भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १९] देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित पंचमुख सदाशिवका दर्शन ६४७


संस्कृतहिन्दी
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे मुनयो देवतास्तथा।<br>अस्तुवन् वाग्भिरिष्टाभिर्वरदं नीललोहितम्॥ २६हो गया और उन सभी मुनियों तथा देवताओंने हाथ जोड़कर अभिलषित वाणीद्वारा वर प्रदान करनेवाले नीललोहित भगवान् शिवकी स्तुति की॥ १७—२६॥
ऋषय ऊचुः<br>नमः शिवाय रुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे।<br>मीढुष्टमाय शर्वाय शिपिविष्टाय रंहसे॥ २७<br>प्रभूते विमले सारे ह्याधारे परमे सुखे।<br>नवशक्त्यावृतं देवं पद्मस्थं भास्करं प्रभुम्॥ २८<br>आदित्यं भास्करं भानुं रविं देवं दिवाकरम्।<br>उमां प्रभां तथा प्रज्ञां सन्ध्यां सावित्रिकामपि॥ २९<br>विस्तारामुत्तरां देवीं बोधनीं प्रणमाम्यहम्।<br>आप्यायनीं च वरदां ब्रह्माणं केशवं हरम्॥ ३०ऋषिगण बोले— शिव, रुद्र, कद्रुद्र, प्रचेता, मीढुष्टम, शर्व, शिपिविष्ट तथा रंहको नमस्कार है। विशाल, विमल, श्रेष्ठ तथा परम सुखदायक आसनपर विराजमान, नौ शक्तियोंसे आवृत तथा कमलके मध्यमें स्थित भगवान् भास्करको, आदित्य-भास्कर-भानु, रवि, देव तथा दिवाकरको उमा, प्रभा, प्रज्ञा, सन्ध्या, सावित्रिका, विस्तारा, उत्तरा, देवी बोधनी, वर प्रदान करनेवाली आप्यायनी, ब्रह्मा, केशव तथा हरको मैं प्रणाम करता हूँ॥ २७—३०॥
सोमादिवृन्दं च यथाक्रमेण<br>सम्पूज्य मन्त्रैर्विहितक्रमेण।<br>स्मरामि देवं रविमण्डलस्थं<br>सदाशिवं शङ्करमादिदेवम्॥ ३१विहित विधिसे मन्त्रोंके द्वारा यथाक्रम सोम आदिका सम्यक् पूजन करके मैं सूर्यमण्डलमें विराजमान सदाशिव आदिदेव भगवान् शंकरका स्मरण करता हूँ॥ ३१॥
इन्द्रादिदेवांश्च तथेश्वरांश्च<br>नारायणं पद्मजमादिदेवम्।<br>प्रागाद्यधोध्वं च यथाक्रमेण<br>वज्रादिपद्मं च तथा स्मरामि॥ ३२इन्द्र आदि आठ दिक्पालोंका, उनके अधिदेवताओंका, नारायणका, आदिदेव ब्रह्माका, यथाक्रम पूर्व आदि आठ दिशाओंका, ऊर्ध्व तथा अधः दिशाओंका और वज्र, पद्म आदिका स्मरण करता हूँ॥ ३२॥
सिन्दूरवर्णाय समण्डलाय<br>सुवर्णवज्राभरणाय तुभ्यम्।<br>पद्माभनेत्राय सपङ्कजाय<br>ब्रह्मेन्द्रनारायणकारणाय ॥ ३३सिन्दूरके समान वर्णवाले, मण्डलयुक्त, सुवर्ण तथा हीरेके आभरणोंसे सुशोभित, कमलसदृश नेत्रोंवाले, कमल धारण करनेवाले तथा ब्रह्मा-इन्द्र-नारायणके भी कारणरूप सदाशिवको नमस्कार है॥ ३३॥
रथं च सप्ताश्वमनूरुवीरं<br>गणं तथा सप्तविधं क्रमेण।<br>ऋतुप्रवाहेण च वालखिल्यान्<br>स्मरामि मन्देहगणक्षयं च॥ ३४मैं सूर्यके रथको, सात घोड़ोंको, पराक्रमी अरुणको, वसन्तादि ऋतुक्रमसे व्यवस्थित सप्तविध गणोंको, वालखिल्य आदि ऋषियोंको तथा मन्देह नामक असुरोंके विनाशको स्मृति-पथपर लाता हूँ॥ ३४॥
हुत्वा तिलाद्यैर्विविधैस्तथाग्नौ<br>पुनः समाप्यैव तथैव सर्वम्।<br>उद्वास्य हृत्पङ्कजमध्यसंस्थं<br>स्मरामि बिम्बं तव देवदेव॥ ३५हे देवदेव! तिल आदि विविध पदार्थोंसे अग्निमें हवन करके पुनः सम्पूर्ण कृत्यका समापन करके हृदयकमलके मध्य संस्थित आपके बिम्बको मण्डलसे निकालकर मैं स्मरण करता हूँ॥ ३५॥
स्मरामि बिम्बानि यथाक्रमेण<br>रक्तानि पद्मामललोचनानि।मैं क्रमशः आपके रक्तबिम्बोंका, पद्मके समान निर्मल नेत्रोंका, दाहिने हाथमें स्थित पद्म, बायें हाथमें स्थित वरद मुद्राका तथा शोभासम्पन्न आभूषणोंका स्मरण करता हूँ॥ ३६॥