श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५८९ | | :--- | :--- |
| वैष्णवान् पालयिष्यामि निहनिष्यामि शात्रवान्।<br>लोकतापभये भीत इति मे धीयते मतिः॥ ४२<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>एवमस्तु यथेच्छं वै चक्रमेतत्सुदर्शनम्।<br>पुरा रुद्रप्रसादेन लब्धं वै दुर्लभं मया॥ ४३<br><br>ऋषिाशापादिकं दुःखं शत्रुरोगादिकं तथा।<br>निहनिष्यति ते नित्यमित्युक्त्वान्तरधीयत॥ ४४<br><br>सूत उवाच<br>ततः प्रणम्य मुदितो राजा नारायणं प्रभुम्।<br>प्रविश्य नगरीं रम्यामयोध्यां पर्यपालयत्॥ ४५<br><br>ब्राह्मणादींश्च वर्णांश्च स्वस्वकर्मण्ययोजयत्।<br>नारायणपरो नित्यं विष्णुभक्तानकल्मषान्॥ ४६<br><br>पालयामास हृष्टात्मा विशेषेण जनाधिपः।<br>अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतेन च॥ ४७<br><br>पालयामास पृथिवीं सागरावरणामिमाम्।<br>गृहे गृहे हरिस्तस्थौ वेदघोषो गृहे गृहे॥ ४८<br><br>नामघोषो हरेश्चैव यज्ञघोषस्तथैव च।<br>अभवन्नृपशार्दूले तस्मिन् राज्यं प्रशासति॥ ४९<br><br>नासस्या नातृणा भूमिर्न दुर्भिक्षादिभिर्युता।<br>रोगहीनाः प्रजा नित्यं सर्वोपद्रववर्जिताः॥ ५०<br><br>अम्बरीषो महातेजाः पालयामास मेदिनीम्।<br>तस्यैवं वर्तमानस्य कन्या कमललोचना॥ ५१<br><br>श्रीमती नाम विख्याता सर्वलक्षणसंयुता।<br>प्रदानसमयं प्राप्ता देवमायेव शोभना॥ ५२<br><br>तस्मिन् काले मुनिः श्रीमान्नारदोऽभ्यागतश्च वै।<br>अम्बरीषस्य राज्ञो वै पर्वतश्च महामतिः॥ ५३<br><br>तावुभावागतौ दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि।<br>अम्बरीषो महातेजाः पूजयामास तावृषी॥ ५४ | अर्चन आदिके द्वारा श्रेष्ठ देवताओंको तृप्त करूँगा, वैष्णवजनोंका पालन-पोषण करूँगा और शत्रुओंका संहार करूँगा, प्राणियोंको संताप देनेसे मैं भयभीत रहूँ—मेरी मति ऐसी भावनाको धारण करे॥ ३९—४२॥<br><br>श्रीभगवान् बोले— 'जैसी आपकी इच्छा है, वैसा ही होगा। प्राचीनकालमें मैंने भगवान् रुद्रकी कृपासे यह दुर्लभ सुदर्शन चक्र प्राप्त किया है। यह आपके ऋषिशाप, दुःख, शत्रु, रोग आदिका सदा नाश करेगा'—ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये॥ ४३-४४॥<br><br>सूतजी बोले— तदनन्तर भगवान् नारायणको प्रणाम करके आनन्दसे युक्त राजा [अम्बरीष] रम्य अयोध्या नगरीमें प्रवेश करके प्रजापालन करने लगे। नारायणमें तत्पर रहनेवाले उन राजाने ब्राह्मण आदि वर्णोंको अपने-अपने कर्ममें लगाया। वे राजा अम्बरीष प्रसन्नचित्त होकर विशेष रूपसे निष्पाप विष्णुभक्तोंका पालन करने लगे। एक सौ अश्वमेधयज्ञ तथा एक सौ वाजपेययज्ञ करके वे सागरपर्यन्त इस पृथ्वीका पालन करनेमें तत्पर हो गये॥ ४५—४७ १/२॥<br><br>उन नृपश्रेष्ठके राज्य-शासन करते रहनेपर घर-घरमें विष्णुका विग्रह स्थापित किया गया; घर-घरमें वेद-ध्वनि, विष्णुके नामका घोष और यज्ञघोष होने लगा। भूमि फसलरहित, तृणविहीन और दुर्भिक्ष आदिसे युक्त नहीं रह गयी। सम्पूर्ण प्रजाएँ नित्य रोग तथा सभी प्रकारके विघ्नोंसे रहित हो गयीं। इस प्रकार महातेजस्वी अम्बरीष पृथ्वीका पालन करते थे॥ ४८—५० १/२॥<br><br>इस प्रकार राज्य करते हुए उन राजाके यहाँ कमलके समान नेत्रोंवाली तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एक कन्या उत्पन्न हुई, जो श्रीमती नामसे विख्यात हुई। देवकन्याके समान सुन्दर वह श्रीमती [कुछ दिनोंमें] कन्यादानके योग्य हो गयी। उस समय राजा अम्बरीषके यहाँ श्रीमान् नारदमुनि तथा महामति पर्वत—ये दोनों आये॥ ५१—५३॥<br><br>उन दोनों ऋषियोंको आया हुआ देखकर उन्हें प्रणाम करके महातेजस्वी अम्बरीषने विधिपूर्वक उनका पूजन-सत्कार किया॥ ५४॥ |