भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ९ ] पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या 'पशूपाशमोक्षविवरण ६१५


| कालेषु त्रिषु सम्बन्धस्तस्य द्वेषेण नो भवेत्।<br>मायातीतस्य देवस्य स्थाणोः पशुपतेर्विभोः॥ ३७<br>तथैवाभिनिवेशेन सम्बन्धो न कदाचन।<br>शङ्करस्य शरण्यस्य शिवस्य परमात्मनः॥ ३८<br>कुशलाकुशलैस्तस्य सम्बन्धो नैव कर्मभिः।<br>भवेत्कालत्रये शम्भोरविद्यामतिवर्तिनः॥ ३९<br>विपाकैः कर्मणां वापि न भवेदेव सङ्गमः।<br>कालेषु त्रिषु सर्वस्य शिवस्य शिवदायिनः॥ ४० | और न तो भविष्यमें होगा। मायासे परे, देवताओंके भी देव, स्थाणु, पशुपति तथा सर्वैश्वर्यसम्पन्न उन शिवका सम्बन्ध द्वेषसे तीनों कालोंमें नहीं हो सकता। उसी प्रकार शरणदाता तथा कल्याणकारक परमात्मा शिवका सम्बन्ध अभिनिवेशसे भी कभी नहीं सम्भव है। पुण्य तथा पापकर्मोंसे भी अविद्याका अतिवर्तन करनेवाले उन शिवका सम्बन्ध तीनों कालोंमें नहीं है। कल्याण प्रदान करनेवाले सर्वरूप शिवका सम्बन्ध [शुभाशुभ] कर्मोंके फलसे भी तीनों कालोंमें नहीं है॥ ३६-४०॥ | | सुखदुःखैरसंस्पृश्यः कालत्रितयवर्तिभिः।<br>स तैर्विनश्वरैः शम्भुर्बोधानन्दात्मकः परः॥ ४१<br>आशयैरपरामृष्टः कालत्रितयगोचरैः।<br>धियांपतिः स्वभूरेष महादेवो महेश्वरः॥ ४२<br>अस्पृश्यः कर्मसंस्कारैः कालत्रितयवर्तिभिः।<br>तथैव भोगसंस्कारैर्भगवानन्तकान्तकः॥ ४३ | वे बोधानन्दस्वरूप परम शिव तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले उन विनाशशील सुख-दुःखोंसे स्पर्श होनेयोग्य नहीं हैं। बुद्धिके स्वामी तथा स्वयं प्रकट होनेवाले वे महादेव महेश्वर तीनों कालोंमें अनुभूत होनेवाली कामनाओंसे भी अस्पृश्य हैं। इसी प्रकार कालका विनाश करनेवाले भगवान् शिव तीनों कालोंमें वर्तमान कर्मसंस्कारों तथा भोगसंस्कारोंसे अस्पृश्य हैं॥ ४१-४३॥ | | पुंविशेषपरो देवो भगवान् परमेश्वरः।<br>चेतनाचेतनायुक्तप्रपञ्चादखिलात्परः ॥ ४४<br>लोके सातिशयत्वेन ज्ञानैश्वर्यं विलोक्यते।<br>शिवेनातिशयत्वेन शिवं प्राहुर्मनीषिणः॥ ४५ | वे परमेश्वर भगवान् महादेव सम्पूर्ण जीवोंसे श्रेष्ठ हैं और जड़-चेतनरूप सम्पूर्ण सृष्टिप्रपंचसे परे हैं। जैसे संसारमें ज्ञान और ऐश्वर्यको अत्यन्त श्रेष्ठ रूपमें देखा जाता है, वैसे ही अतिशय कल्याणरूप होनेसे ही मनीषियोंने महादेवको शिव कहा है॥ ४४-४५॥ | | प्रतिसर्गं प्रसूतानां ब्रह्मणां शास्त्रविस्तरम्।<br>उपदेष्टा स एवादौ कालावच्छेदवर्तिनाम्॥ ४६<br>कालावच्छेदयुक्तानां गुरूणामप्यसौ गुरुः।<br>सर्वेषामेव सर्वेशः कालावच्छेदवर्जितः॥ ४७ | प्रत्येक सर्गमें उत्पन्न होनेवाले तथा कालसीमामें बँधे सभी ब्रह्माओंको सम्पूर्ण शास्त्रोंका आरम्भमें उपदेश करनेवाले वे शिव ही हैं। कालसीमासे रहित वे सर्वेश्वर शिव कालावच्छेदसे युक्त सभी गुरुओंके भी गुरु हैं॥ ४६-४७॥ | | अनादिरेष सम्बन्धो विज्ञानोत्कर्षयोः परः।<br>स्थितयोरीदृशः सर्वः परिशुद्धः स्वभावतः॥ ४८<br>आत्मप्रयोजनाभावे परानुग्रह एव हि।<br>प्रयोजनं समस्तानां कार्याणां परमेश्वरः॥ ४९ | देहमें विद्यमान जीव तथा ईश्वरका यह सेवक तथा सेव्यका सम्बन्ध अनादि है। स्वभावसे अत्यन्त निर्मल तथा विश्वरूप वे शिव माया-सम्बन्धसे रहित हैं। [नित्यानन्दस्वरूप होनेके कारण] अपने प्रयोजनके अभावमें भी वे परमेश्वर शिव जीवके प्रति समस्त कार्योंका प्रयोजनरूप अनुग्रह हैं॥ ४८-४९॥ | | प्रणवो वाचकस्तस्य शिवस्य परमात्मनः।<br>शिवरुद्रादिशब्दानां प्रणवोऽपि परः स्मृतः॥ ५० | प्रणव उन परमात्मा शिवका वाचक है। यह प्रणव |

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