श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६] भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव ६०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विशेषाद्देवदेवस्य विष्णोर्निन्दरतात्मनाम्।<br>सभार्यो मुनिशार्दूलः सैषा ज्येष्ठा इति स्मृता॥ ७६<br>दुःसहस्तामुवाचेदं तडागाश्रममन्तरे।<br>आस्व त्वमत्र चाहं वै प्रवेक्ष्यामि रसातलम्॥ ७७<br>आवयोः स्थानमालोक्य निवासार्थं ततः पुनः।<br>आगमिष्यामि ते पार्श्वमित्युक्ता तमुवाच सा॥ ७८<br>किमश्नामि महाभाग को मे दास्यति वै बलिम्।<br>इत्युक्तस्तां मुनिः प्राह याः स्त्रियस्त्वां यजन्ति वै॥ ७९ | करके देवोंके भी देव विष्णुकी निन्दामें लगे रहनेवाले लोगोंके यहाँ वे मुनिश्रेष्ठ दुःसह अपनी भार्यासहित पहुँचे। किसी समय [एक तड़ाग देखकर] दुःसहमुनिने ये जो ज्येष्ठा नामसे कही गयी हैं, उनसे यह कहा—तुम इस तड़ागके तटपर आश्रममें स्थित पीपलवृक्षमें रहो; मैं रसातलमें प्रवेश करूँगा। अपने दोनोंके निवासयोग्य स्थान देखकर मैं तुम्हारे पास पुनः आ जाऊँगा। उनके ऐसा कहनेपर उस (ज्येष्ठा)-ने उनसे कहा—हे महाभाग! मैं क्या खाऊँगी; मुझे कौन बलि प्रदान करेगा?॥ ७४—७८ १/२॥ |
| बलिभिः पुष्पधूपैश्च न तासां च गृहं विश।<br>इत्युक्त्वा त्वाविशत्तत्र पातालं बिलयोगतः॥ ८० | उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उससे कहा—जो स्त्रियाँ बलियों (भोज्यपदार्थों) तथा पुष्प-धूपसे तुम्हारा पूजन करती हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश मत करना॥ ७९ १/२॥ |
| अद्यापि च विनिर्मग्नो मुनिः स जलसंस्तरे।<br>ग्रामपर्वतबाह्येषु नित्यमास्तेऽशुभा पुनः॥ ८१ | ऐसा कहकर वे बिल-मार्गसे पातालमें प्रविष्ट हुए। वे मुनि आज भी उस जलसंस्तरमें निमग्न हैं और वह अशुभा अलक्ष्मी ग्राम, पर्वत आदि बाह्य स्थानोंमें रह रही है॥ ८०-८१॥ |
| प्रसङ्गाद्देवदेवेशो विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः।<br>लक्ष्म्या दृष्टस्तया लक्ष्मीः सा तमाह जनार्दनम्॥ ८२<br>भर्ता गतो महाबाहो बिलं त्यक्त्वा स मां प्रभो।<br>अनाथाऽहं जगन्नाथ वृत्तिं देहि नमोऽस्तु ते॥ ८३ | संयोगवश किसी समय उस अलक्ष्मीने देवोंके भी देवेश तथा तीनों लोकोंके स्वामी विष्णुको लक्ष्मीके साथ देख लिया; तब अलक्ष्मीने उन जनार्दनसे कहा—हे प्रभो! हे महाबाहो! मेरे पति मुझे छोड़कर इस बिलमें प्रविष्ट हो गये हैं। हे जगन्नाथ! मैं अनाथ हूँ, अतः आप मुझे आजीविका प्रदान करें; आपको नमस्कार है॥ ८२-८३॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तो भगवान् विष्णुः प्रहस्याह जनार्दनः।<br>ज्येष्ठामलक्ष्मीं देवेशो माधवो मधुसूदनः॥ ८४ | सूतजी बोले—[ज्येष्ठाके द्वारा] ऐसा कहे गये जनार्दन, देवेश्वर, माधव तथा मधुसूदन भगवान् विष्णु उस ज्येष्ठा अलक्ष्मीसे हँसकर कहने लगे॥ ८४॥ |
| श्रीविष्णुरुवाच<br>ये रुद्रमनघं शर्वं शङ्करं नीललोहितम्।<br>अम्बां हैमवतीं वापि जनित्रीं जगतामपि॥ ८५<br>मद्भक्तान्निन्दयन्त्यत्र तेषां वित्तं तवैव हि।<br>येऽपि चैव महादेवं विनिन्द्यैव यजन्ति माम्॥ ८६ | **श्रीविष्णु बोले—**जो लोग अनघ, शर्व, शंकर, नीललोहित भगवान् रुद्र तथा [समस्त] लोकोंको उत्पन्न करनेवाली माता पार्वतीकी और मेरे भक्तोंकी निन्दा करते हैं, उनका धन तुम्हारा ही है। जो लोग महादेवकी निन्दा करके मेरा पूजन करते हैं, मेरे वे भक्त निश्चय ही अज्ञानी |
| मूढा ह्यभाग्या मद्भक्ता अपि तेषां धनं तव।<br>यस्याज्ञया ह्यहं ब्रह्मा प्रसादाद्वर्तते सदा॥ ८७<br>ये यजन्ति विनिन्द्यैव मम विद्वेषकारकाः।<br>मद्भक्ता नैव ते भक्ता इव वर्तन्ति दुर्मदाः॥ ८८ | तथा अभागे हैं; उनका भी धन तुम्हारा है। जिनकी आज्ञासे तथा कृपासे मैं (विष्णु) तथा ब्रह्मा सदा क्रियाशील रहते हैं, उनका तिरस्कार करके जो लोग मेरा पूजन करते हैं, वे मेरे विद्वेषी हैं; वे मेरे भक्त बिलकुल नहीं हैं, अपितु |