श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 587, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 587
अध्याय ५ ] विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान ५८५
| विष्णुभक्तस्य च सदा यथान्यायं हि कथ्यते।<br>नारायणपरो विद्वान् यस्यान्नं प्रीतमानसः॥ १४<br><br>अश्नाति तद्धरेरास्यं गतमन्नं न संशयः।<br>स्वार्चनादपि विश्वात्मा प्रीतो भवति माधवः॥ १५ | विष्णुभक्तोंके भोजन एवं आराधनकी यथाशक्ति व्यवस्था करनेवाला वास्तविक फलका भागी कहा गया है। नारायणमें भक्ति रखनेवाला विद्वान् प्रसन्नचित्त होकर जिसका भी अन्न खाता है, वह अन्न मानो साक्षात् श्रीहरिके मुखमें चला गया; इसमें संदेह नहीं है॥ १३-१४<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| महाभागवते तच्च दृष्ट्वासौ भक्तवत्सलः।<br>वासुदेवपरं दृष्ट्वा वैष्णवं दग्धकिल्बिषम्॥ १६<br><br>देवापि भीतास्तं यान्ति प्रणिपत्य यथागतम्।<br>श्रूयतां हि पुरा वृत्तं विष्णुभक्तस्य वैभवम्॥ १७ | भक्तवत्सल लक्ष्मीपति विश्वात्मा विष्णु अपने पूजनकी अपेक्षा अपने महाभागवत भक्तका पूजन देखकर अधिक प्रसन्न होते हैं। वासुदेवमें भक्ति रखनेवाले पापरहित वैष्णवको देखकर देवता भी भयभीत होकर उसे प्रणाम करके जैसे आते हैं, वैसे ही लौट जाते हैं॥ १५-१६<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| दृष्ट्वा यमोऽपि वै भक्तं वैष्णवं दग्धकिल्बिषम्।<br>उत्थाय प्राञ्जलिर्भूत्वा ननाम भृगुनन्दनम्॥ १८<br><br>तस्मात्सम्पूजयेद्भक्त्या वैष्णवान् विष्णुवन्नरः।<br>स याति विष्णुसामीप्यं नात्र कार्या विचारणा॥ १९ | विष्णुभक्तके वैभवसे सम्बन्धित एक प्राचीनकालका वृत्तान्त सुनिये। दग्ध पापोंवाले वैष्णव भक्त भृगुपुत्र च्यवनको देखकर यमराजने भी उठ करके दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया था। अतः मनुष्यको चाहिये कि भगवान् विष्णुकी ही भाँति भक्तिपूर्वक वैष्णवोंकी पूजा करे; [जो ऐसा करता है] वह विष्णुका सामीप्य प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १७-१९॥ |
| अन्यभक्तसहस्रेभ्यो विष्णुभक्तो विशिष्यते।<br>विष्णुभक्तसहस्रेभ्यो रुद्रभक्तो विशिष्यते।<br>रुद्रभक्तात्परतरो नास्ति लोके न संशयः॥ २०<br><br>तस्मात्तु वैष्णवं चापि रुद्रभक्तमथापि वा।<br>पूजयेत्सर्वयत्नेन धर्मकामार्थमुक्तये॥ २१ | विष्णुभक्त अन्य देवताओंके भक्तोंसे हजार गुना श्रेष्ठ होता है और विष्णुभक्तोंसे हजार गुना श्रेष्ठ शिवभक्त होता है; रुद्रभक्तसे श्रेष्ठ कोई भी लोकमें नहीं है, इसमें संशय नहीं है। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये सम्पूर्ण प्रयत्नके साथ विष्णुभक्त अथवा रुद्रभक्तकी पूजा करनी चाहिये॥ २०-२१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे विष्णुभक्तकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'विष्णुभक्तकथन' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
पाँचवाँ अध्याय
विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान, विष्णुमायाद्वारा नारद एवं पर्वत
मुनिका वानरमुख होना तथा इसीका रामावतारमें हेतु बनना
| ऋषय ऊचुः<br>ऐक्ष्वाकुरम्बरीषो वै वासुदेवपरायणः।<br>पालयामास पृथिवीं विष्णोराज्ञापुरःसरः॥ १॥<br><br>श्रुतमेतन्महाबुद्धे तत्सर्वं वक्तुमर्हसि।<br>नित्यं तस्य हरेश्चक्रं शत्रुरोगभयादिकम् ॥ २। | ऋषिगण बोले—इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न विष्णुभक्त [राजा] अम्बरीष भगवान् विष्णुकी आज्ञाके अनुसार पृथ्वीका पालन करते थे—यह हमने सुना है; हे महाबुद्धे! उनके विषयमें आप सब कुछ बताइये। लोकमें ऐसा सुना जाता है कि भगवान् श्रीहरिका |