श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ९ ] | पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या... पशुपाशमोक्षविवरण | ६१३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सनत्कुमार उवाच<br>कथं पशुपतिर्देवः पशवः के प्रकीर्तिताः ॥ ९<br>कैः पाशैस्ते निबध्यन्ते विमुच्यन्ते च ते कथम्। | सनत्कुमार बोले— भगवान् शिव पशुपति कैसे हुए, कौन लोग पशु कहे गये हैं, वे किन पाशोंसे बाँधे जाते हैं और पुनः वे कैसे मुक्त होते हैं?॥ ९१/२॥ |
| शैलादिरुवाच<br>सनत्कुमार वक्ष्यामि सर्वमेतद्यथातथम् ॥ १०<br>रुद्रभक्तस्य शान्तस्य तव कल्याणचेतसः।<br>ब्रह्माद्याः स्थावरान्ताश्च देवदेवस्य धीमतः ॥ ११<br>पशवः परिकीर्त्यन्ते संसारवशवर्तिनः।<br>तेषां पतित्वाद्भगवान् रुद्रः पशुपतिः स्मृतः ॥ १२ | शैलादि बोले— हे सनत्कुमार! मैं रुद्रभक्त, शान्तस्वभाव तथा कल्याणभावनासे युक्त चित्तवाले आपको यह सब यथार्थ रूपमें बताऊँगा। ब्रह्मासे लेकर स्थावर-जंगमपर्यन्त सभी मायावशवर्ती हैं और धीमान् देवदेव शिवके पशु कहे जाते हैं। उनका स्वामी होनेके कारण भगवान् रुद्र पशुपति कहे गये हैं॥ १०—१२॥ |
| अनादिनिधनो धाता भगवान् विष्णुरव्ययः।<br>मायापाशेन बध्नाति पशुवत्परमेश्वरः ॥ १३<br>स एव मोचकस्तेषां ज्ञानयोगेन सेवितः।<br>अविद्यापाशबद्धानां नान्यो मोचक इष्यते ॥ १४<br>तमृते परमात्मानं शङ्करं परमेश्वरम्। | आदि तथा अन्तसे रहित, धारण करनेवाले, अव्यय, षडैश्वर्यसम्पन्न, सर्वव्यापक, परमेश्वर महेश्वर ही इन जीवोंको मोहाभिभूत पशुके समान मायापाशमें बाँधते हैं तथा वे ही ज्ञानयोगसे आराधित होनेपर उन्हें मुक्ति देनेवाले भी हैं; क्योंकि अविद्यापाशमें बँधे जीवोंको मुक्ति देनेवाला परमात्मा परमेश्वर शंकरके अतिरिक्त कोई अन्य है ही नहीं॥ १३-१४१/२॥ |
| चतुर्विंशतितत्त्वानि पाशा हि परमेष्ठिनः ॥ १५<br>तैः पाशैर्मोचयत्येकः शिवो जीवैरूपासितः।<br>निबध्नाति पशूनेकश्चतुर्विंशतिपाशकैः ॥ १६<br>स एव भगवान् रुद्रो मोचयत्यपि सेवितः।<br>दशेन्द्रियमयैः पाशैैरन्तःकरणसम्भवैः ॥ १७<br>भूततन्मात्रपाशैश्च पशून्मोचयति प्रभुः।<br>इन्द्रियार्थमयैः पाशैर्बद्धा विषयिणः प्रभुः ॥ १८<br>आशु भक्ता भवन्त्येव परमेश्वरसेवया। | चौबीस तत्त्व ही भगवान् परमेष्ठीके पाश हैं, वे एकमात्र शिव ही जीवोंके द्वारा आराधित होनेपर उन पाशोंसे मुक्त करते हैं। वे भगवान् रुद्र चौबीस पाशोंसे पशुओं (जीवों)-को बाँधते हैं और वे ही सेवित होनेपर बन्धनमुक्त भी करते हैं। दस इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय), अन्तःकरणजन्य भावों [मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त], शब्द आदि पाँच तन्मात्राओं तथा पृथ्वी आदि पाँच महाभूतों—इन समस्त विषयरूप पाशोंसे भगवान् शिव पशुओंको छुड़ाते हैं। इन इन्द्रियोंके विषयरूप पाशोंसे बँधे हुए विषयग्रस्त लोग परमेश्वर शिवकी सेवासे शीघ्र ही उनके भक्त हो जाते हैं॥ १५—१८१/२॥ |
| भज इत्येष धातुर्वै सेवायां परिकीर्तितः ॥ १९<br>तस्मात्सेवा बुधैः प्रोक्ता भक्तिशब्देन भूयसी।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं पशून् बद्ध्वा महेश्वरः ॥ २०<br>त्रिभिर्गुणमयैः पाशैः कार्यं कारयति स्वयम्।<br>दृढेन भक्तियोगेन पशुभिः समुपासितः ॥ २१<br>मोचयत्येव तान् सद्यः शङ्करः परमेश्वरः। | भज्—यह धातु सेवा अर्थमें कही गयी है, अतः विद्वज्जनोंने सेवाको भक्ति शब्दसे सम्बन्धित बताया है। ब्रह्मा आदिसे लेकर तृणपर्यन्त सभी पशुओंको [सत्त्व आदि] तीनों गुणरूपी पाशोंसे बाँधकर महेश्वर स्वयं कार्य कराते हैं। पशुओंके द्वारा दृढ़ भक्तियोगसे सम्यक् आराधित होनेपर वे परमेश्वर शंकर उन्हें शीघ्र ही [बन्धनसे] छुड़ा देते हैं॥ १९—२११/२॥ |
| भजनं भक्तिरित्युक्ता वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥ २२ | मन, वचन तथा कर्मसे [प्रभुका] भजन ही |