श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ६५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कथं पूजादयः शम्भोर्धर्मकामार्थमुक्तये ।<br>वक्तुमर्हसि शैलादे विनयेनागताय मे ॥ १७ ॥ | लिये शिवकी पूजा आदिका क्या विधान है? हे शैलादे ! विनयपूर्वक मुझ आये हुएको यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १६-१७ ॥ |
| सूत उवाच<br>सम्प्रेक्ष्य भगवान्नन्दी निशम्य वचनं पुनः ।<br>कालवेलाधिकाराद्यामवदद्वदतां वरः ॥ १८ ॥ | सूतजी बोले—[ हे मुनीश्वरो !] उनकी ओर देखकर तथा पुनः उनका वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् नन्दी समुचित समय उपस्थित जानकर उनसे कहने लगे ॥ १८ ॥ |
| शैलादिरुवाच<br>गुरुतः शास्त्रतश्चैवमधिकारं ब्रवीम्यहम् ।<br>गौरवादेव संज्ञाैषा शिवाचार्यस्य नान्यथा ॥ १९ ॥<br>स्वयमाचरते यस्तु आचारे स्थापयत्यपि ।<br>आचिनोति च शास्त्रार्थानाचार्यस्तेन चोच्यते ॥ २० ॥ | **शैलादि बोले—**गुरु तथा शास्त्रसे प्राप्त ज्ञानके आधारपर मैं अधिकार (पात्रता)-के विषयमें बता रहा हूँ। गौरवके कारण ही शिवशास्त्रके आचार्यकी 'गुरु'—यह संज्ञा होती है, इसके विपरीत नहीं। जो स्वयं आचरण करता है, [दूसरोंको भी] आचारमें स्थापित करता है तथा शास्त्रके अर्थज्ञानका संग्रह करता है, वह आचार्य कहा जाता है ॥ १९-२० ॥ |
| तस्माद्वेदार्थतत्त्वज्ञमाचार्यं भस्मशायिनम् ।<br>गुरुमन्वेषयेद्भक्तः सुभगं प्रियदर्शनम् ॥ २१ ॥<br>प्रतिपन्नं जनान्दं श्रुतिस्मृतिपथानुगम् ।<br>विद्याभयदातारं लौल्यचापल्यवर्जितम् ॥ २२ ॥<br>आचारपालकं धीरं समयेषु कृतास्पदम् ।<br>तं दृष्ट्वा सर्वभावेन पूजयेच्छिववद्गुरुम् ॥ २३ ॥<br><br>आत्मना च धनेनैव श्रद्धावित्तानुसारतः ।<br>तावदाराधयेच्छिष्यः प्रसन्नोऽसौ यथा भवेत् ॥ २४ ॥<br>सुप्रसन्ने महाभागे सद्यः पाशक्षयो भवेत् ।<br>गुरुर्मान्यो गुरुः पूज्यो गुरुरेव सदाशिवः ॥ २५ ॥ | अतः भक्तको चाहिये कि वह वेदार्थतत्त्वज्ञ, भस्म धारण करनेवाले, सुशील, प्रिय दर्शनवाले, सम्मानित लोगोंको आनन्दित करनेवाले, श्रुति तथा स्मृतिमें प्रतिपादित मार्गका अनुसरण करनेवाले, विद्यासे अभय प्रदान करनेवाले, लालच तथा चपलतासे रहित, आचारका पालन करनेवाले, धैर्यशाली तथा सन्ध्या आदिकालोंमें समुचित स्थानपर स्थित रहनेवाले आचार्य गुरुका अन्वेषण करे। उस गुरुको प्राप्त करके अनन्य भावसे शिवकी ही भाँति उनका पूजन करना चाहिये। शिष्यको चाहिये कि वह शरीरसे, धनसे तथा श्रद्धा-विश्वासके अनुसार गुरुकी वैसी सेवा करे, जिससे वे प्रसन्न हो जायें। महाभाग गुरुके प्रसन्न हो जानेपर शीघ्र पाश (बन्धन)-का क्षय हो जाता है। गुरु मान्य हैं, गुरु पूज्य हैं, गुरु साक्षात् सदाशिव ही हैं ॥ २१-२५ ॥ |
| संवत्सरत्रयं वाथ शिष्यान् विप्रान् परीक्षयेत् ।<br>प्राणद्रव्यप्रदानेन आदेशैश्च इतस्ततः ॥ २६ ॥<br>उत्तमश्चाधमे योज्यो नीच उत्तमवस्तुषु ।<br>आकृष्टस्ताडिता वापि ये विषादं न यान्ति वै ॥ २७ ॥<br>ते योग्याः शिवधर्मिष्ठाः शिवधर्मपरायणाः ।<br>संयता धर्मसम्पन्नाः श्रुतिस्मृतिपथानुगाः ॥ २८ ॥ | गुरुको भी चाहिये कि प्रिय वस्तुके प्रदानसे तथा इधर-उधर अनेक कार्योंके लिये आदेशोंद्वारा तीन वर्षोंतक ब्राह्मण-शिष्योंकी परीक्षा करे। उत्तम [शिष्य]-को अधम कार्यमें तथा अधमको उत्तम कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये। गुरुके द्वारा आकृष्ट तथा ताड़ित होनेपर भी जो शिष्य विषादको प्राप्त नहीं होते, वे ही शिवधर्मके अधिकारी हैं। शिवधर्मिष्ठ, शिवधर्मपरायण, जितेन्द्रिय, धर्मसम्पन्न, श्रुति-स्मृतिके मार्गका अनुसरण करनेवाले, |