श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एते किन्नरसङ्घा वै मामाचार्यमुपागताः।<br>तपसा नैव शक्या वै गानविद्या तपोधन ॥ ५६ | आचार्य हो गया। वहाँपर पहले गन्धर्व आदि और बादमें ये किन्नरोंके समुदाय मुझे आचार्य मानकर [मेरे पास] आने लगे॥ ५२–५५ १/२॥ |
| तस्माच्छ्रुतेन संयुक्तो मत्तस्त्वं गानमाप्नुहि।<br>एवमुक्तो मुनिस्तं वै प्रणिपत्य जगौ तदा ॥ ५७<br>तच्छृणुष्व मुनिश्रेष्ठ वासुदेवं नमस्य तु। | हे तपोधन! गानविद्या तपस्यासे कभी भी प्राप्त नहीं की जा सकती, अतः श्रवण-अभ्याससे युक्त होकर आप मुझसे गानविद्या प्राप्त करें। हे मुनिश्रेष्ठ! भगवान् वासुदेवको नमस्कार करके उस गानको सुनिये। तब ऐसा कहे गये वे मुनि नारद उसे प्रणाम करके गानाभ्यास करने लगे॥ ५६–५७ १/२॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>उलूकेनैवमुक्तस्तु नारदो मुनिसत्तमः ॥ ५८<br>शिक्षाक्रमेण संयुक्तस्तत्र गानमशिक्षयत्।<br>गानबन्धुस्तदाहेदं त्यक्तलज्जो भवाधुना ॥ ५९ | मार्कण्डेयजी बोले—उलूकके द्वारा ऐसा कहे गये मुनिश्रेष्ठ नारद शिक्षाक्रमसे युक्त होकर उससे गान सीखने लगे। उस समय गानबन्धु उलूकने [नारदजीसे] कहा—अब आप लज्जासे रहित हो जाइये॥ ५८–५९॥ |
| उलूक उवाच<br>स्त्रीसङ्गमे तथा गीते द्यूते व्याख्यानसङ्गमे।<br>व्यवहारे तथाहारे त्वर्थानां च समागमे ॥ ६०<br>आये व्यये तथा नित्यं त्यक्तलज्जस्तु वै भवेत्।<br>न कुञ्चितेन गूढेन नित्यं प्रावरणादिभिः ॥ ६१<br>हस्तविक्षेपभावेन व्यादितास्येन चैव हि।<br>निर्याताजिह्वायोगेन न गेयं हि कथञ्चन ॥ ६२<br>न गायेदूर्ध्वबाहुश्च नोर्ध्वदृष्टिः कथञ्चन।<br>स्वाङ्गं निरीक्षमाणेन परं सम्प्रेक्षता तथा ॥ ६३<br>सङ्घट्टे च तथोत्थाने कटिस्र्थानं न शस्यते।<br>हासो रोषस्तथा कम्पस्तथान्यत्र स्मृतिः पुनः ॥ ६४<br>नैतानि शस्तरूपाणि गानयोगे महामते।<br>नैकहस्तेन शक्यं स्यात्तालसङ्घट्टनं मुने ॥ ६५<br>क्षुधार्तेन भयार्तेन तृष्णार्तेन तथैव च।<br>गानयोगो न कर्तव्यो नान्धकारे कथञ्चन ॥ ६६<br>एवमादीनि चान्यानि न कर्तव्यानि गायता। | उलूक बोला—स्त्री-संसर्गमें, गीतमें, द्यूतमें, व्याख्यान देनेमें, व्यवहारमें, आहारमें, अर्थोपार्जनमें तथा आय-व्ययमें मनुष्यको सदा लज्जाका त्याग कर देना चाहिये। शरीरके अंगोंको सिकोड़कर, बहुत आवरण आदिसे शरीरको ढककर, हाथ हिला-हिलाकर, मुँहको विकृत रूपसे खोलकर और जिह्वाको निकालकर कभी नहीं गाना चाहिये। हाथ ऊपर उठाकर, ऊपरकी ओर दृष्टि करके, अपने अंगोंको देखते हुए तथा दूसरेका अवलोकन करते हुए कभी नहीं गाना चाहिये। ताल देनेके लिये और उठनेके लिये कटिका आश्रय प्रशस्य नहीं होता है। हे महामते! गानयोगमें हास, रोष, कम्प तथा अनवधानता—ये सभी रूप प्रशस्त नहीं माने जाते। हे मुने! एक हाथसे ताल दे पाना सम्भव नहीं हो सकता है। भूखसे पीड़ित, भयभीत तथा तृष्णासे व्याकुल मनुष्यको गानयोग नहीं करना चाहिये; अन्धकारमें कभी नहीं गाना चाहिये। गानेवालेको इसी प्रकारके अन्य कार्य भी नहीं करने चाहिये॥ ६०–६६ १/२॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>एवमुक्तः स भगवान् स्तेनोक्तैर्विधिलक्षणैः।<br>अशिक्षयत्तथा गीतं दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ ६७<br>ततः समस्तसम्पन्नो गीतप्रस्तारकादिषु।<br>विपञ्च्यादिषु सम्पन्नः सर्वस्वरविभागवित् ॥ ६८ | मार्कण्डेयजी बोले—इस प्रकार उसके द्वारा कहे गये भगवान् नारदने बताये गये गान-लक्षणोंके द्वारा हजार दिव्य वर्षोंतक गीतकी शिक्षा प्राप्त की। इससे वे गीत-प्रस्तार आदिमें पूर्ण पारंगत हो गये और वीणावादन आदिमें ज्ञानसम्पन्न होकर सभी स्वरभेदोंके ज्ञाता बन |