भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५९४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| रेखाङ्कितकटिग्रीवं रक्तान्तायतलोचनम्।<br>नम्रचापानुकरणपटुभ्रूयुगशोभितम् ॥ ९९<br><br>विभक्तत्रिवलीव्यक्तं नाभिव्यक्तशुभोदरम्।<br>हिरण्याम्बरसंवीतं तुङ्गरत्ननखं शुभम्।<br>पद्माकारकरं त्वेनं पद्मास्यं पद्मलोचनम्॥ १००<br><br>सुनासं पद्महृदयं पद्मनाभं श्रिया वृतम्।<br>दन्तपङ्क्तिभिरत्यर्थं कुन्दकुड्मलसन्निभैः॥ १०१<br><br>हसन्तं मां समालोक्य दक्षिणं च प्रसार्य वै।<br>पाणिं स्थितममुं तत्र पश्यामि शुभमूर्धजम् ॥ १०२ | कान्तिवाले, लम्बी भुजाओंवाले, विशाल नेत्रोंवाले, उन्नत तथा उत्तम वक्षःस्थलवाले, रेखायुक्त कटिप्रदेश तथा ग्रीवावाले, रक्त प्रान्तभागसे युक्त विशाल नेत्रोंवाले, झुके हुए धनुषके सदृश टेढ़ी भौंहोंसे सुशोभित, [उदरदेशमें] पृथक्-पृथक् तीन वलियोंसे समन्वित, स्पष्ट नाभिसे युक्त सुन्दर उदरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, उन्नत तथा रत्नकी आभासे युक्त नखवाले, मनोहर कमलके आकारसदृश हाथोंवाले, कमलके समान मुख तथा नेत्रोंवाले, सुन्दर नासिकावाले, पद्मसद्श हृदयदेशवाले, पद्मके समान नाभिवाले, कान्तिमान्, कुन्द-कलीके समान दन्त-पंक्तियोंसे सुशोभित, सुन्दर केशोंवाले और मुझको देखकर मेरी ओर दाहिना हाथ फैलाकर हँसते हुए वहाँपर विराजमान इस [अन्य व्यक्ति]-को देख रही हूँ॥ ९६—१०२॥ | | सम्भ्रान्तमानसां तत्र वेपतीं कदलीमिव।<br>स्थितां तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि॥ १०३ | तब कदलीकी भाँति काँपते हुए वहाँपर खड़ी उस व्याकुल मनवाली कन्यासे राजाने कहा—हे वत्से! अब तुम क्या करोगी?॥ १०३॥ | | एवमुक्ते मुनिः प्राह नारदः संशयं गतः।<br>कियन्तो बाहवस्तस्य कन्ये ब्रूहि यथातथम् ॥ १०४<br><br>बाहुद्वयं च पश्यामीत्याह कन्या शुचिस्मिता।<br>प्राह तां पर्वतस्तत्र तस्य वक्षःस्थले शुभे॥ १०५<br><br>किं पश्यसि च मे ब्रूहि करे किं वास्य पश्यसि।<br>कन्या तमाह मालां वै पञ्चरूपामनुत्तमाम्॥ १०६<br><br>वक्षःस्थलेऽस्य पश्यामि करे कार्मुकसायकान्। | उसके ऐसा कहनेपर सन्देहमें पड़े नारदमुनिने कहा—हे कन्ये! उसकी कितनी भुजाएँ हैं; सही-सही बताओ। तब पवित्र मुसकानवाली उस कन्याने कहा—मैं [उसके] दो हाथ देख रही हूँ। इसके बाद पर्वतने उससे कहा—हे शुभे! तुम उसके वक्षःस्थलपर क्या देख रही हो और उसके [बायें] हाथमें क्या देख रही हो; मुझे बताओ। इसपर कन्या उनसे बोली—मैं उसके वक्षःस्थलपर सर्वश्रेष्ठ पंचरूप माला तथा हाथमें धनुष-बाण देख रही हूँ॥ १०४—१०६ १/२॥ | | एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ परस्परमनुत्तमौ ॥ १०७<br><br>मनसा चिन्तयन्तौ तौ मायेयं कस्यचिद्भवेत्।<br>मायावी तस्करो नूनं स्वयमेव जनार्दनः॥ १०८<br><br>आगतो न यथा कुर्यात्कथमस्मन्मुखं त्विदम्।<br>गोलाङ्गूलत्वमित्येवं चिन्तयामास नारदः॥ १०९<br><br>पर्वतोऽपि यथान्यायं वानरत्वं कथं मम।<br>प्राप्तमित्येव मनसा चिन्तामापेदिवांस्तथा॥ ११० | उसके द्वारा इस प्रकार कहे गये वे दोनों उत्तम मुनिश्रेष्ठ मनमें सोचते हुए परस्पर कहने लगे कि यह किसीकी माया हो सकती है। लगता है मायावी तथा तस्कर स्वयं जनार्दन ही [कन्या प्राप्त करनेके लिये] निश्चितरूपसे यहाँ आया हुआ है; यदि ऐसा न होता, तो मेरा यह मुख लंगूरके मुखके समान वह क्यों करता?—ऐसा नारदजी सोचने लगे। इसी प्रकार पर्वतमुनि भी मनमें चिन्ता करने लगे कि मुझे यह वानरत्व कैसे प्राप्त हो गया?॥ १०७—११०॥ |