श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| | के त्रेतायुगमें कोई धुन्धूमूक नामक सामर्थ्यसम्पन्न द्विज था॥ ८॥ | | मेघवाहनकल्पे वै ब्रह्मणः परमात्मनः।<br>मेघो भूत्वा महादेवं कृत्तिवासममीश्वरम्॥ ९<br><br>बहुमानेन वै रुद्रं देवदेवो जनार्दनः।<br>खिन्नोऽतिभाराद्रुद्रस्य निःश्वासोच्छ्वासवर्जितः॥ १०<br><br>विज्ञाप्य शितिकण्ठाय तपश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः।<br>तपसा परमैश्वर्यं बलं चैव तथाद्भुतम्॥ ११<br><br>लब्धवान् परमेशानाच्छङ्करात्परमात्मनः ।<br>तस्मात्कल्पस्तदा चासीन्मेघवाहनसंज्ञया॥ १२ | मेघवाहन कल्पमें परमात्मा शिवका मेघरूपी वाहन बनकर देवदेव जनार्दन विष्णुने अत्यन्त आदरके साथ उन महादेव कृत्तिवास (व्याघ्रचर्मधारी) ईश्वर रुद्रका वहन किया था। तब रुद्रके अत्यधिक भारसे पीड़ित होनेके कारण वे श्वास-उच्छ्वाससे रहित हो गये। इसके बाद उन कमलनयन विष्णुने शितिकण्ठ शिवको उद्देश्य करके तपस्या की और अपनी तपस्याके द्वारा परमेश्वर तथा परमात्मा शंकरसे परम ऐश्वर्य और अद्भुत बल प्राप्त किया। इसीलिये वह कल्प मेघवाहन नामसे विख्यात हुआ॥ ९–१२॥ | | तस्मिन् कल्पे मुनेः शापाद् धुन्धूमूकसमुद्भवः।<br>धुन्धूमूकात्मजस्तेन दुरात्मा च बभूव सः॥ १३<br><br>धुन्धूमूकः पुरासक्तो भार्यया सह मोहितः।<br>तस्यां वै स्थापितो गर्भः कामासक्तेन चेतसा॥ १४<br><br>अमावास्यामहन्येव मुहूर्ते रुद्रदैवते।<br>अन्तर्वत्नी तदा भार्या भुक्ता तेन यथासुखम्॥ १५<br><br>असूत् सा च तनयं विशल्याख्या प्रयत्नतः।<br>रुद्रे मुहूर्ते मन्देन वीक्षिते मुनिसत्तमाः॥ १६ | उस कल्पमें [पूर्वजन्ममें किसी] मुनिके शापके कारण धुन्धूमूकके यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, धुन्धूमूकका वह पुत्र [पिताके दोषके कारण] दुरात्मा हो गया। पूर्वकालमें वह धुन्धूमूक विरक्त होते हुए भी भार्यापर मोहित हो गया और उसने अमावास्या तिथिको दिनमें ही रुद्रदैवत मुहूर्तमें कामासक्त मनसे भार्याके साथ सुखपूर्वक संसर्ग किया और उसमें गर्भ स्थापित कर दिया। तत्पश्चात् हे मुनिश्रेष्ठो! विशल्या नामक उस [मुनिपत्नी]-ने शनिकी दृष्टिवाले भयंकर मुहूर्तमें अत्यन्त कष्टपूर्वक एक पुत्रको जन्म दिया॥ १३–१६॥ | | मातुः पितुस्तथारिष्टं स सञ्जातस्तथात्मनः।<br>ऋषी तमूचतुर्विप्रा धुन्धूमूकं मिथस्तदा॥ १७<br><br>मित्रावरुणनामानौ दुष्पुत्र इति सत्तमौ।<br>वसिष्ठः प्राह नीचोऽपि प्रभावाद्वै बृहस्पतेः॥ १८ | माता, पिता तथा अपने लिये अरिष्टकारी होकर उसने जन्म लिया था। हे विप्रो! मित्र एवं वरुण नामक श्रेष्ठ ऋषियोंने उस धुन्धूमूकसे कहा कि यह दुष्पुत्र है, किंतु वसिष्ठने उससे कहा कि तुम्हारा यह पुत्र नीच तथा दुर्बुद्धि होते हुए भी बृहस्पतिके प्रभावसे पापसे मुक्त हो जायगा॥ १७–१८ १/२॥ | | पुत्रस्तवासौ दुर्बुद्धिरपि मुच्यति किल्विषात्।<br>दुःखितो धुन्धूमूकोऽसौ दृष्ट्वा पुत्रमवस्थितम्॥ १९<br><br>जातकर्मादिकं कृत्वा विधिवत्स्वयमेव च।<br>अध्यापयामास च तं विधिनैव द्विजोत्तमाः॥ २०<br><br>तेनाधीतं यथान्यायं धौन्धुमूकेन सुव्रताः।<br>कृतोद्वाहस्तदा गत्वा गुरुशुश्रूषणे रतः॥ २१ | हे द्विजश्रेष्ठो! ऐसी दशावाले पुत्रको देखकर वह धुन्धूमूक [बहुत] दुःखित हुआ। उसने विधिपूर्वक उसके जातकर्म आदि संस्कार करके स्वयं उसे सम्यक् प्रकारसे पढ़ाया। उस धुन्धूमूकके पुत्रने भलीभाँति अध्ययन किया। हे सुव्रतो! इसके बाद उसका विवाह कर दिया गया, तब वहाँसे जाकर वह गुरुसेवामें निरत हो गया॥ १९–२१॥ |