श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीनारदजीको गानविद्याकी प्राप्ति ५८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तब स्वरांगनाएँ महामुनि नारदकी वीणाके तारोंमें आकर स्थित हो गयीं॥ १००-१०२॥ | |
| आहूय कृष्णो भगवान् स्वयमेव महामुनिम्।<br>अशिक्षयदमेयात्मा गानयोगमनुत्तमम्॥ १०३<br><br>ततोऽतिशयमापन्नस्तुम्बरोर्मुुलिसत्तमः ।<br>ततो ननर्त देवर्षिः प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ १०४ | तदनन्तर अपरिमेय आत्माको धारण करनेवाले स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने महामुनिको बुलाकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ गानविद्याकी शिक्षा प्रदान की। तब मुनिश्रेष्ठ नारद तुम्बुरुसे भी अधिक ज्ञानसम्पन्न हो गये। वे देवर्षि जनार्दन श्रीकृष्णको प्रणाम करके [आनन्दमग्न होकर] नृत्य करने लगे॥ १०३-१०४॥ |
| उवाच च हृषीकेशः सर्वज्ञस्त्वं महामुने।<br>प्रहस्य ज्ञानयोगेन गायस्व मम सन्निधौ॥ १०५<br><br>एतत्ते प्रार्थितं प्राप्तं मम लोके तथैव च।<br>नित्यं तुम्बरुणा सार्धं गायस्व च यथातथम्॥ १०६ | तदनन्तर भगवान् हृषीकेशने हँसकर कहा—हे महामुने! अब आप गानविद्यामें सबकुछ जान गये हैं; अब आप मेरे सान्निध्यमें रहकर गान किया कीजिये। आपने यह अपना अभिलषित प्राप्त कर लिया है। अब आप भी तुम्बुरुके साथ मेरे लोकमें सम्यक् प्रकारसे नित्य गान कीजिये॥ १०५-१०६॥ |
| एवमुक्तो मुनिस्तत्र यथायोगं चचार सः।<br>यदा सम्पूजयन् कृष्णो रुद्रं भुवननायकम्॥ १०७<br><br>तदा जगौ हरेस्तस्य नियोगाच्छङ्कराय वै।<br>रुक्मिण्या सह सत्या च जाम्बवत्या महामुनिः॥ १०८ | तब [श्रीकृष्णके द्वारा] ऐसा कहे गये वे मुनि यथेच्छ विचरण करने लगे। हे नृपश्रेष्ठ! जब श्रीकृष्ण भुवननायक शिवकी पूजा करने लगते थे, उस समय [श्रीकृष्णरूप] उन श्रीहरिके आदेशसे स्वरोंके महाज्ञानी महामुनि नारद रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और श्रीकृष्णके साथ शंकरजीका स्तुति-गान करते थे॥ १०७-१०८ १/२॥ |
| कृष्णेन च नृपश्रेष्ठ श्रुतिजातिविशारदः।<br>एष वो मुनिशार्दूलाः प्रोक्तो गीतक्रमो मुने॥ १०९<br><br>ब्राह्मणो वासुदेवाख्यां गायमानो भृशं नृप।<br>हरेः सालोक्यमाप्नोति रुद्रगानोऽधिको भवेत्॥ ११०<br><br>अन्यथा नरकं गच्छेदगायमानोऽन्यदेव हि।<br>कर्मणा मनसा वाचा वासुदेवपरायणः॥ १११<br><br>गायन् शृण्वंस्तमाप्नोति तस्माद्गेयं परं विदुः॥ ११२ | [सूतजी बोले—] हे श्रेष्ठ मुनिगण! मैंने आपलोगोंको मुनि नारदकी गानविद्या-प्राप्तिका यह क्रम बतला दिया। [मार्कण्डेयजीने कहा—] हे राजन्! वासुदेवकी स्तुतिका अत्यधिक गान करनेवाला ब्राह्मण श्रीहरिका सालोक्य प्राप्त कर लेता है; किंतु रुद्रका स्तुतिगान करनेवाला उससे भी अधिक श्रेष्ठ भगवत्सारूप्य प्राप्त कर लेता है। इसके विपरीत किसी अन्यका गान करनेवाला नरकमें जाता है। मन, वाणी तथा कर्मसे वासुदेवमें ही अनुरक्त होकर उनकी स्तुतिका गान करनेवाला तथा उसे सुननेवाला उन्हींको प्राप्त होता है, अतः गानविद्याको सर्वश्रेष्ठ कहा गया है॥ १०९-११२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे वैष्णवगीतकथनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'वैष्णवगीतकथन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३॥