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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

७- भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा

६०६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| तेषां गृहं धनं क्षेत्रमिष्टापूर्तं तथैव हि। | वे मदोन्मत्त हैं और मेरा भक्त होनेका पाखण्ड करते हैं, उनका भी घर, धन, खेत तथा इष्टापूर्त (यज्ञ आदि तथा तालाब, कुआँ खुदवानेका पुण्य कार्य) सब कुछ तुम्हारा है॥ ८५-८८ १/२॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तां परित्यज्य लक्ष्म्यालक्ष्मीं जनार्दनः ॥ ८९<br><br>जजाप भगवान् रुद्रमलक्ष्मीक्षयसिद्धये।<br>तस्मात्प्रदेयस्तस्यै च बलिर्नित्यं मुनीश्वराः ॥ ९०<br><br>विष्णुभक्तैर्न सन्देहः सर्वयत्नेन सर्वदा।<br>अङ्गनाभिः सदा पूज्या बलिभिर्विविधैर्द्विजाः ॥ ९१ | **सूतजी बोले—**ऐसा कहकर उन अलक्ष्मीको विदा करके भगवान् जनार्दन अलक्ष्मीके क्षयकी सिद्धिके लिये लक्ष्मीके साथ रुद्रका जप करने लगे। अतः हे मुनीश्वरो! सभी विष्णुभक्तोंको चाहिये कि वे पूर्ण प्रयत्नसे उस अलक्ष्मीको नित्य-निरन्तर बलि प्रदान करें; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे द्विजो! सभी स्त्रियोंको अनेक प्रकारके बलि-उपचारोंसे सदा [ज्येष्ठा—अलक्ष्मीकी] पूजा करनी चाहिये॥ ८९-९१॥ | | यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्।<br>अलक्ष्मीवृत्तमनघो लक्ष्मीवाँल्लभते गतिम् ॥ ९२ | जो [मनुष्य] इस अलक्ष्मी-वृत्तान्तको पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है, वह पापरहित तथा लक्ष्मीवान् हो जाता है और [शुभ] गति प्राप्त करता है॥ ९२॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अलक्ष्मीवृत्तं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अलक्ष्मीवृत्त' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥


सातवाँ अध्याय

भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा

| ऋषय ऊचुः<br>किं जपन्मुच्यते जन्तुः सर्वलोकभयादिभिः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम्॥ १<br>अलक्ष्मीं वाथ सन्त्यज्य गमिष्यति जपेन वै।<br>लक्ष्मीवासो भवेन्मर्त्यः सूत वक्तुमिहार्हसि॥ २ | **ऋषिगण बोले—**किस [मन्त्र] के जपसे प्राणी सम्पूर्ण सांसारिक भय आदिसे मुक्त हो जाता है और समस्त पापोंसे छूटकर परम गति प्राप्त करता है? किस जपके द्वारा मनुष्य अलक्ष्मीका त्याग करके लक्ष्मीयुक्त हो जाता है; हे सूतजी! यह सब आप बतायें॥ १-२॥ | | सूत उवाच<br>पुरा पितामहेनोक्तं वसिष्ठाय महात्मने।<br>वक्ष्ये सङ्क्षेपतः सर्वं सर्वलोकहिताय वै॥ ३<br>शृण्वन्तु वचनं सर्वे प्रणिपत्य जनार्दनम्।<br>देवदेवमजं विष्णुं कृष्णमच्युतमव्ययम्॥ ४<br>सर्वपापहरं शुद्धं मोक्षदं ब्रह्मवादिनम्।<br>मनसा कर्मणा वाचा यो विद्वान् पुण्यकर्मकृत्॥ ५ | **सूतजी बोले—**पूर्वकालमें पितामहने महात्मा वसिष्ठसे इस विषयमें जो बताया था, वह सब मैं सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये संक्षेपमें बताऊँगा। आप सभी लोग जनार्दन, देवाधिदेव, अजन्मा, कृष्ण, अच्युत, अव्यय, समस्त पापोंको दूर करनेवाले, विशुद्ध, मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा ब्रह्मवादी विष्णुको प्रणाम करके [मेरा] वचन सुनें॥ ३-४ १/२॥ |

अध्याय ७ ] भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा ६०७


| नारायणं जपेन्नित्यं प्रणम्य पुरुषोत्तमम्।<br>स्वपन्नारायणं देवं गच्छन्नारायणं तथा॥ ६<br>भुञ्जन्नारायणं विप्रास्तिष्ठञ्जाग्रत्सनातनम्।<br>उन्मिषन्निमिषन् वापि नमो नारायणेति वै॥ ७<br>भोज्यं पेयं च लेह्यं च नमो नारायणेति च।<br>अभिमन्त्र्य स्पृशन्भुङ्क्ते स याति परमां गतिम्॥ ८<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति च सतां गतिम्। | जो पुण्य कर्म करनेवाला विद्वान् मन-वचन-कर्मसे पुरुषोत्तमको प्रणाम करके 'नमो नारायणाय'—इस मन्त्रका जप करता है; सोते, जागते, चलते, बैठते, भोजन करते, आँखें खोलते तथा मूँदते नारायणका स्मरण करता है; भोज्य, पेय तथा लेह्य पदार्थका स्पर्श करते हुए 'नमो नारायणाय'—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसे ग्रहण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है और सभी पापोंसे मुक्त होकर सद्गति प्राप्त करता है॥ ५–८ १/२॥ | | अलक्ष्मीश्च मया प्रोक्ता पत्नी या दुःसहस्य च॥ ९<br>नारायणपदं श्रुत्वा गच्छत्येव न संशयः।<br>या लक्ष्मीर्देवदेवस्य हरेः कृष्णस्य वल्लभा॥ १०<br>गृहे क्षेत्रे तथावासे तनौ वसति सुव्रताः। | मुनि दुःसहकी पत्नी जो मेरे द्वारा अलक्ष्मी कही गयी है, वह 'नारायण' नामको सुनते ही वहाँसे भाग जाती है; इसमें संशय नहीं है और हे सुव्रतो! देवोंके भी देव भगवान् श्रीकृष्णकी प्रिया जो लक्ष्मी हैं, वे [उस मनुष्यके] घर, क्षेत्र, आवास तथा शरीरमें वास करती हैं॥ ९–१० १/२॥ | | आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः॥ ११<br>इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा।<br>किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तस्य बहुभिर्व्रतैः॥ १२<br>नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः।<br>तस्मात्सर्वेषु कालेषु नमो नारायणेति च॥ १३<br>जपेत् स याति विप्रेन्द्रा विष्णुलोकं सबान्धवः। | सभी शास्त्रोंका सम्यक् अनुशीलन करके और बार-बार विचार करके यही एक निश्चय किया गया है कि सदा नारायणका ही ध्यान करना चाहिये। अनेक मन्त्रों तथा व्रतोंसे उस मनुष्यको क्या प्रयोजन; क्योंकि यह 'नमो नारायणाय' मन्त्र सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। अतः हे विप्रेन्द्रो! जो सभी समय 'नमो नारायणाय' इस मन्त्रको जपता है, वह बन्धु-बान्धवोंसहित विष्णुलोकको प्राप्त होता है॥ ११–१३ १/२॥ | | अन्यच्च देवदेवस्य शृण्वन्तु मुनिसत्तमाः॥ १४<br>मन्त्रो मया पुराभ्यस्तः सर्ववेदार्थसाधकः।<br>द्वादशाक्षरसंयुक्तो द्वादशात्मा पुरातनः॥ १५<br>तस्यैवेह च माहात्म्यं सङ्क्षेपात्प्रवदामि वः। | हे मुनिश्रेष्ठो! अब आपलोग देवदेव भगवान् विष्णुके अन्य मन्त्रोंके माहात्म्यका श्रवण करें। मैंने पूर्वकालमें समस्त वेदार्थोंको सिद्ध करनेवाले, बारह वर्णोंसे युक्त, द्वादश आदित्यस्वरूप तथा सनातन मन्त्रका अभ्यास किया था; उसी मन्त्रका माहात्म्य मैं आपलोगोंको संक्षेपमें बता रहा हूँ॥ १४–१५ १/२॥ | | कश्चिद्द्विजो महाप्राज्ञस्तपस्तप्त्वा कथञ्चन॥ १६<br>पुत्रमेकं तयोत्पाद्य संस्कारैश्च यथाक्रमम्।<br>योजयित्वा यथाकालं कृतोपनयनं पुनः॥ १७<br>अध्यापयामास तदा स च नोवाच किञ्चन।<br>न जिह्वा स्पन्दते तस्य दुःखितोऽभूद् द्विजोत्तमः॥ १८ | किसी महामनीषी ब्राह्मणने तपस्या करके किसी तरह एक पुत्रको उत्पन्नकर क्रमानुसार उसके सभी संस्कार सम्पन्न किये; यथासमय उसके उपनयनके पश्चात् उस द्विजने उसे अध्ययन कराया, किन्तु वह कुछ भी नहीं |

६०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| वासुदेवेति नियतमैतरेयो वदत्यसौ।<br>पिता तस्य तथा चान्यां परिणीय यथाविधि॥ १९<br>पुत्रानुत्पादयामास तथैव विधिपूर्वकम्।<br>वेदानधीत्य सम्पन्ना बभूवुः सर्वसम्मताः॥ २०<br>ऐतरेयस्य सा माता दुःखिता शोकमूर्च्छिता। | बोल पाता था। उसकी जिह्वा किसी भी शब्दका उच्चारण नहीं करती थी, वह ऐतरेय नामक बालक केवल 'वासुदेवाय'—इस मन्त्रको निरन्तर बोलता था। इससे वह द्विजश्रेष्ठ बहुत दुःखित हुआ॥ १६–१८ १/२॥<br><br>तब उसके पिताने दूसरी स्त्रीसे विधानके साथ विवाह करके उससे विधिपूर्वक पुत्र उत्पन्न किये। वे पुत्र वेदोंका अध्ययन करके सबके मान्य तथा सम्पत्तियुक्त हो गये॥ १९-२०॥<br><br>ऐतरेयकी वह माता इससे अत्यन्त दुःखित तथा शोकाकुल होकर [उससे] बोली—'मेरी सौतके पुत्र सम्पन्न हैं तथा वेदवेदांगमें पारंगत हैं; वे ब्राह्मणोंसे पूजित होते हुए अपनी माताको आनन्दित करते हैं। एक तुम हो जो मुझ अभागिनको उद्यमहीन पुत्र उत्पन्न हुए। अब तो मेरा मर जाना ही श्रेयस्कर है; जीवित रहना किसी भी तरह ठीक नहीं'॥ २१-२२ १/२॥ | | उवाच पुत्राः सम्पन्ना वेदवेदाङ्गपारगाः॥ २१<br>ब्राह्मणैः पूज्यमाना वै मोदयन्ति च मातरम्।<br>मम त्वं भाग्यहीनायाः पुत्रो जातो निराकृतिः॥ २२<br>ममात्र निधनं श्रेयो न कथञ्चन जीवितम्।<br>इत्युक्तः स च निर्गम्य यज्ञवाटं जगाम वै॥ २३<br>तस्मिन् याते द्विजानां तु न मन्त्राः प्रतिपेदिरे।<br>ऐतरेये स्थिते तत्र ब्राह्मणा मोहितास्तदा॥ २४<br>ततो वाणी समुद्भूता वासुदेवेति कीर्तनात्।<br>ऐतरेयस्य ते विप्राः प्रणिपत्य यथातथम्॥ २५<br>पूजां चक्रुस्ततो यज्ञं स्वयमेव समागतम्।<br>ततः समाप्य तं यज्ञमैतरेयो धनादिभिः॥ २६<br>सर्ववेदान् सदस्याह सषडङ्गान्स समाहितः।<br>तुष्टुवुश्च तथा विप्रा ब्रह्माद्याश्च तथा द्विजाः॥ २७<br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः। | [माताके द्वारा] ऐसा कहा गया वह ऐतरेय वहाँसे निकलकर यज्ञमण्डपमें गया। उसके पहुँचते ही [वहाँ उपस्थित] ऋत्विजोंको मन्त्र अवगत नहीं हुए। उस ऐतरेयके वहाँ स्थित रहनेपर सभी ब्राह्मण मोहित हो गये। तब वासुदेव इस नाम-मन्त्रके कीर्तनसे उसके मुखसे मन्त्रमयी वाणी निकलने लगी। [यह देखकर] उन विप्रोंने प्रणाम करके यथाविधि ऐतरेयका पूजन किया। तत्पश्चात् वहाँपर यज्ञदेव स्वयं ही उपस्थित हुए। तब उस यज्ञको पूर्ण करके उन विप्रोंके द्वारा वह ऐतरेय धन आदिसे सम्मानित किया गया। उसने एकनिष्ठ होकर छः अंगोंसहित सभी वेदोंका उस विप्रसभामें कथन किया। [तब हर्षित होकर] सभी ऋत्विज ब्राह्मण आदि तथा द्विजगण उसकी स्तुति करने लगे और सभी खेचर, सिद्ध एवं चारण उसके ऊपर पुष्प-वृष्टि करने लगे॥ २३–२७ १/२॥ | | एवं समाप्य वै यज्ञमैतरेयो द्विजोत्तमाः॥ २८<br>मातरं पूजयित्वा तु विष्णोः स्थानं जगाम ह।<br>एतद्वै कथितं सर्वं द्वादशाक्षरवैभवम्॥ २९<br>पठतां शृण्वतां नित्यं महापातकनाशनम्।<br>जपेद्यः पुरुषो नित्यं द्वादशाक्षरमव्ययम्॥ ३० | हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार यज्ञ सम्पन्न करके वह ऐतरेय अपनी माताकी पूजा करके विष्णुलोक चला गया। मैंने यह द्वादशाक्षर मन्त्रका महत्त्व आपलोगोंको बतला दिया। इसे पढ़ने तथा सुननेवालोंके महापापका नाश हो जाता है। जो मनुष्य इस अविनाशी द्वादशाक्षर |

