भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 583, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 583

अध्याय ३] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५८१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्वेतद्वीपे हृषीकेशं गापयामास गीतकान्।<br>तत्र श्रुत्वा तु भगवान्नारदं प्राह माधवः॥ ७६<br>तुम्बरोर्न विशिष्टोऽसि गीतैरद्यापि नारद।<br>यदा विशिष्टो भविता तं कालं प्रवदाम्यहम्॥ ७७<br>गानबन्धुं समासाद्य गानार्थज्ञो भवानसि।और वहाँ गीत गाने लगे। उसे सुनकर लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुने नारदसे कहा—हे नारद! आप आज भी गीतोंका गान करनेमें तुम्बुरुसे विशिष्ट नहीं हैं। आप जब उनसे विशिष्ट होंगे, उस समयको मैं बता रहा हूँ। आप गानबन्धुसे शिक्षा प्राप्त करके गानतत्त्वके ज्ञाता हो गये हैं॥ ७५—७७ १/२ ॥
मनोर्वैवस्वतस्याहमष्टाविंशतिमे युगे॥ ७८<br>द्वापरान्ते भविष्यामि यदुवंशकुलोद्भवः।<br>देवक्यां वसुदेवस्य कृष्णो नाम्ना महामते॥ ७९<br>तदानीं मां समासाद्य स्मारयेथा यथातथम्।<br>तत्र त्वां गीतसम्पन्नं करिष्यामि महाव्रतम्॥ ८०<br>तुम्बरोश्च समं चैव तथातिशयसंयुक्तम्।<br>तावत्कालं यथायोगं देवगन्धर्वयोनिषु॥ ८१<br>शिक्षयस्व यथान्यायमित्युक्त्वान्तरधीयत।हे महामते! मैं वैवस्वत मनुके अट्ठाईसवें द्वापरयुगके अन्तमें देवकीके गर्भसे वसुदेवके पुत्रके रूपमें कृष्ण नामसे यदुवंशमें अवतीर्ण होऊँगा। उस समय मेरे पास आकर आप ठीक-ठीक स्मरण कराइयेगा; तब मैं आपको तुम्बुरुके समान ही अतिशय गानसे सम्पन्न तथा महाव्रतसे युक्त कर दूँगा। तबतक आप यथानुकूल देव-गन्धर्वयोनियोंमें समुचित रूपसे शिक्षा प्रदान कीजिये—ऐसा कहकर वे [भगवान् विष्णु] अन्तर्धान हो गये॥ ७८—८१ १/२॥
ततो मुनिः प्रणम्यैनं वीणावादनतत्परः॥ ८२<br>देवर्षिर्देवसङ्काशः सर्वाभरणभूषितः।<br>तपसां निधिरत्यन्तं वासुदेवपरायणः॥ ८३<br>स्कन्धे विपञ्चीमासाद्य सर्वलोकांश्चचार सः।<br>वारुणं याम्यमाग्नेयमैन्द्रं कौबेरमेव च॥ ८४<br>वायव्यं च तथेशानं संसदं प्राप्य धर्मवित्।<br>गायमानो हरिं सम्यग्विणावादविचक्षणः॥ ८५तदनन्तर वीणावादनमें संलग्न रहनेवाले, देवतुल्य, तपस्याकी निधि तथा वासुदेवमें पूर्णरूपसे आसक्त वे देवर्षि नारद सभी आभरणोंसे विभूषित होकर अपने कन्धेपर वीणा धारण करके सभी लोकोंमें विचरने लगे। वरुण, यम, अग्नि, इन्द्र, कुबेर, वायु तथा ईशान—इन देवताओंकी सभामें पहुँचकर धर्मनिष्ठ तथा वीणावादनमें कुशल वे नारद भगवान् श्रीहरिका गान करते थे॥ ८२—८५॥
गन्धर्वाप्सरसां सङ्घैः पूज्यमानस्ततस्ततः।<br>ब्रह्मलोकं समासाद्य कस्मिंश्चित्कालपर्यये॥ ८६<br>हाहाहूहूश्च गन्धर्वौ गीतवाद्यविशारदौ।<br>ब्रह्मणो गायकौ दिव्यौ नित्यौ गन्धर्वसत्तमौ॥ ८७<br>तत्र ताभ्यां समासाद्य गायमानो हरिं प्रभुम्।<br>ब्रह्मणा च महातेजाः पूजितो मुनिसत्तमः॥ ८८तदनन्तर गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे पूजित होते हुए वे किसी समय ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए। वहाँ गायन-वादनमें विशारद हाहा-हूहू नामक दो दिव्य श्रेष्ठ गन्धर्व ब्रह्माके गायकके रूपमें सदा विद्यमान रहते थे। वहाँ उन दोनोंके साथमें बैठकर भगवान् श्रीहरिका गान करते हुए महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ नारद ब्रह्माजीके द्वारा पूजित हुए॥ ८६—८८॥
तं प्रणम्य महात्मानं सर्वलोकपितामहम्।<br>चचार च यथाकामं सर्वलोकेषु नारदः॥ ८९समस्त लोकोंके पितामह उन ब्रह्माको प्रणाम करके नारदजी सभी लोकोंमें इच्छानुसार विचरण करने लगे॥ ८९॥
ततः कालेन महता गृहं प्राप्य च तुम्बरोः।<br>वीणामादाय तत्रस्थो ह्यगायत महामुनिः॥ ९०तदनन्तर बहुत समयके बाद वे महामुनि नारद