श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १०] उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन ६१७
दसवाँ अध्याय
उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन तथा शिवके आदेशसे ही सृष्टि-पालन आदि सभी कार्योंका संचालन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>भूय एव ममाचक्ष्व महिमानमुमापतेः।<br>भवभक्त महाप्राज्ञ भगवन्नन्दिकेश्वर॥ १ ॥ | सनत्कुमार बोले— हे शिवभक्त! हे महाप्राज्ञ! हे भगवन्! हे नन्दिकेश्वर! आप उमापति शिवजीकी महिमाका पुनः वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| शैलादिरुवाच<br>सनत्कुमारसङ्क्षेपात्तव वक्ष्याम्यशेषतः।<br>महिमानं महेशस्य भवस्य परमेष्ठिनः॥ २ ॥<br>नास्य प्रकृतिबन्धोऽभूद्बुद्धिबन्धो न कश्चन।<br>न चाहङ्कारबन्धश्च मनोबन्धश्च नोऽभवत्॥ ३ ॥<br>चित्तबन्धो न तस्याभूच्छ्रोत्रबन्धो न चाभवत्।<br>न त्वचां चक्षुषां वापि बन्धो जज्ञे कदाचन॥ ४ ॥<br>जिह्वाबन्धो न तस्याभूद्घ्राणबन्धो न कश्चन।<br>पादबन्धः पाणिबन्धो वाग्बन्धश्चैव सुव्रत॥ ५ ॥<br>उपस्थेन्द्रियबन्धश्च भूततन्मात्रबन्धनम्।<br>नित्यशुद्धस्वभावेन नित्यबुद्धो निसर्गतः॥ ६ ॥<br>नित्यमुक्त इति प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्ववेदिभिः। | शैलादि बोले— हे सनत्कुमार! मैं परमेष्ठी भगवान् महेश्वरकी सम्पूर्ण महिमाको आपसे संक्षेपमें ही कहूँगा। इन शिवजीको प्रकृतिका बन्धन तथा बुद्धिका बन्धन कभी नहीं हुआ, इसी प्रकार अहंकारबन्धन तथा मनोबन्धन भी इन्हें नहीं हुआ। उन्हें न तो चित्तका बन्ध हुआ और न तो श्रोत्रका बन्ध हुआ, उन्हें त्वचा और नेत्रका भी बन्ध कभी नहीं हुआ। हे सुव्रत! उन शिवको जिह्वा, घ्राण, पाद, हाथ, वाणी, जननेन्द्रिय और शब्द आदि पाँच गुणोंका भी कोई बन्धन नहीं हुआ। तत्त्ववेत्ता मुनियोंने नित्य शुद्ध स्वभावके कारण उन शिवको नैसर्गिकरूपसे नित्यबुद्ध तथा नित्यमुक्त बतलाया है॥ २—६ १/२॥ |
| अनादिमध्यनिष्ठस्य शिवस्य परमेष्ठिनः॥ ७ ॥<br>बुद्धिं सूते नियोगेन प्रकृतिः पुरुषस्य च।<br>अहङ्कारं प्रसूतेऽस्या बुद्धिस्तस्य नियोगतः॥ ८ ॥<br>अन्तर्यामीति देहेषु प्रसिद्धस्य स्वयम्भुवः।<br>इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्राणि च शासनात्॥ ९ ॥<br>अहङ्कारोऽतिसंसृते शिवस्य परमेष्ठिनः।<br>तन्मात्राणि नियोगेन तस्य संसुवते प्रभोः॥ १० ॥<br>महाभूतान्यशेषेण महादेवस्य धीमतः।<br>ब्रह्मादीनां तृणान्तं हि देहिनां देहसङ्गतिम्॥ ११ ॥<br>महाभूतान्यशेषाणि जनयन्ति शिवाज्ञया।<br>अध्यवस्यति सर्वार्थान् बुद्धिस्तस्याज्ञया विभोः॥ १२ ॥ | आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित परमेष्ठी पुरुषरूप शिवकी आज्ञासे प्रकृति बुद्धिको उत्पन्न करती है और पुनः उन्हीं शिवके आदेशसे इस प्रकृतिकी बुद्धि अहंकारकी उत्पत्ति करती है। अन्तर्यामीरूपसे देहमें स्थित रहनेवाले प्रसिद्ध स्वयम्भू परमेष्ठी शिवके आदेशसे अहंकार दस इन्द्रियों, मन तथा शब्द आदि तन्मात्राओंको उत्पन्न करता है। उन्हीं धीमान् प्रभु महादेवके आदेशसे ये तन्मात्राएँ आकाशादि महाभूतोंको उत्पन्न करती हैं। तदनन्तर शिवकी आज्ञासे ये सब महाभूत ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त देहधारियोंके देहको उत्पन्न करते हैं। उन्हीं सर्वव्यापी शिवकी आज्ञासे बुद्धि समस्त अर्थोंका निश्चय करती है॥ ७—१२॥ |
| अन्तर्यामीति देहेषु प्रसिद्धस्य स्वयम्भुवः।<br>स्वभावसिद्धमैश्वर्यं स्वभावादेव भूतयः॥ १३ ॥<br>तस्याज्ञया समस्तार्थानहङ्कारोऽतिमन्यते।<br>चित्तं चेतयते चापि मनः सङ्कल्पयत्यपि॥ १४ ॥<br>श्रोत्रं शृणोति तच्छक्त्या शब्दस्पर्शादिकं च यत्।<br>शम्भोराज्ञाबलेनैव भवस्य परमेष्ठिनः॥ १५ ॥ | देहोंमें अन्तर्यामीरूपसे प्रसिद्ध स्वयम्भू शिवका ऐश्वर्य स्वभावसिद्ध है और उनकी विभूतियाँ भी स्वभावसे ही हैं। उन्हीं शिवकी आज्ञासे अहंकार सभी अर्थोंका स्वायत्तीकरण करता है, चित्त स्मरण कराता है और मन संकल्प करता है। कान उन्हींकी शक्तिसे श्रवण करता है। उन्हीं परमेष्ठी प्रभु शम्भुके आज्ञाबलसे |