श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २१] शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य ६५३
इक्कीसवाँ अध्याय
शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| परीक्ष्य भूमिं विधिवद्गन्धवर्णरसादिभिः।<br>अलङ्कृत्य वितानाद्यैरीश्वरावाहनक्षमाम्॥ १<br>एकहस्तप्रमाणेन् मण्डलं परिकल्पयेत्।<br>आलिखेत्कमलं मध्ये पञ्चरत्नसमन्वितम्॥ २<br>चूर्णैरष्टदलं वृत्तं सितं वा रक्तमेव च।<br>परिवारेण संयुक्तं बहुशोभासमन्वितम्॥ ३<br>आवाह्य कर्णिकायां तु शिवं परमकारणम्।<br>अर्चयेत्सर्वयत्नेन यथाविभवविस्तरम्॥ ४ | गन्ध, वर्ण, रस आदिसे भलीभाँति भूमिकी परीक्षा करके ईश्वरके आवाहनयोग्य उस स्थानको वितान (चाँदनी) आदिसे अलंकृत करके वहाँ एक हाथ मापका मण्डल बनाना चाहिये। उसके मध्यमें चूर्णोंके द्वारा पंचरत्नसमन्वित श्वेत या रक्तवर्ण गोल अष्टदल कमलकी रचना करनी चाहिये। तत्पश्चात् [उस कमलकी] कर्णिकामें परिवारसे युक्त, अति शोभामय परम कारण शिवका आवाहन करके अपने सामर्थ्यके अनुसार पूर्ण प्रयत्नसे उनका पूजन करना चाहिये॥ १–४॥ |
| दलेषु सिद्धयः प्रोक्ताः कर्णिकायां महामुने।<br>वैराग्यज्ञाननालं च धर्मकन्दं मनोरमम्॥ ५<br>वामा ज्येष्ठा च रौद्री च काली विकरणी तथा।<br>बलविकरणी चैव बलप्रमथिनी क्रमात्॥ ६<br>सर्वभूतस्य दमनी केसरेषु च शक्तयः।<br>मनोन्मनी महामाया कर्णिकायां शिवासने॥ ७<br>वामदेवादिभिः सार्धं द्वन्द्वन्यायेन विन्यसेत्।<br>मनोन्मनं महादेवं मनोन्मन्याथ मध्यतः॥ ८ | हे महामुने! कर्णिकाके कमलदलोंमें [अणिमा आदि आठ] सिद्धियाँ स्थित बतायी गयी हैं। वैराग्य-ज्ञानरूप उसका नाल है तथा धर्मरूप उसका मनोरम कन्द (मूल) है। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथिनी और सर्वभूतदमनी—क्रमशः ये आठ शक्तियाँ केसरोमें स्थित हैं तथा महामायारूपा मनोन्मनी शिवासनरूप कर्णिकामें विराजमान हैं; उन-उन स्थानोंमें उनका ध्यान करना चाहिये। वामदेव आदिके साथ इन वामा आदि आठ शक्तियोंका तथा मध्यमें देवी मनोन्मनीके साथ मनोन्मन महादेवकी दाम्पत्यरूपसे प्रतिष्ठा करनी चाहिये॥ ५–८॥ |
| सूर्यसोमाग्निसम्बन्धात्प्रणवाख्यं शिवात्मकम्।<br>पुरुषं विन्यसेद्वक्त्रं पूर्वे पत्रे रविप्रभम्॥ ९<br>अघोरं दक्षिणे पत्रे नीलाञ्जनचयोपमम्।<br>उत्तरे वामदेवाख्यं जपाकुसुमसन्निभम्॥ १०<br>सद्यं पश्चिमपत्रे तु गोक्षीरधवलं न्यसेत्।<br>ईशानं कर्णिकायां तु शुद्धस्फटिकसन्निभम्॥ ११ | सूर्य-चन्द्र-अग्निके सम्बन्धसे प्रणव नामक सूर्यतुल्य प्रभाववाले शिवरूप तत्पुरुषका [कमलके] पूर्व पत्रमें न्यास करना चाहिये। नीलांजनसदृश अघोरका दक्षिण पत्रमें, जपाकुसुमके समान वर्णवाले वामदेव नामक शिवका उत्तर पत्रमें, गोदुग्धके समान धवल सद्योजातका पश्चिम पत्रमें और शुद्ध स्फटिकके समान कान्तिवाले ईशानका कमलकी कर्णिकामें न्यास करना चाहिये॥ ९–११॥ |
| चन्द्रमण्डलसङ्काशं हृदयायेति मन्त्रतः।<br>वाह्नये रुद्रदिग्भागे शिरसे धूम्रवर्चसे॥ १२<br>शिखायै च नमश्चेति रक्ताभे नैर्ऋते दले।<br>कवचायाञ्जनाभाय इति वायुदले न्यसेत्॥ १३ | चन्द्रमण्डलसङ्काशाय हृदयाय नमः—इस मन्त्रसे अग्निकोणके दलमें, धूम्रवर्चसे शिरसे नमः—इस मन्त्रसे ईशानकोणके दलमें, रक्ताभाय शिखायै नमः—इस मन्त्रसे नैर्ऋत्यकोणके दलमें और अञ्जनाभाय |