श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ६१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| तस्माज्जपेद्धि यो नित्यं प्रागुक्तेन विधानतः।<br>शक्तिबीजसमायुक्तं स याति परमां गतिम्॥ ३४<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमुत्तमम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ ३५<br><br>स याति ब्रह्मलोकं तु रुद्रजाप्यमनुत्तमम्॥ ३६ | इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अतः जो मनुष्य पूर्वमें कहे गये* विधानके अनुसार आदिमें मायाबीज लगाकर इस मन्त्रका नित्य जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥ ३३-३४॥<br><br>[हे मुनियो!] मैंने आपलोगोंसे यह उत्तम कथासार कह दिया, जो [मनुष्य] इस सर्वोत्कृष्ट रुद्रजपसम्बन्धी प्रसंगको पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है॥ ३५-३६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागेऽष्टाक्षरप्रशंसा नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अष्टाक्षरप्रशंसा' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८ ॥
नौवाँ अध्याय
पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या, पाशुपतयोगका माहात्म्य तथा पशुपाशमोक्षविवरण
| ऋषय ऊचुः<br>देवैः पुरा कृतं दिव्यं व्रतं पाशुपतं शुभम्।<br>ब्रह्मणा च स्वयं सूत कृष्णोनाक्लिष्टकर्मणा॥ १<br>पतितेन च विप्रेण धौन्धुमूकेन वै तथा।<br>कृत्वा जप्त्वा गतिः प्राप्ता कथं पाशुपतं व्रतम्॥ २<br>कथं पशुपतिर्देवः शङ्करः परमेश्वरः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं परं कौतूहलं हि नः॥ ३<br><br>सूत उवाच<br>पुरा शापाद्विनिर्मुक्तो ब्रह्मपुत्रो महायशाः।<br>रुद्रस्य देवदेवस्य मरुदेशादिहागतः॥ ४<br>त्यक्त्वा प्रसादाद्रुद्रस्य उष्ट्रदेहमजाज्ञया।<br>शिलादपुत्रमासाद्य नमस्कृत्य विधानतः॥ ५<br>मेरुपृष्ठे मुनिवरः श्रुत्वा धर्ममनुत्तमम्।<br>माहेश्वरं मुनिश्रेष्ठा ह्यपृच्छच्च पुनः पुनः॥ ६<br>नन्दिनं प्रणिपत्यैनं कथं पशुपतिः प्रभुः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं तत्सर्वं च तदाह सः॥ ७<br>तत्सर्वं श्रुतवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।<br>तस्मादहमनुश्रुत्य युष्माकं प्रवदामि वै॥ ८<br>सर्वे शृण्वन्तु वचनं नमस्कृत्वा महेश्वरम्। | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! देवताओंने, ब्रह्माजीने तथा उत्कृष्ट कर्मोंवाले स्वयं विष्णुने पूर्वकालमें इस दिव्य एवं मंगलकारी व्रतको किया था। पतित विप्र धौन्धुमूकने भी इसे करके तथा मन्त्रका जप करके सद्गति प्राप्त की। यह पाशुपतव्रत कैसा है और वे परमेश्वर भगवान् शंकर पशुपति क्यों [कहे जाते] हैं? हमलोगोंको [इस विषयके प्रति] बड़ी जिज्ञासा है; आप हमें बतायें॥ १—३॥<br><br>सूतजी बोले—पूर्वकालमें ब्रह्माजीके पुत्र महायशस्वी सनत्कुमार देवदेव रुद्रके शापसे मुक्त हुए थे। उन भगवान् रुद्रके ही अनुग्रहसे उष्ट्रदेहका त्याग करके वे मरुदेशसे यहाँ (भारतवर्ष) आ गये। पुनः ब्रह्माजीकी आज्ञासे शिलादपुत्र नन्दीके पास मेरुके शिखरपर पहुँचकर उन्हें विधानपूर्वक नमस्कार करके मुनिवरने उनसे सर्वश्रेष्ठ मोक्षधर्मका श्रवणकर पाशुपतव्रतके विषयमें पूछा। हे मुनिश्रेष्ठो! इन नन्दीको बार-बार प्रणाम करके सनत्कुमारने पूछा—प्रभु शिव पशुपति कैसे हुए—यह आप हमसे बतायें। तब उन नन्दीने उन्हें सब कुछ बता दिया। कृष्णद्वैपायन प्रभु व्यासने [सनत्कुमारसे] वह सब सुना और उन [व्यासजी]-से सुन करके अब मैं आपलोगोंसे वही प्रसंग कह रहा हूँ, महेश्वरको नमस्कार करके सभी लोग उस वचनको सुनें॥ ४—८ १/२ ॥ |
* पंचाक्षरमन्त्रका पूर्ण विधान श्रीलिङ्गमहापुराणके पूर्वभागके पचासीवें अध्यायमें वर्णित है।