८- शिवमन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धुमूखका शिवकी कृपासे शिवगणत्वको प्राप्त करना

अध्याय ८ ]शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धूमूकका शिवगणत्वको प्राप्त करना६०१

| स याति दिव्यमतुलं विष्णोस्तत्परमं पदम्।<br>अपि पापसमाचारो द्वादशाक्षरतत्परः ॥ ३१<br><br>प्राप्नोति परमं स्थानं नात्र कार्या विचारणा।<br>किं पुनर्ये स्वधर्मस्था वासुदेवपरायणाः ॥ ३२<br><br>दिव्यं स्थानं महात्मानः प्राप्नुवन्तीति सुव्रताः ॥ ३३ | मन्त्रका नित्य जप करता है, वह भगवान् विष्णुके अनुपम, दिव्य तथा परमपदको प्राप्त होता है। पाप करनेवाला भी यदि इस द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )-के जपमें तत्पर रहता है, तो वह परम पद प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये, तो फिर हे सुव्रतो! जो लोग अपने धर्ममें स्थित रहते हुए वासुदेवपरायण हैं, उनकी बात ही क्या; वे महात्मा तो दिव्य स्थान (विष्णुलोक) अवश्य प्राप्त करते हैं॥ २८-३३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे द्वादशाक्षरप्रशंसा नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'द्वादशाक्षरप्रशंसा' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥


आठवाँ अध्याय

शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धूमूकका शिवकी कृपासे शिवगणत्वको प्राप्त करना

सूत उवाचसूतजी बोले—
अष्टाक्षरो द्विजश्रेष्ठा नमो नारायणोति च।<br>द्वादशाक्षरमन्त्रश्च परमः परमात्मनः ॥ १<br>मन्त्रः षडक्षरो विप्राः सर्ववेदार्थसञ्चयः।<br>यश्चों नमः शिवायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ २<br>तथा शिवतरायेति दिव्यः पञ्चाक्षरः शुभः।<br>मयस्कराय चेत्येवं नमस्ते शङ्कराय च ॥ ३<br>सप्ताक्षरोऽयं रुद्रस्य प्रधानपुरुषस्य वै।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ ४हे द्विजश्रेष्ठो! 'ॐ नमो नारायणाय' यह अष्टाक्षर मन्त्र तथा द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )—ये परमात्माके श्रेष्ठ मन्त्र हैं। किंतु हे विप्रो! 'ॐ नमः शिवाय'—यह जो षडक्षर मन्त्र है, वह सभी वेदार्थोंका सारभूत है, उसी प्रकार 'शिवतराय' तथा 'मयस्कराय'—ये दिव्य तथा मंगलकारक पंचाक्षरमन्त्र सभी मनोरथोंको प्राप्त करानेवाले हैं और उसी तरह प्रधानपुरुष रुद्रका 'नमस्ते शङ्कराय'—यह सप्ताक्षर मन्त्र भी सभी मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है॥ १-३^{१}/_{२}॥
मन्त्रैरेतैर्द्विजश्रेष्ठा मुनयश्च यजन्ति तम्।<br>शङ्करं देवदेवेशं मयस्करमजोद्भवम् ॥ ५<br>शिवं च शङ्करं रुद्रं देवदेवमुमापतिम्।<br>प्राहुर्नमः शिवायेति नमस्ते शङ्कराय च ॥ ६<br>मयस्कराय रुद्राय तथा शिवतराय च।<br>जप्त्वा मुच्येत वै विप्रो ब्रह्महत्यादिभिः क्षणात् ॥ ७हे द्विजश्रेष्ठो! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रसहित सभी देवता, श्रेष्ठ द्विजगण एवं मुनिलोग इन मन्त्रोंसे उन शंकर, देवदेवेश, मयस्कर तथा अजोद्भव शिवका यजन करते हैं और उन्हीं शिवको शंकर, रुद्र, देवदेव तथा उमापति कहते हैं। नमः शिवाय, नमस्ते शङ्कराय, मयस्कराय, रुद्राय, शिवतराय—इन मन्त्रोंका जप करके विप्र ब्रह्महत्या आदि [महापातकों]-से क्षणभरमें मुक्त हो जाता है॥ ४-७॥
पुरा कश्चिदद्विजः शक्तो धुन्धूमूक इति श्रुतः।<br>आसीत्तृतीये त्रेतायामावर्ते च मनोः प्रभोः ॥ ८पूर्वकालमें प्रभु मनुके तीसरे आवर्त (चतुर्युग)-
६१०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| | के त्रेतायुगमें कोई धुन्धूमूक नामक सामर्थ्यसम्पन्न द्विज था॥ ८॥ | | मेघवाहनकल्पे वै ब्रह्मणः परमात्मनः।<br>मेघो भूत्वा महादेवं कृत्तिवासममीश्वरम्॥ ९<br><br>बहुमानेन वै रुद्रं देवदेवो जनार्दनः।<br>खिन्नोऽतिभाराद्रुद्रस्य निःश्वासोच्छ्वासवर्जितः॥ १०<br><br>विज्ञाप्य शितिकण्ठाय तपश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः।<br>तपसा परमैश्वर्यं बलं चैव तथाद्भुतम्॥ ११<br><br>लब्धवान् परमेशानाच्छङ्करात्परमात्मनः ।<br>तस्मात्कल्पस्तदा चासीन्मेघवाहनसंज्ञया॥ १२ | मेघवाहन कल्पमें परमात्मा शिवका मेघरूपी वाहन बनकर देवदेव जनार्दन विष्णुने अत्यन्त आदरके साथ उन महादेव कृत्तिवास (व्याघ्रचर्मधारी) ईश्वर रुद्रका वहन किया था। तब रुद्रके अत्यधिक भारसे पीड़ित होनेके कारण वे श्वास-उच्छ्वाससे रहित हो गये। इसके बाद उन कमलनयन विष्णुने शितिकण्ठ शिवको उद्देश्य करके तपस्या की और अपनी तपस्याके द्वारा परमेश्वर तथा परमात्मा शंकरसे परम ऐश्वर्य और अद्भुत बल प्राप्त किया। इसीलिये वह कल्प मेघवाहन नामसे विख्यात हुआ॥ ९–१२॥ | | तस्मिन् कल्पे मुनेः शापाद् धुन्धूमूकसमुद्भवः।<br>धुन्धूमूकात्मजस्तेन दुरात्मा च बभूव सः॥ १३<br><br>धुन्धूमूकः पुरासक्तो भार्यया सह मोहितः।<br>तस्यां वै स्थापितो गर्भः कामासक्तेन चेतसा॥ १४<br><br>अमावास्यामहन्येव मुहूर्ते रुद्रदैवते।<br>अन्तर्वत्नी तदा भार्या भुक्ता तेन यथासुखम्॥ १५<br><br>असूत् सा च तनयं विशल्याख्या प्रयत्नतः।<br>रुद्रे मुहूर्ते मन्देन वीक्षिते मुनिसत्तमाः॥ १६ | उस कल्पमें [पूर्वजन्ममें किसी] मुनिके शापके कारण धुन्धूमूकके यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, धुन्धूमूकका वह पुत्र [पिताके दोषके कारण] दुरात्मा हो गया। पूर्वकालमें वह धुन्धूमूक विरक्त होते हुए भी भार्यापर मोहित हो गया और उसने अमावास्या तिथिको दिनमें ही रुद्रदैवत मुहूर्तमें कामासक्त मनसे भार्याके साथ सुखपूर्वक संसर्ग किया और उसमें गर्भ स्थापित कर दिया। तत्पश्चात् हे मुनिश्रेष्ठो! विशल्या नामक उस [मुनिपत्नी]-ने शनिकी दृष्टिवाले भयंकर मुहूर्तमें अत्यन्त कष्टपूर्वक एक पुत्रको जन्म दिया॥ १३–१६॥ | | मातुः पितुस्तथारिष्टं स सञ्जातस्तथात्मनः।<br>ऋषी तमूचतुर्विप्रा धुन्धूमूकं मिथस्तदा॥ १७<br><br>मित्रावरुणनामानौ दुष्पुत्र इति सत्तमौ।<br>वसिष्ठः प्राह नीचोऽपि प्रभावाद्वै बृहस्पतेः॥ १८ | माता, पिता तथा अपने लिये अरिष्टकारी होकर उसने जन्म लिया था। हे विप्रो! मित्र एवं वरुण नामक श्रेष्ठ ऋषियोंने उस धुन्धूमूकसे कहा कि यह दुष्पुत्र है, किंतु वसिष्ठने उससे कहा कि तुम्हारा यह पुत्र नीच तथा दुर्बुद्धि होते हुए भी बृहस्पतिके प्रभावसे पापसे मुक्त हो जायगा॥ १७–१८ १/२॥ | | पुत्रस्तवासौ दुर्बुद्धिरपि मुच्यति किल्विषात्।<br>दुःखितो धुन्धूमूकोऽसौ दृष्ट्वा पुत्रमवस्थितम्॥ १९<br><br>जातकर्मादिकं कृत्वा विधिवत्स्वयमेव च।<br>अध्यापयामास च तं विधिनैव द्विजोत्तमाः॥ २०<br><br>तेनाधीतं यथान्यायं धौन्धुमूकेन सुव्रताः।<br>कृतोद्वाहस्तदा गत्वा गुरुशुश्रूषणे रतः॥ २१ | हे द्विजश्रेष्ठो! ऐसी दशावाले पुत्रको देखकर वह धुन्धूमूक [बहुत] दुःखित हुआ। उसने विधिपूर्वक उसके जातकर्म आदि संस्कार करके स्वयं उसे सम्यक् प्रकारसे पढ़ाया। उस धुन्धूमूकके पुत्रने भलीभाँति अध्ययन किया। हे सुव्रतो! इसके बाद उसका विवाह कर दिया गया, तब वहाँसे जाकर वह गुरुसेवामें निरत हो गया॥ १९–२१॥ |

अध्याय . ८ ] शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धौन्धूमूकका शिवगणत्वको प्राप्त करना ६११


