श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| गच्छेन्द्र मा कृथास्त्वत्र मम बुद्धिविलोपनम्।<br>ततः प्रहस्य भगवान् स्वरूपमकरोद्धरिः॥ ३०<br><br>शार्ङ्गचक्रगदापाणिः खड्गहस्तो जनार्दनः।<br>गरुडोपरि सर्वात्मा नीलाचल इवापरः॥ ३१<br><br>देवगन्धर्वसङ्घैश्च स्तूयमानः समन्ततः।<br>प्रणम्य स च सन्तुष्टस्तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ३२<br><br>प्रसीद लोकनाथेश मम नाथ जनार्दन।<br>कृष्ण विष्णो जगन्नाथ सर्वलोकननमस्कृत॥ ३३<br><br>त्वमादिस्त्वमनादिस्त्वमनन्तः पुरुषः प्रभुः।<br>अप्रमेयो विभुर्विष्णुर्गोविन्दः कमलेक्षणः॥ ३४<br><br>महेश्वराङ्गजो मध्ये पुष्करः खगमः खगः।<br>कव्यवाहः कपाली त्वं हव्यवाहः प्रभञ्जनः॥ ३५<br><br>आदिदेवः क्रियानन्दः परमात्मात्मनि स्थितः।<br>त्वां प्रपन्नोऽस्मि गोविन्द जय देवकिनन्दन।<br>जय देव जगन्नाथ पाहि मां पुष्करेक्षण॥ ३६<br><br>नान्या गतिस्त्वदन्या मे त्वमेव शरणं मम। | हे इन्द्र! आप चले जाइये, मेरी बुद्धिको भ्रमित मत कीजिये॥ २८-२९ १/२॥<br><br>तब [इन्द्ररूपधारी] भगवान् विष्णुने हँसकर अपना रूप प्रकट कर दिया। वे सर्वात्मा जनार्दन हाथमें शार्ङ्ग नामक धनुष-चक्र-गदा-खड्ग लिये हुए थे, गरुड़पर आरूढ़ थे और दूसरे नीलपर्वतकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। देवताओं तथा गन्धर्वोंके समूह सभी ओरसे उनकी स्तुति कर रहे थे॥ ३०-३१ १/२॥<br><br>तब प्रसन्नताको प्राप्त वे [अम्बरीष] उन गरुड़ध्वजको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे— हे लोकनाथ! हे ईश! हे मेरे नाथ! हे जनार्दन! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे जगन्नाथ! हे सर्वलोकननमस्कृत! [मुझपर] प्रसन्न होइये। आप आदि हैं और आदिरहित भी हैं। आप अनन्त, परम पुरुष, प्रभुतासम्पन्न, अपरिमित, सर्वोपरि, विष्णु, गोविन्द, कमलके समान नेत्रोंवाले, महेश्वरके अंगसे आविर्भूत, नाभिसे कमलकी उत्पत्ति करनेवाले, हृदयाकाशमें योगियोंके द्वारा प्राप्त होनेवाले, खगरूप, कव्यवाह तथा भैरवरूप हैं। आप हव्यवाह, प्रभंजन, आदिदेव, क्रियानन्द, परमात्मा तथा स्वयंमें स्थित हैं। हे गोविन्द! मैं आपके शरणागत हूँ। हे देवकीनन्दन! आपकी जय हो। हे देव! हे जगन्नाथ! आपकी जय हो। हे कमलनयन! मेरी रक्षा कीजिये; आपके अतिरिक्त मेरी दूसरी गति नहीं है; आप ही मेरे शरणदाता हैं॥ ३२-३६ १/२॥ | | सूत उवाच<br>तमाह भगवान् विष्णुः किं ते हृदि चिकीर्षितम्॥ ३७<br><br>तत्सर्वं ते प्रदास्यामि भक्तोऽसि मम सुव्रत।<br>भक्तिप्रियोऽहं सततं तस्माद्दातुमिहागतः॥ ३८ | सूतजी बोले— भगवान् विष्णुने उनसे कहा— आपके मनमें कौन-सी अभिलाषा है; वह सब मैं आपको दूँगा। हे सुव्रत! आप मेरे भक्त हैं, मुझे भक्ति प्रिय है, अतः आपको वर प्रदान करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ॥ ३७-३८॥ | | अम्बरीष उवाच<br>लोकनाथ परानन्द नित्यं मे वर्तते मतिः।<br>वासुदेवपरो नित्यं वाङ्मनःकायकर्मभिः॥ ३९<br><br>यथा त्वं देवदेवस्य भवस्य परमात्मनः।<br>तथा भवाम्यहं विष्णो तव देव जनार्दन॥ ४०<br><br>पालयिष्यामि पृथिवीं कृत्वा वै वैष्णवं जगत्।<br>यज्ञहोमार्चनैश्चैव तर्पयामि सुरोत्तमान्॥ ४१ | अम्बरीषजी बोले— हे लोकनाथ! हे परानन्द! मेरी सदा यही अभिलाषा रहती है कि मैं मन, वाणी तथा कर्मसे नित्य वासुदेवमें लीन रहूँ। हे विष्णो! हे देव! हे जनार्दन! जैसे आप देवाधिदेव परमात्मा शिवके [भक्त] हैं, वैसे ही मैं आपका [भक्त] हो जाऊँ। मैं [सम्पूर्ण] जगत्को विष्णुभक्त बनाकर पृथ्वीका पालन करूँगा, यज्ञ-हवन- |