श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ५ ] | विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान | ५१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आहूय पश्चादन्यस्मै कन्यां त्वं दत्तवानसि।<br>मायायोगेन तस्मात्त्वां तमो ह्यभिभविष्यति ॥ १३५<br><br>तेन चात्मानमत्यर्थं यथावत्त्वं न वेत्स्यसि।<br>एवं शापे प्रदत्ते तु तमोराशिरथोत्थितः ॥ १३६<br><br>नृपं प्रति ततश्चक्रं विष्णोः प्रादुर्भूत् क्षणात्।<br>चक्रवित्रासितं घोरं तावुभौ तम अभ्यगात् ॥ १३७ | किसी अन्यको बुलाकर आपने माया रचकर उसे अपनी कन्या दे दी है, अतः तमोगुण आपको आक्रान्त कर लेगा; इसके परिणामस्वरूप आप अपनी आत्माको यथार्थरूपमें बिलकुल नहीं जान पायेंगे॥ १३३—१३५ १/२ ॥<br><br>[मुनियोंके द्वारा] यह शाप दे दिये जानेपर एक अन्धकारपुंज उत्पन्न हुआ और राजाकी ओर बढ़ा; तब उसी क्षण भगवान् विष्णुका चक्र प्रकट हो गया। उस चक्रके द्वारा त्रस्त किया गया वह अन्धकारपुंज अब उन मुनियोंकी ओर चल पड़ा॥ १३६-१३७॥ |
| ततः सन्तप्तसर्वाङ्गौ धावमानौ महामुनी।<br>पृष्ठतश्चक्रमालोक्य तमोराशिं दुरासदम् ॥ १३८<br><br>कन्यासिद्धिर्हो प्राप्ता ह्यावयोरिति वेगतौ।<br>लोकालोकान्तमनिशं धावमानौ भयार्दितौ ॥ १३९<br><br>त्राहि त्राहीति गोविन्दं भाषमाणौ भयार्दितौ।<br>विष्णुलोकं ततो गत्वा नारायण जगत्पते ॥ १४०<br><br>वासुदेव हृषीकेश पद्मनाभ जनार्दन।<br>त्राह्वावां पुण्डरीकाक्ष नाथोऽसि पुरुषोत्तम ॥ १४१ | तत्पश्चात् सन्तप्त अंगोंवाले भागते हुए वे दोनों महामुनि अपने पीछे उस चक्र तथा भयानक अन्धकार-पुंजको देखकर कहने लगे—'अहो, हम दोनोंने शीघ्र ही कन्यासिद्धि प्राप्त कर ली।' भयभीत होकर लोकलोकान्तरमें निरन्तर दौड़ते हुए और 'त्राहि-त्राहि'—ऐसा पुकारते हुए विष्णुलोक जाकर गोविन्दसे बोले—हे नारायण ! हे जगत्पते ! हे वासुदेव ! हे हृषीकेश ! हे पद्मनाभ ! हे जनार्दन ! हे पुण्डरीकाक्ष ! हे पुरुषोत्तम ! आप [सबके] स्वामी हैं; हम दोनोंकी रक्षा कीजिये ॥ १३८-१४१॥ |
| ततो नारायणश्चिन्त्य श्रीमाञ्छ्रीवत्सलाञ्छनः।<br>निवार्य चक्रं ध्वान्तं च भक्तानुग्रहकाम्यया ॥ १४२<br><br>अम्बरीषश्च मद्भक्तस्तथैतौ मुनिसत्तमौ।<br>अनयोरस्य च तथा हितं कार्यं मयाधुना ॥ १४३<br><br>आहूय तन्तमः श्रीमान् गिरा प्रह्लादयन् हरिः।<br>प्रोवाच भगवान् विष्णुः शृणुतां मे इदं वचः ॥ १४४ | अम्बरीष मेरा भक्त है और वैसे ही ये दोनों मुनिश्रेष्ठ भी मेरे भक्त हैं, अतः इस [अम्बरीष]-का तथा इन दोनों [मुनियों]-का इस समय मुझे हित करना चाहिये—यह सोच करके भक्तोंपर कृपा करनेकी अभिलाषासे ऐश्वर्यसम्पन्न वक्षःस्थलपर श्रीवत्स चिह्न धारण करनेवाले, नारायण, श्रीहरि भगवान् विष्णुने चक्र तथा तमोराशिका निवारण करके उस अन्धकारको बुलाकर वाणीसे उसे प्रसन्न करते हुए बोले—मेरी यह बात सुनो, यह ऋषिका |
| ऋषिशापो न चैवासीदन्यथा च वरो मम।<br>दत्तो नृपाय रक्षार्थं नास्ति तस्यान्यथा पुनः ॥ १४५<br><br>अम्बरीषस्य पुत्रस्य नप्तुः पुत्रो महायशाः।<br>श्रीमान् दशरथो नाम राजा भवति धार्मिकः ॥ १४६<br><br>तस्याहमग्रजः पुत्रो रामनामा भविष्याम्यहम्।<br>तत्र मे दक्षिणो बाहुर्भरतो नाम वै भवेत् ॥ १४७<br><br>शत्रुघ्नो नाम सव्यश्च शेषोऽसौ लक्ष्मणः स्मृतः।<br>तत्र मां समुपागच्छ गच्छेदानीं नृपं विना ॥ १४८ | शाप नहीं था, अपितु मेरा वरदान ही था, जिसे राजाकी रक्षाके लिये मैंने उन्हें प्रदान किया था; इसके विपरीत और कुछ भी नहीं है। इन राजा अम्बरीषके पुत्रके नातीके पुत्र महायशस्वी तथा ऐश्वर्यशाली 'दशरथ' नामक धर्मात्मा राजा होंगे। मैं उन्हींके 'राम' नामक ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा। मेरा दाहिना हाथ उस समय भरत नामसे और बायाँ हाथ शत्रुघ्न नामसे प्रकट होंगे और ये शेषनाग लक्ष्मणके रूपमें प्रसिद्ध होंगे। उस समय तुम मेरे पास |