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनेनैव मुनिश्रेष्ठा धौन्धुमूकेन दुर्मदात्।<br>भुक्त्वांयां वृषलीं दृष्ट्वा स्वभार्यावहिवानिशम्॥ २२<br><br>एकशय्यासनगतो धौन्धूमूको द्विजाधमः।<br>तथा चचार दुर्बुद्धिस्त्यक्त्वा धर्मगतिं पराम्॥ २३<br><br>माध्वी पीता तया सार्धं तेन रागविवृद्धये।<br>केनापि कारणेनैव तामुद्दिश्य द्विजोत्तमाः॥ २४हे द्विजश्रेष्ठो! इसी [पूर्वोक्त दोष]-के कारण वह धुन्धूमूकपुत्र किसी शूद्राको देखकर मदोन्मत्त होकर अपनी भार्याके समान उसके साथ दिन-रात भोग करके [उसके पास] पड़ा रहता था। वह द्विजाधम तथा दुर्बुद्धि अपनी परम धर्मगतिका त्याग करके उसके साथ शय्यापर स्थित होकर दुराचारमें रत रहता था। वह कामोद्दीपनके लिये उसके साथ मदिरा भी पीता था॥ २२-२३१/२॥
निहता सा च पापेन वृषली गतमङ्गला।<br>ततस्तस्यास्तदा तस्य भ्रातृभिर्निहतः पिता॥ २५<br><br>माता च तस्य दुर्बुद्धेर्धौन्धूमूकस्य शोभना।<br>भार्या च तस्य दुर्बुद्धेः श्यालास्ते चापि सुव्रताः॥ २६<br><br>राज्ञा क्षणादहो नष्टं कुलं तस्याश्च तस्य च।<br>गत्वासौ धौन्धूमूकश्च येन केनापि लीलया॥ २७हे द्विजश्रेष्ठो! किसी कारणसे उस शूद्राके साथ उसका विरोध हो गया और उस पापीने अभद्र शूद्राको मार डाला। तब उसके भाइयोंने उस धौन्धूमूकके पिताको मार डाला, इसी प्रकार उन्होंने उस दुर्बुद्धिकी माता, सुन्दर पत्नी तथा उसके सालों (पत्नीके भाइयों)-का भी वध कर दिया। हे सुव्रतो! इस प्रकार क्षणभरमें उसका कुल विनष्ट हो गया और उस शूद्राका सम्पूर्ण कुल भी राजाके द्वारा मार डाला गया॥ २४-२६१/२॥
दृष्ट्वा तु तं मुनिश्रेष्ठं रुद्रजाप्यपरायणम्।<br>लब्ध्वा पाशुपतं तद्वै पुरा देवान् महेश्वरात्॥ २८<br><br>लब्ध्वा पञ्चाक्षरं चैव षडक्षरमनुत्तमम्।<br>पुनः पञ्चाक्षरं चैव जप्त्वा लक्षं पृथक्पृथक्॥ २९<br><br>व्रतं कृत्वा च विधिना दिव्यं द्वादशमासिकम्।<br>कालधर्मं गतः कल्पे पूजितश्च यमेन वै॥ ३०<br><br>उद्धृता च तथा माता पिता श्यालाश्च सुव्रताः।<br>पत्नी च सुभगा जाता सुस्मिता च पतिव्रता॥ ३१<br><br>ताभिर्विमानमारुह्य देवैः सेन्द्रैरभिष्टुतः।<br>गाणपत्यमनुप्राप्य रुद्रस्य दयितोऽभवत्॥ ३२तत्पश्चात् जिस किसी तरह वहाँसे निकलकर वह धौन्धूमूक पूर्वकालमें महेश्वर महादेवसे पाशुपतव्रत प्राप्त करके रुद्रजपमें तत्पर मुनिश्रेष्ठ बृहस्पति के यहाँ प्रारब्धवश पहुँचकर उनसे सर्वश्रेष्ठ पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्र ग्रहण करके और बादमें उस पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्रको पृथक्-पृथक् एक लाख बार जपकर और इस प्रकार दिव्य द्वादशमासिक व्रतको विधिपूर्वक करके अन्तमें [आयुके समाप्त होनेपर] मृत्युको प्राप्त हुआ। यमलोकमें यमराजके द्वारा वह बहुत सम्मानित किया गया। हे सुव्रतो! इस प्रकार उसने [शूद्रोंके द्वारा मारे गये] अपने माता, पिता तथा सालोंका उद्धार कर दिया और सुन्दर मुसकानवाली उसकी पतिव्रता भार्या सौभाग्यवती हो गयी। उन सभीके साथ विमानमें बैठकर [रुद्रलोक पहुँचकर] इन्द्रसहित सभी देवताओंसे स्तुत होता हुआ वह गणाध्यक्ष बनकर भगवान् रुद्रका प्रिय हो गया॥ २७-३२॥
तस्मादष्टाक्षरान्मन्त्रात्तथा वै द्वादशाक्षरात्।<br>भवेत्कोटिगुणं पुण्यं नात्र कार्या विचारणा॥ ३३अतएव अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रोंसे यह [पंचाक्षरमन्त्र] करोड़ों गुना अधिक पुण्यप्रद होता है;

९- पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या, पाशुपतयोगका माहात्म्य तथा पशुपाशमोक्षविवरण

६१२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
तस्माज्जपेद्धि यो नित्यं प्रागुक्तेन विधानतः।<br>शक्तिबीजसमायुक्तं स याति परमां गतिम्॥ ३४<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमुत्तमम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ ३५<br><br>स याति ब्रह्मलोकं तु रुद्रजाप्यमनुत्तमम्॥ ३६इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अतः जो मनुष्य पूर्वमें कहे गये* विधानके अनुसार आदिमें मायाबीज लगाकर इस मन्त्रका नित्य जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥ ३३-३४॥<br><br>[हे मुनियो!] मैंने आपलोगोंसे यह उत्तम कथासार कह दिया, जो [मनुष्य] इस सर्वोत्कृष्ट रुद्रजपसम्बन्धी प्रसंगको पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है॥ ३५-३६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागेऽष्टाक्षरप्रशंसा नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अष्टाक्षरप्रशंसा' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८ ॥


नौवाँ अध्याय

पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या, पाशुपतयोगका माहात्म्य तथा पशुपाशमोक्षविवरण

ऋषय ऊचुः<br>देवैः पुरा कृतं दिव्यं व्रतं पाशुपतं शुभम्।<br>ब्रह्मणा च स्वयं सूत कृष्णोनाक्लिष्टकर्मणा॥ १<br>पतितेन च विप्रेण धौन्धुमूकेन वै तथा।<br>कृत्वा जप्त्वा गतिः प्राप्ता कथं पाशुपतं व्रतम्॥ २<br>कथं पशुपतिर्देवः शङ्करः परमेश्वरः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं परं कौतूहलं हि नः॥ ३<br><br>सूत उवाच<br>पुरा शापाद्विनिर्मुक्तो ब्रह्मपुत्रो महायशाः।<br>रुद्रस्य देवदेवस्य मरुदेशादिहागतः॥ ४<br>त्यक्त्वा प्रसादाद्रुद्रस्य उष्ट्रदेहमजाज्ञया।<br>शिलादपुत्रमासाद्य नमस्कृत्य विधानतः॥ ५<br>मेरुपृष्ठे मुनिवरः श्रुत्वा धर्ममनुत्तमम्।<br>माहेश्वरं मुनिश्रेष्ठा ह्यपृच्छच्च पुनः पुनः॥ ६<br>नन्दिनं प्रणिपत्यैनं कथं पशुपतिः प्रभुः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं तत्सर्वं च तदाह सः॥ ७<br>तत्सर्वं श्रुतवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।<br>तस्मादहमनुश्रुत्य युष्माकं प्रवदामि वै॥ ८<br>सर्वे शृण्वन्तु वचनं नमस्कृत्वा महेश्वरम्।ऋषिगण बोले—हे सूतजी! देवताओंने, ब्रह्माजीने तथा उत्कृष्ट कर्मोंवाले स्वयं विष्णुने पूर्वकालमें इस दिव्य एवं मंगलकारी व्रतको किया था। पतित विप्र धौन्धुमूकने भी इसे करके तथा मन्त्रका जप करके सद्गति प्राप्त की। यह पाशुपतव्रत कैसा है और वे परमेश्वर भगवान् शंकर पशुपति क्यों [कहे जाते] हैं? हमलोगोंको [इस विषयके प्रति] बड़ी जिज्ञासा है; आप हमें बतायें॥ १—३॥<br><br>सूतजी बोले—पूर्वकालमें ब्रह्माजीके पुत्र महायशस्वी सनत्कुमार देवदेव रुद्रके शापसे मुक्त हुए थे। उन भगवान् रुद्रके ही अनुग्रहसे उष्ट्रदेहका त्याग करके वे मरुदेशसे यहाँ (भारतवर्ष) आ गये। पुनः ब्रह्माजीकी आज्ञासे शिलादपुत्र नन्दीके पास मेरुके शिखरपर पहुँचकर उन्हें विधानपूर्वक नमस्कार करके मुनिवरने उनसे सर्वश्रेष्ठ मोक्षधर्मका श्रवणकर पाशुपतव्रतके विषयमें पूछा। हे मुनिश्रेष्ठो! इन नन्दीको बार-बार प्रणाम करके सनत्कुमारने पूछा—प्रभु शिव पशुपति कैसे हुए—यह आप हमसे बतायें। तब उन नन्दीने उन्हें सब कुछ बता दिया। कृष्णद्वैपायन प्रभु व्यासने [सनत्कुमारसे] वह सब सुना और उन [व्यासजी]-से सुन करके अब मैं आपलोगोंसे वही प्रसंग कह रहा हूँ, महेश्वरको नमस्कार करके सभी लोग उस वचनको सुनें॥ ४—८ १/२ ॥

* पंचाक्षरमन्त्रका पूर्ण विधान श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके पचासीवें अध्यायमें वर्णित है।

