भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६१४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
श्लोकअर्थ
सर्वकार्येण हेतुत्वात्पाशच्छेदपटीयसी।<br>सत्यः सर्वग इत्यादि शिवस्य गुणचिन्तना ॥ २३<br>रूपोपादानचिन्ता च मानसं भजनं विदुः।<br>वाचिकं भजनं धीराः प्रणवादिजपं विदुः ॥ २४भक्ति कही गयी है। समस्त प्रपंचोंके पति विष्णुका भी हेतु होनेके कारण वह भक्ति बन्धनको काटनेमें समर्थ है। वे सत्य हैं तथा सर्वव्यापी हैं—शिवके इन गुणोंको जानने तथा उनके रूप और उपादानोंके चिन्तनको विद्वानोंने मानस भजन कहा है और प्रणव (ॐकार)-के जप आदिको उन्होंने वाचिक भजन कहा है, इसी प्रकार सत्पुरुषोंके द्वारा प्राणायाम आदिको कायिक भजन कहा जाता है॥ २२–२४१/२॥
कायिकं भजनं सद्भिः प्राणायामादि कथ्यते।<br>धर्माधर्ममयैः पाशैर्बन्धनं देहिनामिदम् ॥ २५<br>मोचकः शिव एवैको भगवान् परमेश्वरः।<br>चतुर्विंशतितत्त्वानि मायाकर्मगुणा इति ॥ २६<br>कीर्त्यन्ते विषयाश्चेति पाशा जीवनिबन्धनात्।<br>तैर्बद्धाः शिवभक्त्यैव मुच्यन्ते सर्वदेहिनः ॥ २७<br>पञ्चक्लेशमयैः पाशैः पशून् बध्नाति शङ्करः।<br>स एव मोचकस्तेषां भक्त्या सम्यगुपासितः ॥ २८धर्माधर्ममय पाशोंसे जीवोंका यह बन्धन होता है और एकमात्र वे भगवान् परमेश्वर शिव ही [उन पाशोंसे जीवोंको] मुक्त करनेवाले हैं। चौबीस तत्त्व, मायाके गुण और शब्द आदि विषय—ये जीवको बाँधनेके कारण पाश कहे जाते हैं। उन पाशोंसे बँधे हुए सभी प्राणी शिवभक्तिके द्वारा ही मुक्त होते हैं। [अविद्या आदि] पाँच क्लेशरूप पाशोंसे भी वे शिव जीवोंको बाँधते हैं और वे ही भक्तिके द्वारा भलीभाँति उपासित किये जानेपर पाशोंसे उन्हें मुक्त कर देते हैं॥ २५–२८॥
अविद्यामस्मितां रागं द्वेषं च द्विपदां वराः।<br>वदन्त्यभिनिवेशं च क्लेशान् पाशत्वमागतान् ॥ २९<br>तमो मोहो महामोहस्तामिस्र इति पण्डिताः।<br>अन्धतामिस्र इत्याहुरविद्यां पञ्चधा स्थिताम् ॥ ३०<br>ताञ्जीवान् मुनिशार्दूलाः सर्वांश्चैवाप्यविद्यया।<br>शिवो मोचयति श्रीमान्नान्यः कश्चिद्विमोचकः ॥ ३१<br>अविद्यां तम इत्याहुरस्मितां मोह इत्यपि।<br>महामोह इति प्राज्ञा रागं योगपरायणाः ॥ ३२<br>द्वेषं तामिस्र इत्याहुरन्धतामिस्र इत्यपि।<br>तथैवाभिनिवेशं च मिथ्याज्ञानं विवेकिनः ॥ ३३मनुष्योंमें श्रेष्ठ लोग अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशको जीवोंको बाँधनेवाले [पाँच] क्लेश कहते हैं। पण्डितजन तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र—इन पाँच प्रकारसे अविद्या आदिको स्थित कहते हैं। हे मुनिश्रेष्ठो! केवल शिव ही उन समस्त जीवोंको अविद्यासे मुक्त कर सकते हैं, उन्हें मुक्त करनेवाला कोई दूसरा नहीं है। योगपरायण महाज्ञानियोंने अविद्याको तम, अस्मिताको मोह और रागको महामोह कहा है, इसी प्रकार विवेकयुक्त जनोंने द्वेषको तामिस्र और मिथ्या ज्ञानरूपी अभिनिवेशको अन्धतामिस्र बताया है॥ २९–३३१/२॥
तमसोऽष्टविधा भेदा मोहश्चाष्टविधः स्मृतः।<br>महामोहप्रभेदाश्च बुधैर्दश विचिन्तिताः ॥ ३४<br>अष्टादशविधं चाहुस्तामिस्रं च विचक्षणाः।<br>अन्धतामिस्रभेदाश्च तथाष्टादशधा स्मृताः ॥ ३५तमके आठ भेद हैं। मोह आठ प्रकारका कहा गया है। विद्वानोंने महामोहके दस भेद बताये हैं। बुद्धिमान् लोगोंने तामिस्रको अठारह भेदोंवाला कहा है। अन्धतामिस्रके अठारह प्रकारके भेद बताये गये हैं॥ ३४-३५॥
अविद्ययास्य सम्बन्धो नातीतो नास्त्यनागतः।<br>भवेद्रागेण देवस्य शम्भोरङ्गनिवासिनः ॥ ३६सर्वान्तर्यामी देवदेव शिवका सम्बन्ध अविद्या तथा रागसे न तो वर्तमानमें है, न पूर्वकालमें रहा है