श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २० ] पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा ६५१
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वद्वन्द्वसहा धीरा नित्यमुद्युक्तचेतसः ।<br>परोपकारनिरता गुरुशुश्रूषणे रताः ॥ २९<br><br>आर्जवा मार्दवाः स्वस्था अनुकूलाः प्रियंवदाः ।<br>अमानिनो बुद्धिमन्तस्त्यक्तस्पर्धा गतस्पृहाः ॥ ३०<br><br>शौचाचारगुणोपेता दम्भमात्सर्यवर्जिताः ।<br>योग्या एवं द्विजाः सर्वे शिवभक्तिपरायणाः ॥ ३१<br><br>एवंवृत्तसमोपेता वाङ्मनःकायकर्मभिः ।<br>शोध्या एवंविधाश्चैव तत्त्वानां च विशुद्धये ॥ ३२<br><br>शुद्धो विनयसम्पन्नो मिथ्याकटुकवर्जितः ।<br>गुर्वाज्ञापालकश्चैव शिष्योऽनुग्रहमर्हति ॥ ३३ | [सुख-दुःख आदि] सभी द्वन्द्वोंको सहनेवाले, धैर्यशाली, सदा उद्योगशील चित्तवाले, परोपकारमें लगे रहनेवाले, गुरुसेवामें निरत, सरल तथा मृदु स्वभाववाले, स्वस्थचित्त, गुरुके अनुकूल, प्रिय बोलनेवाले, मानरहित, बुद्धिसम्पन्न, स्पर्धाविहीन, कामनाशून्य, शौच-आचार आदि गुणोंसे युक्त, दम्भ तथा मात्सर्यसे विहीन—इस प्रकारके शिवभक्तिपरायण सभी द्विज शिष्य होनेके अधिकारी हैं। [इन्द्रिय आदि चौबीस] तत्त्वोंकी शुद्धिके लिये मन-वाणी-कर्मसे इन आचरणोंसे सम्पन्न इस प्रकारके शिष्योंका शोधन करना चाहिये। शुद्ध हृदयवाले, विनयसे सम्पन्न, मिथ्या तथा कटुभाषणसे रहित और गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला शिष्य ही गुरुकृपाके योग्य होता है ॥ २६–३३ ॥ |
| गुरुश्च शास्त्रवित्प्राज्ञस्तपस्वी जनवत्सलः ।<br>लोकाचाररतो ह्येवं तत्त्वविन्मोक्षदः स्मृतः ॥ ३४ | शास्त्रज्ञ, बुद्धिमान्, तपस्वी, लोकप्रिय, लोकाचारमें रत तथा तत्त्वज्ञानी गुरु मोक्ष देनेमें समर्थ बताया गया है। |
| सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः ।<br>सर्वोपायविधानज्ञस्तत्त्वहीनस्य निष्फलम् ॥ ३५ | गुरु सभी लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त शास्त्रोंमें निष्णात तथा सभी उपायोंके विधानको जाननेवाला भी हो, किंतु यदि वह आत्मज्ञानसे रहित हो, तो सब कुछ निष्फल है। |
| स्वसंवेद्ये परे तत्त्वे निश्चयो यस्य नात्मनि ।<br>आत्मनोऽनुग्रहो नास्ति परस्यानुग्रहः कथम् ॥ ३६ | स्वयं अनुभूत किये जानेवाले परात्मतत्त्वमें जिसकी निश्चित धारणा न हो, उसका अपना ही कल्याण नहीं है, तो उसके द्वारा दूसरेका कल्याण कैसे सम्भव है ? |
| प्रबुद्धस्तु द्विजो यस्तु स शुद्धः साधयत्यपि ।<br>तत्त्वहीने कुतो बोधः कुतो ह्यात्मपरिग्रहः ॥ ३७ | जो आत्मज्ञानी द्विज है, वह स्वयं शुद्ध है और दूसरोंको भी शुद्ध कर देता है। तत्त्वहीन गुरुमें बोध कहाँसे होगा और उसका आत्मोद्धार कैसे होगा! |
| परिग्रहविनिर्मुक्तास्ते सर्वे पशवोदिताः ।<br>पशुभिः प्रेरिता ये तु सर्वे ते पशवः स्मृताः ॥ ३८ | जो आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे सब पशु कहे गये हैं। पशुतुल्य द्विजके द्वारा जो शिष्य ज्ञानप्रेरित किये जाते हैं, वे सब भी पशु ही कहे गये हैं। |
| तस्मात्तत्त्वविदो ये तु ते मुक्ता मोचयन्त्यपि ।<br>संवित्तिजननं तत्त्वं परानन्दसमुद्भवम् ॥ ३९ | अतः जो लोग तत्त्ववेत्ता हैं, वे ही मुक्त हैं और दूसरोंको भी मुक्त कर सकते हैं। आत्मबोध उत्पन्न करनेवाला तत्त्व परानन्दको उत्पन्न करता है। |
| तत्त्वं तु विदितं येन स एवानन्ददर्शकः ।<br>न पुनर्नाममात्रेण संवित्तिरहितस्तु यः ॥ ४० | उस तत्त्वको जिसने जान लिया, वही परमानन्दका दर्शन करानेमें समर्थ है, नाममात्रका गुरु ऐसा नहीं कर सकता। |
| अन्योन्यं तारयेन्नैव किं शिला तारयेच्छिलाम् ।<br>येषां तन्नाममात्रेण मुक्तिर्वै नाममात्रिका ॥ ४१ | जो आत्मज्ञानविहीन है, वह दूसरेको कभी नहीं तार सकता, क्या [कोई] शिला दूसरी |