अध्याय ९ ]पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या... पशुपाशमोक्षविवरण६१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनत्कुमार उवाच<br>कथं पशुपतिर्देवः पशवः के प्रकीर्तिताः ॥ ९<br>कैः पाशैस्ते निबध्यन्ते विमुच्यन्ते च ते कथम्।सनत्कुमार बोले— भगवान् शिव पशुपति कैसे हुए, कौन लोग पशु कहे गये हैं, वे किन पाशोंसे बाँधे जाते हैं और पुनः वे कैसे मुक्त होते हैं?॥ ९१/२॥
शैलादिरुवाच<br>सनत्कुमार वक्ष्यामि सर्वमेतद्यथातथम् ॥ १०<br>रुद्रभक्तस्य शान्तस्य तव कल्याणचेतसः।<br>ब्रह्माद्याः स्थावरान्ताश्च देवदेवस्य धीमतः ॥ ११<br>पशवः परिकीर्त्यन्ते संसारवशवर्तिनः।<br>तेषां पतित्वाद्भगवान् रुद्रः पशुपतिः स्मृतः ॥ १२शैलादि बोले— हे सनत्कुमार! मैं रुद्रभक्त, शान्तस्वभाव तथा कल्याणभावनासे युक्त चित्तवाले आपको यह सब यथार्थ रूपमें बताऊँगा। ब्रह्मासे लेकर स्थावर-जंगमपर्यन्त सभी मायावशवर्ती हैं और धीमान् देवदेव शिवके पशु कहे जाते हैं। उनका स्वामी होनेके कारण भगवान् रुद्र पशुपति कहे गये हैं॥ १०—१२॥
अनादिनिधनो धाता भगवान् विष्णुरव्ययः।<br>मायापाशेन बध्नाति पशुवत्परमेश्वरः ॥ १३<br>स एव मोचकस्तेषां ज्ञानयोगेन सेवितः।<br>अविद्यापाशबद्धानां नान्यो मोचक इष्यते ॥ १४<br>तमृते परमात्मानं शङ्करं परमेश्वरम्।आदि तथा अन्तसे रहित, धारण करनेवाले, अव्यय, षडैश्वर्यसम्पन्न, सर्वव्यापक, परमेश्वर महेश्वर ही इन जीवोंको मोहाभिभूत पशुके समान मायापाशमें बाँधते हैं तथा वे ही ज्ञानयोगसे आराधित होनेपर उन्हें मुक्ति देनेवाले भी हैं; क्योंकि अविद्यापाशमें बँधे जीवोंको मुक्ति देनेवाला परमात्मा परमेश्वर शंकरके अतिरिक्त कोई अन्य है ही नहीं॥ १३-१४१/२॥
चतुर्विंशतितत्त्वानि पाशा हि परमेष्ठिनः ॥ १५<br>तैः पाशैर्मोचयत्येकः शिवो जीवैरूपासितः।<br>निबध्नाति पशूनेकश्चतुर्विंशतिपाशकैः ॥ १६<br>स एव भगवान् रुद्रो मोचयत्यपि सेवितः।<br>दशेन्द्रियमयैः पाशैैरन्तःकरणसम्भवैः ॥ १७<br>भूततन्मात्रपाशैश्च पशून्मोचयति प्रभुः।<br>इन्द्रियार्थमयैः पाशैर्बद्धा विषयिणः प्रभुः ॥ १८<br>आशु भक्ता भवन्त्येव परमेश्वरसेवया।चौबीस तत्त्व ही भगवान् परमेष्ठीके पाश हैं, वे एकमात्र शिव ही जीवोंके द्वारा आराधित होनेपर उन पाशोंसे मुक्त करते हैं। वे भगवान् रुद्र चौबीस पाशोंसे पशुओं (जीवों)-को बाँधते हैं और वे ही सेवित होनेपर बन्धनमुक्त भी करते हैं। दस इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय), अन्तःकरणजन्य भावों [मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त], शब्द आदि पाँच तन्मात्राओं तथा पृथ्‍वी आदि पाँच महाभूतों—इन समस्त विषयरूप पाशोंसे भगवान् शिव पशुओंको छुड़ाते हैं। इन इन्द्रियोंके विषयरूप पाशोंसे बँधे हुए विषयग्रस्त लोग परमेश्वर शिवकी सेवासे शीघ्र ही उनके भक्त हो जाते हैं॥ १५—१८१/२॥
भज इत्येष धातुर्वै सेवायां परिकीर्तितः ॥ १९<br>तस्मात्सेवा बुधैः प्रोक्ता भक्तिशब्देन भूयसी।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं पशून् बद्ध्वा महेश्वरः ॥ २०<br>त्रिभिर्गुणमयैः पाशैः कार्यं कारयति स्वयम्।<br>दृढेन भक्तियोगेन पशुभिः समुपासितः ॥ २१<br>मोचयत्येव तान् सद्यः शङ्करः परमेश्वरः।भज्—यह धातु सेवा अर्थमें कही गयी है, अतः विद्वज्जनोंने सेवाको भक्ति शब्दसे सम्बन्धित बताया है। ब्रह्मा आदिसे लेकर तृणपर्यन्त सभी पशुओंको [सत्त्व आदि] तीनों गुणरूपी पाशोंसे बाँधकर महेश्वर स्वयं कार्य कराते हैं। पशुओंके द्वारा दृढ़ भक्तियोगसे सम्यक् आराधित होनेपर वे परमेश्वर शंकर उन्हें शीघ्र ही [बन्धनसे] छुड़ा देते हैं॥ १९—२११/२॥
भजनं भक्तिरित्युक्ता वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥ २२मन, वचन तथा कर्मसे [प्रभुका] भजन ही
६१४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
श्लोकअर्थ
सर्वकार्येण हेतुत्वात्पाशच्छेदपटीयसी।<br>सत्यः सर्वग इत्यादि शिवस्य गुणचिन्तना ॥ २३<br>रूपोपादानचिन्ता च मानसं भजनं विदुः।<br>वाचिकं भजनं धीराः प्रणवादिजपं विदुः ॥ २४भक्ति कही गयी है। समस्त प्रपंचोंके पति विष्णुका भी हेतु होनेके कारण वह भक्ति बन्धनको काटनेमें समर्थ है। वे सत्य हैं तथा सर्वव्यापी हैं—शिवके इन गुणोंको जानने तथा उनके रूप और उपादानोंके चिन्तनको विद्वानोंने मानस भजन कहा है और प्रणव (ॐकार)-के जप आदिको उन्होंने वाचिक भजन कहा है, इसी प्रकार सत्पुरुषोंके द्वारा प्राणायाम आदिको कायिक भजन कहा जाता है॥ २२–२४१/२॥
कायिकं भजनं सद्भिः प्राणायामादि कथ्यते।<br>धर्माधर्ममयैः पाशैर्बन्धनं देहिनामिदम् ॥ २५<br>मोचकः शिव एवैको भगवान् परमेश्वरः।<br>चतुर्विंशतितत्त्वानि मायाकर्मगुणा इति ॥ २६<br>कीर्त्यन्ते विषयाश्चेति पाशा जीवनिबन्धनात्।<br>तैर्बद्धाः शिवभक्त्यैव मुच्यन्ते सर्वदेहिनः ॥ २७<br>पञ्चक्लेशमयैः पाशैः पशून् बध्नाति शङ्करः।<br>स एव मोचकस्तेषां भक्त्या सम्यगुपासितः ॥ २८धर्माधर्ममय पाशोंसे जीवोंका यह बन्धन होता है और एकमात्र वे भगवान् परमेश्वर शिव ही [उन पाशोंसे जीवोंको] मुक्त करनेवाले हैं। चौबीस तत्त्व, मायाके गुण और शब्द आदि विषय—ये जीवको बाँधनेके कारण पाश कहे जाते हैं। उन पाशोंसे बँधे हुए सभी प्राणी शिवभक्तिके द्वारा ही मुक्त होते हैं। [अविद्या आदि] पाँच क्लेशरूप पाशोंसे भी वे शिव जीवोंको बाँधते हैं और वे ही भक्तिके द्वारा भलीभाँति उपासित किये जानेपर पाशोंसे उन्हें मुक्त कर देते हैं॥ २५–२८॥
अविद्यामस्मितां रागं द्वेषं च द्विपदां वराः।<br>वदन्त्यभिनिवेशं च क्लेशान् पाशत्वमागतान् ॥ २९<br>तमो मोहो महामोहस्तामिस्र इति पण्डिताः।<br>अन्धतामिस्र इत्याहुरविद्यां पञ्चधा स्थिताम् ॥ ३०<br>ताञ्जीवान् मुनिशार्दूलाः सर्वांश्चैवाप्यविद्यया।<br>शिवो मोचयति श्रीमान्नान्यः कश्चिद्विमोचकः ॥ ३१<br>अविद्यां तम इत्याहुरस्मितां मोह इत्यपि।<br>महामोह इति प्राज्ञा रागं योगपरायणाः ॥ ३२<br>द्वेषं तामिस्र इत्याहुरन्धतामिस्र इत्यपि।<br>तथैवाभिनिवेशं च मिथ्याज्ञानं विवेकिनः ॥ ३३मनुष्योंमें श्रेष्ठ लोग अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशको जीवोंको बाँधनेवाले [पाँच] क्लेश कहते हैं। पण्डितजन तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र—इन पाँच प्रकारसे अविद्या आदिको स्थित कहते हैं। हे मुनिश्रेष्ठो! केवल शिव ही उन समस्त जीवोंको अविद्यासे मुक्त कर सकते हैं, उन्हें मुक्त करनेवाला कोई दूसरा नहीं है। योगपरायण महाज्ञानियोंने अविद्याको तम, अस्मिताको मोह और रागको महामोह कहा है, इसी प्रकार विवेकयुक्त जनोंने द्वेषको तामिस्र और मिथ्या ज्ञानरूपी अभिनिवेशको अन्धतामिस्र बताया है॥ २९–३३१/२॥
तमसोऽष्टविधा भेदा मोहश्चाष्टविधः स्मृतः।<br>महामोहप्रभेदाश्च बुधैर्दश विचिन्तिताः ॥ ३४<br>अष्टादशविधं चाहुस्तामिस्रं च विचक्षणाः।<br>अन्धतामिस्रभेदाश्च तथाष्टादशधा स्मृताः ॥ ३५तमके आठ भेद हैं। मोह आठ प्रकारका कहा गया है। विद्वानोंने महामोहके दस भेद बताये हैं। बुद्धिमान् लोगोंने तामिस्रको अठारह भेदोंवाला कहा है। अन्धतामिस्रके अठारह प्रकारके भेद बताये गये हैं॥ ३४-३५॥
अविद्ययास्य सम्बन्धो नातीतो नास्त्यनागतः।<br>भवेद्रागेण देवस्य शम्भोरङ्गनिवासिनः ॥ ३६सर्वान्तर्यामी देवदेव शिवका सम्बन्ध अविद्या तथा रागसे न तो वर्तमानमें है, न पूर्वकालमें रहा है

अध्याय ९ ] पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या 'पशूपाशमोक्षविवरण ६१५


| कालेषु त्रिषु सम्बन्धस्तस्य द्वेषेण नो भवेत्।<br>मायातीतस्य देवस्य स्थाणोः पशुपतेर्विभोः॥ ३७<br>तथैवाभिनिवेशेन सम्बन्धो न कदाचन।<br>शङ्करस्य शरण्यस्य शिवस्य परमात्मनः॥ ३८<br>कुशलाकुशलैस्तस्य सम्बन्धो नैव कर्मभिः।<br>भवेत्कालत्रये शम्भोरविद्यामतिवर्तिनः॥ ३९<br>विपाकैः कर्मणां वापि न भवेदेव सङ्गमः।<br>कालेषु त्रिषु सर्वस्य शिवस्य शिवदायिनः॥ ४० | और न तो भविष्यमें होगा। मायासे परे, देवताओंके भी देव, स्थाणु, पशुपति तथा सर्वैश्वर्यसम्पन्न उन शिवका सम्बन्ध द्वेषसे तीनों कालोंमें नहीं हो सकता। उसी प्रकार शरणदाता तथा कल्याणकारक परमात्मा शिवका सम्बन्ध अभिनिवेशसे भी कभी नहीं सम्भव है। पुण्य तथा पापकर्मोंसे भी अविद्याका अतिवर्तन करनेवाले उन शिवका सम्बन्ध तीनों कालोंमें नहीं है। कल्याण प्रदान करनेवाले सर्वरूप शिवका सम्बन्ध [शुभाशुभ] कर्मोंके फलसे भी तीनों कालोंमें नहीं है॥ ३६-४०॥ | | सुखदुःखैरसंस्पृश्यः कालत्रितयवर्तिभिः।<br>स तैर्विनश्वरैः शम्भुर्बोधानन्दात्मकः परः॥ ४१<br>आशयैरपरामृष्टः कालत्रितयगोचरैः।<br>धियांपतिः स्वभूरेष महादेवो महेश्वरः॥ ४२<br>अस्पृश्यः कर्मसंस्कारैः कालत्रितयवर्तिभिः।<br>तथैव भोगसंस्कारैर्भगवानन्तकान्तकः॥ ४३ | वे बोधानन्दस्वरूप परम शिव तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले उन विनाशशील सुख-दुःखोंसे स्पर्श होनेयोग्य नहीं हैं। बुद्धिके स्वामी तथा स्वयं प्रकट होनेवाले वे महादेव महेश्वर तीनों कालोंमें अनुभूत होनेवाली कामनाओंसे भी अस्पृश्य हैं। इसी प्रकार कालका विनाश करनेवाले भगवान् शिव तीनों कालोंमें वर्तमान कर्मसंस्कारों तथा भोगसंस्कारोंसे अस्पृश्य हैं॥ ४१-४३॥ | | पुंविशेषपरो देवो भगवान् परमेश्वरः।<br>चेतनाचेतनायुक्तप्रपञ्चादखिलात्परः ॥ ४४<br>लोके सातिशयत्वेन ज्ञानैश्वर्यं विलोक्यते।<br>शिवेनातिशयत्वेन शिवं प्राहुर्मनीषिणः॥ ४५ | वे परमेश्वर भगवान् महादेव सम्पूर्ण जीवोंसे श्रेष्ठ हैं और जड़-चेतनरूप सम्पूर्ण सृष्टिप्रपंचसे परे हैं। जैसे संसारमें ज्ञान और ऐश्वर्यको अत्यन्त श्रेष्ठ रूपमें देखा जाता है, वैसे ही अतिशय कल्याणरूप होनेसे ही मनीषियोंने महादेवको शिव कहा है॥ ४४-४५॥ | | प्रतिसर्गं प्रसूतानां ब्रह्मणां शास्त्रविस्तरम्।<br>उपदेष्टा स एवादौ कालावच्छेदवर्तिनाम्॥ ४६<br>कालावच्छेदयुक्तानां गुरूणामप्यसौ गुरुः।<br>सर्वेषामेव सर्वेशः कालावच्छेदवर्जितः॥ ४७ | प्रत्येक सर्गमें उत्पन्न होनेवाले तथा कालसीमामें बँधे सभी ब्रह्माओंको सम्पूर्ण शास्त्रोंका आरम्भमें उपदेश करनेवाले वे शिव ही हैं। कालसीमासे रहित वे सर्वेश्वर शिव कालावच्छेदसे युक्त सभी गुरुओंके भी गुरु हैं॥ ४६-४७॥ | | अनादिरेष सम्बन्धो विज्ञानोत्कर्षयोः परः।<br>स्थितयोरीदृशः सर्वः परिशुद्धः स्वभावतः॥ ४८<br>आत्मप्रयोजनाभावे परानुग्रह एव हि।<br>प्रयोजनं समस्तानां कार्याणां परमेश्वरः॥ ४९ | देहमें विद्यमान जीव तथा ईश्वरका यह सेवक तथा सेव्यका सम्बन्ध अनादि है। स्वभावसे अत्यन्त निर्मल तथा विश्वरूप वे शिव माया-सम्बन्धसे रहित हैं। [नित्यानन्दस्वरूप होनेके कारण] अपने प्रयोजनके अभावमें भी वे परमेश्वर शिव जीवके प्रति समस्त कार्योंका प्रयोजनरूप अनुग्रह हैं॥ ४८-४९॥ | | प्रणवो वाचकस्तस्य शिवस्य परमात्मनः।<br>शिवरुद्रादिशब्दानां प्रणवोऽपि परः स्मृतः॥ ५० | प्रणव उन परमात्मा शिवका वाचक है। यह प्रणव |

