भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 589

अध्याय ५] विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान ५८७


श्लोक (संस्कृत)अर्थ (हिन्दी)
कार्यमें तत्पर रहनेवाला और पवित्र मनवाला पुत्र उत्पन्न हो। तब 'वैसा ही होगा'—यह कहकर जनार्दनने उन्हें एक फल प्रदान किया॥ १६-१७॥
सा प्रबुद्धा फलं दृष्ट्वा भर्त्रे सर्वं न्यवेदयत्।<br>भक्षयामास संहृष्टा फलं तद्गतमानसा ॥ १८तदनन्तर वे जग गयीं और उस फलको देखकर उन्होंने सारी बात अपने पतिसे कही। इसके बाद उन्हीं प्रभुमें संलग्न चित्तवाली उन्होंने प्रसन्न होकर वह फल खा लिया॥ १८॥
ततः कालेन सा देवी पुत्रं कुलविवर्धनम्।<br>असूत सा सदाचारं वासुदेवपरायणम् ॥ १९<br><br>शुभलक्षणसम्पन्नं चक्राङ्किततनूरुहम्।<br>जातं दृष्ट्वा पिता पुत्रं क्रियाः सर्वाश्चकार वै ॥ २०तत्पश्चात् समय आनेपर उन देवीने कुलकी वृद्धि करनेवाले, सदाचारी, वासुदेवपरायण, शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा चक्रांकित केशोंवाले पुत्रको जन्म दिया। पुत्र उत्पन्न हुआ देखकर पिता [त्रिशंकु]-ने उसके सभी [जातकर्म आदि] संस्कार किये॥ १९-२०॥
अम्बरीष इति ख्यातो लोके सम्भवत्प्रभुः।<br>पितर्युपरते श्रीमानभिषिक्तो महामुनिः ॥ २१<br><br>मन्त्रिष्वाधाय राज्यं च तप उग्रं चकार सः।<br>संवत्सरसहस्रं वै जपन्नारायणं प्रभुम् ॥ २२<br><br>हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं सूर्यमण्डलमध्यतः।<br>शङ्खचक्रगदापद्म धारयन्तं चतुर्भुजम् ॥ २३<br><br>शुद्धजाम्बूनदनिभं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं पीताम्बरधरं प्रभुम् ॥ २४<br><br>श्रीवत्सवक्षसं देवं पुरुषं पुरुषोत्तमम्।वह ऐश्वर्यशाली बालक अम्बरीष—इस नामसे लोकमें विख्यात हुआ। पिताकी मृत्यु हो जानेपर उस शोभासम्पन्न महात्मा अम्बरीषका अभिषेक किया गया। तत्पश्चात् मन्त्रियोंको राज्य सौंपकर उन्होंने हृदयकमलके मध्यमें विराजमान, सूर्यमण्डलके मध्यमें स्थित, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले, चतुर्भुज, विशुद्ध सुवर्णके सदृश कान्तिवाले, ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूप, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, पीताम्बर धारण करनेवाले, वक्षःस्थलपर श्रीवत्स चिह्न धारण करनेवाले, परम पुरुष तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ भगवान् नारायणका जप करते हुए पूरे एक हजार वर्षतक कठोर तप किया॥ २१—२४¹/२॥
ततो गरुडमारुह्य सर्वदेवैरभिष्टुतः ॥ २५<br><br>आजगाम स विश्वात्मा सर्वलोकनमसस्कृतः।<br>ऐरावतमिवाचिन्त्यं कृत्वा वै गरुडं हरिः ॥ २६<br><br>स्वयं शक्र इवासीनस्तमाह नृपसत्तमम्।<br>इन्द्रोऽहमस्मि भद्रं ते किं ददामि वरं च ते ॥ २७<br><br>सर्वलोकेश्वरोऽहं त्वां रक्षितुं समुपागतः।तब सभी देवताओंसे स्तुत तथा सभी लोकोंसे नमस्कृत होनेवाले वे विश्वात्मा गरुड़पर आरूढ़ होकर वहाँ आ गये। उन श्रीहरिने गरुड़को अद्भुत ऐरावतके रूपमें करके स्वयं इन्द्रका रूप धारणकर उसपर आसीन हो उन नृपश्रेष्ठसे कहा—'मैं इन्द्र हूँ, आपका कल्याण हो; मैं आपको कौन-सा वर प्रदान करूँ? सभी लोकोंका ईश्वर मैं आपकी रक्षा करनेके लिये आपके पास आया हूँ'॥ २५—२७¹/२॥
अम्बरीष उवाच<br>नाहं त्वामभिसन्धाय तप आस्थितवानिह ॥ २८<br><br>त्वया दत्तं च नेष्यामि गच्छ शक्र यथासुखम्।<br>मम नारायणो नाथस्तन्नमामि जगत्पतिम् ॥ २९अम्बरीषजी बोले—आपको उद्देश्य करके मैंने यह तप नहीं किया है। हे शक्र! आपके द्वारा प्रदत्त वर मैं नहीं चाहता; अतः आप सुखपूर्वक लौट जाइये। मेरे स्वामी तो नारायण हैं; मैं उन्हीं जगत्पतिको नमस्कार करता हूँ।