श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| तेषां गृहं धनं क्षेत्रमिष्टापूर्तं तथैव हि। | वे मदोन्मत्त हैं और मेरा भक्त होनेका पाखण्ड करते हैं, उनका भी घर, धन, खेत तथा इष्टापूर्त (यज्ञ आदि तथा तालाब, कुआँ खुदवानेका पुण्य कार्य) सब कुछ तुम्हारा है॥ ८५-८८ १/२॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तां परित्यज्य लक्ष्म्यालक्ष्मीं जनार्दनः ॥ ८९<br><br>जजाप भगवान् रुद्रमलक्ष्मीक्षयसिद्धये।<br>तस्मात्प्रदेयस्तस्यै च बलिर्नित्यं मुनीश्वराः ॥ ९०<br><br>विष्णुभक्तैर्न सन्देहः सर्वयत्नेन सर्वदा।<br>अङ्गनाभिः सदा पूज्या बलिभिर्विविधैर्द्विजाः ॥ ९१ | **सूतजी बोले—**ऐसा कहकर उन अलक्ष्मीको विदा करके भगवान् जनार्दन अलक्ष्मीके क्षयकी सिद्धिके लिये लक्ष्मीके साथ रुद्रका जप करने लगे। अतः हे मुनीश्वरो! सभी विष्णुभक्तोंको चाहिये कि वे पूर्ण प्रयत्नसे उस अलक्ष्मीको नित्य-निरन्तर बलि प्रदान करें; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे द्विजो! सभी स्त्रियोंको अनेक प्रकारके बलि-उपचारोंसे सदा [ज्येष्ठा—अलक्ष्मीकी] पूजा करनी चाहिये॥ ८९-९१॥ | | यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्।<br>अलक्ष्मीवृत्तमनघो लक्ष्मीवाँल्लभते गतिम् ॥ ९२ | जो [मनुष्य] इस अलक्ष्मी-वृत्तान्तको पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है, वह पापरहित तथा लक्ष्मीवान् हो जाता है और [शुभ] गति प्राप्त करता है॥ ९२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अलक्ष्मीवृत्तं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अलक्ष्मीवृत्त' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा
| ऋषय ऊचुः<br>किं जपन्मुच्यते जन्तुः सर्वलोकभयादिभिः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम्॥ १<br>अलक्ष्मीं वाथ सन्त्यज्य गमिष्यति जपेन वै।<br>लक्ष्मीवासो भवेन्मर्त्यः सूत वक्तुमिहार्हसि॥ २ | **ऋषिगण बोले—**किस [मन्त्र] के जपसे प्राणी सम्पूर्ण सांसारिक भय आदिसे मुक्त हो जाता है और समस्त पापोंसे छूटकर परम गति प्राप्त करता है? किस जपके द्वारा मनुष्य अलक्ष्मीका त्याग करके लक्ष्मीयुक्त हो जाता है; हे सूतजी! यह सब आप बतायें॥ १-२॥ | | सूत उवाच<br>पुरा पितामहेनोक्तं वसिष्ठाय महात्मने।<br>वक्ष्ये सङ्क्षेपतः सर्वं सर्वलोकहिताय वै॥ ३<br>शृण्वन्तु वचनं सर्वे प्रणिपत्य जनार्दनम्।<br>देवदेवमजं विष्णुं कृष्णमच्युतमव्ययम्॥ ४<br>सर्वपापहरं शुद्धं मोक्षदं ब्रह्मवादिनम्।<br>मनसा कर्मणा वाचा यो विद्वान् पुण्यकर्मकृत्॥ ५ | **सूतजी बोले—**पूर्वकालमें पितामहने महात्मा वसिष्ठसे इस विषयमें जो बताया था, वह सब मैं सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये संक्षेपमें बताऊँगा। आप सभी लोग जनार्दन, देवाधिदेव, अजन्मा, कृष्ण, अच्युत, अव्यय, समस्त पापोंको दूर करनेवाले, विशुद्ध, मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा ब्रह्मवादी विष्णुको प्रणाम करके [मेरा] वचन सुनें॥ ३-४ १/२॥ |