६१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| शम्भोः प्रणववाच्यस्य भावना तज्जपादपि।<br>या सिद्धिः स्वपराप्राप्या भवत्येव न संशयः॥ ५१ | शिव-रुद्र आदि शब्दोंमें श्रेष्ठ कहा गया है। शिवके वाचक प्रणवके जपसे तथा उसकी भावनासे जो सिद्धि होती है, वह अन्य मन्त्रोंके जपसे प्राप्त नहीं होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५०-५१॥ | | ज्ञानतत्त्वं प्रयत्नेन योगः पाशुपतः परः।<br>उक्तस्तु देवदेवेन सर्वेषामनुकम्पया॥ ५२ | देवदेव आदित्यरूपी शिवने [याज्ञवल्क्यकी तपस्यासे प्रसन्न होकर] सभीकी अनुकम्पासे ज्ञानतत्त्वरूप श्रेष्ठ पाशुपत योगका उपदेश उन्हें दिया था। तत्पश्चात् याज्ञवल्क्यने | | स होवाचैव याज्ञवल्क्यो यदक्षरं गार्ग्ययोगिनः।<br>अभिवदन्ति स्थूलमनन्तं महाश्चर्यमदीर्घमलोहित-<br>ममस्तकमासायमत एवो पुनरसमसङ्गमगन्धमरस-<br>मचक्षुष्कमश्रोत्रमवाङ्मनोतेजस्कमप्रमाणमनुसुख-<br>मनामगोत्रममरमजरमनामयममृतमोंशब्दममृत-<br>मसंवृतमपूर्वमनपरमनन्तमबाह्यं तदश्नाति किञ्चन<br>न तदश्नाति किञ्चन॥ ५३॥ | गार्गीसे कहा—हे गार्गि! अयोगी लोग नाशशून्य जो शिवतत्त्व है, उसे विराट्रूप, अनन्त तथा अत्यन्त आश्चर्यजनक बताते हैं, किंतु योगीलोग उसे अदीर्घ, अलोहित, मस्तक-विहीन, कभी अस्त न होनेवाला, अतएव नित्यानन्दरस-स्वरूप, स्पर्शशून्य, अगन्ध, अरस (रसविहीन), अचक्षुष्क (नेत्रविहीन), अश्रोत्र (कर्णरहित), मन तथा वाणीसे परे, अतेजस्क (अदाहक), अप्रमाण, सुखकारी, नाम तथा गोत्रसे विहीन, मृत्युरहित, जराशून्य, अनामय (रोगरहित), अमृत (मोक्षरूप) ॐकार शब्दसे प्रतिपाद्य, सुधारूप, अनाच्छादित, पूर्वभागसे शून्य, अपरभागशून्य तथा अन्तरहित कहते हैं। वह ब्रह्म सब कुछ खाता है और वह ब्रह्म कुछ भी नहीं खाता है॥ ५२-५३॥ | | एतत्कालव्यये ज्ञात्वा परं पाशुपतं प्रभुम्।<br>योगे पाशुपते चास्मिन् यस्यार्थः किल उत्तमे॥ ५४ | इस उत्तम पाशुपतयोगमें जिस मनुष्यकी अभिरुचि होती है, वह इस श्रेष्ठ पाशुपत योगको जानकर अन्तकालमें परमेश्वरमें विलीन हो जाता है। | | कृत्वोङ्कारं प्रदीपं मृगय गृहपतिं<br>सूक्ष्ममाद्यान्तरस्थं<br>संयम्य द्वारवासं पवनपटुतरं<br>नायकं चेन्द्रियाणाम्।<br>वाग्जालैः कस्य हेतोर्विभटसि तु भयं<br>दृश्यते नैव किंचि-<br>द्देहस्थं पश्य शम्भुं भ्रमसि किमु परे<br>शास्त्रजालेऽन्धकारे॥ ५५ | ॐकाररूप दीपकको प्रज्वलित करके वायुसे भी अधिक वेगसे गति करनेवाले तथा इन्द्रियोंके स्वामी मनको भलीभाँति नियन्त्रित करके अन्तर्यामी, सूक्ष्म तथा सबके आदिस্বরূপ उस परमात्माका अन्वेषण करो। तुम वाग्जालोंमें पड़कर किसलिये वृथा विवाद कर रहे हो। भय तो कुछ भी नहीं दिखायी दे रहा है। अतः तुम अपनी ही देहमें विद्यमान शम्भुको देखो; अन्धकारमय शास्त्रजालमें क्यों भटक रहे हो? इस प्रकार मुमुक्षुको चाहिये कि वह शिवजीके द्वारा मुनियोंके प्रति कहे गये उपदेशपर विद्वानोंके साथ भलीभाँति विचार | | एवं सम्यग्बुधैर्ज्ञात्वा मुनीनामथ चोक्तं शिवेन।<br>असमरसं पञ्चधा कृत्वोभयं चात्मनि योजयेत्॥ ५६ | करके आनन्दरूप आत्मस्वरूपको पंचकोशसे परे करके अभयरूपी मोक्ष प्राप्त करे॥ ५४—५६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतव्रतवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'पाशुपतव्रतवर्णन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥

१०- उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन तथा शिवके आदेशसे ही सृष्टि-पालन आदि सभी कार्योंका संचालन

अध्याय १०] उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन ६१७


दसवाँ अध्याय

उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन तथा शिवके आदेशसे ही सृष्टि-पालन आदि सभी कार्योंका संचालन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनत्कुमार उवाच<br>भूय एव ममाचक्ष्व महिमानमुमापतेः।<br>भवभक्त महाप्राज्ञ भगवन्नन्दिकेश्वर॥ १ ॥सनत्कुमार बोले— हे शिवभक्त! हे महाप्राज्ञ! हे भगवन्! हे नन्दिकेश्वर! आप उमापति शिवजीकी महिमाका पुनः वर्णन कीजिये॥ १॥
शैलादिरुवाच<br>सनत्कुमारसङ्क्षेपात्तव वक्ष्याम्यशेषतः।<br>महिमानं महेशस्य भवस्य परमेष्ठिनः॥ २ ॥<br>नास्य प्रकृतिबन्धोऽभूद्बुद्धिबन्धो न कश्चन।<br>न चाहङ्कारबन्धश्च मनोबन्धश्च नोऽभवत्॥ ३ ॥<br>चित्तबन्धो न तस्याभूच्छ्रोत्रबन्धो न चाभवत्।<br>न त्वचां चक्षुषां वापि बन्धो जज्ञे कदाचन॥ ४ ॥<br>जिह्वाबन्धो न तस्याभूद्घ्राणबन्धो न कश्चन।<br>पादबन्धः पाणिबन्धो वाग्बन्धश्चैव सुव्रत॥ ५ ॥<br>उपस्थेन्द्रियबन्धश्च भूततन्मात्रबन्धनम्।<br>नित्यशुद्धस्वभावेन नित्यबुद्धो निसर्गतः॥ ६ ॥<br>नित्यमुक्त इति प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्ववेदिभिः।शैलादि बोले— हे सनत्कुमार! मैं परमेष्ठी भगवान् महेश्वरकी सम्पूर्ण महिमाको आपसे संक्षेपमें ही कहूँगा। इन शिवजीको प्रकृतिका बन्धन तथा बुद्धिका बन्धन कभी नहीं हुआ, इसी प्रकार अहंकारबन्धन तथा मनोबन्धन भी इन्हें नहीं हुआ। उन्हें न तो चित्तका बन्ध हुआ और न तो श्रोत्रका बन्ध हुआ, उन्हें त्वचा और नेत्रका भी बन्ध कभी नहीं हुआ। हे सुव्रत! उन शिवको जिह्वा, घ्राण, पाद, हाथ, वाणी, जननेन्द्रिय और शब्द आदि पाँच गुणोंका भी कोई बन्धन नहीं हुआ। तत्त्ववेत्ता मुनियोंने नित्य शुद्ध स्वभावके कारण उन शिवको नैसर्गिकरूपसे नित्यबुद्ध तथा नित्यमुक्त बतलाया है॥ २—६ १/२॥
अनादिमध्यनिष्ठस्य शिवस्य परमेष्ठिनः॥ ७ ॥<br>बुद्धिं सूते नियोगेन प्रकृतिः पुरुषस्य च।<br>अहङ्कारं प्रसूतेऽस्या बुद्धिस्तस्य नियोगतः॥ ८ ॥<br>अन्तर्यामीति देहेषु प्रसिद्धस्य स्वयम्भुवः।<br>इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्राणि च शासनात्॥ ९ ॥<br>अहङ्कारोऽतिसंसृते शिवस्य परमेष्ठिनः।<br>तन्मात्राणि नियोगेन तस्य संसुवते प्रभोः॥ १० ॥<br>महाभूतान्यशेषेण महादेवस्य धीमतः।<br>ब्रह्मादीनां तृणान्तं हि देहिनां देहसङ्गतिम्॥ ११ ॥<br>महाभूतान्यशेषाणि जनयन्ति शिवाज्ञया।<br>अध्यवस्यति सर्वार्थान् बुद्धिस्तस्याज्ञया विभोः॥ १२ ॥आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित परमेष्ठी पुरुषरूप शिवकी आज्ञासे प्रकृति बुद्धिको उत्पन्न करती है और पुनः उन्हीं शिवके आदेशसे इस प्रकृतिकी बुद्धि अहंकारकी उत्पत्ति करती है। अन्तर्यामीरूपसे देहमें स्थित रहनेवाले प्रसिद्ध स्वयम्भू परमेष्ठी शिवके आदेशसे अहंकार दस इन्द्रियों, मन तथा शब्द आदि तन्मात्राओंको उत्पन्न करता है। उन्हीं धीमान् प्रभु महादेवके आदेशसे ये तन्मात्राएँ आकाशादि महाभूतोंको उत्पन्न करती हैं। तदनन्तर शिवकी आज्ञासे ये सब महाभूत ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त देहधारियोंके देहको उत्पन्न करते हैं। उन्हीं सर्वव्यापी शिवकी आज्ञासे बुद्धि समस्त अर्थोंका निश्चय करती है॥ ७—१२॥
अन्तर्यामीति देहेषु प्रसिद्धस्य स्वयम्भुवः।<br>स्वभावसिद्धमैश्वर्यं स्वभावादेव भूतयः॥ १३ ॥<br>तस्याज्ञया समस्तार्थानहङ्कारोऽतिमन्यते।<br>चित्तं चेतयते चापि मनः सङ्कल्पयत्यपि॥ १४ ॥<br>श्रोत्रं शृणोति तच्छक्त्या शब्दस्पर्शादिकं च यत्।<br>शम्भोराज्ञाबलेनैव भवस्य परमेष्ठिनः॥ १५ ॥देहोंमें अन्तर्यामीरूपसे प्रसिद्ध स्वयम्भू शिवका ऐश्वर्य स्वभावसिद्ध है और उनकी विभूतियाँ भी स्वभावसे ही हैं। उन्हीं शिवकी आज्ञासे अहंकार सभी अर्थोंका स्वायत्तीकरण करता है, चित्त स्मरण कराता है और मन संकल्प करता है। कान उन्हींकी शक्तिसे श्रवण करता है। उन्हीं परमेष्ठी प्रभु शम्भुके आज्ञाबलसे
६१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| वचनं कुरुते वाक्यं नादानादि कदाचन।<br>शरीराणामशेषाणां तस्य देवस्य शासनात्॥ १६<br><br>करोति पाणिरादानं न गत्यादि कदाचन।<br>सर्वेषामेव जन्तूनां नियमादेव वेधसः॥ १७<br><br>विहारं कुरुते पादो नोत्सर्गादि कदाचन।<br>समस्तदेहिबृन्दानां शिवस्यैव नियोगतः॥ १८<br><br>उत्सर्गं कुरुते पायुर्र्न वदेत कदाचन।<br>जन्तोजातस्य सर्वस्य परमेश्वरशासनात्॥ १९<br><br>आनन्दं कुरुते शश्वदुपस्थं वचनाद्विभोः।<br>सर्वेषामेव भूतानामीश्वरस्यैव शासनात्॥ २० | ही शब्द-स्पर्श आदि जो भी हैं, वे अपने-अपने विषयोंमें व्यवहार करते हैं। उन्हीं भगवान् शिवके आदेशसे सभी देहधारियोंकी वाणी बोलनेका काम करती है; वह ग्रहण आदिका कार्य कभी नहीं करती। उन्हीं शिवके [बनाये गये] नियमसे ही सभी प्राणियोंका हाथ ग्रहणका कार्य करता है, वह चलने-फिरनेका कार्य कभी नहीं कर सकता। शिवके आदेशसे सभी प्राणिसमुदायका पैर गमनकार्य करता है, वह [मल आदिका] उत्सर्जन कभी नहीं कर सकता। उन परमेश्वरके आदेशसे सम्पूर्ण प्राणिसमुदायका गुदास्थल उत्सर्जन-कार्य करता है, वह बोलनेका कार्य कभी नहीं करता। उन्हीं सर्वव्यापी ईश्वरके वचन तथा आदेशसे सभी प्राणियोंकी जननेन्द्रिय सदा आनन्द प्रदान करती है॥ १३—२०॥ | | अवकाशमशेषाणां भूतानां सम्प्रयच्छति।<br>आकाशं सर्वदा तस्य परमस्यैव शासनात्॥ २१<br><br>निर्देशेन शिवस्यैव भेदैः प्राणादिभिर्निजैः।<br>बिभर्ति सर्वभूतानां शरीराणि प्रभञ्जनः॥ २२<br><br>निर्देशाद्देवदेवस्य सप्तस्कन्धगतो मरुत्।<br>लोकयात्रां वहत्येव भेदैः स्वैरावहादिभिः॥ २३<br><br>नागाद्यैः पञ्चभिर्भेदैः शरीरेषु प्रवर्तते।<br>अपदेशेन देवस्य परमस्य समीरणः॥ २४ | उन्हीं परमेश्वरके आदेशसे आकाश सभी प्राणियोंको अवकाश प्रदान करता है। उन्हीं शिवके निर्देशसे अपने प्राण आदि भेदोंसे प्रभंजन (वायु) सभी प्राणियोंके शरीरको धारण करता है। सात स्कन्धोंवाला मरुत् उन्हीं देवदेवके निर्देशपर अपने आवह आदि भेदोंसे स्थित होकर लोकयात्रा करता है। यही वायु परम प्रभु शिवकी आज्ञासे नाग आदि पाँच भेदोंसे शरीरोंमें विद्यमान रहता है॥ २१—२४॥ | | हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि।<br>पाकं च कुरुते वह्निः शङ्करस्यैव शासनात्॥ २५<br><br>भुक्तमाहारजातं यत्पचते देहिनां तथा।<br>उदरस्थः सदा वह्निर्विश्वेश्वरनियोगतः॥ २६ | शंकरकी आज्ञासे ही अग्नि देवताओंके लिये हव्य तथा पितरोंके लिये कव्यका वहन करती है और भोजनका परिपाक करती है। उदरमें स्थित अग्नि उन विश्वेश्वरके ही आदेशसे प्राणियोंके द्वारा ग्रहण किये गये सम्पूर्ण आहारको पचाती है। | | सञ्जीवयन्त्यशेषाणि भूतान्यापस्तदाज्ञया।<br>अविल्लङ्घ्या हि सर्वेषामाज्ञा तस्य गरीयसी॥ २७<br><br>चराचराणि भूतानि बिभर्त्येव तदाज्ञया।<br>आज्ञया तस्य देवस्य देवदेवः पुरन्दरः॥ २८ | जल उन्हींकी आज्ञासे सभी प्राणियोंको जीवन प्रदान करता है। उनकी श्रेष्ठ आज्ञा सबके लिये अनुल्लंघनीय है। पृथ्वी उन्हींकी आज्ञासे चराचर जीवोंको धारण करती है और उन्हीं देव शिवकी आज्ञासे इन्द्र भी सभी प्राणियोंका पालन करते हैं। | | जीवतां व्याधिभिः पीडां मृतानां यातनाशतैः।<br>विश्वम्भरः सदाकालं लोकैः सर्वैरलङ्घ्यया॥ २९<br><br>देवान् पात्यसुरान् हन्ति त्रैलोक्यमखिलं स्थितः।<br>अधार्मिकाणां वै नाशं करोति शिवशासनात्॥ ३० | यमराज भी उन्हीं शिवकी आज्ञासे जीवित प्राणियोंको व्याधियोंसे तथा मृतलोगोंको सैकड़ों प्रकारकी यातनाओंसे कष्ट प्रदान करते हैं। तीनों लोकोंमें हर समय विद्यमान रहकर भगवान् विष्णु उन्हीं शिवकी सभी लोगोंके द्वारा |

