श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५११ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्वं च पर्वत मे वाक्यं शृणु वक्ष्यामि यत्प्रभो।<br>कन्येयं युवयोरेकं वरयिष्यति चेच्छुभा॥ ६२<br><br>तस्मै कन्यां प्रयच्छामि नान्यथा शक्तिरस्ति मे।<br>तथेत्युक्त्वा ततो भूयः श्वो यास्याव इति स्म ह॥ ६३<br><br>इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलौ जग्मतुः प्रीतिमानसौ।<br>वासुदेवपरौ नित्यमुभौ ज्ञानविदां वरौ॥ ६४ | याचना कर रहे हैं; [ऐसी स्थितिमें] मैं क्या करूँ? हे महाप्राज्ञ! हे नारद! आप मेरी बात सुनें और हे पर्वत! हे प्रभो! आप भी मेरा वचन सुनें, जिसे मैं कह रहा हूँ—'मेरी यह सौभाग्यवती पुत्री आप दोनोंमेंसे जिस एकका वरण कर लेगी, उसे मैं अपनी कन्या दे दूँगा; इसके अतिरिक्त मेरा सामर्थ्य नहीं है'॥ ६०–६२ १/२॥<br><br>'वैसा ही हो'—यह कहनेके बाद 'हम दोनों कल पुनः आयेंगे'—यह कहकर निरन्तर भगवान् विष्णुमें अनुरक्त रहनेवाले तथा ज्ञानियोंमें अग्रणी वे दोनों मुनिश्रेष्ठ प्रसन्नचित्त होकर वहाँसे चले गये॥ ६३–६४॥ |
| विष्णुलोकं ततो गत्वा नारदो मुनिसत्तमः।<br>प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह॥ ६५<br><br>श्रोतव्यमस्ति भगवन्नाथ नारायण प्रभो।<br>रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि नमस्ते भुवनेश्वर॥ ६६ | तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ नारदने विष्णुलोक पहुँचकर भगवान् हृषीकेशको प्रणाम करके यह वचन कहा—हे भगवन्! हे नाथ! हे नारायण! हे प्रभो! आपको कुछ सुनना है; इसे मैं आपको एकान्तमें बताऊँगा। हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है॥ ६५–६६॥ |
| ततः प्रहस्य गोविन्दः सर्वानुत्सार्य तं मुनिम्।<br>ब्रूहीत्याह च विश्वात्मा मुनिराह च केशवम्॥ ६७<br><br>त्वदीयो नृपतिः श्रीमानम्बरीषो महीपतिः।<br>तस्य कन्या विशालाक्षी श्रीमती नाम नामतः॥ ६८<br><br>परिणेतुमनास्तत्र गतोऽस्मि वचनं शृणु।<br>पर्वतोऽयं मुनिः श्रीमांस्तव भृत्यस्तपोनिधिः॥ ६९<br><br>तामैच्छत्सोऽपि भगवन्नावामाह जनाधिपः।<br>अम्बरीषो महातेजाः कन्येयं युवयोर्वरम्॥ ७०<br><br>लावण्ययुक्तं वृणुयाद्यदि तस्मै ददाम्यहम्।<br>इत्याहावां नृपस्तत्र तथेत्युक्त्वाह्मागतः॥ ७१<br><br>आगमिष्यामि ते राजन् श्वः प्रभाते गृहं त्विति।<br>आगतोऽहं जगन्नाथ कर्तुमर्हसि मे प्रियम्॥ ७२<br><br>वानराननवद्भाति पर्वतस्य मुखं यथा।<br>तथा कुरु जगन्नाथ मम चेदिच्छसि प्रियम्॥ ७३ | तदनन्तर परमात्मा गोविन्द सभी लोगोंको वहाँसे हटाकर हँस करके उन मुनिसे बोले—'कहिये।' तब मुनिने केशवसे कहा—'मेरी बात सुनिये; श्रीमान् राजा अम्बरीष आपके भक्त हैं। श्रीमती नामसे विख्यात उनकी विशाल नेत्रोंवाली पुत्री है। मैं उससे विवाह करनेका इच्छुक हूँ। मैं वहाँ गया था। मेरा वचन सुनिये। आपके भक्त तपोनिधि श्रीमान् ये जो पर्वतमुनि हैं, वे भी उसे चाहते हैं। हे भगवन्! महातेजस्वी राजा अम्बरीषने हम दोनोंसे कहा कि यह कन्या आप दोनोंमेंसे जिस सौन्दर्यसम्पन्नका पतिरूपमें वरण करेगी, उसे मैं कन्या अर्पण कर दूँगा।' जब राजाने हम दोनोंसे ऐसा कहा, तब 'ठीक है; हे राजन्! मैं आपके घर कल प्रातःकाल आऊँगा'—ऐसा कहकर मैं यहाँ आ गया। 'हे जगन्नाथ! अब मैं आपके पास आ गया हूँ; आप मेरा प्रिय कार्य कर दें। हे जगन्नाथ! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो जिस भी प्रकारसे पर्वतका मुख वानरके मुखके समान हो जाय, वैसा आप कर दें'॥ ६७–७३॥ |
| तथेत्युक्त्वा स गोविन्दः प्रहस्य मधुसूदनः।<br>त्वयोक्तं च करिष्यामि गच्छ सौम्य यथागतम्॥ ७४ | तब मुसकराकर भगवान् मधुसूदनने 'ठीक है'—ऐसा कहकर [मुनि नारदसे] कहा—हे सौम्य! आपने |