भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ५ ]विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान५१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततो राजा प्रणम्यासौ नारदं पर्वतं तथा।<br>भवद्भ्यां किमिदं तत्र कृतं बुद्धिविमोहजम्॥ १११<br>स्वस्थौ भवन्तौ तिष्ठेतां यथा कन्यार्थमुद्यतौ।<br>एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ नृपमूचतुरुल्बणौ॥ ११२तदनन्तर राजाने नारद तथा पर्वतको प्रणाम करके कहा—आप दोनोंने बुद्धि-विमोह उत्पन्न करनेवाला यह क्या कर दिया ? कन्याको प्राप्त करनेके लिये तत्पर आप दोनों अब शान्तचित्त होकर बैठिये॥ १११ १/२॥
त्वमेव मोहं कुरुषे नावामिह कथञ्चन।<br>आवयोरेकमेषा ते वरयत्वेव मा चिरम्॥ ११३राजाके ऐसा कहनेपर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ कुपित होकर बोले—आप ही मोह कर रहे हैं; हम दोनों बिलकुल नहीं। आपकी यह पुत्री अब हम दोनोंमेंसे किसी एकका अविलम्ब वरण कर ले॥ ११२-११३॥
ततः सा कन्यका भूयः प्रणिपत्येष्टदेवताम्।<br>मायामादाय तिष्ठन्तं तयोर्मध्ये समाहितम्॥ ११४<br>सर्वाभरणसंयुक्तमतसीपुष्पसन्निभम् ।<br>दीर्घबाहुं सुपुष्टाङ्गं कर्णान्तायतलोचनम्॥ ११५<br>पूर्ववत्पुरुषं दृष्ट्वा मालां तस्मै ददौ हि सा।<br>अनन्तरं हि सा कन्या न दृष्टा मनुजैः पुनः॥ ११६तत्पश्चात् अपने इष्ट देवताको प्रणाम करके माला लेकर वह उठी और उसने उन दोनोंके बीचमें समाहितचित्त होकर बैठे हुए, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, अतसीपुष्पके समान श्याम वर्णवाले, लम्बी भुजाओंवाले, पुष्ट अंगोंवाले तथा कर्णपर्यन्त विशाल नेत्रोंवाले पूर्वसदृश पुरुषको देखकर उसे माला पहना दी। इसके बाद पुनः [वहाँ उपस्थित] मनुष्योंने उस कन्याको नहीं देखा॥ ११४-११६॥
ततो नादः समभवत् किमेतदिति विस्मितौ।<br>तामादाय गतो विष्णुः स्वस्थानं पुरुषोत्तमः॥ ११७<br>पुरा तदर्थमनिशं तपस्तप्त्वा वराङ्गना।<br>श्रीमती सा समुत्पन्ना सा गता च तथा हरिम्॥ ११८तब वे दोनों मुनि आश्चर्यचकित हो गये कि यह क्या हुआ ? इसके बाद वहाँ [लोगोंके बीच] यह ध्वनि होने लगी कि उसे लेकर पुरुषोत्तम श्रीविष्णु अपने लोकको चले गये। पूर्वजन्ममें उस सुन्दर युवतीने उन भगवान्के लिये निरन्तर तप करके [इस जन्ममें] 'श्रीमती' नामवाली कन्याके रूपमें जन्म लिया और फिर वह श्रीविष्णुको प्राप्त हुई॥ ११७-११८॥
तावुभौ मुनिशार्दूलौ धिक्कृतावतिदुःखितौ।<br>वासुदेवं प्रति तदा जग्मतुर्भवनं हरेः॥ ११९तत्पश्चात् [उस श्रीमतीके द्वारा] तिरस्कृत किये गये वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वासुदेव श्रीविष्णुके प्रति अत्यन्त दुःखित होकर उन श्रीहरिके भवन पहुँचे॥ ११९॥
तावागतौ समीक्ष्याह श्रीमतीं भगवान् हरिः।<br>मुनिश्रेष्ठौ समायातौ गूहस्वात्मानमत्र वै॥ १२०उन दोनोंको आया हुआ देखकर भगवान् श्रीहरिने श्रीमतीसे कहा कि मुनिश्रेष्ठ [नारद तथा पर्वत] आये हैं, अतः तुम अपनेको यहाँ छिपा लो॥ १२०॥
तथेत्युक्त्वा च सा देवी प्रहसन्ती चकार ह।<br>नारदः प्रणिपत्याग्रे प्राह दामोदरं हरिम्॥ १२१इस पर 'ठीक है'—ऐसा कहकर उस देवीने हँसते हुए वैसा कर दिया। तब सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके नारदने दामोदर श्रीहरिसे कहा—आपने मेरा तथा पर्वतका प्रिय कार्य तो आज कर दिया; हे गोविन्द! हे
प्रियं हि कृतवानद्य मम त्वं पर्वतस्य हि।<br>त्वमेव नूनं गोविन्द कन्यां तां हृतवानसि॥ १२२सुरश्रेष्ठ! अपनी बुद्धिसे हम दोनोंको धोखा देकर तथा विमोहित करके स्वयं आपने ही उस कन्याका हरण
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