अध्याय १० ] उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन [ ६१९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनुल्लङ्घ्य आज्ञासे देवताओंकी रक्षा करते हैं और असुरोंका संहार करते हैं तथा उन्हीं शिवके शासनसे अधार्मिकोंका नाश करते हैं॥ २५-३०॥
वरुणः सलिलैर्लोकान् सम्भावयति शासनात्।<br>मजयत्याज्ञया तस्य पाशैर्बध्नाति चासुरान्॥ ३१<br><br>पुण्यानुरूपं सर्वेषां प्राणिनां सम्प्रयच्छति।<br>वित्तं वित्तेश्वरस्तस्य शासनात्परमेष्ठिनः॥ ३२<br><br>उदयास्तमये कुर्वन् कुरुते कालमाज्ञया।<br>आदित्यस्तस्य नित्यस्य सत्यस्य परमात्मनः॥ ३३<br><br>पुष्पाण्यौषधिजातानि प्रह्लादयति च प्रजाः।<br>अमृतांशुः कलाधारः कालकालस्य शासनात्॥ ३४उन्हीं शिवकी आज्ञासे वरुणदेव अपने जलसे सभी लोकोंको सन्तुष्ट करते हैं और उन्हींकी आज्ञासे असुरोंको अपने पाशोंसे बाँधते हैं तथा बादमें जलमें डुबा देते हैं। उन परमेष्ठी शिवके ही आदेशसे धनके स्वामी कुबेर समस्त प्राणियोंको उनके पुण्यके अनुसार धन प्रदान करते हैं। उन्हीं शाश्वत तथा सत्यस्वरूप परमात्माकी आज्ञासे सूर्यदेव उदय तथा अस्तरूप कार्यको करते हुए कालनिर्धारण करते हैं। कालके भी काल शिवके ही आदेशसे कलाधार चन्द्रमा पुष्पों, औषधियों तथा जीवोंको आनन्दित करते हैं॥ ३१-३४॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ मरुतस्तथा।<br>अन्याश्च देवताः सर्वास्तच्छासनविनिर्मिताः॥ ३५<br><br>गन्धर्वा देवसङ्घाश्च सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।<br>यक्षरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रेषु वेधसः॥ ३६<br><br>ग्रहनक्षत्रताराश्च यज्ञा वेदास्तपांसि च।<br>ऋषीणां च गणाः सर्वे शासनं तस्य धिष्ठिताः॥ ३७<br><br>कव्याशिनां गणाः सप्तसमुद्रा गिरिसिन्धवः।<br>शासने तस्य वर्तन्ते काननानि सरांसि च॥ ३८<br><br>कलाः काष्ठा निमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।<br>ऋत्वब्दपक्षमासाश्च नियोगात्तस्य धिष्ठिताः॥ ३९<br><br>युगमन्वन्तराण्यस्य शम्भोस्तिष्ठन्ति शासनात्।<br>पराश्चैव परार्थाश्च कालभेदास्तथापरे॥ ४०सभी आदित्य, वसुगण, समस्त रुद्र, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण तथा अन्य समस्त देवता उन्हीं शिवके शासनसे विनिर्मित हैं। गन्धर्व, देवसमुदाय, सिद्ध, साध्य, चारण, यक्ष, राक्षस तथा पिशाच शिवके ही शासनमें स्थित हैं। ग्रह, नक्षत्र, तारा, यज्ञ, वेद, तप तथा ऋषिगण—ये सब उन्हींके शासनमें अधिष्ठित हैं। पितरोंके समूह, सातों समुद्र, पर्वत, नदियाँ, वन तथा सरोवर भी उन्हींके शासनमें रहते हैं। कला, काष्ठा, निमेष, मुहूर्त, दिन, रात, ऋतु, वर्ष, पक्ष तथा मास उन्हींके अनुशासनमें अधिष्ठित हैं; उसी प्रकार युग, मन्वन्तर, पर, परार्ध तथा दूसरे अन्य कालभेद भी इन्हीं शम्भुके शासनसे प्रवर्तित होते हैं॥ ३५-४०॥
देवानां जातयश्चाष्टौ तिरश्चां पञ्चजातयः।<br>मनुष्याश्च प्रवर्तन्ते देवदेवस्य धीमतः॥ ४१<br><br>जातानि भूतवृन्दानि चतुर्दशसु योनिषु।<br>सर्वलोकनिषण्णानि तिष्ठन्त्यस्यैव शासनात्॥ ४२<br><br>चतुर्दशसु लोकेषु स्थिता जाताः प्रजाः प्रभोः।<br>सर्वेश्वरस्य तस्यैव नियोगवशवर्तिनः॥ ४३उन्हीं बुद्धिसम्पन्न देवदेवके शासनसे देवताओंकी [विद्याधर आदि] आठ जातियाँ, पशु-पक्षियोंकी पाँच जातियाँ तथा मनुष्य प्रवर्तित होते हैं। सभी लोकोंमें रहनेवाले इन देवता आदि चौदह योनियोंमें उत्पन्न सभी प्राणीसमूह इन्हीं शिवके शासनमें रहते हैं। चौदह लोकोंमें स्थित रहनेवाली सभी प्रजाएँ उन्हीं परमेश्वर प्रभु शिवके शासनके अधीन रहती हैं॥ ४१-४३॥
पातालानि समस्तानि भुवनान्यस्य शासनात्।<br>ब्रह्माण्डानि च शेषाणि तथा सावरणानि च॥ ४४पाताल आदि समस्त भुवन तथा [जल आदि] आवरणोंसे युक्त ब्रह्माण्ड इन्हींके शासनसे स्थित हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभीसे युक्त समस्त वर्तमान

११- भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य

६२०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| वर्तमानानि सर्वाणि ब्रह्माण्डानि तदाज्ञया।<br>वर्तन्ते सर्वभूतौधैः समेतानि समन्ततः॥ ४५<br>अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्माण्डानि तदाज्ञया।<br>प्रवृत्तानि पदार्थौधैः सहितानि समन्ततः॥ ४६<br>ब्रह्माण्डानि भविष्यन्ति सह वस्तुभिरात्मकैः।<br>करिष्यन्ति शिवस्याज्ञां सर्वैरावरर्णैः सह॥ ४७ | ब्रह्माण्ड सब प्रकारसे उन्हींकी आज्ञासे स्थित हैं; उन्हींकी आज्ञासे असंख्य ब्रह्माण्ड अनेक पदार्थोंसहित उत्पन्न हुए और समाप्त भी हो गये। इसी प्रकार आगे होनेवाले अनेक ब्रह्माण्ड होंगे और वे अपने सभी पदार्थों तथा आवरणोंके साथ शिवकी आज्ञाका पालन करेंगे॥ ४४-४७॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे उमापतेर्महिमवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'उमापतिमहिमावर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥


ग्यारहवाँ अध्याय

भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य

सनत्कुमार उवाच<br>विभूतीः शिवयोर्मह्यमाचक्ष्व त्वं गणाधिप।<br>परापरविदां श्रेष्ठ परमेश्वरभावित॥ १सनत्कुमार बोले—परापरवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा परमेश्वर शिवको प्राप्त कर लेनेवाले हे गणाधिप! अब आप मुझसे शिव तथा पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन करें॥ १॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>हन्त ते कथयिष्यामि विभूतीः शिवयोरहम्।<br>सनत्कुमार योगीन्द्र ब्रह्मणस्तनयोत्तम॥ २नन्दिकेश्वर बोले—ब्रह्माके पुत्रोंमें श्रेष्ठ तथा योगिप्रवर हे सनत्कुमार! मैं शिव तथा पार्वतीकी विभूतियोंको आपको अवश्य बताऊँगा [वे इस प्रकार हैं—]॥ २॥
परमात्मा शिवः प्रोक्तः शिवा सा च प्रकीर्तिता।<br>शिवमेवेश्वरं प्राहुर्मायां गौरीं विदुर्बुधाः॥ ३<br>पुरुषं शङ्करं प्राहुर्गौरीं च प्रकृतिं द्विजाः।<br>अर्थः शम्भुः शिवा वाणी दिवसोजः शिवा निशा॥ ४<br>सप्ततन्तुर्महादेवो रुद्राणी दक्षिणा स्मृता।<br>आकाशं शङ्करो देवः पृथिवी शङ्करप्रिया॥ ५<br>समुद्रो भगवान् रुद्रो वेला शैलेन्द्रकन्यका।<br>वृक्षः शूलायुधो देवः शूलपाणिप्रिया लता॥ ६वे परमात्मा शिव (कल्याणरूप) कहे गये हैं तथा वे पार्वती शिवा (कल्याणरूपिणी) कही गयी हैं। विद्वानोंने शिवको ही ईश्वर कहा है तथा पार्वतीको माया कहा है। द्विजोंने शंकरको पुरुष तथा गौरीको प्रकृति बताया है। शिव अर्थस्वरूप हैं तो पार्वती वाणी हैं और शिव दिन हैं तो पार्वती रात हैं। महादेव सप्ततन्तुरूप यज्ञ हैं और रुद्राणीको दक्षिणा कहा गया है। भगवान् शंकर आकाश हैं तथा शंकरप्रिया पार्वती पृथ्वी हैं। भगवान् रुद्र समुद्र हैं और गिरिराजकुमारी उसकी लहरें हैं। शूलको आयुधरूपमें धारण करनेवाले भगवान् शिव वृक्ष हैं तो हाथमें शूल धारण करनेवाले शिवकी प्रिया पार्वती उसकी लता हैं॥ ३—६॥
ब्रह्मा हरोऽपि सावित्री शङ्करार्धशरीरिणी।<br>विष्णुर्महेश्वरो लक्ष्मीर्भवानी परमेश्वरी॥ ७<br>वज्रपाणिर्महादेवः शची शैलेन्द्रकन्यका।<br>जातवेदाः स्वयं रुद्रः स्वाहा शवार्थकायिनी॥ ८शिव ब्रह्मा हैं तो शंकरकी अर्धांगिनी पार्वती सावित्री हैं। महेश्वर शिव विष्णु हैं तो परमेश्वरी भवानी लक्ष्मी हैं। महादेव हाथमें वज्र धारण करनेवाले इन्द्र हैं तो पर्वतराजकी

