भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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५८०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च।<br>स्वराणां भेदयोगेन ज्ञातवान् मुनिसत्तमः॥ ६९<br><br>ततो गन्धर्वसङ्घाश्च किन्नराणां तथैव च।<br>मुनिना सह संयुक्ताः प्रीतियुक्ता भवन्ति ते॥ ७०गये, मुनिश्रेष्ठ नारदने स्वरोंके छियालीस हजार एक सौ भेद-प्रभेदोंको जान लिया। तभीसे गन्धर्वों तथा किन्नरोंके समूह मुनि नारदसे मिलकर अत्यन्त प्रेमसे भर जाते थे॥ ६७-७०॥
गानबन्धुं मुनिः प्राह प्राप्य गानमनुत्तमम्।<br>त्वां समासाद्य सम्पन्नस्त्वं हि गीतविशारदः॥ ७१<br><br>ध्वाङ्क्षशत्रो महाप्राज्ञ किमाचार्य करोमि ते।मुनिने गानबन्धु उलूकसे कहा—आपके सान्निध्यमें आकर आपसे श्रेष्ठ गान प्राप्त करके मैं गानविद्यामें निष्णात हो गया हूँ; आप निश्चय ही गीतविशारद हैं। हे ध्वांक्षशत्रो! हे महाप्राज्ञ! हे आचार्य! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?॥ ७१¹/₂॥
गानबन्धुरुवाच<br>ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवस्तु चतुर्दश॥ ७२<br><br>ततस्त्रैलोक्यसम्प्लावो भविष्यति महामुने।<br>तावन्मे त्वायुषो भावस्तावन्मे परमं शुभम्॥ ७३<br><br>मनसाध्याहितं मे स्याद्दक्षिणा मुनिसत्तम।गानबन्धु बोला—हे ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु व्यतीत होते हैं। तत्पश्चात् तीनों लोक जलाप्लावित हो जाते हैं। हे महामुने! ब्रह्माके दिनके समाप्तिपर्यन्त मेरी आयु हो तथा मेरा परम कल्याण हो; आपके द्वारा मनसे ऐसी कामना की जाय—हे मुनिश्रेष्ठ! यही मेरी दक्षिणा है॥ ७२-७३¹/₂॥
नारद उवाच<br>अतीतकल्पसंयोगे गरुडस्त्वं भविष्यसि॥ ७४<br><br>स्वस्ति तेऽस्तु महाप्राज्ञ गमिष्यामि प्रसीद माम्।नारदजी बोले—कल्पके व्यतीत होनेपर आप गरुड़ होंगे। हे महाप्राज्ञ! आपका कल्याण हो, आप मुझपर प्रसन्न हों; अब मैं प्रस्थान करूँगा॥ ७४¹/₂॥
मार्कण्डेय उवाच<br>एवमुक्त्वा जगामाथ नारदोऽपि जनार्दनम्॥ ७५मार्कण्डेयजी बोले—ऐसा कहकर नारदजी भी श्वेतद्वीपमें विराजमान जनार्दन वासुदेवके पास चले गये