भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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५९६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विमोहावां स्वयं बुद्ध्या प्रतार्य सुरसत्तम।<br>इत्युक्तः पुरुषो विष्णुः पिधाय श्रोत्रमच्युत।<br>पाणिभ्यां प्राह भगवान् भवद्भ्यां किमुदीरितम्॥ १२३किया है॥ १२१-१२२ १/२॥<br>उनके ऐसा कहनेपर परम पुरुष अच्युत भगवान् विष्णुने दोनों हाथोंसे अपने कान बन्द करके कहा—आप दोनोंने यह क्या कह दिया! अहो, यह तो वासनामय भाव है, जबकि आपलोग मुनिवृत्तिवाले हैं॥ १२३ १/२॥
कामवानपि भावोऽयं मुनिवृत्तिरहो किल।<br>एवमुक्तो मुनिः प्राह वासुदेवं स नारदः॥ १२४<br><br>कर्णमूले मम कथं गोलांगूलमुखं त्विति।<br>कर्णमूले तमाहेदं वानरत्वं कृतं मया॥ १२५<br><br>पर्वतस्य मया विद्वन् गोलांगूलमुखं तव।<br>मया तव कृतं तत्र प्रियार्थं नान्यथा त्विति॥ १२६[भगवान्के द्वारा] इस प्रकार कहे गये उन नारद मुनिने वासुदेवसे उनके कर्णमूलमें कहा—आपने मेरा मुख लंगूरके मुखके समान क्यों कर दिया? तब भगवान् उनके कर्णमूलमें बोले—हे विद्वन्! मैंने ही पर्वतका मुख वानर-जैसा और आपका मुख लंगूर-जैसा कर दिया था; यह सब मैंने आपके हितके लिये ही किया था, इसके विपरीत नहीं॥ १२४—१२६॥
पर्वतोऽपि तथा प्राह तस्याप्येवं जगाद सः।<br>शृण्वतोरुभयोस्तत्र प्राह दामोदरो वचः॥ १२७पर्वतने भी वही पूछा; तब उन विष्णुने उनसे भी वैसा ही कहा। इसके बाद भगवान् दामोदर श्रवण कर रहे उन दोनोंके समक्ष यह वचन बोले—मैं शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ कि मैंने आप दोनोंका हित ही किया है॥ १२७ १/२॥
प्रियं भवद्भ्यां कृतवान् सत्येनात्मानमालभे।<br>नारदः प्राह धर्मात्मा आवयोर्मध्यतः स्थितः॥ १२८तत्पश्चात् धर्मात्मा नारदने कहा—हम दोनोंके मध्यमें स्थित वह कौन धनुर्धारी पुरुष था, जो उस कन्याका हरण करके चला गया था?॥ १२८ १/२॥
धनुष्मान् पुरुषः कोऽत्र तां हृत्वा गतवान् किल।<br>तच्छ्रुत्वा वासुदेवोऽसौ प्राह तौ मुनिसत्तमौ॥ १२९<br><br>मायाविनो महात्मनो बहवः सन्ति सत्तमाः।<br>तत्र सा श्रीमती नूनमदृष्ट्वा मुनिसत्तमौ॥ १३०<br><br>चक्रपाणिरहं नित्यं चतुर्बाहुरिति स्थितः।<br>तां तथा नाहमैच्छं वै भवद्भ्यां विदितं हि तत्॥ १३१यह सुनकर वासुदेवने उन मुनिवरोंसे कहा—'बहुतसे श्रेष्ठ महात्मा लोग भी मायावी हैं। वहाँ निश्चित ही श्रीमतीने आप दोनों ऋषिसत्तमोंको देखकर ही अन्यका वरण किया होगा। मैं हाथमें चक्र धारण किये चार भुजाओंसे युक्त होकर स्थित रहता हूँ, यह तो आप दोनोंको विदित ही है; मैंने उसे प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं की है'॥ १२९—१३१॥
इत्युक्तौ प्रणिपत्यैनमूचतुः प्रीतिमानसौ।<br>कोऽत्र दोषस्तव विभो नारायण जगत्पते॥ १३२भगवान्ने जब उनसे ऐसा कहा, तब उन दोनोंने प्रसन्न-चित्त होकर उन्हें प्रणाम करके कहा—हे विभो! हे नारायण! हे जगत्पते! इसमें आपका क्या दोष है; इसमें उस राजाकी ही धृष्टता है, उसीने यह माया रची है॥ १३२ १/२॥
दौरात्म्यं तन्नृपस्यैव मायां हि कृतवानसौ।<br>इत्युक्त्वा जग्मतुस्तस्मान्मुनी नारदपर्वतौ॥ १३३<br><br>अम्बरीषं समासाद्य शापेनैनमयोजयत्।<br>नारदः पर्वतश्चैव यस्मादावामिहागतौ॥ १३४ऐसा कहकर वे दोनों मुनि नारद तथा पर्वत वहाँसे चल पड़े। अम्बरीषके यहाँ आकर नारद तथा पर्वतने उन्हें शाप दे दिया। हम दोनों आये थे, फिर भी उसके बादमें