अध्याय ११ ] भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य ६२१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यमस्त्रियम्बको देवस्तत्प्रिया गिरिकन्यका।<br>वरुणो भगवान् रुद्रो गौरी सर्वार्थदायिनी ॥ ९<br><br>बालेन्दुशेखरो वायुः शिवा शिवमनोरमा।<br>चन्द्रार्धमौलियक्षेन्द्रः स्वयमृद्धिः शिवा स्मृता ॥ १०<br><br>चन्द्रार्धशेखरश्चन्द्रो रोहिणी रुद्रवल्लभा।<br>सप्तसप्तिः शिवः कान्ता उमादेवी सुवर्चला ॥ ११पुत्री उमा शची हैं। स्वयं रुद्र ही अग्नि हैं तो शिवकी अर्धाङ्गिनी पार्वती स्वाहा हैं। त्रिनेत्र शिव यम हैं तो गिरिपुत्री पार्वती उनकी प्रिया हैं। भगवान् रुद्र वरुण हैं तो समस्त अभीष्ट प्रदान करनेवाली पार्वती उनकी भार्या हैं। बालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले शिव वायु हैं तो शिववल्लभा पार्वती उनकी भार्या हैं। मस्तकपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित होनेवाले शिव कुबेर हैं तो साक्षात् शिवा कुबेरपत्नी ऋद्धि कही गयी हैं। अर्धचन्द्रसे सुशोभित मस्तकवाले शिव चन्द्रमा हैं तो रुद्रप्रिया शिवा रोहिणी हैं। भगवान् शिव सूर्यदेव हैं तो उनकी प्रिया भगवती उमा [ सूर्यपत्नी ] सुवर्चला हैं ॥ ७—११॥
षण्मुखस्त्रिपुरध्वंसी देवसेना हरप्रिया।<br>उमा प्रसूतिर्वै ज्ञेया दक्षो देवो महेश्वरः ॥ १२<br><br>पुरुषाख्यो मनुः शम्भुः शतरूपा शिवप्रिया।<br>विदुर्भवानीमाकूतिं रुचिं च परमेश्वरम् ॥ १३<br><br>भृगुर्भगाक्षिहा देवः ख्यातिस्त्रिनयनप्रिया।<br>मरीचिर्भगवान् रुद्रः सम्भूतिर्वल्लभा विभोः ॥ १४<br><br>विदुर्भवानीं रुचिरां कविं च परमेश्वरम्।<br>गङ्गाधरोऽङ्गिरा ज्ञेयः स्मृतिः साक्षादुमा स्मृता ॥ १५<br><br>पुलस्त्यः शशभृन्मौलिः प्रीतिः कान्ता पिनाकिनः।<br>पुलहस्त्रिपुरध्वंसी दया कालरिपुप्रिया ॥ १६<br><br>क्रतुर्दक्षकतुध्वंसी सन्नतिर्दयिता विभोः।<br>त्रिनेत्रोऽत्रिरुमा साक्षादनुसूया स्मृता बुधैः ॥ १७<br><br>ऊर्जामाहुरुमां वृद्धां वसिष्ठं च महेश्वरम्।<br>शङ्करः पुरुषाः सर्वे स्त्रियः सर्वा महेश्वरी ॥ १८त्रिपुरका नाश करनेवाले शिव कार्तिकेय हैं तो शिवप्रिया पार्वती [ कार्तिकेयभार्या ] देवसेना हैं। भगवान् महेश्वर दक्षप्रजापति हैं तो उमाको प्रसूति जानना चाहिये। शम्भु पुरुष नामक मनु हैं तो शिवप्रिया पार्वती शतरूपा हैं। परमेश्वर शिवको रुचिप्रजापति तथा भवानीको आकूति कहा गया है। भगके नेत्रको विनष्ट करनेवाले शिव भृगु हैं तो त्रिनेत्र शिवकी प्रिया पार्वती ख्याति हैं। भगवान् रुद्र मरीचि हैं तो प्रभु शिवकी प्रिया पार्वती सम्भूति हैं। परमेश्वरको कवि (शुक्र) तथा भवानीको रुचिरा कहा गया है। गङ्गाधर शिवको अंगिराके रूपमें जानना चाहिये और साक्षात् उमाको स्मृतिके रूपमें समझना चाहिये। चन्द्रशेखर शंकरजी पुलस्त्य हैं तो पिनाकधारी शिवकी प्रिया पार्वती प्रीति हैं। त्रिपुरका विध्वंस करनेवाले शिव ऋषि पुलह हैं तो कालरिपु शिवकी प्रिया उमा दया हैं। दक्षके यज्ञको नष्ट करनेवाले शिव क्रतु हैं तो सर्वव्यापी शिवकी भार्या पार्वती सन्नति हैं। विद्वानोंने तीन नेत्रोंवाले शिवको अत्रि तथा साक्षात् उमाको अनसूया कहा है। महेश्वर शिवको वसिष्ठ तथा श्रेष्ठ उमाको ऊर्जा कहा गया है। [ संसारके ] सभी पुरुष शिवरूप हैं और सभी स्त्रियाँ महेश्वरी पार्वतीरूपा हैं ॥ १२–१८॥
पुल्लिङ्गशब्दवाच्या ये ते च रुद्राः प्रकीर्तिताः।<br>स्त्रीलिङ्गशब्दवाच्या याः सर्वा गौर्या विभूतयः ॥ १९<br><br>सर्वे स्त्रीपुरुषाः प्रोक्तास्तयोरेव विभूतयः।<br>पदार्थशक्तयो या यास्ता गौरीति विदुर्बुधाः ॥ २०<br><br>सा सा विश्वेश्वरी देवी स च सर्वो महेश्वरः।<br>शक्तिमन्तः पदार्था ये स च सर्वो महेश्वरः ॥ २१पुल्लिंगशब्दवाची जो भी पदार्थ हैं, वे सब रुद्र कहे गये हैं; स्त्रीलिङ्गशब्दवाची जो भी हैं, वे सब गौरीकी विभूतियाँ हैं। सभी स्त्री-पुरुष उन्हीं दोनोंकी ही विभूतियाँ कही गयी हैं। पदार्थोंकी जो-जो शक्तियाँ हैं, वे सब गौरी

| ६२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अष्टौ प्रकृतयो देव्या मूर्त्तयः परिकीर्त्तिताः।<br>तथा विकृतयस्तस्या देहबद्धविभूतयः ॥ २२<br><br>विस्फुलिङ्गा यथा तावदग्नौ च बहुधा स्मृताः।<br>जीवाः सर्वे तथा शर्वे द्वन्द्वसत्त्वमुपागताः ॥ २३<br><br>गौरीरूपाणि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम्।<br>शरीरिणस्तथा सर्वे शङ्करांशा व्यवस्थिताः ॥ २४<br><br>श्राव्यं सर्वमुमारूपं श्रोता देवो महेश्वरः।<br>विषयित्वं विभुर्धत्ते विषयात्मकतामुमा ॥ २५<br><br>स्रष्टव्यं वस्तुजातं तु धत्ते शङ्करवल्लभा।<br>स्रष्टा स एव विश्वात्मा बालचन्द्रार्धशेखरः ॥ २६<br><br>दृश्यवस्तु प्रजारूपं बिभर्ति भुवनेश्वरी।<br>द्रष्टा विश्वेश्वरो देवः शशिखण्डशिखामणिः ॥ २७हैं—ऐसा विद्वानोंने कहा है। वह शक्ति विश्वेश्वरी देवी उमा ही हैं और वह समस्त पदार्थ भगवान् महेश्वर ही हैं। शक्तिसे युक्त जो भी पदार्थ हैं, वे सब महेश्वर शिवरूप हैं। आठों प्रकृतियाँ देवीकी मूर्तियाँ हैं और सभी विकृतियाँ उनकी देहबद्ध विभूतियाँ कही गयी हैं। जैसे अग्निमें अनेक विस्फुलिङ्ग बताये गये हैं, वैसे ही द्वन्द्वसत्त्वको प्राप्त शिवमें सभी जीव स्थित हैं। जीवोंके समस्त शरीर गौरीरूप हैं और समस्त जीव शंकरके अंशरूपसे उनमें व्यवस्थित हैं। श्रवणके योग्य सब कुछ उमाका रूप है और उसके श्रोता भगवान् महेश्वर हैं। शिव विषयका आस्वादकत्व धारण करते हैं और पार्वती विषयात्मकता धारण करती हैं। शंकरप्रिया पार्वती सृजन करनेयोग्य सभी वस्तुओंको धारण करती हैं और अर्धबालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले वे विश्वात्मा ही उनके स्रष्टा हैं। भुवनेश्वरी उमा समस्त प्रजारूप दृश्य वस्तुओंको धारण करती हैं और चन्द्रखण्डको सिरपर धारण करनेवाले भगवान् विश्वेश्वर उनके द्रष्टा हैं॥ १९–२७॥
रसजातमुमारूपं घ्रेयजातं च सर्वशः।<br>देवो रसयिता शम्भुर्घाता च भुवनेश्वरः ॥ २८<br><br>मन्तव्यवस्तुतां धत्ते महादेवी महेश्वरी।<br>मन्ता स एव विश्वात्मा महादेवो महेश्वरः ॥ २९<br><br>बोद्धव्यं वस्तुरूपं च बिभर्ति भववल्लभा।<br>देवः स एव भगवान् बोद्धा बालेन्दुशेखरः ॥ ३०<br><br>पीठाकृतिरुमा देवी लिङ्गरूपश्च शङ्करः।<br>प्रतिष्ठाप्य प्रयत्नेन पूजयन्ति सुरासुराः ॥ ३१<br><br>ये ये पदार्था लिङ्गाङ्कास्ते ते शर्वविभूतयः।<br>अर्था भगाङ्किता ये ये ते ते गौर्या विभूतयः ॥ ३२<br><br>स्वर्गपाताललोकान्तब्रह्माण्डावरणाष्टकम् ।<br>ज्ञेयं सर्वमुमारूपं ज्ञाता देवो महेश्वरः ॥ ३३<br><br>बिभर्ति क्षेत्रतां देवी त्रिपुरान्तकवल्लभा।<br>क्षेत्रज्ञत्वमथो धत्ते भगवानन्धकान्तकः ॥ ३४सम्पूर्ण रस उमारूप है और शम्भु रस ग्रहण करनेवाले हैं; सूँघनेयोग्य वस्तुसमूह उमारूप है और शिव उसके घ्राता हैं। महादेवी महेश्वरी माननेयोग्य वस्तुता (भाव)-को धारण करती हैं और वे विश्वात्मा महादेव महेश्वर उसका मनन करनेवाले हैं। शिवप्रिया पार्वती बोध करनेयोग्य वस्तुओंको धारण करती हैं और बालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले वे भगवान् शिव उनके बोद्धा हैं। उमा पीठाकृति (जलहरी) हैं और शिव [उसमें स्थित] लिङ्गरूप हैं। देवता तथा दानव लिङ्ग तथा वेदीके रूपमें स्थापित करके प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा करते हैं। जो-जो पदार्थ पुरुषचिह्नोंवाले हैं, वे शिवकी विभूतियाँ हैं और जो-जो पदार्थ स्त्रीचिह्नोंवाले हैं, वे गौरीकी विभूतियाँ हैं। स्वर्गसे पाताललोकपर्यन्त आठ आवरणोंवाले ब्रह्माण्डमें जो भी जाननेयोग्य है, वह सब उमारूप है और उसके ज्ञाता भगवान् महेश्वर हैं। त्रिपुराका नाश करनेवाले शिवकी प्रिया देवी [पार्वती] क्षेत्रता (लिङ्गशरीररूपता)-को धारण करती हैं और अन्धकका संहार करनेवाले भगवान् [शिव] क्षेत्रज्ञत्व (जीवरूपत्व)-को धारण करते हैं॥ २८–३४॥

