भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५८६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
हन्तीति श्रूयते लोके धार्मिकस्य महात्मनः।<br>अम्बरीषस्य चरितं तत्सर्वं ब्रूहि सत्तम॥ ३<br>माहात्म्यमनुभावं च भक्तियोगमनुत्तमम्।<br>यथावच्छ्रोतुमिच्छामः सूत वक्तुं त्वमर्हसि॥ ४सुदर्शन चक्र उनके शत्रु, रोग, भय आदिका सदा नाश किया करता था। अतः हे श्रेष्ठ! आप उन धार्मिक तथा महात्मा अम्बरीषके उस सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन कीजिये। हे सूत! हम उनके माहात्म्य, अनुभाव तथा श्रेष्ठ भक्तियोगको यथार्थतः सुनना चाहते हैं, आप हमें बतायें॥ १-४॥
सूत उवाच<br>श्रूयतां मुनिशार्दूलाश्चरितं तस्य धीमतः।<br>अम्बरीषस्य माहात्म्यं सर्वपापहरं परम्॥ ५**सूतजी बोले—**हे मुनीन्द्रो! उन बुद्धिमान् अम्बरीषके श्रेष्ठ चरित्र तथा माहात्म्यको आपलोग सुनें, जो सम्पूर्ण पापोंका नाश कर देनेवाला है॥ ५॥
त्रिशङ्कोर्दयिता भार्या सर्वलक्षणशोभिता।<br>अम्बरीषस्य जननी नित्यं शौचसमन्विता॥ ६<br>योगनिद्रासमारूढं शेषपर्यङ्कशायिनम्।<br>नारायणं महात्मानं ब्रह्माण्डकमलोद्भवम्॥ ७<br>तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकाण्डजम्।<br>सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ८<br>अर्चयामास सततं वाङ्मनःकायकर्मभिः।<br>माल्यादानादिकं सर्वं स्वयमेवमचीकरत्॥ ९<br>गन्धादिपेषणं चैव धूपद्रव्यादिकं तथा।<br>भूमेरालेपनादीनि हविषां पचनं तथा॥ १०<br>तत्कौतुकसमाविष्टा स्वयमेव चकार सा।<br>शुभा पद्मावती नित्यं वाचा नारायणेति वै॥ ११<br>अनन्तेत्येव सा नित्यं भाषमाणा पतिव्रता।<br>दशवर्षसहस्राणि तत्परेणान्तरात्मना॥ १२<br>अर्चयामास गोविन्दं गन्धपुष्पादिभिः शुचिः।<br>विष्णुभक्तान् महाभागान् सर्वपापविवर्जितान्॥ १३त्रिशंकुकी प्रिय भार्या तथा अम्बरीषकी माता, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं, नित्य [स्नान आदिसे] शुद्ध होकर योगनिद्रामें लीन रहनेवाले, शेषशय्यापर शयन करनेवाले, ब्रह्माण्डरूपी कमलका प्रादुर्भाव करनेवाले, तमोगुणसे युक्त होनेपर कालरूद्ररूप, रजोगुणसे युक्त होनेपर हिरण्यगर्भ ब्रह्मारूप और सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर सर्वव्यापी तथा सभी देवोंसे नमस्कृत साक्षात् महात्मा नारायण विष्णुकी निरन्तर मन-वाणी-कर्मसे अर्चना करती थीं। माल्य, दान आदि सब कुछ वे स्वयं करती थीं। चन्दन आदि द्रव्योंका घिसना, धूप-दीप आदि, भूमिका लेपन आदि, हवि-द्रव्यको पकाना—ये सब कार्य वे स्वयं सम्पन्न करती थीं। वे कल्याणमयी तथा पतिव्रता रानी पद्मावती प्रतिदिन वाणीसे 'नारायण' और 'अनन्त'—ऐसा निरन्तर उच्चारण करती हुई उन्हीं परमात्मामें संलग्न मनसे दस हजार वर्षोंतक शुद्धतापूर्वक गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंसे गोविन्दका पूजन किया करती थीं। वे सब प्रकारके पापोंसे रहित महाभाग विष्णुभक्तोंको दान, मान, पूजन तथा धनोंसे नित्य सन्तुष्ट रखती थीं॥ ६-१३ १/२॥
दानमानार्चनैर्नित्यं धनरत्नैस्तोषयत्।<br>ततः कदाचित्सा देवी द्वादशीं समुपोष्य वै॥ १४<br>हरेरग्रे महाभागा सुष्वाप पतिना सह।<br>तत्र नारायणो देवस्तामाह पुरुषोत्तमः॥ १५तदनन्तर किसी समय वे महाभागा देवी द्वादशीका व्रत करके पतिके साथ भगवान् श्रीहरिके [विग्रहके] सम्मुख सो गयीं। वहाँपर [स्वप्नमें] पुरुषोत्तम नारायणने उनसे कहा—हे भद्रे! क्या चाहती हो? हे भामिनि! तुम मुझसे वर माँग लो॥ १४-१५ १/२॥
किमिच्छसि वरं भद्रे मत्तस्त्वं ब्रूहि भामिनि।<br>सा दृष्ट्वा तु वरं वव्रे पुत्रो मे वैष्णवो भवेत्॥ १६<br>सार्वभौमो महातेजाः स्वकर्मनिरतः शुचिः।<br>तथेत्युक्त्वा ददौ तस्यै फलमेकं जनार्दनः॥ १७तब भगवान्‌को देखकर उन्होंने यह वर माँगा—मुझे विष्णुभक्त, चक्रवर्ती सम्राट्, महातेजस्वी, अपने