श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ५७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| मूल संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| तव भृत्यैस्तदा लुप्तं पापं चक्रुस्त्वदाज्ञया।<br>हरेः कीर्तिं विना चान्यद्ब्राह्मणेन नृपोत्तम॥ ४३<br>न गेययोगे गातव्यं तस्मात्पापं कृतं त्वया।<br>नष्टस्ते सर्वलोकोऽद्य गच्छ पर्वतकोटरम्॥ ४४<br>पूर्वोत्सृष्टं स्वदेहं तं खादन्नित्यं निकृत्य वै।<br>तस्मिन् कोणे त्विमं देहं खादन्नित्यं क्षुधान्वितः॥ ४५<br>महानिरयसंस्थस्त्वं यावन्मन्वन्तरं भवेत्।<br>मन्वन्तरे ततोऽतीते भूम्यां त्वं च भविष्यसि॥ ४६<br>ततः कालेन सम्प्राप्य मानुष्यमवगच्छसि। | वासुदेव-प्रतिमाके पासमें विद्यमान समस्त उपहार आदिको नष्ट कर दिया; इस प्रकार तुम्हारी आज्ञासे ही उन्होंने पाप किया। हे नृपश्रेष्ठ! [तुमने आज्ञा दे रखी थी कि] ‘कोई भी ब्राह्मण श्रीहरिके कीर्तिगानके बिना ही उनकी उपासना करे और गानयोगके द्वारा उनका यशोगान न करे’—अतः तुमने पाप किया है। इससे तुम्हारा सम्पूर्ण लोक नष्ट हो गया है; अतः अब तुम पर्वतके कोटरमें जाओ और वहाँ पहलेसे पड़े हुए अपने शवको नोच-नोचकर नित्य खाते हुए निवास करो। क्षुधासे व्याकुल होकर उस पर्वत-कोटरमें नित्य अपने शवको खाते हुए तुम जबतक मन्वन्तर रहेगा, तबतक उसी घोर नरकमें पड़े रहो। तदनन्तर मन्वन्तर बीत जानेपर तुम पृथ्वीपर जन्म लोगे। [विभिन्न योनियोंमें जन्म लेते हुए पुनः] बहुत समयके बाद मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर तुम ज्ञान प्राप्त करोगे॥ ३९-४६ १/२॥ |
| गानबन्धुरुवाच<br>एवमुक्त्वा यमो विद्वांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ४७<br>हरिमित्रो विमानेन स्तूयमानो गणाधिपैः।<br>विष्णुलोकं गतः श्रीमान् सङ्गृह्य गणबान्धवान्॥ ४८ | गानबन्धु बोला—ऐसा कहकर विद्वान् यम वहीं अन्तर्धान हो गये और ऐश्वर्यशाली हरिमित्र अपने बान्धवगणोंको साथ लेकर गणाधिपोंसे स्तुत होता हुआ विमानसे विष्णुलोक चला गया॥ ४७-४८॥ |
| भुवनेशो नृपो ह्यस्मिन् कोटरे पर्वतस्य वै।<br>खादमानः शवं नित्यमास्ते क्षुत्तृट्समन्वितः॥ ४९ | राजा भुवनेश भूख-प्याससे युक्त होकर अपने शवको नित्य खाता हुआ इसी पर्वतके कोटरमें पड़ा रहता था॥ ४९॥ |
| अद्राक्षं तं नृपं तत्र सर्वमेतन्ममोक्तवान्।<br>समालोक्याहमाज्ञाय हरिमित्रं समेयिवान्॥ ५०<br>विमानेनार्कवर्णेन गच्छन्तममरैर्वृतम्।<br>इन्द्रद्युम्नप्रसादेन प्राप्तं मे ह्यायुरुत्तमम्॥ ५१ | मैंने उस राजाको वहाँ देखा और उसने ही मुझे यह सब बताया था। यह देखकर तथा सब कुछ जानकर मैं सूर्यके समान प्रभाववाले विमानसे जाते हुए तथा देवताओंसे घिरे हुए हरिमित्रके पास गया। इन्द्रद्युम्नके अनुग्रहसे मुझे उत्तम आयु प्राप्त हुई है। हे सुव्रत! उसीके प्रभावसे मैंने हरिमित्रका दर्शन किया है॥ ५०-५१ १/२॥ |
| तेनाहं हरिमित्रं वै दृष्टवानस्मि सुव्रत।<br>तदैश्वर्यप्रभावेन मनो मे समुपागतम्॥ ५२<br>गानविद्यां प्रति तदा किन्नरैः समुपाविशम्।<br>षष्टिं वर्षसहस्त्राणां गानयोगेन मे मुने॥ ५३<br>जिह्वा प्रसादिता स्पष्टा ततो गानमशिक्षयम्।<br>ततस्तु द्विगुणेनैव कालेनाभूदियं मम॥ ५४<br>गानयोगसमायुक्ता गता मन्वन्तरा दश।<br>गानाचार्योऽभवं तत्र गन्धर्वाद्याः समागताः॥ ५५ | उन्हींके ऐश्वर्यके प्रभावसे गानविद्याके प्रति मेरा मन आकृष्ट हुआ। हे मुने! साठ हजार वर्षोंतक मैं किन्नरोंके साथ गानका अभ्यास करता रहा, तब गानयोगसे मेरी जिह्वा पवित्र होकर स्पष्ट हो गयी, तत्पश्चात् मैं गानकी शिक्षा लेने लगा और उससे भी दुगुने समयमें मेरी यह जिह्वा गानयोगसे परिपूर्ण हो गयी। इस प्रकार [गानका अभ्यास करते हुए] दस मन्वन्तर बीत गये; अन्तमें मैं गानका |