भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 611
अध्याय ८ ]शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धूमूकका शिवगणत्वको प्राप्त करना६०१

| स याति दिव्यमतुलं विष्णोस्तत्परमं पदम्।<br>अपि पापसमाचारो द्वादशाक्षरतत्परः ॥ ३१<br><br>प्राप्नोति परमं स्थानं नात्र कार्या विचारणा।<br>किं पुनर्ये स्वधर्मस्था वासुदेवपरायणाः ॥ ३२<br><br>दिव्यं स्थानं महात्मानः प्राप्नुवन्तीति सुव्रताः ॥ ३३ | मन्त्रका नित्य जप करता है, वह भगवान् विष्णुके अनुपम, दिव्य तथा परमपदको प्राप्त होता है। पाप करनेवाला भी यदि इस द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )-के जपमें तत्पर रहता है, तो वह परम पद प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये, तो फिर हे सुव्रतो! जो लोग अपने धर्ममें स्थित रहते हुए वासुदेवपरायण हैं, उनकी बात ही क्या; वे महात्मा तो दिव्य स्थान (विष्णुलोक) अवश्य प्राप्त करते हैं॥ २८-३३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे द्वादशाक्षरप्रशंसा नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'द्वादशाक्षरप्रशंसा' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥


आठवाँ अध्याय

शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धुन्धूमूकका शिवकी कृपासे शिवगणत्वको प्राप्त करना

सूत उवाचसूतजी बोले—
अष्टाक्षरो द्विजश्रेष्ठा नमो नारायणोति च।<br>द्वादशाक्षरमन्त्रश्च परमः परमात्मनः ॥ १<br>मन्त्रः षडक्षरो विप्राः सर्ववेदार्थसञ्चयः।<br>यश्चों नमः शिवायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ २<br>तथा शिवतरायेति दिव्यः पञ्चाक्षरः शुभः।<br>मयस्कराय चेत्येवं नमस्ते शङ्कराय च ॥ ३<br>सप्ताक्षरोऽयं रुद्रस्य प्रधानपुरुषस्य वै।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ ४हे द्विजश्रेष्ठो! 'ॐ नमो नारायणाय' यह अष्टाक्षर मन्त्र तथा द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )—ये परमात्माके श्रेष्ठ मन्त्र हैं। किंतु हे विप्रो! 'ॐ नमः शिवाय'—यह जो षडक्षर मन्त्र है, वह सभी वेदार्थोंका सारभूत है, उसी प्रकार 'शिवतराय' तथा 'मयस्कराय'—ये दिव्य तथा मंगलकारक पंचाक्षरमन्त्र सभी मनोरथोंको प्राप्त करानेवाले हैं और उसी तरह प्रधानपुरुष रुद्रका 'नमस्ते शङ्कराय'—यह सप्ताक्षर मन्त्र भी सभी मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है॥ १-३^{१}/_{२}॥
मन्त्रैरेतैर्द्विजश्रेष्ठा मुनयश्च यजन्ति तम्।<br>शङ्करं देवदेवेशं मयस्करमजोद्भवम् ॥ ५<br>शिवं च शङ्करं रुद्रं देवदेवमुमापतिम्।<br>प्राहुर्नमः शिवायेति नमस्ते शङ्कराय च ॥ ६<br>मयस्कराय रुद्राय तथा शिवतराय च।<br>जप्त्वा मुच्येत वै विप्रो ब्रह्महत्यादिभिः क्षणात् ॥ ७हे द्विजश्रेष्ठो! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रसहित सभी देवता, श्रेष्ठ द्विजगण एवं मुनिलोग इन मन्त्रोंसे उन शंकर, देवदेवेश, मयस्कर तथा अजोद्भव शिवका यजन करते हैं और उन्हीं शिवको शंकर, रुद्र, देवदेव तथा उमापति कहते हैं। नमः शिवाय, नमस्ते शङ्कराय, मयस्कराय, रुद्राय, शिवतराय—इन मन्त्रोंका जप करके विप्र ब्रह्महत्या आदि [महापातकों]-से क्षणभरमें मुक्त हो जाता है॥ ४-७॥
पुरा कश्चिदद्विजः शक्तो धुन्धूमूक इति श्रुतः।<br>आसीत्तृतीये त्रेतायामावर्ते च मनोः प्रभोः ॥ ८पूर्वकालमें प्रभु मनुके तीसरे आवर्त (चतुर्युग)-