भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| शम्भोः प्रणववाच्यस्य भावना तज्जपादपि।<br>या सिद्धिः स्वपराप्राप्या भवत्येव न संशयः॥ ५१ | शिव-रुद्र आदि शब्दोंमें श्रेष्ठ कहा गया है। शिवके वाचक प्रणवके जपसे तथा उसकी भावनासे जो सिद्धि होती है, वह अन्य मन्त्रोंके जपसे प्राप्त नहीं होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५०-५१॥ | | ज्ञानतत्त्वं प्रयत्नेन योगः पाशुपतः परः।<br>उक्तस्तु देवदेवेन सर्वेषामनुकम्पया॥ ५२ | देवदेव आदित्यरूपी शिवने [याज्ञवल्क्यकी तपस्यासे प्रसन्न होकर] सभीकी अनुकम्पासे ज्ञानतत्त्वरूप श्रेष्ठ पाशुपत योगका उपदेश उन्हें दिया था। तत्पश्चात् याज्ञवल्क्यने | | स होवाचैव याज्ञवल्क्यो यदक्षरं गार्ग्ययोगिनः।<br>अभिवदन्ति स्थूलमनन्तं महाश्चर्यमदीर्घमलोहित-<br>ममस्तकमासायमत एवो पुनरसमसङ्गमगन्धमरस-<br>मचक्षुष्कमश्रोत्रमवाङ्मनोतेजस्कमप्रमाणमनुसुख-<br>मनामगोत्रममरमजरमनामयममृतमोंशब्दममृत-<br>मसंवृतमपूर्वमनपरमनन्तमबाह्यं तदश्नाति किञ्चन<br>न तदश्नाति किञ्चन॥ ५३॥ | गार्गीसे कहा—हे गार्गि! अयोगी लोग नाशशून्य जो शिवतत्त्व है, उसे विराट्रूप, अनन्त तथा अत्यन्त आश्चर्यजनक बताते हैं, किंतु योगीलोग उसे अदीर्घ, अलोहित, मस्तक-विहीन, कभी अस्त न होनेवाला, अतएव नित्यानन्दरस-स्वरूप, स्पर्शशून्य, अगन्ध, अरस (रसविहीन), अचक्षुष्क (नेत्रविहीन), अश्रोत्र (कर्णरहित), मन तथा वाणीसे परे, अतेजस्क (अदाहक), अप्रमाण, सुखकारी, नाम तथा गोत्रसे विहीन, मृत्युरहित, जराशून्य, अनामय (रोगरहित), अमृत (मोक्षरूप) ॐकार शब्दसे प्रतिपाद्य, सुधारूप, अनाच्छादित, पूर्वभागसे शून्य, अपरभागशून्य तथा अन्तरहित कहते हैं। वह ब्रह्म सब कुछ खाता है और वह ब्रह्म कुछ भी नहीं खाता है॥ ५२-५३॥ | | एतत्कालव्यये ज्ञात्वा परं पाशुपतं प्रभुम्।<br>योगे पाशुपते चास्मिन् यस्यार्थः किल उत्तमे॥ ५४ | इस उत्तम पाशुपतयोगमें जिस मनुष्यकी अभिरुचि होती है, वह इस श्रेष्ठ पाशुपत योगको जानकर अन्तकालमें परमेश्वरमें विलीन हो जाता है। | | कृत्वोङ्कारं प्रदीपं मृगय गृहपतिं<br>सूक्ष्ममाद्यान्तरस्थं<br>संयम्य द्वारवासं पवनपटुतरं<br>नायकं चेन्द्रियाणाम्।<br>वाग्जालैः कस्य हेतोर्विभटसि तु भयं<br>दृश्यते नैव किंचि-<br>द्देहस्थं पश्य शम्भुं भ्रमसि किमु परे<br>शास्त्रजालेऽन्धकारे॥ ५५ | ॐकाररूप दीपकको प्रज्वलित करके वायुसे भी अधिक वेगसे गति करनेवाले तथा इन्द्रियोंके स्वामी मनको भलीभाँति नियन्त्रित करके अन्तर्यामी, सूक्ष्म तथा सबके आदिस্বরূপ उस परमात्माका अन्वेषण करो। तुम वाग्जालोंमें पड़कर किसलिये वृथा विवाद कर रहे हो। भय तो कुछ भी नहीं दिखायी दे रहा है। अतः तुम अपनी ही देहमें विद्यमान शम्भुको देखो; अन्धकारमय शास्त्रजालमें क्यों भटक रहे हो? इस प्रकार मुमुक्षुको चाहिये कि वह शिवजीके द्वारा मुनियोंके प्रति कहे गये उपदेशपर विद्वानोंके साथ भलीभाँति विचार | | एवं सम्यग्बुधैर्ज्ञात्वा मुनीनामथ चोक्तं शिवेन।<br>असमरसं पञ्चधा कृत्वोभयं चात्मनि योजयेत्॥ ५६ | करके आनन्दरूप आत्मस्वरूपको पंचकोशसे परे करके अभयरूपी मोक्ष प्राप्त करे॥ ५४—५६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतव्रतवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'पाशुपतव्रतवर्णन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