श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय १९ ] | देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित पंचमुख सदाशिवका दर्शन | ६४५ |
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उन्नीसवाँ अध्याय
देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित नीललोहित पंचमुख सदाशिवके विराट्स्वरूपका दर्शन होना और उनकी पूजा एवं स्तुति करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शैलादिरुवाच<br>तं प्रभुं प्रीतमनसं प्रणिपत्य वृषध्वजम्।<br>अपृच्छन्मुनयो देवाः प्रीतिकण्टकितत्वचः॥ १ | शैलादि बोले— [हे सनत्कुमार!] प्रसन्न मनवाले उन प्रभु वृषध्वज शिवको प्रणाम करके हर्षसे रोमांचित शरीरवाले मुनियों तथा देवताओंने उनसे पूछा— ॥ १॥ |
| देवा ऊचुः<br>भगवन् केन मार्गेण पूजनीयो द्विजातिभिः।<br>कुत्र वा केन रूपेण वक्तुमर्हसि शङ्कर॥ २<br>कस्याधिकारः पूजायां ब्राह्मणस्य कथं प्रभो।<br>क्षत्रियाणां कथं देव वैश्यानां वृषभध्वज॥ ३<br>स्त्रीशूद्राणां कथं वापि कुण्डगोलादिनां तु वा।<br>हिताय जगतां सर्वमस्माकं वक्तुमर्हसि॥ ४ | देवता बोले— हे भगवन्! द्विजातिगण किस विधिसे, कहाँ और किस रूपसे आपका पूजन करें, हे शंकर! आप बतानेकी कृपा कीजिये। हे प्रभो! किस ब्राह्मणका [आपकी] पूजामें अधिकार है? हे देव! हे वृषध्वज! क्षत्रियों, वैश्यों, स्त्रियों, शूद्रों, कुण्ड-गोलक आदि वर्णसंकर लोगोंका आपकी पूजामें किस प्रकारसे अधिकार है? जगत्के कल्याणके लिये हमें यह सब बतानेका अनुग्रह करें॥ २–४॥ |
| सूत उवाच<br>तेषां भावं समालोक्य मुनीनां नीललोहितः।<br>प्राह गम्भीरया वाचा मण्डलस्थः सदाशिवः॥ ५<br>मण्डले चाग्रतो पश्यन् देवदेवं सहोमया।<br>देवाश्च मुनयः सर्वे विद्युत्कोटिसमप्रभम्॥ ६<br>अष्टबाहुं चतुर्वक्त्रं द्वादशाक्षं महाभुजम्।<br>अर्धनारीश्वरं देवं जटामुकुटधारिणम्॥ ७<br>सर्वाभरणसंयुक्तं रक्तमाल्यानुलेपनम्।<br>रक्ताम्बरधरं सृष्टिस्थितिसंहारकारकम्॥ ८ | सूतजी बोले— उन देवताओं और मुनियोंकी भक्ति देखकर सूर्यमण्डलमें स्थित नीललोहित सदाशिव गम्भीर वाणीमें बोले। उस अवसरपर सभी देवताओं और मुनियोंने सामने देखा कि सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले देवदेव शिव सूर्यमण्डलमें उमाके साथ विराजमान हैं, करोड़ों विद्युत्के समान उनकी प्रभा है, वे आठ भुजाओं, चार मुखों तथा बारह नेत्रोंसे शोभा पा रहे हैं, वे बड़ी-बड़ी भुजाओंसे युक्त हैं, वे प्रभु अर्धनारीश्वररूपमें हैं, वे जटाजूटरूपी मुकुट धारण किये हुए हैं, वे सभी आभरणोंसे समन्वित हैं और रक्तवर्णकी माला, चन्दन तथा वस्त्र धारण किये हुए हैं॥ ५–८॥ |
| तस्य पूर्वमुखं पीतं प्रसन्नं पुरुषात्मकम्।<br>अघोरं दक्षिणं वक्त्रं नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ९<br>दंष्ट्राकरालमत्युग्रं ज्वालामालासमावृतम्।<br>रक्तश्मश्रुं जटायुक्तं चोत्तरे विद्रुमप्रभम्॥ १०<br>प्रसन्नं वामदेवाख्यं वरदं विश्वरूपिणम्।<br>पश्चिमं वदनं तस्य गोक्षीरधवलं शुभम्॥ ११<br>मुक्ताफलमयैर्हारैर्भूषितं तिलकोज्ज्वलम्।<br>सद्योजातमुखं दिव्यं भास्करस्य स्मरारिणः॥ १२ | उनका पूर्वमुख तत्पुरुषसंज्ञक था, जो पीतवर्ण तथा प्रसन्नतासे युक्त था, उनका अघोर नामक दक्षिणमुख नीले अंजनके तुल्य, विकराल दाढ़ोंसे युक्त, अत्यन्त उग्र, ज्वालासमूहसे समावृत, रक्तवर्णकी दाढ़ीसे युक्त और जटाओंसे सुशोभित था, उत्तर दिशामें उनका वामदेव नामक मुख था, जो प्रवालमणिके सदृश प्रभासे युक्त, प्रसन्न, वरदायक तथा विश्वरूप था और उन कामरिपु भास्कररूप शिवका पश्चिममुख सद्योजात नामवाला था, जो गौके दुग्धके समान धवल, सुन्दर, मुक्ताफलसे युक्त |