अध्याय ११] भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य ६२३


श्लोकहिन्दी अर्थ
शिवलिङ्गं समुत्सृज्य यजन्ते चान्यदेवताः।<br>स नृपः सह देशेन रौरवं नरकं व्रजेत्॥ ३५<br><br>शिवभक्तो न यो राजा भक्तोऽन्येषु सुरेषु यः।<br>स्वपतिं युवतिस्त्यक्त्वा यथा जारेषु राजते॥ ३६<br><br>ब्रह्मादयः सुराः सर्वे राजानश्च महर्द्धिकाः।<br>मानवा मुनयश्चैव सर्वे लिङ्गं यजन्ति च॥ ३७<br><br>विष्णुना रावणं हत्वा ससैन्यं ब्रह्मणः सुतम्।<br>स्थापितं विधिवद्भक्त्या लिङ्गं तीरे नदीपतेः॥ ३८[जिस राजाके राज्यमें] लोग शिवलिङ्गको छोड़कर अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वह राजा अपने देशसहित रौरव नरकमें जाता है। जो राजा शिवभक्त नहीं है और अन्य देवताओंके प्रति भक्तिपरायण रहता है, वह वैसे ही है, जैसे कोई युवती अपने पतिको छोड़कर परपुरुषोंमें आसक्ति रखती है। ब्रह्मा आदि सभी देवता, बड़े-बड़े ऐश्वर्यशाली राजा, मनुष्य तथा मुनिगण शिवलिङ्गकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णुने [रामावतारमें] सेनासहित ब्राह्मणपुत्र रावणका संहार करके समुद्रके तटपर विधिपूर्वक शिवलिङ्गकी स्थापना की थी॥ ३५—३८॥
कृत्वा पापसहस्त्राणि हत्वा विप्रशतं तथा।<br>भावात्समाश्रितो रुद्रं मुच्यते नात्र संशयः॥ ३९<br><br>सर्वे लिङ्गमया लोकाः सर्वे लिङ्गे प्रतिष्ठिताः।<br>तस्मादभ्यर्चयेल्लिङ्गं यदिच्छेच्छाश्वतं पदम्॥ ४०<br><br>सर्वाकारौ स्थितावेतौ नरैः श्रेयोऽर्थिभिः शिवौ।<br>पूजनीयौ नमस्कार्यौ चिन्तनीयौ च सर्वदा॥ ४१हजारों पाप करके तथा सैकड़ों विप्रोंका वध करके भी जो भक्तिपूर्वक रुद्रका आश्रय ग्रहण करता है, वह मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। समस्त लोक लिङ्गमय है और सभी लिङ्गमें ही स्थित हैं; अतः यदि कोई शाश्वत पदकी इच्छा रखता हो, तो उसे शिवलिङ्गका पूजन अवश्य करना चाहिये। अपने कल्याणकी कामना करनेवाले मनुष्योंको सर्वरूपमें स्थित इन दोनों (शिव-पार्वती)-का सर्वदा पूजन, नमस्कार और चिन्तन करना चाहिये॥ ३९—४१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवविभूतिमहिमवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवविभूतिमहिमावर्णन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११॥

१२- भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता

६२४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

बारहवाँ अध्याय

भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता

श्लोकअर्थ
सनत्कुमार उवाच<br>मूर्तयोऽष्टौ समाचक्ष्व शङ्करस्य महात्मनः।<br>विश्वरूपस्य देवस्य गणेश्वर महामते॥ १सनत्कुमार बोले— हे गणेश्वर! हे महामते! विश्वरूप महात्मा भगवान् शंकरकी आठ मूर्तियोंको आप मुझे बतायें॥ १॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>हन्त ते कथयिष्यामि महिमानमुमापतेः।<br>विश्वरूपस्य देवस्य सरोजभवसम्भव॥ २<br><br>भूरापोऽग्निर्मरुद् व्योम भास्करो दीक्षितः शशी।<br>भवस्य मूर्तयः प्रोक्ताः शिवस्य परमेष्ठिनः॥ ३<br><br>खात्मेन्दुवह्निसूर्याम्भोधराः पवन इत्यपि।<br>तस्याष्टमूर्तयः प्रोक्ता देवदेवस्य धीमतः॥ ४<br><br>अग्निहोत्रेऽर्पिते तेन सूर्यात्मनि महात्मनि।<br>तद्विभूतीस्तथा सर्वे देवास्तृप्यन्ति सर्वदा॥ ५<br><br>वृक्षस्य मूलसेकेन यथा शाखोपशाखिकाः।<br>तथा तस्यार्चया देवास्तथा स्युस्तद्विभूतयः॥ ६नन्दिकेश्वर बोले— हे कमलयोनि (ब्रह्मा)-के पुत्र! मैं उमापति विश्वरूप महादेवकी महिमाका वर्णन आपसे अवश्य करूँगा। भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, भास्कर, यजमान तथा चन्द्र—ये परमेष्ठी भगवान् शिवकी आठ मूर्तियाँ कही गयी हैं। आकाश, आत्मा (जीव), चन्द्र, अग्नि, सूर्य, जल, पृथ्वी, पवन—ये भी उन बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेवकी आठ मूर्तियाँ कही गयी हैं। इसीलिये अग्निमें विधिपूर्वक दी गयी आहुति, सूर्यको प्रदत्त अर्घ्य आदि तथा परमात्माके प्रति समर्पित पदार्थसे उनकी समस्त विभूतियाँ और सभी देवता सदैव तृप्त होते हैं। जिस प्रकार वृक्षके मूलको सींचनेसे उसकी शाखाएँ तथा उपशाखाएँ स्वयं पोषित होती हैं, उसी प्रकार उन शिवकी पूजासे देवगण तथा उनकी विभूतियाँ स्वयं सन्तुष्ट हो जाती हैं॥ २—६॥
तस्य द्वादशधा भिन्नं रूपं सूर्यात्मकं प्रभोः।<br>सर्वदेवात्मकं याज्यं यजन्ति मुनिपुङ्गवाः॥ ७उन प्रभु शिवके बारह प्रकारके भिन्न सूर्यात्मक रूप हैं; श्रेष्ठ मुनिगण उसी सर्वदेवात्मक पूज्य रूपका यजन करते हैं॥ ७॥
अमृताख्या कला तस्य सर्वस्यादित्यरूपिणः।<br>भूतसञ्जीवनी चेष्टा लोकेऽस्मिन् पीयते सदा॥ ८उन आदित्यरूप भगवान् शिवकी अमृता नामक कला प्राणियोंको जीवन प्रदान करती है; इस लोकमें सभीके लिये प्रिय इस कलाका सदा पान किया जाता है॥ ८॥
चन्द्राख्यकिरणास्तस्य धूर्जटेर्भास्करात्मनः।<br>ओषधीनां विवृद्ध्यर्थं हिमवृष्टिं वितन्वते॥ ९सूर्यरूप उन भगवान् शिवकी चन्द्र नामक किरणें औषधियोंकी वृद्धिके लिये हिमवृष्टिका विस्तार करती हैं॥ ९॥
शुक्लाख्या रश्मयस्तस्य शम्भोर्मार्तण्डरूपिणः।<br>घर्मं वितन्वते लोके सस्यपाकादिकारणम्॥ १०मार्तण्डरूपी उन शिवकी शुक्ल नामक किरणें फसलोंके पाक आदिकी कारणरूप ऊष्माका लोकमें विस्तार करती हैं॥ १०॥
दिवाकरात्मनस्तस्य हरिकेशाह्वयः करः।<br>नक्षत्रपोषकश्चैव प्रसिद्धः परमेष्ठिनः॥ ११उन सूर्यरूप परमेष्ठी शिवकी हरिकेश नामसे

अध्याय १२] भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता ६२५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विश्वकर्माह्वयस्तस्य किरणो बुधपोषकः।<br>सर्वेश्वरस्य देवस्य सप्तसप्तिस्वरूपिणः॥ १२<br>विश्वव्यच इति ख्यातः किरणस्तस्य शूलिनः।<br>शुक्रपोषकभावेन प्रतीतः सूर्यरूपिणः॥ १३<br>संयद्वसुरिति ख्यातो यस्य रश्मिस्त्रिशूलिनः।<br>लोहिताङ्गं प्रपुष्णाति सहस्रकिरणात्मनः॥ १४<br>अर्वावसूरिति ख्यातो रश्मिस्तस्य पिनाकिनः।<br>बृहस्पतिं प्रपुष्णाति सर्वदा तपनात्मनः॥ १५<br>स्वराडिति समाख्यातः शिवस्यांशः शनैश्चरम्।<br>हरिदश्वात्मनस्तस्य प्रपुष्णाति दिवानिशम्॥ १६<br>सूर्यात्मकस्य देवस्य विश्वयोनेरुमापतेः।<br>सुषुम्णाख्यः सदा रश्मिः पुष्णाति शिशिरद्युतिम्॥ १७प्रसिद्ध किरण नक्षत्रोंको दीप्ति प्रदान करती है। उन सूर्यरूप सर्वेश्वर प्रभुकी विश्वकर्मा नामक किरण बुधका पोषण करती है। उन शूलधारी सूर्यरूप शिवकी विश्वव्यच—इस नामसे प्रसिद्ध किरण शुक्रके पोषकभावसे प्रतिष्ठित है। उन सूर्यरूप त्रिशूलधारी शिवकी संयद्वसु—इस नामसे प्रसिद्ध किरण मंगलका पोषण करती है। उन सूर्यरूप पिनाकी शिवकी अर्वावसु—इस नामवाली किरण सर्वदा बृहस्पतिका पोषण करती है। सूर्यरूप उन शिवकी स्वराट्—इस नामसे प्रसिद्ध किरण दिन-रात शनैश्चरका पोषण करती है। विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले उमापति सूर्यरूप महादेवकी सुषुम्णा नामक किरण सदा चन्द्रमाका पोषण करती है॥ ११—१७॥
सौम्यानां वसुजातानां प्रकृतित्वमुपागता।<br>तस्य सोमाह्वया मूर्तिः शङ्करस्य जगद्गुरोः॥ १८<br>तस्य सोमात्मकं रूपं शुक्रत्वेन व्यवस्थितम्।<br>शरीरभाजां सर्वेषां देवस्यान्तकशासिनः॥ १९<br>शरीरिणामशेषाणां मनस्येव व्यवस्थितम्।<br>वपुः सोमात्मकं शम्भोस्तस्य सर्वजगद्गुरोः॥ २०उन जगद्गुरु शंकरकी सोम (चन्द्र) नामक मूर्ति समस्त शान्त किरणोंकी प्रकृतिको प्राप्त है। कालपर शासन करनेवाले उन शिवका सोमात्मकरूप सभी देहधारियोंमें शुक्र (वीर्य)-रूपसे व्यवस्थित है। समस्त जगत्के गुरु उन शिवका चन्द्ररूप शरीर ही सभी जीवोंके मनमें प्रतिष्ठित है॥ १८—२०॥
शम्भोः षोडशधा भिन्ना स्थितामृतकलात्मनः।<br>सर्वभूतशरीरेषु सोमाख्या मूर्तिरुत्तमा॥ २१चन्द्ररूप शिवकी सोम नामक उत्तम मूर्ति सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें सोलह प्रकारके विभिन्न रूपोंमें स्थित है॥ २१॥
देवान् पितॄंश्च पुष्णाति सुधयामृतया सदा।<br>मूर्तिः सोमाह्वया तस्य देवदेवस्य शासितुः॥ २२उन देवाधिदेव प्रभुकी 'चन्द्र' नामक मूर्ति अपनी अविनाशी सुधासे देवताओं और पितरोंको सदा तृप्त करती रहती है॥ २२॥
पुष्णात्योषधिजातानि देहिनामात्मशुद्धये।<br>सोमाह्वया तनुस्तस्य भवानीमिति निर्दिशेत्॥ २३उन शिवकी सोम नामक मूर्ति प्राणियोंकी देहशुद्धिके लिये समस्त औषधियोंको पोषित करती है; उस मूर्तिको भवानीरूप ही समझना चाहिये॥ २३॥
यज्ञानां पतिभावेन जीवानां तपसामपि।<br>प्रसिद्धरूपमेतद्वै सोमात्मकमुमापतेः॥ २४<br>जलानामोषधीनां च पतिभावेन विश्रुतम्।<br>सोमात्मकं वपुस्तस्य शम्भोर्भगवतः प्रभोः॥ २५उमापति शिवकी यह चन्द्ररूप मूर्ति यज्ञों, जीवों और तपोंके स्वामीके रूपमें प्रसिद्ध है। उन सर्वशक्तिमान् भगवान् शम्भुका चन्द्ररूप विग्रह जल और औषधियोंके स्वामीके रूपमें विख्यात है॥ २४-२५॥
देवो हिरण्मयो मृष्टः परस्परविवेकिभिः।<br>करणानामशेषाणां देवतानां निराकृतिः॥ २६आत्मा और अनात्मा-सम्बन्धी विचारसम्पन्न जनोंसे सुविचारित जो सदाशिव हैं, वे समस्त इन्द्रियों तथा उनके देवताओंसे अग्राह्य हैं तथा विशुद्ध अमृतरूप हैं॥ २६॥