भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २० ] पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा | ६४९


Sanskrit ShlokaHindi Translation
ते देवा मुनयः सर्वे शिवमुद्दिश्य शङ्करम्।<br>प्रणेमुश्च महात्मानो रुद्रध्यानेन विह्वलाः ॥ ५<br>जग्मुर्यथागतं देवा मुनयश्च तपोधनाः।<br>तस्मादभ्यर्चयेन्नित्यमादित्यं शिवरूपिणम् ॥ ६<br>धर्मकामार्थमुक्त्यर्थं मनसा कर्मणा गिरा।सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये—ऐसा कहकर भगवान् रुद्र वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥ १—४ ॥<br><br>इसके बाद वे समस्त देवता तथा महान् आत्मावाले मुनिगण कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरको उद्देश्य करके प्रणाम करने लगे। तदनन्तर देवता तथा तपोधन मुनलोग प्रसन्न होकर रुद्रका ध्यान करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। अतएव धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये मन-वचन-कर्मसे शिवरूप आदित्यकी नित्य पूजा करनी चाहिये ॥ ५-६ १/२ ॥
ऋषय ऊचुः<br>रोमहर्षण सर्वज्ञ सर्वशास्त्रभृतां वर ॥ ७<br>व्यासशिष्य महाभाग वाह्येयं वद साम्प्रतम्।<br>शिवेन देवदेवेन भक्तानां हितकाम्यया ॥ ८<br>वेदात् षडङ्गादुद्धृत्य सांख्ययोगाच्च सर्वतः।<br>तपश्च विपुलं तप्त्वा देवदानवदुश्चरम् ॥ ९<br>अर्थदेशादिसंयुक्तं गूढमज्ञाननिन्दितम्।<br>वर्णाश्रमकृतैर्धर्मैर्विपरीतं क्वचित्समम् ॥ १०<br>शिवेन कथितं शास्त्रं धर्मकामार्थमुक्तये।<br>शतकोटिप्रमाणेन तत्र पूजा कथं विभोः ॥ ११<br>स्नानयोगादयो वापि श्रोतुं कौतूहलं हि नः।ऋषिगण बोले—हे रोमहर्षण ! हे सर्वज्ञ ! सभी शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले हे व्यासशिष्य ! हे महाभाग ! अब आप हमें वाह्येय (अग्निपुराणोक्त) शिवपूजाकी विधि बताइये। भक्तोंके कल्याणके लिये देवाधिदेव शिवने देवताओं तथा दानवोंके लिये दुश्चर कठोर तप करके षडंग वेदसे तथा सांख्ययोगसे भलीभाँति ग्रहण करके अर्थ-देश आदिसे युक्त, गूढ़, अविवेकियोंके द्वारा निन्दित, वर्णाश्रमकृत धर्मोंसे कहीं-कहीं विपरीत तथा कहीं-कहीं अनुकूल जिस शतकोटि प्रमाणवाले शास्त्रको धर्म-अर्थ-काम-मोक्षहेतु कहा है, उसमें उन सर्वव्यापी शिवकी पूजा, स्नान, योग आदिका क्या विधान है? उसे सुननेकी हमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ७–११ १/२ ॥
सूत उवाच<br>पुरा सनत्कुमारेण मेरुष्पृष्ठे सुशोभने ॥ १२<br>पृष्टो नन्दीश्वरो देवः शैलादिः शिवसम्मतः।<br>पृष्टोऽयं प्रणिपत्यैवं मुनिमुख्यैश्च सर्वतः ॥ १३<br>तस्मै सनत्कुमाराय नन्दिना कुलन्दिना।<br>कथितं यच्छिवज्ञानं शृण्वन्तु मुनिपुङ्गवाः ॥ १४<br>शैव संङ्क्षिप्य वेदोक्तं शिवेन परिभाषितम्।<br>स्तुतिनिन्दादिरहितं सद्यः प्रत्ययकारकम् ॥ १५<br>गुरुप्रसादजं दिव्यमनायासेन मुक्तिदम्।सूतजी बोले—पूर्वकालमें सनत्कुमारने अत्यन्त सुन्दर मेरुशिखरपर शिवजीके प्रिय शैलादि भगवान् नन्दीश्वरसे यही बात पूछी थी। प्रणाम करके श्रेष्ठ मुनियोंने भी इनसे ऐसा ही पूछा था। हे मुनीश्वरो ! तब अपने कुलको आनन्दित करनेवाले नन्दीने उन सनत्कुमारको जिस शिवज्ञानका उपदेश किया था, उसे आपलोग सुनें। स्वयं शिवके द्वारा संक्षिप्त करके परिभाषित किया गया वह शिवज्ञान वेदप्रतिपादित, निन्दा आदिसे रहित, शीघ्र ही श्रद्धा उत्पन्न करनेवाला, गुरुकृपासे प्राप्त होनेवाला, दिव्य तथा अनायास ही मुक्ति देनेवाला है ॥ १२–१५ १/२ ॥
सनत्कुमार उवाच<br>भगवन् सर्वभूतेश नन्दीश्वर महेश्वर ॥ १६सनत्कुमार बोले—हे भगवन् ! हे सर्वभूतेश ! हे नन्दीश्वर ! हे महेश्वर ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके