भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५८२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्वरकल्पास्तु तत्रस्थाः षड्जाद्याः सप्त वै मताः।<br>क्रीडतो भगवान् दृष्ट्वा निर्गतश्च सुसत्वरम्॥ ९१गन्धर्व तुम्बुरुके घर पहुँचकर वीणा लेकरके वहीं स्थित होकर गाने लगे। षड्ज आदि जो सात प्रथम स्वर माने गये हैं, वे वहाँ साक्षात् विद्यमान थे; उन्हें [तुम्बुरुके घरमें] क्रीड़ा करते देखकर भगवान् नारद बड़ी शीघ्रतासे वहाँसे निकल गये॥ ९०-९१॥
शिक्षयामास बहुशस्तत्र तत्र महामतिः।<br>श्रमयोगेन संयुक्तो नारदोऽपि महामुनिः॥ ९२तत्पश्चात् महान् बुद्धिसे सम्पन्न महामुनि नारद परिश्रमके साथ बहुत समयतक गान सीखते रहे।
सप्तस्वराङ्गनाः पश्यन् गानविद्याविशारदः।<br>आसीद्वीणासमायोगे न तास्तन्त्र्यः प्रपेदिरे॥ ९३गानविद्यामें पारंगत वे नारद सातों स्वरोंकी अंगनाओंका अवलोकन करते हुए सदा वीणा धारण किये गान-साधनामें रत रहते थे; किंतु उनकी वीणाकी तन्त्रियाँ उन स्वरांगनाओंको प्राप्त न कर सकीं॥ ९२-९३॥
ततो रैवतके कृष्णं प्रणिपत्य महामुनिः।<br>विज्ञापयदशेषं तु श्वेतद्वीपे तु यत् पुरा॥ ९४तदनन्तर रैवतकपर्वतपर आकर श्रीकृष्णको प्रणाम करके महामुनि नारदने उन्हें वह सब बताया, जो श्वेतद्वीपमें पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने श्रेष्ठ गानयोगके विषयमें उनसे कहा था॥ ९४॥
नारायणेन कथितं गानयोगमनुत्तमम्।<br>तच्छ्रुत्वा प्रहसन् कृष्णः प्राह जाम्बवतीं मुदा॥ ९५उसे सुनकर श्रीकृष्णने जाम्बवतीसे हँसते हुए कहा—हे भद्रे! इन मुनिवर [नारद]-को वीणा-गानकी विधिपूर्वक शिक्षा प्रदान करो। तब ‘ठीक है’ श्रीकृष्णसे हँसते हुए ऐसा कहकर वे मुनिको सम्यक् प्रकारसे शिक्षा देने लगीं॥ ९५-९६ १/२॥
एतं मुनिवरं भद्रे शिक्षयस्व यथाविधि।<br>वीणागानसमायोगे तथेत्युक्त्वा च सा हरिम्॥ ९६
प्रहसन्ती यथायोगं शिक्षयामास तं मुनिम्।<br>ततः संवत्सरे पूर्णे पुनरागम्य माधवम्॥ ९७तत्पश्चात् एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर वे माधवके पास आकर उन्हें प्रणाम करके उनके सामने खड़े हो गये। तब केशवने फिर कहा—अब आप सत्यभामाके पास आइये और इनसे विधिपूर्वक शिक्षा प्राप्त कीजिये। तब ‘ठीक है’—ऐसा कहकर वे मुनि सत्यभामाको प्रणाम करके गान करने लगे। उन सत्यभामाने भी उन्हें गानशिक्षा प्रदान की। तब एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर [रुक्मिणीसे शिक्षा लेनेके लिये] पुनः वासुदेवके द्वारा नियुक्त किये गये वे विद्वान् नारद रुक्मिणीके भवनमें गये॥ ९७-९९ १/२॥
प्रणिपत्याग्रतस्तस्थौ पुनराह स केशवः।<br>सत्यां समीपमागच्छ शिक्षयस्व यथाविधि॥ ९८
तथेत्युक्त्वा सत्यभामां प्रणिपत्य जगौ मुनिः।<br>तया स शिक्षितो विद्वान् पूर्णे संवत्सरे पुनः॥ ९९
वासुदेवनियुक्तोऽसौ रुक्मिणीसदनं गतः।<br>अङ्गनाभिस्ततस्ताभिर्दासीभिर्मुनिसत्तमः ॥ १००तब वहाँकी अंगनाओं और दासियोंने उन मुनिश्रेष्ठसे कहा—हे मुने! इतने समयतक गाते हुए भी आप स्वरका ज्ञान नहीं कर सके। तत्पश्चात् नारदमुनिने उन देवी रुक्मिणीसे भी पूरे तीन वर्षोंतक महान् परिश्रमके साथ शिक्षा प्राप्त की और वे [उत्तम] गान करने लगे;
उक्तोऽसौ गायमानोऽपि न स्वरं वेत्सि वै मुने।<br>ततः श्रमेण महता वत्सरत्रयसंयुक्तम्॥ १०१
शिक्षितोऽसौ तदा देव्या रुक्मिण्यापि जगौ मुनिः।<br>ततः स्वराङ्गनाः प्राप्य तन्त्रीयोगं महामुनेः॥ १०२