श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ६४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हारोंसे सुशोभित, तिलकसे प्रकाशित तथा अत्यन्त दिव्य था॥ ९-१२॥ | |
| आदित्यमग्रतोऽपश्यन्पूर्ववच्चतुराननम् ।<br>भास्करं पुरतो देवं चतुर्वक्त्रं च पूर्ववत्॥ १३<br><br>भानुं दक्षिणतो देवं चतुर्वक्त्रं च पूर्ववत्।<br>रविमुत्तरतोऽपश्यन्पूर्ववच्चतुराननम् ॥ १४<br><br>विस्तारां मण्डले पूर्वे उत्तरां दक्षिणे स्थिताम्।<br>बोधनीं पश्चिमे भागे मण्डलस्य प्रजापतेः॥ १५<br><br>अध्यायनीं च कौबेर्यामेकवक्त्रां चतुर्भुजाम्।<br>सर्वाभरणसम्पन्नाः शक्तयः सर्वसम्मताः॥ १६ | उन्होंने आगेकी ओर शिवके ही सदृश चार मुखोंवाले आदित्यको, पूर्वकी ओर शिवसदृश चतुर्मुख भगवान् भास्करको, दक्षिणकी ओर शिवतुल्य चतुर्मुख प्रभु भानुको और उत्तरकी ओर शिवके ही समान चतुर्मुख रविको देखा। इसी प्रकार उन देवताओंने सूर्यमण्डलकी पूर्वदिशामें देवी विस्ताराको, दक्षिणमें उत्तराको, पश्चिमभागमें बोधनीको और उत्तरदिशामें एक मुख तथा चार भुजाओंवाली अध्यायनीको विराजमान देखा। सबकी पूज्य ये शक्तियाँ सभी आभरणोंसे सम्पन्न थीं॥ १३-१६॥ |
| ब्रह्माणं दक्षिणे भागे विष्णुं वामे जनार्दनम्।<br>ऋग्यजुःसाममार्गेण मूर्तित्रयमयं शिवम्॥ १७<br><br>ईशानं वरदं देवमीशानं परमेश्वरम्।<br>ब्रह्मासनस्थं वरदं धर्मज्ञानासनोपरि॥ १८<br><br>वैराग्यैश्वर्यसंयुक्ते प्रभूते विमले तथा।<br>सारं सर्वेश्वरं देवमाराध्यं परमं सुखम्॥ १९<br><br>सितपङ्कजमध्यस्थं दीप्ताद्यैरभिसंवृतम्।<br>दीप्तां दीपशिखाकारां सूक्ष्मां विद्युत्प्रभां शुभाम्॥ २०<br><br>जयामग्निशिखाकारां प्रभां कनकसुप्रभाम्।<br>विभूतिं विद्रुमप्रख्यां विमलां पद्मसंनिभाम्॥ २१<br><br>अमोघां कर्णिकाकारां विद्युत्तं विश्ववर्णिनीम्।<br>चतुर्वक्त्रां चतुर्वर्णां देवीं वै सर्वतोमुखीम्॥ २२<br><br>सोममङ्गारकं देवं बुधं बुद्धिमतां वरम्।<br>बृहस्पतिं बृहद्बुद्धिं भार्गवं तेजसां निधिम्॥ २३<br><br>मन्दं मन्दगतिं चैव समन्तात्तस्य ते सदा।<br>सूर्यः शिवो जगन्नाथः सोमः साक्षादुमा स्वयं॥ २४<br><br>पञ्चभूतानि शेषाणि तन्मयं च चराचरम्।<br>दृष्ट्वैव मुनयः सर्वे देवदेवमुमापतिम्॥ २५ | देवताओं तथा मुनियोंने उनके दाहिनी ओर ब्रह्माको और बायीं ओर जनार्दन विष्णुको देखा। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके क्रमसे [ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णुमय रूपमें] तीन विग्रहोंसे सुशोभित सबके स्वामी, वरद, ईशान, वरदायक, परमेश्वर शिवको धर्मज्ञानके आसनपर ब्रह्मासनमें स्थित देखा। उन्होंने वैराग्य तथा ऐश्वर्यसे सुशोभित विशाल तथा विमल आसनपर श्वेत कमलके मध्यमें विराजमान सबके स्वामी, देवताओंके आराध्य, सर्वोपरि तथा सुखदायक शिवको दीप्ता आदि [नौ] शक्तियोंसे आवृत देखा। उन देवताओं और मुनियोंने प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान दीप्ताको, विद्युत्प्रभाके समान शुभ सूक्ष्माको, अग्निशिखाके आकारवाली जयाको, सुवर्णके कान्तिसदृश प्रभाको, विद्रुम (मूँगा)-के समान वर्णवाली विभूतिको, कमलसदृश विमलाको, कमलकी कर्णिकाके रूपवाली अमोघाको, अनेक वर्णोंवाली देवी विद्युत्को, चार मुखों और चार वर्णोंवाली देवी सर्वतोमुखीको, चन्द्रमाको, मंगलको, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देव बुधको, महान् बुद्धिवाले बृहस्पतिको, तेजोनिधि शुक्रको और मन्दगतिवाले शनैश्चरको सदा उन शिवके चारों ओर स्थित देखा। स्वयं जगत्स्वामी शिवरूप सूर्य, साक्षात् उमारूप चन्द्र और गगनादि पंचमहाभूतरूप भौम आदि पाँच ग्रह हैं, इन्हींसे चराचर जगत् व्याप्त है। इस प्रकार देवदेव उमापति सदाशिवको देखते ही सभी मुनियोंको पूजाविधिका ज्ञान |