक्रम ॥ ८९ ॥ |
| महेन्द्रो दुर्भरः सेनी यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः।<br>पञ्चब्रह्मसमुत्पत्तिर्विश्वेशो विमलोदयः ॥ ९० | महेन्द्र, दुर्भर, सेनी, यज्ञांगयज्ञवाहन, पंचब्रह्मसमुत्पत्ति, विश्वेश, विमलोदय ॥ ९० ॥ |
| आत्मयोनिरनाद्यन्तो षड्विंशत्सप्तलोकधृक्।<br>गायत्रीवल्लभः प्रांशुर्विश्वावासः प्रभाकरः ॥ ९१ | आत्मयोनि, अनाद्यन्त, षड्विंशत्सप्तलोकधृक्, गायत्रीवल्लभ, प्रांशु, विश्वावास, प्रभाकर ॥ ९१ ॥ |
| शिशुर्गिरिरतः सम्राट् सुषेणः सुरशत्रुहा।<br>अमोघोऽरिष्टमथनो मुकुन्दो विगतज्वरः ॥ ९२ | शिशु, गिरिरत, सम्राट्सुषेण, सुरशत्रुहा, अमोघ, अरिष्टमथन, मुकुन्द, विगतज्वर ॥ ९२ ॥ |
| स्वयंज्योतिरनुज्योतिरारत्मज्योतिश्चञ्चलः ।<br>पिङ्गलः कपिलश्मश्रुः शास्त्रनेत्रस्त्रयीतनुः ॥ ९३ | स्वयंज्योति, अनुज्योति, आत्मज्योति, अचंचल, पिंगल, कपिलश्मश्रु, शास्त्रनेत्रत्रयीतनु ॥ ९३ ॥ |
| ज्ञानस्कन्धो महाज्ञानी निरुत्पत्तिरुपप्लवः।<br>भगो विवस्वानादित्यो योगाचार्यो बृहस्पतिः ॥ ९४ | ज्ञानस्कन्ध, महाज्ञानी, निरुत्पत्ति, उपप्लव, भग, विवस्वान्-आदित्य, योगाचार्य, बृहस्पति ॥ ९४ ॥ |
| उदारकीर्तिरुद्योगी सद्योगी सदसन्मयः।<br>नक्षत्रमाली राकेशः साधिष्ठानः षडाश्रयः ॥ ९५ | उदारकीर्ति, उद्योगी, सद्योगी, सदसन्मय, नक्षत्रमालीराकेश, साधिष्ठान, षडाश्रय ॥ ९५ ॥ |
| पवित्रपाणिः पापारिर्मणिपूरो मनोगतिः।<br>हृत्पुण्डरीकमासीनः शुक्लः शान्तो वृषाकपिः ॥ ९६ | पवित्रपाणि, पापारि, मणिपूर, मनोगति, |