भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| वासुदेवेति नियतमैतरेयो वदत्यसौ।<br>पिता तस्य तथा चान्यां परिणीय यथाविधि॥ १९<br>पुत्रानुत्पादयामास तथैव विधिपूर्वकम्।<br>वेदानधीत्य सम्पन्ना बभूवुः सर्वसम्मताः॥ २०<br>ऐतरेयस्य सा माता दुःखिता शोकमूर्च्छिता। | बोल पाता था। उसकी जिह्वा किसी भी शब्दका उच्चारण नहीं करती थी, वह ऐतरेय नामक बालक केवल 'वासुदेवाय'—इस मन्त्रको निरन्तर बोलता था। इससे वह द्विजश्रेष्ठ बहुत दुःखित हुआ॥ १६–१८ १/२॥<br><br>तब उसके पिताने दूसरी स्त्रीसे विधानके साथ विवाह करके उससे विधिपूर्वक पुत्र उत्पन्न किये। वे पुत्र वेदोंका अध्ययन करके सबके मान्य तथा सम्पत्तियुक्त हो गये॥ १९-२०॥<br><br>ऐतरेयकी वह माता इससे अत्यन्त दुःखित तथा शोकाकुल होकर [उससे] बोली—'मेरी सौतके पुत्र सम्पन्न हैं तथा वेदवेदांगमें पारंगत हैं; वे ब्राह्मणोंसे पूजित होते हुए अपनी माताको आनन्दित करते हैं। एक तुम हो जो मुझ अभागिनको उद्यमहीन पुत्र उत्पन्न हुए। अब तो मेरा मर जाना ही श्रेयस्कर है; जीवित रहना किसी भी तरह ठीक नहीं'॥ २१-२२ १/२॥ | | उवाच पुत्राः सम्पन्ना वेदवेदाङ्गपारगाः॥ २१<br>ब्राह्मणैः पूज्यमाना वै मोदयन्ति च मातरम्।<br>मम त्वं भाग्यहीनायाः पुत्रो जातो निराकृतिः॥ २२<br>ममात्र निधनं श्रेयो न कथञ्चन जीवितम्।<br>इत्युक्तः स च निर्गम्य यज्ञवाटं जगाम वै॥ २३<br>तस्मिन् याते द्विजानां तु न मन्त्राः प्रतिपेदिरे।<br>ऐतरेये स्थिते तत्र ब्राह्मणा मोहितास्तदा॥ २४<br>ततो वाणी समुद्भूता वासुदेवेति कीर्तनात्।<br>ऐतरेयस्य ते विप्राः प्रणिपत्य यथातथम्॥ २५<br>पूजां चक्रुस्ततो यज्ञं स्वयमेव समागतम्।<br>ततः समाप्य तं यज्ञमैतरेयो धनादिभिः॥ २६<br>सर्ववेदान् सदस्याह सषडङ्गान्स समाहितः।<br>तुष्टुवुश्च तथा विप्रा ब्रह्माद्याश्च तथा द्विजाः॥ २७<br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः। | [माताके द्वारा] ऐसा कहा गया वह ऐतरेय वहाँसे निकलकर यज्ञमण्डपमें गया। उसके पहुँचते ही [वहाँ उपस्थित] ऋत्विजोंको मन्त्र अवगत नहीं हुए। उस ऐतरेयके वहाँ स्थित रहनेपर सभी ब्राह्मण मोहित हो गये। तब वासुदेव इस नाम-मन्त्रके कीर्तनसे उसके मुखसे मन्त्रमयी वाणी निकलने लगी। [यह देखकर] उन विप्रोंने प्रणाम करके यथाविधि ऐतरेयका पूजन किया। तत्पश्चात् वहाँपर यज्ञदेव स्वयं ही उपस्थित हुए। तब उस यज्ञको पूर्ण करके उन विप्रोंके द्वारा वह ऐतरेय धन आदिसे सम्मानित किया गया। उसने एकनिष्ठ होकर छः अंगोंसहित सभी वेदोंका उस विप्रसभामें कथन किया। [तब हर्षित होकर] सभी ऋत्विज ब्राह्मण आदि तथा द्विजगण उसकी स्तुति करने लगे और सभी खेचर, सिद्ध एवं चारण उसके ऊपर पुष्प-वृष्टि करने लगे॥ २३–२७ १/२॥ | | एवं समाप्य वै यज्ञमैतरेयो द्विजोत्तमाः॥ २८<br>मातरं पूजयित्वा तु विष्णोः स्थानं जगाम ह।<br>एतद्वै कथितं सर्वं द्वादशाक्षरवैभवम्॥ २९<br>पठतां शृण्वतां नित्यं महापातकनाशनम्।<br>जपेद्यः पुरुषो नित्यं द्वादशाक्षरमव्ययम्॥ ३० | हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार यज्ञ सम्पन्न करके वह ऐतरेय अपनी माताकी पूजा करके विष्णुलोक चला गया। मैंने यह द्वादशाक्षर मन्त्रका महत्त्व आपलोगोंको बतला दिया। इसे पढ़ने तथा सुननेवालोंके महापापका नाश हो जाता है। जो मनुष्य इस अविनाशी द्वादशाक्षर |