श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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एवमुक्त्वा मुनिर्हृष्टः प्रणिपत्य जनार्दनम्।
मन्यमानः कृतात्मानं तथायोध्यां जगाम सः॥ ७५
गते मुनिवरे तस्मिन् पर्वतोऽपि महामुनिः।
प्रणम्य माधवं हृष्टो रहस्येनमुवाच ह॥ ७६
वृत्तं तस्य निवेद्याग्रे नारदस्य जगत्पतेः।
गोलाङ्गूलमुखं यद्वन्मुखं भाति तथा कुरु॥ ७७
तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुस्त्वयोक्तं च करोमि वै।
गच्छ शीघ्रमयोध्यां वै मा वेदीर्नारदस्य वै॥ ७८
त्वया मे संविदं तत्र तथेत्युक्त्वा जगाम सः।
ततो राजा समाज्ञाय प्राप्तौ मुनिवरौ तदा॥ ७९
माङ्गल्यैर्विविधैः सर्वामयोध्यां ध्वजमालिनीम्।
मण्डयामास पुष्पैश्च लाजैश्चैव समन्ततः॥ ८०
अम्बुसिक्तगृहद्वारां सिक्तापपणमहापथाम्।
दिव्यगन्धरसोपेतां धूपितां दिव्यधूपकैः॥ ८१
कृत्वा च नगरीं राजा मण्डयामास तां सभाम्।
दिव्यैर्गन्धैस्तथा धूपै रत्नैश्र्च विविधैस्तथा॥ ८२
अलङ्कृतां मणिस्तम्भैर्नानामाल्यापशोभिताम्।
पराध्र्यास्तरणोपेतैर्दिव्यैर्भद्रासनैर्वृताम् ॥ ८३
कृत्वा नृपेन्द्रस्तां कन्यां ह्यादाय प्रविवेश ह।
सर्वाभरणसम्पन्नां श्रीरिवायतलोचनाम्॥ ८४
करसम्मितमध्याङ्गीं पञ्चस्निग्धां शुभाननाम्।
स्त्रीभिः परिवृतां दिव्यां श्रीमतीं संश्रितां तदा॥ ८५
जो कहा है, उसे मैं करूँगा; अब आप जैसे आये थे, वैसे ही चले जाइये॥ ७४॥
[भगवान्के] ऐसा कहनेपर वे मुनि प्रसन्नतापूर्वक जनार्दनको प्रणाम करके अपनेको धन्य मानते हुए वहाँसे अयोध्या चले गये॥ ७५॥
तत्पश्चात् उन मुनिश्रेष्ठके चले जानेपर महामुनि पर्वतने भी [वहाँ पहुँचकर] भगवान् माधवको प्रणाम करके उन [राजा अम्बरीष]-का सारा वृत्तान्त उनके सम्मुख एकान्तमें कहकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा— हे जगत्पते! नारदका मुख लंगूरके मुखकी भाँति लगने लगे, वैसा आप कर दें॥ ७६-७७॥
यह सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—'आपके द्वारा कही गयी बात मैं अवश्य करूँगा, अब आप शीघ्र ही अयोध्या जाइये; किंतु आपके साथ मेरे इस वार्तालापके विषयमें नारदसे वहाँ मत कहियेगा। तब 'ठीक है'— ऐसा कहकर वे [पर्वतमुनि] चले गये॥ ७८ १/२॥
तदनन्तर राजाने उन दोनों मुनिवरोंको आया हुआ जानकर अनेक प्रकारके मांगलिक पदार्थों, पुष्पों तथा लाजा (लावा) आदिके द्वारा एवं ध्वजा-तोरण आदि लगवाकर चारों ओरसे सम्पूर्ण अयोध्याको सजाया। भवनोंके द्वारोंको जलसे सिक्त करके, बाजारों तथा मार्गोंपर जलका छिड़काव कराकर, नगरीको दिव्य गन्ध, रस आदिसे युक्त तथा सुगन्धित धूपोंसे धूपित करके राजाने सम्पूर्ण अयोध्याको मण्डित किया। तदनन्तर राजाने उस स्वयंवर-सभाको विविध प्रकारके दिव्य गन्धों, धूपों तथा रत्नोंसे अलंकृत; मणिनिर्मित स्तम्भों तथा अनेकविध मालाओंसे सुशोभित एवं बहुमूल्य आस्तरणोंसे युक्त दिव्य सिंहासनोंसे आवृत करनेके पश्चात् सभी प्रकारके आभरणोंसे सुसज्जित, लक्ष्मीके समान विशाल नेत्रोंवाली, कृशोदरी, हाथ आदि पाँच अंगोंमें कोमलता धारण करनेवाली, मनोहर मुखमण्डलवाली और अनेक स्त्रियोंसे घिरी तथा संश्रित (सहारा देकर ले जायी जाती हुई) कन्या श्रीमतीको साथमें लेकर उस सभामें प्रवेश किया॥ ७९-८५॥